Tuesday, November 4, 2025

आत्मा का प्रतिबिंब

 "आत्मा का प्रतिबिंब"


छाया के भीतर एक छाया है,

प्रकाश के दिल में एक अँधेरा

जहाँ मनुष्य अपने ही प्रतिबिंब से डरता है,

और सत्य, दर्पण की दरारों में छिपा रहता है।


वह जो मुस्कान पहनता है सभ्यता की,

जानता है भीतर की दरारें कहाँ से शुरू होती हैं।

एक इच्छा है—मुक्त होने की,

पर मुक्ति किससे? अपने ही आप से?


हर पवित्र विचार की तह में

एक फुसफुसाहट है मृदु, पर विकराल।

जो कहती है: “मैं भी तुम ही हूँ,”

और यही शब्द सबसे भयानक हैं।


मनुष्य दो हिस्सों में नहीं बँट सकता,

क्योंकि वह हर साँस में अपना अँधेरा लेकर चलता है।

जो उससे भागता है, वही अंततः निगल लिया जाता है।


संतुलन ही सबसे कठिन साधना है

न कि प्रकाश का जय,

न अंधकार की पराजय,

बल्कि यह स्वीकार कि दोनों एक ही आत्मा के स्वर हैं,

जो अनसुने रह जाएँ तो चीख में बदल जाते हैं।

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