Tuesday, November 4, 2025

परछाइयों का अंधकार

 परछाइयों का अंधकार


अंधकार में परछाई गायब हो जाती है जैसे किसी का अस्तित्व ही अचानक लुप्त हो जाए। शायद उसी तरह कुछ लोग हमारे जीवन से ओझल हो जाते हैं। वे जो कभी हमारे साथ थे, हमारी मुस्कान में बसे थे, वे धीरे-धीरे हमारी दृष्टि से, और फिर हमारी आत्मा से भी मिटने लगते हैं।


कभी-कभी यह गायब होना अचानक नहीं होता। यह धीरे-धीरे, अनकहे शब्दों और अनसुनी भावनाओं के बीच होता है। जब हम किसी को समझने की कोशिश छोड़ देते हैं, या जब कोई हमें समझना छोड़ देता है वहीं से अंधकार जन्म लेता है।


मनुष्य का मन भी अंधकार की तरह है गहराई में जितना उतरते जाओ, उतनी ही परछाइयाँ मिलती हैं। पर हर परछाई किसी प्रकाश की गवाही भी देती है। शायद इसलिए कुछ लोग पूरी तरह खो नहीं जाते; वे हमारे भीतर की किसी रोशनी में अब भी झिलमिलाते रहते हैं स्मृतियों की लौ बनकर।


अंधकार कभी पूरी तरह स्थायी नहीं होता। जब भी मन के किसी कोने में आशा की किरण जलती है, वे परछाइयाँ फिर लौट आती हैं कभी एक आह बनकर, कभी एक मुस्कान में घुलकर।

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