"प्यार का भ्रम"
प्यार… यह शब्द जितना सरल लगता है, उतना ही जटिल इसकी अनुभूति है। मनुष्य के अस्तित्व का सबसे सुंदर और सबसे खतरनाक भ्रम यही है प्यार का भ्रम।
यह भ्रम न स्त्री का है, न पुरुष का यह मानव मन की वह गहन स्थिति है जहाँ कल्पना, चाहत, अकेलापन, संवेदना और आत्म-प्रत्यय एक-दूसरे में विलीन होकर वास्तविकता का आभास देने लगते हैं।
मनोविज्ञान का दृष्टिकोण
मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो प्यार का भ्रम (Illusion of Love) एक ऐसी मानसिक अवस्था है जहाँ व्यक्ति दूसरे के प्रति अपने आकर्षण, अपेक्षाओं या भावनात्मक निवेश को ‘सच्चा प्रेम’ समझ बैठता है।
यह भ्रम इसलिए बनता है क्योंकि मानव मस्तिष्क संबंध की आवश्यकता से संचालित होता है।
हर व्यक्ति के भीतर एक अवचेतन भय होता है “अकेले रह जाने का भय।”
जब कोई व्यक्ति थोड़ी-सी सहानुभूति, कोमलता या ध्यान दिखाता है, तब यह भय शांत हो जाता है, और मन उसी क्षण ‘प्रेम का आभास’ महसूस करने लगता है।
कई बार यह प्रेम नहीं, बल्कि भावनात्मक निर्भरता (Emotional Dependency) होती है।
फिर भी मन उसे प्यार का नाम देता है, क्योंकि भ्रम में भी सुकून है, जबकि सत्य में दर्द।
भावनाओं का विस्तार
प्यार का भ्रम इसलिए स्थायी लगता है क्योंकि इसमें भावनाएँ सच्ची होती हैं
भले ही उनका आधार झूठा हो।
जब कोई व्यक्ति किसी की हर बात में अपना प्रतिबिंब देखने लगता है,
जब दूसरे की मुस्कान अपने हृदय की धड़कन बन जाती है,
तो मन वास्तविकता और कल्पना की सीमा भूल जाता है।
भ्रम की यही सुंदरता है
यह झूठ होते हुए भी सच्चे जैसा लगता है।
यह एक सपना है, जो खुली आँखों से देखा जाता है,
और जब वह सपना टूटता है, तो व्यक्ति खुद से प्रश्न करता है
"क्या यह प्यार था, या सिर्फ़ एक भावनात्मक मृगतृष्णा?"
सामाजिक आयाम
समाज में प्यार का भ्रम अक्सर संस्कृति, मीडिया और सामाजिक अपेक्षाओं से भी जन्म लेता है।
फ़िल्में, कहानियाँ और गीत हमें यह सिखाते हैं कि प्यार में सब कुछ सम्भव है
पर वास्तविक जीवन में प्यार की जगह समझ, सम्मान और धैर्य लेते हैं।
समाज हमें यह नहीं सिखाता कि प्यार का अंत भी शालीनता से हो सकता है।
इसलिए जब प्रेम मुरझाने लगता है, तो लोग स्वीकार नहीं कर पाते कि वह अब प्यार नहीं रहा
वे भ्रम में जीते रहते हैं, जैसे अब भी वही जादू मौजूद है।
दार्शनिक दृष्टिकोण
दार्शनिक रूप से, प्यार का भ्रम अस्तित्व की खोज है।
मनुष्य हमेशा किसी ‘दूसरे’ में खुद को खोजता है।
कभी यह खोज आत्मा का विस्तार होती है, कभी एक ग़लत पहचान।
भ्रम में डूबा प्रेम मनुष्य को सत्य की ओर नहीं, सपनों की ओर खींचता है
फिर भी यही भ्रम जीवन को अर्थ देता है।
क्योंकि सत्य सूखा हो सकता है,
पर भ्रम में रस है, रंग है, कविता है।
कभी-कभी भ्रम ही मनुष्य की सबसे सुंदर सच्चाई बन जाता है।
प्यार का भ्रम किसी की गलती नहीं
यह मनुष्य की संवेदनशीलता का प्रमाण है।
जिसे यह भ्रम हुआ, वह यह सिद्ध कर देता है कि उसके भीतर अभी भी महसूस करने की क्षमता जीवित है।
पर बुद्धिमत्ता यह नहीं कि हम भ्रम में न पड़ें,
बल्कि यह कि जब हमें उसका आभास हो
तो हम मुस्कराकर स्वीकार करें कि यह भी जीवन की एक सीख थी।
प्यार का भ्रम अंत नहीं, एक अध्याय है
जो हमें सिखाता है कि सच्चा प्यार तब जन्म लेता है,
जब भ्रम का पर्दा हटता है और हम खुद से प्रेम करना सीखते हैं।
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