मुक्ति क्या है और मोक्ष क्या है ?
इस पर भी यहां थोड़ा विचार कर लेना चाहिए। अपने स्थान पर यह बात पूर्ण सत्य है कि एक बार जन्म-मरण के चक्र में फंसने के बाद उसमें से निकलना जीवात्मा के लिए अत्यन्त कठिन है। जिसे 'भवमुक्ति' कहते हैं, वह है जीवन-मरण से सदैव के लिए मुक्त हो जाना। भवमुक्ति में संसार में आवागमन से जीवात्मा तो मुक्त हो जाती है लेकिन उसका अस्तित्व किसी-न-किसी लोक-लोकांतर में, किसी-न-किसी रूप में बना ही रहता है। जीवात्मा और शरीर का नाता-रिश्ता दूध और पानी के समान है। भवमुक्ति में भौतिक शरीर और भौतिक जगत से जीवात्मा निवृत्त तो हो जाती है, लेकिन जिस लोक में जाती है, वहां का शरीर उसे धारण करना पड़ता है। भवमुक्ति के पश्चात आत्ममुक्ति है। स्थूल शरीर का अन्य शरीरों से भी सदैव के लिए मुक्त हो जाना आत्ममुक्ति है। इस अवस्था में आत्मा अपने निज शरीर यानी आत्मशरीर को उपलब्ध हो जाती है। ऐसी आत्मा को ही *विशुद्धात्मा* कहते हैं। अंततः एक ऐसी अवस्था आती है जब आत्मा अपने निज शरीर का भी त्याग कर देती है और यही त्याग आत्मा को आकर्षित करता है परमात्मा की ओर जिसका परिणाम है-- *मोक्ष*। आत्मा के ऊपर यदि कोई है तो वह है-- *परमात्मा।*
परमात्मा क्या है ?
परमात्मा सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्ड के कण-कण में व्याप्त *परमतत्व* है। वह अनादि, असीम और अनन्त है। *व्याप्तम येन चराचरम* है।
मोक्ष का अर्थ है-- *आत्मतत्व और परमात्मतत्व का सामरस्य भाव*। आत्मा के अस्तित्व का परमात्मा के अस्तित्व में सदैव के लिए लय हो जाना। जीवात्मा की यात्रा कब समाप्त होगी और कब आवागमन से मुक्ति मिलेगी--यह निश्चित रूप से कहा नहीं जा सकता।
क्या काशी जैसे तीर्थ में मृत्यु होने पर मुक्ति-लाभ सम्भव नहीं है ?
नहीं, यह भ्रामक धारणा है--कपिला आनन्द बोली।
------------:दो प्रकार के तीर्थ:------------
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वेद, शास्त्र, पुराण, काव्य, उपनिषद आदि के जितने भी ग्रन्थ हैं, उन सबकी भाषा और उन सबके विषय सांकेतिक और लाक्षणिक हैं। अचेतन मन की अवस्था में महापुरुषों द्वारा लिखे गए हैं सब-के-सब और यही कारण है कि वास्तविकता से अपरिचित रहकर जिज्ञासुगण अपने अनुमान-ज्ञान के आधार पर अलग-अलग अर्थ निकालते हैं।
शास्त्रों में *सप्ततीर्थों* की चर्चा की गई है। लोगों की धारणा है कि तीर्थों में शरीर-त्याग होने पर मोक्ष या मुक्ति को उपलब्ध हो जाती है जीवात्मा। सप्ततीर्थों में काशी सर्वोपरि है। यह विशिष्ट आध्यात्मिक तीर्थ है। उसकी अपनी विशेषता है।
तीर्थ दो प्रकार के हैं--कर्मतीर्थ और ज्ञानतीर्थ। काशी ज्ञानतीर्थ है। अन्य तीर्थ कर्मतीर्थ हैं। दोनों प्रकार के तीर्थों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। कर्मतीर्थ के क्षेत्र में फलाकांक्षारहित, निष्काम भाव से सत्कर्मों द्वारा धर्म और पुण्य--दोनों प्रकार के संस्कार उत्पन्न होते हैं जिनके फलस्वरुप आवागमन से मुक्ति तो नहीं मिलती, लेकिन यदि मिलता है तो पुण्य के प्रभाव से स्वर्गादि अथवा ऐसे ही रमणीक सूक्ष्म लोक में स्थान। कालांतर में संस्कार क्षीण हो जाने पर पुनः संसार में जन्म लेना पड़ता है लेकिन वह पुनर्जन्म सामान्य नहीं होता है। विद्वत कुल के ब्राह्मण परिवार में, धर्मात्माओं के परिवार में जन्म मिलता है जीवात्मा को। जीवन काल में यश, कीर्ति, वैभव, ऐश्वर्य आदि की उपलब्धि होती है। व्यक्तित्व भी असाधारण होता है
------:ज्ञानतीर्थ काशी:------
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काशी ज्ञानतीर्थ है। कर्म से मुक्ति या मोक्ष नहीं, ज्ञान से मोक्ष मिलता है। काशी के दो रूप हैं--मृण्मय रूप और चिन्मय रूप। जिस काशी से लोग परिचित हैं, काशी का वह मृण्मय (पार्थिव) रूप है। काशी का चिन्मय (अपार्थिव) रूप ठीक काशी के ऊपर है चिन्मय जगत में है। वह स्वर्णमय है। वहां गंगा की धारा दूध के समान निर्मल और धवल है। उच्चकोटि के योगी-साधकगण उसमें स्नान करते हैं, अवगाहन करते हैं। काशी विश्वनाथ (विश्वेश्वर) का स्वरूप भी चिन्मय है। चिन्मय काशी का महाश्मशान भी चिन्मय है जहां भैरव-भैरवी के रूप में शिव-पार्वती विचरण करते हैं। जैसे कर्मतीर्थ स्वर्गप्रदाता हैं, उसी प्रकार काशी का चिन्मय स्वरूप मुक्तिदाता है। इसीलिए काशी के सम्बंध में *ज्ञानातमुक्ति* कहा गया है-- 'ज्ञान के द्वारा परमगति।'
लेकिन कौन-सा ज्ञान ? भौतिक ज्ञान, शास्त्रीय ज्ञान, वैदिक ज्ञान, पौराणिक ज्ञान, यौगिक ज्ञान, तांत्रिक ज्ञान ?
नहीं, इन समस्त ज्ञानों से मोक्ष का कोई लेना-देना नहीं, सम्बन्ध है केवल--आत्मज्ञान से और वह भी काशी के चिन्मय स्वरूप की उपस्थिति में।
दिव्यात्मा कपिलानंद ने कहा--आत्मज्ञान तो किसी स्थान पर हो सकता है उपलब्ध लेकिन उसके द्वारा मोक्ष नहीं। मोक्ष उपलब्ध होगा केवल काशी में। अन्यत्र आत्मज्ञान होने पर उसके द्वारा मोक्ष प्राप्ति के लिए आत्मा को काशी में जन्म लेना अनिवार्य होता है।
आत्मज्ञान का उदय कैसे होता है ?
इस प्रश्न के उत्तर में कपिला आनन्द ने कहा--क्रमशः 11 बार सात्विक और धर्मपरायण ब्राह्मण कुल में जन्म लेने पर प्रत्येक जन्म में जीवनपर्यंत जो व्यक्ति निरपेक्ष भाव से, अनासक्त भाव से, निःस्पृह भाव से कर्मभूमि ( भूलोक ) में वर्णानुसार, कर्मानुसार, समयानुसार कर्म करते हुए अध्यात्म मार्ग का अनुसरण करता है और अन्त में उसे जो अनुभव-ज्ञान मिलता है, उसे कहते हैं-- *आत्मज्ञान।* आत्मज्ञान परमज्ञान है। परमज्ञान उपलब्ध होने पर व्यक्ति को अपनी आत्मा के दूसरे खण्ड का पता चल जाता है और पता चलते ही दोनों अपूर्ण आत्म-खण्ड आपस में मिलकर एक हो जाते हैं। इसी अवस्था को कहते हैं-- *पूर्णात्मा।* पूर्णात्मा हुए बिना मोक्ष-लाभ सम्भव नहीं। पूर्णात्मा का अगला जन्म होता है काशी में और वह भी उच्च संस्कारित ब्राह्मण कुल में। ऐसी पूर्णात्मा का संसार के रंगमंच पर एक वीतराग योगी के रूप में प्रकटीकरण होता है। ऐसे वीतराग महापुरुष के मुमुर्षु- काल में भगवान विश्वनाथ शिव के रूप में दक्षिणावर्त शंख द्वारा *तारक मन्त्र की दीक्षा* प्रदान करते हैं जिसके फलस्वरूप उस महापुरुष की आत्मा तत्काल मोक्ष को उपलब्ध हो जाती है। जैसा कि बतला चुकी हूँ कि काशी कर्मतीर्थ नहीं, ज्ञानतीर्थ है। कर्म का सम्बन्ध मोक्ष से नहीं, ज्ञान से है। काशी में जो योगी और साधक निवास करते हैं, वे अपनी विशेष अवस्था में चिन्मय काशी में विचरण करते हैं। सम्पूर्ण काशीक्षेत्र महाश्मशान क्षेत्र है जोको दो भागों में विभक्त है--उत्तर क्षेत्र विश्वेश्वर क्षेत्र है और दक्षिण क्षेत्र है--केदारेश्वर क्षेत्र। केदारेश्वर क्षेत्र के श्मशान में 'गौरी केदार' यानी पार्वती और शिव भैरवी-भैरव के रूप में विचरण करते रहते हैं जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है।
रामकृष्ण परमहंसदेव जब काशी आये थे और केदारेश्वर मन्दिर के बगल में जिस मकान में ठहरे हुए थे, उसकी छत से भैरव-भैरवी के रूप में शिव-पार्वती को विचरण करते हुए देखा था उन्होंने। (इसका तात्पर्य यह नहीं कि शिव-पार्वती को उस छत से कोई भी व्यक्ति देख सकता है। नहीं, कदापि नहीं। केवल पूर्णात्मा व्यक्ति ही देख सकता है अपनी चिन्मयी काया में चिन्मयी काशी के दिव्य क्षेत्र में)