Monday, April 6, 2026

मरना ही जीवन है

कभी ऐसा लगा है कि सब कुछ ठीक होते हुए भी भीतर एक अव्यवस्था चल रही है। बाहर जीवन चलता रहता है, काम पूरे होते हैं, संबंध चलते हैं, लेकिन भीतर एक टूटन छिपी रहती है। ये टूटन किसी घटना से नहीं आती, बल्कि सोच के ढाँचे से आती है। हर विचार किसी पुराने अनुभव से जन्म लेता है, और उसी कारण हर नया क्षण भी अतीत का विस्तार बन जाता है। इसी विस्तार में जीवन बंध जाता है, और जो ताजगी हो सकती थी, वो खो जाती है। इसी खोने में एक अनदेखा दुख जन्म लेता है, जिसे शब्द नहीं पकड़ पाते।


सोच हमेशा तुलना करती है, बाँटती है, और नाम देती है। ये हर चीज को किसी श्रेणी में डाल देती है, ताकि उसे समझ सके। लेकिन इसी समझ में एक दूरी बन जाती है, क्योंकि जो देखा जा रहा है वो सीधा नहीं देखा जा रहा। हर चीज स्मृति के पर्दे से गुजरती है, और उसी में विकृत हो जाती है। इसी कारण संबंध जटिल हो जाते हैं, क्योंकि सामने व्यक्ति नहीं, उसकी छवि दिखाई देती है। और छवि कभी भी जीवित नहीं होती, वो केवल अतीत का प्रतिबिंब होती है।


यही विभाजन जीवन में संघर्ष पैदा करता है। एक हिस्सा चाहता है, दूसरा विरोध करता है, और इसी खींचतान में ऊर्जा बिखर जाती है। यही बिखराव अव्यवस्था बन जाता है, जो हर दिन को भारी बना देता है। इस अव्यवस्था को ठीक करने की कोशिश भी उसी सोच से की जाती है, जो खुद समस्या है। इसलिए कोई भी समाधान स्थायी नहीं होता, क्योंकि जड़ को नहीं देखा जाता। और जब तक जड़ छिपी रहती है, तब तक हर प्रयास केवल सतह पर ही घूमता रहता है।


विचार की सीमा और उसका अंत:


विचार उपयोगी है, लेकिन उसकी सीमा है। ये तकनीक बना सकता है, व्यवस्था बना सकता है, लेकिन जीवन की गहराई को नहीं छू सकता। क्योंकि ये हमेशा अतीत से आता है, और अतीत कभी पूर्ण नहीं होता। जो ज्ञात है, वही सोच सकता है, और जो अज्ञात है, वो सोच की पहुँच से बाहर रहता है। फिर भी सोच हर चीज को समझने की कोशिश करती है, और इसी में भ्रम पैदा होता है।


जब ये देखा जाता है कि विचार हर समस्या को अपने ही ढाँचे में हल करना चाहता है, तब उसकी सीमा स्पष्ट होने लगती है। ये सीमा कोई निष्कर्ष नहीं है, बल्कि एक प्रत्यक्ष अनुभव है। अब ये समझ आता है कि सोच केवल एक उपकरण है, जीवन का केंद्र नहीं। इसी समझ में एक दूरी आती है, जो सोच को अपनी जगह पर रख देती है। अब सोच का उपयोग होता है, लेकिन उस पर निर्भरता नहीं रहती।


इस दूरी में एक नया आयाम खुलता है। अब देखने में कोई बाधा नहीं होती, क्योंकि बीच में स्मृति का हस्तक्षेप कम हो जाता है। जो सामने है, वो वैसा ही दिखने लगता है जैसा वो है। इसी देखने में एक स्पष्टता होती है, जो विचार से नहीं आती। और यही स्पष्टता परिवर्तन का आधार बनती है।


द्वंद्व से मुक्त होने की शुरुआत:


जहाँ द्वंद्व है, वहाँ शांति नहीं हो सकती। एक तरफ इच्छा होती है, दूसरी तरफ डर, और दोनों के बीच मन फँसा रहता है। यही फँसाव जीवन को जटिल बना देता है, क्योंकि हर निर्णय संघर्ष से गुजरता है। इस संघर्ष को खत्म करने के लिए फिर से सोच का सहारा लिया जाता है, लेकिन सोच ही द्वंद्व को बनाए रखती है।


जब ये देखा जाता है कि द्वंद्व सोच की ही उपज है, तब उसमें एक दरार आती है। ये दरार बहुत सूक्ष्म होती है, लेकिन यही सबसे महत्वपूर्ण होती है। इसी में पहली बार ये महसूस होता है कि संघर्ष आवश्यक नहीं है। अगर देखने में कोई विभाजन नहीं हो, तो द्वंद्व भी नहीं रहेगा।


इस देखने में कोई पक्ष नहीं होता, कोई चयन नहीं होता। केवल जो है, उसे वैसे ही देखा जाता है। इसी में एक गहरी शांति छिपी होती है, जो प्रयास से नहीं आती। यही शांति द्वंद्व के अंत का संकेत है, और इसी में जीवन का एक नया स्वरूप जन्म लेता है।


हर दिन मरने का रहस्य:


मृत्यु को दूर की घटना मान लिया गया है, इसलिए उससे डर बना रहता है। लेकिन अगर गहराई से देखा जाए, तो हर क्षण कुछ समाप्त हो रहा है। एक विचार खत्म होता है, एक भावना गुजरती है, एक अनुभव समाप्त होता है। यही निरंतर समाप्ति जीवन का हिस्सा है, लेकिन इसे देखा नहीं जाता।


अगर हर दिन जो बीत गया उसे पूरी तरह समाप्त होने दिया जाए, तो जीवन में एक अद्भुत हल्कापन आ सकता है। लेकिन मन ऐसा नहीं करता, वो हर चीज को पकड़ कर रखता है। यही पकड़ स्मृति का बोझ बन जाती है, जो हर नए क्षण को ढँक देती है। इसी बोझ में जीवन की ताजगी खो जाती है।


जब ये समझ आता है कि छोड़ना ही वास्तविक जीना है, तब एक नया दृष्टिकोण जन्म लेता है। अब हर अनुभव को पूरा जीकर उसे समाप्त होने दिया जाता है। इसमें कोई प्रयास नहीं होता, केवल एक जागरूकता होती है। इसी जागरूकता में मृत्यु और जीवन एक साथ घटित होते हैं।


स्मृति से मुक्त मस्तिष्क:


स्मृति उपयोगी है, लेकिन जब वो केंद्र बन जाती है, तब समस्या शुरू होती है। हर अनुभव स्मृति बन जाता है, और फिर वही स्मृति हर नए अनुभव को प्रभावित करती है। इस तरह मस्तिष्क कभी भी ताजा नहीं रह पाता, क्योंकि वो हमेशा अतीत में जीता रहता है।


जब मस्तिष्क अपने ही इस पैटर्न को देखता है, तब उसमें एक बदलाव आता है। ये बदलाव किसी अभ्यास से नहीं आता, बल्कि देखने की गहराई से आता है। अब स्मृति अपनी जगह पर रहती है, लेकिन जीवन को नियंत्रित नहीं करती। यही स्थिति मस्तिष्क को हल्का बना देती है।


इस हल्केपन में एक नई ऊर्जा होती है, जो पहले दब गई थी। अब मस्तिष्क शांत होता है, लेकिन निष्क्रिय नहीं होता। इस शांति में एक तीव्रता होती है, जो हर चीज को स्पष्ट रूप से देखती है। यही स्पष्टता जीवन को एक नई दिशा देती है।


प्रेम और स्वतंत्रता का स्पर्श:


जहाँ सोच समाप्त होती है, वहाँ एक नई गुणवत्ता जन्म लेती है। ये प्रेम है, लेकिन ये भावना नहीं है। ये किसी पर निर्भर नहीं है, इसलिए इसमें कोई डर नहीं है। ये स्वतंत्र है, और इसी कारण इसमें कोई अपेक्षा नहीं होती।


इस प्रेम में कोई केंद्र नहीं होता, कोई स्वार्थ नहीं होता। ये केवल बहता है, बिना किसी कारण के। इसी में एक गहरी सुंदरता होती है, जो हर चीज को छूती है। यही प्रेम जीवन को पूर्ण बनाता है, क्योंकि इसमें कोई कमी नहीं होती।


स्वतंत्रता भी इसी के साथ आती है। ये किसी चीज से मुक्त होने की नहीं, बल्कि खुद से मुक्त होने की अवस्था है। इसमें कोई सीमा नहीं होती, क्योंकि इसमें कोई पकड़ नहीं होती। यही स्वतंत्रता जीवन का असली स्वरूप है।


शब्दों से परे का मौन:


जब सब कुछ शांत हो जाता है, तब एक ऐसा मौन बचता है जो शब्दों से परे है। इसमें कोई विचार नहीं होता, कोई स्मृति नहीं होती, फिर भी ये खाली नहीं होता। इसमें एक गहरी उपस्थिति होती है, जो सब कुछ समेटे हुए होती है।


इस मौन को पकड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि पकड़ आते ही वो समाप्त हो जाता है। इसे केवल जिया जा सकता है, बिना किसी इच्छा के। इसी में एक ऐसी शांति होती है, जो कभी टूटती नहीं।


यही मौन जीवन का सबसे गहरा रहस्य है, जिसमें सब कुछ समाया हुआ है। और इसी में हर प्रश्न अपने आप समाप्त हो जाता है, बिना किसी उत्तर के।

जब जीवन दिखने लगता...

 कोई घंटी नहीं बजती, कोई संकेत नहीं आता, फिर भी एक दिन सब कुछ वैसा नहीं रहता जैसा पहले था। वही लोग, वही जगह, वही दिनचर्या, लेकिन अनुभव में एक हल्का सा फर्क उतर आता है। जैसे किसी ने भीतर से परदा थोड़ा सा हटा दिया हो। जो पहले सीधा लगता था, अब परतों में दिखने लगता है। जो पहले निश्चित था, अब सवाल बन जाता है। इसी बदलाव में कोई उत्सव नहीं होता, बल्कि एक खामोश बेचैनी होती है। और यही बेचैनी रास्ता खोलती है।


जो कुछ अब तक सच माना गया था, वो अचानक संदिग्ध लगने लगता है। विचार, जिन पर भरोसा था, अब डगमगाते दिखते हैं। एक ही बात कभी सही लगती है, कभी गलत, और इसी अस्थिरता में एक झटका छिपा होता है। ये झटका डराता भी है और जगाता भी है। क्योंकि अब आधार खिसकने लगता है, और बिना आधार के खड़े रहना आसान नहीं होता। लेकिन यही असहजता भीतर एक नई जगह बनाती है, जहाँ से देखने का ढंग बदलता है।


भावनाएँ भी अब पहले जैसी ठोस नहीं लगतीं। गुस्सा उठता है, लेकिन साथ ही दिखता भी है कि गुस्सा उठ रहा है। दुख आता है, लेकिन उसके साथ एक मौन साक्षी भी रहता है। ये दो स्तर साथ साथ चलते हैं, एक जो जी रहा है और एक जो देख रहा है। इसी दोहरे अनुभव में एक नई संभावना जन्म लेती है। अब हर चीज में पूरी तरह खो जाना संभव नहीं रहता, क्योंकि देखने की रोशनी साथ चल रही होती है।


देखने वाला कौन है?


ये सवाल धीरे-धीरे उठता है, बिना किसी कोशिश के। अगर विचार दिख रहे हैं, तो देखने वाला विचार नहीं हो सकता। अगर भावनाएँ दिखाई दे रही हैं, तो देखने वाला भावना नहीं हो सकता। फिर ये क्या है, जो हर चीज को देख रहा है। इसका जवाब तुरंत नहीं मिलता, और शायद शब्दों में कभी मिलता भी नहीं। लेकिन इस सवाल के साथ रहना ही एक गहरी यात्रा बन जाता है।


जब ध्यान इस देखने पर जाता है, तो एक अजीब सी शांति महसूस होती है। ये शांति बनाई हुई नहीं होती, बल्कि देखने के कारण आती है। इसमें कोई उपलब्धि का भाव नहीं होता, बल्कि एक हल्कापन होता है। जैसे कुछ अनावश्यक गिर रहा हो, और जो बच रहा हो वो बहुत सरल हो। यही सरलता धीरे धीरे फैलने लगती है।


लेकिन मन इस स्थिति को भी पकड़ना चाहता है। वो इसे स्थायी बनाना चाहता है, इसे दोहराना चाहता है। और जैसे ही ये कोशिश शुरू होती है, देखने की शुद्धता खो जाती है। क्योंकि अब फिर से एक करने वाला आ गया है। यही देखने और पकड़ने का खेल बार बार चलता है, और इसी को समझना ही आगे का द्वार खोलता है।


सजगता का स्वाभाविक फूल:


सजग रहना कोई अभ्यास नहीं है, ये समझ का परिणाम है। जब ये साफ दिखने लगता है कि हर हस्तक्षेप चीजों को उलझा देता है, तब मन अपने आप शांत होने लगता है। ये शांति मजबूरी नहीं होती, बल्कि समझ से आती है। इसी शांति में सजगता जन्म लेती है।


अब हर क्रिया में एक हल्की सी जागरूकता रहती है। चलते हुए भी पता होता है कि कदम उठ रहे हैं, बोलते हुए भी महसूस होता है कि शब्द निकल रहे हैं। ये कोई दोहराव नहीं है, बल्कि एक जीवित अनुभव है। इसमें कोई बनावटीपन नहीं होता, क्योंकि इसमें कोई प्रयास नहीं होता। यही इसे सहज बनाता है।


धीरे धीरे ये सजगता इतनी गहरी हो जाती है कि वो हर स्थिति में बनी रहती है। चाहे बाहर शोर हो या भीतर हलचल, एक हिस्सा हमेशा शांत रहता है। यही स्थिरता अब जीवन का आधार बन जाती है। और इसी में एक नई ऊर्जा भी जन्म लेती है।


विचारों का धीमा पड़ना:


विचार अब पहले जैसे ताकतवर नहीं लगते। वो आते हैं, लेकिन अब पकड़ नहीं पाते। जैसे कोई आवाज दूर से आ रही हो, लेकिन भीतर तक नहीं पहुँच रही। यही दूरी विचारों की पकड़ को कमजोर कर देती है। अब उन्हें रोकने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि वो खुद ही गुजर जाते हैं।


इस गुजरने में एक मौन जन्म लेता है। ये मौन खाली नहीं होता, बल्कि जीवंत होता है। इसमें कोई हलचल नहीं होती, फिर भी इसमें एक गहराई होती है। यही मौन धीरे-धीरे फैलने लगता है, और हर अनुभव को छूने लगता है।


अब जीवन का अनुभव अलग हो जाता है। वही चीजें जो पहले भारी लगती थीं, अब हल्की लगने लगती हैं। क्योंकि अब उनके साथ पहचान नहीं होती। केवल देखना होता है, और उसी में उनका असर समाप्त हो जाता है।


अहंकार का ढहना:


जो खुद को केंद्र मानता था, वो अब उतना मजबूत नहीं लगता। उसकी हर चाल अब दिखाई देने लगती है। कभी वो खुद को बड़ा दिखाता है, कभी छोटा, लेकिन दोनों ही खेल अब स्पष्ट हो जाते हैं। यही स्पष्टता उसकी पकड़ को ढीला कर देती है।


अब खुद को साबित करने की जरूरत कम होने लगती है। तुलना अपने आप कम हो जाती है, क्योंकि अब देखने में कोई माप नहीं होता। जो है, वही पर्याप्त लगता है। इसी पर्याप्तता में एक शांति होती है, जो पहले कभी महसूस नहीं हुई।


अहंकार धीरे-धीरे गिरता है, बिना किसी संघर्ष के। क्योंकि उसे हटाने की कोशिश नहीं की जाती, बल्कि उसे देखा जाता है। और देखने में उसका अस्तित्व कमजोर पड़ जाता है। यही उसका अंत है, जो किसी प्रयास से नहीं, बल्कि समझ से आता है।


जीवन का हल्का होना:


अब जीवन पहले जैसा नहीं लगता, फिर भी सब कुछ वैसा ही है। फर्क केवल देखने में है, और वही सब कुछ बदल देता है। अब हर घटना को पकड़ने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि वो खुद ही गुजर जाती है। इसी में एक हल्कापन आता है, जो हर दिन को आसान बना देता है।


अब प्रतिक्रिया तुरंत नहीं होती, क्योंकि पहले देखने की प्रक्रिया होती है। यही छोटा सा अंतर जीवन को बदल देता है। अब हर चीज एक अनुभव बन जाती है, न कि बोझ। इसी में एक सहजता होती है, जो पहले नहीं थी।


जीवन अब एक खेल जैसा लगने लगता है, जिसमें कुछ भी स्थायी नहीं है। और इसी अस्थिरता में एक सुंदरता होती है। क्योंकि अब पकड़ नहीं है, इसलिए डर भी कम हो जाता है। यही स्वतंत्रता जीवन को गहरा बनाती है।


चेतना में विश्राम:


जब सब कुछ देखा जा चुका होता है, तब एक गहरा ठहराव आता है। ये ठहराव किसी प्रयास से नहीं आता, बल्कि थकान के बाद आता है। अब कुछ करने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि करने वाला ही शांत हो जाता है। इसी में एक विश्राम होता है, जो बहुत गहरा होता है।


इस विश्राम में कोई पहचान नहीं होती, कोई कहानी नहीं होती। केवल एक उपस्थिति होती है, जो हर चीज को समेटे हुए होती है। यही उपस्थिति ही असली आधार है, जो कभी नहीं बदलता। इसमें कोई डर नहीं होता, क्योंकि इसमें खोने जैसा कुछ नहीं होता।


यही अवस्था धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बन जाती है। अब हर चीज उसी से होकर गुजरती है, और उसी में विलीन हो जाती है। इसमें कोई शुरुआत नहीं होती, कोई अंत नहीं होता। केवल एक निरंतर मौन होता है, जो हमेशा मौजूद रहता है।

मनुष्य का जीवन सच में बहुत अनमोल है

 मनुष्य का जीवन सच में बहुत अनमोल है, लेकिन उससे भी अधिक मूल्यवान है उसके द्वारा किए गए कर्म। हर इंसान की अपनी एक अलग दुनिया होती है उसकी सोच, उसके अनुभव, उसकी भावनाएँ इसलिए कोई भी व्यक्ति सबको खुश नहीं रख सकता। यह एक सच्चाई है जिसे स्वीकार करना ही शांति की पहली सीढ़ी है।


लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इंसान कुछ कर ही नहीं सकता। हर व्यक्ति ऐसा कार्य जरूर कर सकता है जिससे उसके जीवन में बदलाव आए और समाज में भी शांति फैले। समस्या यह है कि हर मनुष्य के अंदर एक अलग दुनिया बसती है, और उस दुनिया को प्रभावित करने वाले अनगिनत कारण होते हैं परिस्थितियाँ, संबंध, इच्छाएँ, डर और भावनाएँ।


अक्सर देखा जाता है कि इंसान अपने सही कर्म के मार्ग से भटक जाता है। इसका मुख्य कारण है उसका अशांत मन। जब मन शांत नहीं होता, तो भावनाएँ नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। और जब भावनाओं पर नियंत्रण नहीं होता, तब व्यक्ति क्षणिक सुख के लिए ऐसे निर्णय ले लेता है, जिनकी सजा उसे जीवन भर भुगतनी पड़ती है।


यही कारण है कि ध्यान (मेडिटेशन) का महत्व इतना अधिक है। पुराने समय के साधु-संत ध्यान क्यों करते थे? क्योंकि वे जीवन के गहरे सत्य को समझते थे। वे जानते थे कि मन को स्थिर किए बिना सही दृष्टि प्राप्त नहीं हो सकती। जब व्यक्ति ध्यान की अवस्था में होता है, तब वह स्वयं को और दूसरों को उनके वास्तविक रूप में देख पाता है।


इसके विपरीत, जब हम भावनाओं में बह रहे होते हैं जैसे क्रोध, दुख या अहंकार तो हम सामने वाले व्यक्ति को सही ढंग से देख ही नहीं पाते। हम उसे समझने के बजाय अपने मन की स्थिति के अनुसार उसका आकलन करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति क्रोधित है, तो वह प्रकृति के बीच जाकर भी शांति का अनुभव नहीं कर सकता। उसके सामने फूल, झरने, पहाड़, पेड़, पक्षी सब कुछ होते हुए भी वह उन्हें महसूस नहीं कर पाता।


लेकिन एक जागरूक और ध्यानमय व्यक्ति का अनुभव बिल्कुल अलग होता है। वह भीड़-भाड़, तनाव या संघर्ष के माहौल में भी भीतर से शांत रहता है। उसकी शांति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि उसके भीतर से उत्पन्न होती है।


महाभारत में श्रीकृष्ण इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इतना बड़ा युद्ध चल रहा था, चारों ओर अशांति और विनाश था, फिर भी वे पूरी तरह शांत, जागरूक और संतुलित थे। उन्हें स्पष्ट रूप से पता था कि वे क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं। यही जागरूकता उन्हें भावनाओं के प्रभाव से मुक्त रखती थी।


जो व्यक्ति सच में जागरूक होता है, वह अपनी भावनाओं का गुलाम नहीं बनता। बल्कि वह उन्हें समझता है और नियंत्रित करता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि इंसान ध्यान को सही रूप में समझे। आज बहुत से लोग शांति चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह पता ही नहीं होता कि ध्यान वास्तव में क्या है और इसे कैसे अपनाया जाए।


ध्यान अपने मन को समझने और उसे स्थिर करने की एक सरल विधि है। जब व्यक्ति धीरे-धीरे ध्यान को अपने जीवन का हिस्सा बनाता है, तब उसके विचार स्पष्ट होते हैं, भावनाएँ संतुलित होती हैं और जीवन में एक गहरी शांति का अनुभव होने लगता है।

Sunday, April 5, 2026

शांति ही जीवन का असली धन है...

जब जीवन जीना ही है, तो क्यों न इसे पूरी जागरूकता के साथ जिया जाए।

शांति ही जीवन का असली धन है, बाकी सब तो आते-जाते साये हैं।


दुःख बाहर से नहीं आता, उसका जन्म भीतर की पकड़ से होता है।

जहाँ पकड़ है, वहीं पीड़ा है जहाँ छोड़ना है, वहीं मुक्ति है।


मनुष्य चीज़ों को नहीं, उनके विचारों को पकड़े रहता है।

घटना बीत जाती है, पर उसका बोझ मन सालों तक ढोता रहता है।


मान लो मन एक पुरानी अलमारी है।

जिसमें तुम हर टूटे रिश्ते, हर अपमान, हर असफलता को सहेज कर रखते हो।


अलमारी भर चुकी है, पर तुम नया जीवन उसमें ठूँसना चाहते हो।

जगह नहीं है, फिर भी शिकायत है कि जीवन भारी क्यों लग रहा है।


एक अनोखा उदाहरण समझो

तुम नदी किनारे खड़े हो और हाथ में पानी पकड़ने की कोशिश कर रहे हो।


जितना जोर से पकड़ोगे, पानी उतनी तेजी से फिसलेगा।

और अंत में हाथ खाली रह जाएगा, बस थकान बचेगी।


यही दुःख का कारण है पकड़ने की कोशिश उस चीज़ को जो स्वभाव से बहने वाली है।

जीवन नदी है, और तुम उसे मुट्ठी में कैद करना चाहते हो।


जो बीत गया, वह हवा के झोंके जैसा था।

तुम उसे रोक नहीं सके, पर उसकी यादों की दीवार जरूर खड़ी कर ली।


पेड़ का फल पककर गिरता है क्योंकि वह जानता है 

छोड़ना ही आगे बढ़ने का रास्ता है, पकड़ना नहीं।


मनुष्य फल नहीं बन पाता, इसलिए गिरने से डरता है।

वह सड़ना स्वीकार कर लेता है, पर छोड़ना नहीं।


गुस्सा भी पकड़ का ही एक रूप है।

जब चीजें मन के अनुसार नहीं होतीं, तो भीतर आग जलती है।


अगर उसी क्षण तुम ध्यान बदल दो,

तो आग बिना ईंधन के खुद ही बुझ जाती है।


भावनाएँ समस्या नहीं हैं, उनसे जुड़ जाना समस्या है।

उन्हें देखो जैसे आसमान बादलों को देखता है बिना छुए, बिना रोके।


ध्यान कोई कठिन साधना नहीं, बल्कि देखने की कला है।

जो हो रहा है, उसे बिना निर्णय के देखना ही ध्यान है।


लोग सोचते हैं ध्यान करने से शांति मिलेगी।

पर सच यह है शांति में रहने वाला ही ध्यान को जान पाता है।


हम हर चीज़ के पहले धारणा बना लेते हैं।

और फिर उसी धारणा के चश्मे से पूरी दुनिया को देखने लगते हैं।


यही धारणा धीरे-धीरे सच लगने लगती है।

और हम वास्तविकता से दूर होते जाते हैं।


अगर तुम सच में जीना चाहते हो,

तो हर पल को बिना पुराने बोझ के देखना सीखो।


जीवन न तो बीते कल में है, न आने वाले कल में।

वह केवल इसी क्षण में सांस ले रहा है।


जो इस क्षण को पकड़ने की जगह महसूस करता है,

वही दुःख से मुक्त होकर सच में जीना शुरू करता है।

बदलती यौन-संस्कृति

 "बदलती यौन-संस्कृति: बाजार, मानसिकता और संतुलन की जरूरत"


भारत में सेक्स टॉयज या यौन-वेलनेस उत्पादों का बढ़ता बाजार सिर्फ एक आर्थिक कहानी नहीं है, बल्कि यह समाज की बदलती सोच, जीवनशैली और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संकेत भी है। जिस विषय पर कभी खुलकर बात करना भी मुश्किल था, वह आज धीरे-धीरे सामान्य चर्चा का हिस्सा बन रहा है।


लेकिन इस बदलाव को सिर्फ “आधुनिकता” या “प्रगति” कह देना पर्याप्त नहीं है। इसके पीछे कई परतें हैं सकारात्मक भी, और कुछ चिंताजनक भी। इसलिए इसे समझना ज़रूरी है, संतुलित दृष्टिकोण से।


1. बदलाव की जड़: सुविधा, जानकारी और निजीपन


आज इंटरनेट ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई है। पहले जहां ऐसे उत्पाद खरीदना शर्म या झिझक का कारण था, वहीं अब लोग घर बैठे, बिना किसी सामाजिक दबाव के, इन्हें मंगवा सकते हैं।


ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स ने न केवल खरीद को आसान बनाया है, बल्कि जानकारी भी उपलब्ध कराई है। युवा अब ब्लॉग, वीडियो और सोशल मीडिया के माध्यम से यौन स्वास्थ्य के बारे में सीख रहे हैं।


नतीजा....


जिज्ञासा.... जानकारी....प्रयोग... स्वीकार्यता

यह एक स्वाभाविक चक्र बन गया है।


2. मानसिकता में बदलाव: “छुपाने” से “समझने” तक


भारतीय समाज में लंबे समय तक सेक्स को केवल प्रजनन से जोड़कर देखा गया। आनंद, भावनात्मक जुड़ाव या व्यक्तिगत संतुष्टि जैसे पहलू अक्सर चर्चा से बाहर रहे।


अब युवा पीढ़ी इसे एक व्यापक दृष्टि से देख रही है:


यह सिर्फ शरीर नहीं, मन से भी जुड़ा है


यह रिश्तों का हिस्सा है, न कि सिर्फ जिम्मेदारी


यह व्यक्तिगत अधिकार भी है


खासकर महिलाओं में यह बदलाव महत्वपूर्ण है। वे अब अपनी इच्छाओं को समझने और व्यक्त करने लगी हैं, जो पहले दबा दी जाती थीं।


3. लेकिन एक बड़ा बदलाव: “अनुभव” से “उपकरण” तक


यहां एक गहरी बात समझने की जरूरत है।


भारतीय समाज में सम्भोग (यौन संबंध) सिर्फ शारीरिक क्रिया नहीं था। यह भावनात्मक जुड़ाव, विश्वास, और संबंध की गहराई का हिस्सा माना जाता था।


अब धीरे-धीरे एक बदलाव दिख रहा है:


प्राकृतिक अनुभव ...... तकनीकी सहायता


भावनात्मक जुड़ाव.... व्यक्तिगत संतुष्टि


सेक्स टॉयज इस बदलाव का हिस्सा हैं। वे सुविधा देते हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाते हैं:


 क्या हम अनुभव को “टूल” में बदल रहे हैं?

क्या सुविधा के कारण रिश्तों की गहराई कम हो सकती है?


यह पूरी तरह नकारात्मक नहीं है, लेकिन संतुलन जरूरी है।


4. सकारात्मक प्रभाव: जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता


(क) मानसिक स्वास्थ्य में सुधार


तनाव, अकेलापन और भावनात्मक दबाव आज आम हैं। ऐसे में ये उत्पाद कुछ लोगों के लिए राहत का माध्यम बनते हैं।


(ख) रिश्तों में खुलापन


जब पार्टनर आपस में खुलकर बात करते हैं, तो गलतफहमियां कम होती हैं और भरोसा बढ़ता है।


(ग) महिलाओं की स्वतंत्रता


महिलाएं अब अपनी खुशी और जरूरतों को समझने लगी हैं। यह सामाजिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।


(घ) सुरक्षित विकल्प


कुछ स्थितियों में ये उत्पाद जोखिम भरे व्यवहार की जगह सुरक्षित विकल्प दे सकते हैं।


5. चुनौतियां और संभावित खतरे


हर बदलाव के साथ कुछ जोखिम भी आते हैं। यहां भी वही स्थिति है।


(क) भावनात्मक दूरी का खतरा


अगर व्यक्ति केवल उपकरणों पर निर्भर हो जाए, तो वास्तविक रिश्तों में रुचि कम हो सकती है।

मानवीय जुड़ाव, स्पर्श और भावनाएं मशीन से पूरी तरह नहीं मिल सकतीं।


(ख) लत (Dependency) का जोखिम


जैसे किसी भी सुखद अनुभव की आदत पड़ सकती है, वैसे ही इसका भी अत्यधिक उपयोग समस्या बन सकता है।


(ग) गलत जानकारी


इंटरनेट पर सही और गलत दोनों तरह की जानकारी होती है। बिना सही समझ के उपयोग स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है।


(घ) सस्ते और असुरक्षित उत्पाद


बाजार के बढ़ने के साथ नकली या खराब गुणवत्ता वाले उत्पाद भी बढ़ सकते हैं, जो शारीरिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।


(ङ) सांस्कृतिक टकराव


नई पीढ़ी और पुरानी सोच के बीच अंतर बढ़ सकता है, जिससे परिवारों में असहजता या तनाव पैदा हो सकता है।


6. समाज की भूमिका: रोकना नहीं, दिशा देना


यह बदलाव रुकने वाला नहीं है। इसलिए सवाल यह नहीं है कि इसे रोका जाए या नहीं, बल्कि यह है कि इसे सही दिशा कैसे दी जाए।


क्या किया जा सकता है?


बेहतर सेक्स एजुकेशन: स्कूल और कॉलेज स्तर पर संतुलित, वैज्ञानिक जानकारी दी जाए


खुली बातचीत: बिना शर्म और बिना जजमेंट के संवाद हो


गुणवत्ता और सुरक्षा: सही रेगुलेशन और जागरूकता हो


मानसिक संतुलन: इसे जीवन का हिस्सा समझा जाए, पूरा जीवन नहीं


7. संतुलन ही असली समाधान


सेक्स टॉयज न तो पूरी तरह “गलत” हैं, न ही कोई “जादुई समाधान”।

वे सिर्फ एक साधन हैं जिनका उपयोग कैसे किया जाता है, यही सबसे महत्वपूर्ण है।


अगर इन्हें समझदारी, संतुलन और जागरूकता के साथ अपनाया जाए, तो ये लाभकारी हो सकते हैं।


लेकिन अगर ये वास्तविक रिश्तों और भावनाओं की जगह लेने लगें, तो समस्या पैदा हो सकती है।


भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहां परंपरा और आधुनिकता आमने-सामने नहीं, बल्कि साथ-साथ चलने की कोशिश कर रहे हैं।


यौन-वेलनेस का बढ़ता बाजार इस बात का संकेत है कि लोग अब अपने शरीर और मन को बेहतर समझना चाहते हैं।


लेकिन असली प्रगति तब होगी जब:


सुविधा और संवेदना दोनों साथ रहें


तकनीक और रिश्तों में संतुलन बना रहे


और सबसे जरूरी इंसान “उपकरण” से ज्यादा “अनुभव” को महत्व दे


सेक्स केवल क्रिया नहीं, एक मानवीय अनुभव है।

उसे पूरी तरह मशीनों पर छोड़ देना प्रगति नहीं, अधूरापन हो सकता है।


इसलिए रास्ता एक ही है जागरूकता, संतुलन और समझदारी।

चेतना क्या है?

 "चेतना" इंसान का वर्तमान क्षण


हम अपनी ज़िंदगी में हर पल कुछ न कुछ करते रहते हैं सोचते हैं, महसूस करते हैं, निर्णय लेते हैं। लेकिन अगर ध्यान से देखें, तो यह सब एक ही चीज़ पर टिका होता है वर्तमान क्षण, यानी “अभी”। यही वर्तमान क्षण हमारी चेतना का असली रूप है।


चेतना क्या है?


चेतना का मतलब है अभी इस पल में जो कुछ हम जान रहे हैं, महसूस कर रहे हैं और सोच रहे हैं।


जब आप यह पढ़ रहे हैं, आपके दिमाग में शब्द चल रहे हैं, शायद कुछ विचार भी आ रहे हैं यही आपकी चेतना है।

जब आप चाय पीते हैं और उसका स्वाद महसूस करते हैं वही चेतना है।

जब आप परेशान होते हैं और सोचते हैं “मुझे ऐसा क्यों लग रहा है?” वह भी चेतना है।


सीधे शब्दों में:

चेतना = वर्तमान क्षण की जागरूकता


वर्तमान क्षण क्यों महत्वपूर्ण है?


अक्सर हम या तो बीते हुए समय (अतीत) में खोए रहते हैं, या आने वाले समय (भविष्य) की चिंता करते हैं।

लेकिन सच यह है कि:


हम सिर्फ वर्तमान में ही जी सकते हैं।

हमारे सारे अनुभव “अभी” में ही होते हैं।


जब हम वर्तमान क्षण से दूर होते हैं:


हम तनाव में रहते हैं

बेवजह सोचते रहते हैं

छोटी-छोटी खुशियाँ भी नहीं देख पाते


और जब हम वर्तमान में होते हैं:


मन शांत रहता है

ध्यान बढ़ता है

निर्णय बेहतर होते हैं


"चेतना के स्तर और वर्तमान क्षण"


हम हर समय एक जैसे जागरूक नहीं होते। कभी हम आधे-अधूरे ध्यान में होते हैं, तो कभी पूरी तरह सचेत।


1. कम जागरूकता (जब हम “ऑटो मोड” में होते हैं)


कई बार हम काम तो कर रहे होते हैं, लेकिन ध्यान कहीं और होता है।


उदाहरण....


खाना खा रहे हैं, लेकिन मोबाइल देख रहे हैं

किसी से बात कर रहे हैं, पर मन कहीं और है


इस स्थिति में हम वर्तमान क्षण में पूरी तरह नहीं होते।

हम सिर्फ आदत के अनुसार काम कर रहे होते हैं।


"यह चेतना का कम स्तर है।"


2. अधिक जागरूकता (जब हम पूरी तरह “अभी” में होते हैं)


जब हम किसी काम को पूरे ध्यान से करते हैं वही उच्च चेतना है।


उदाहरण....


पढ़ाई करते समय सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान

किसी की बात को ध्यान से सुनना

अपने भावनाओं को समझना “मैं अभी गुस्से में हूँ”


" यह चेतना का उच्च स्तर है।"


इसमें हम....


अपने विचारों को देख पाते हैं

अपनी गलतियों को समझ पाते हैं

खुद को बदल सकते हैं


"वर्तमान क्षण से दूर करने वाली अवस्थाएँ"


कुछ स्थितियाँ ऐसी होती हैं जो हमारी चेतना को बदल देती हैं और हमें “अभी” से दूर ले जाती हैं।


1. नींद


नींद में हम पूरी तरह वर्तमान को महसूस नहीं करते, लेकिन हमारा दिमाग काम करता रहता है।

यह शरीर और दिमाग को आराम देने के लिए जरूरी है।


2. सम्मोहन 


इस अवस्था में व्यक्ति....


बाहरी दुनिया से थोड़ा अलग हो जाता है

सुझावों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाता है


यह भी एक तरह से चेतना का बदला हुआ रूप है, जहाँ ध्यान बहुत संकुचित हो जाता है।


3. दवाओं और पदार्थों का प्रभाव


कुछ चीज़ें हमारी चेतना को बदल देती हैं:


- हैलुसिनोजेन.... चीज़ें अलग तरह से दिखने लगती हैं

- डिप्रेसेंट्स.... दिमाग धीमा हो जाता है

- स्टीमुलेंट्स... दिमाग तेज़ हो जाता है


इन सबका असर यही होता है कि हमारा “वर्तमान अनुभव” बदल जाता है।


चेतना और वर्तमान क्षण का असली मतलब

अगर गहराई से समझें, तो.....


चेतना कोई जटिल या दूर की चीज़ नहीं है

यह हर पल हमारे साथ है

यह वही है जो हम “अभी” महसूस कर रहे हैं


जब हम वर्तमान में रहते हैं, तो हम सच में जीते हैं


जब हम वर्तमान से हटते हैं, तो हम सिर्फ सोचते रह जाते हैं


चेतना का असली रूप है वर्तमान क्षण में जागरूक रहना


कम जागरूकता हमें आदतों में बांधती है


अधिक जागरूकता हमें समझदार और संतुलित बनाती है


जीवन की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि हम “अभी” में कितने उपस्थित हैं


"ज़िंदगी न अतीत में है, न भविष्य में ज़िंदगी सिर्फ इसी पल में है और इसी पल को समझना ही चेतना को समझना है।"


आत्म ध्यान

जब कोई इंसान किसी कार्य को लगातार धैर्य, विश्वास और पूरी गहराई से करता है, तो वह धीरे-धीरे उस कार्य में डूबने लगता है। यह डूबना केवल बाहरी प्रयास नहीं होता, बल्कि भीतर की एक यात्रा बन जाता है। इसी अवस्था में सच्चा सृजन जन्म लेता है। जो काम पहले केवल प्रयास था, वही साधना बन जाता है और साधना से ही उत्कृष्टता निकलती है।


मनुष्य का सबसे उच्च ध्यान “आत्म ध्यान” है। क्योंकि आत्मा, इन्द्रियों, मन और चेतना से भी अधिक गहराई में स्थित है। मन तो भटकता है, इन्द्रियाँ आकर्षित होती हैं, और चेतना परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है लेकिन आत्मा स्थिर है, शांत है, और सत्य के सबसे निकट है। जब इंसान अपने भीतर उतरता है, तभी वह इस स्थिरता को अनुभव कर पाता है।


आज का युग आधुनिकता का युग है। चारों ओर तकनीक का विस्तार हो रहा है रोबोट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन, और अंतरिक्ष तक पहुँचने की योजनाएँ। इंसान चाँद पर होटल बनाने की बात कर रहा है। यह सब विज्ञान की अद्भुत प्रगति है, लेकिन इसी के साथ एक चुनौती भी खड़ी होती है मन का भटकाव। जितनी तेज़ी से बाहरी दुनिया बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से मन अस्थिर हो रहा है।


ऐसे समय में ध्यान की आवश्यकता और भी अधिक हो जाती है। यदि विज्ञान को संतुलन में नहीं रखा गया, तो वही मानव के लिए खतरा बन सकता है। विज्ञान में सृजन की शक्ति है, लेकिन उसी में विनाश की क्षमता भी छिपी है। यह संसार को रोशन कर सकता है, और परमाणु विस्फोट से उसे नष्ट भी कर सकता है। इसलिए विज्ञान का संचालन केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि जागरूकता और ध्यान से होना चाहिए।


समाज और परिवार में भी ध्यान का महत्व उतना ही है। जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे आध्यात्म की आवश्यकता भी बढ़ेगी। वास्तव में, विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि पूरक हैं। विज्ञान बाहरी दुनिया को समझने का प्रयास है, जबकि अध्यात्म भीतर की दुनिया को जानने का मार्ग है। दोनों में ध्यान की आवश्यकता समान रूप से होती है।


जो व्यक्ति ध्यान में स्थित होता है, वह बाहरी परिस्थितियों में उलझता नहीं है। वह सत्य और अपने इष्ट के मार्ग पर चलता है। वह दूसरों के दुःख को समझ सकता है, लेकिन उसमें डूबता नहीं है। वह समाधान खोजता है, सहारा बनता है, और अपने संतुलन को बनाए रखता है।


वह व्यक्ति अपने बीते हुए समय से सीख लेता है, लेकिन उसमें अटका नहीं रहता। आने वाले समय को वह एक प्रेरणा के रूप में देखता है। उसके लिए सुख, दुःख, क्रोध जैसी भावनाएँ केवल एक प्रक्रिया होती हैं वे आती हैं और चली जाती हैं। वह इन भावनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं करता, क्योंकि वह जानता है कि प्रतिक्रिया ही उलझन का कारण बनती है।


ऐसा व्यक्ति अपनी इन्द्रियों का उपयोग भोग के लिए नहीं, बल्कि सृजन के लिए करता है। वह इन्द्रियों के आकर्षण में बहता नहीं, बल्कि उन्हें एक साधन के रूप में उपयोग करता है अपने ध्यान को गहराई देने के लिए, और आत्मा तक पहुँचने के लिए।


जीवन का संतुलन इसी में है कि हम विज्ञान और अध्यात्म दोनों को साथ लेकर चलें। बाहरी प्रगति के साथ-साथ आंतरिक स्थिरता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि मनुष्य केवल बाहर की दुनिया को जीतने में लगा रहेगा और भीतर को भूल जाएगा, तो उसका विकास अधूरा रहेगा।


ध्यान ही वह सेतु है जो मनुष्य को स्वयं से जोड़ता है। और जब मनुष्य स्वयं से जुड़ जाता है, तभी वह सच्चे अर्थों में सृजन कर पाता है अपने लिए, समाज के लिए, और इस संपूर्ण संसार के लिए।


ध्यान कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे जबरदस्ती “किया” जा सके। ध्यान अपने आप “होता” है, लेकिन उसके लिए निरंतर अभ्यास और सही दिशा में प्रयास जरूरी होता है। जैसे कोई व्यक्ति किसी भी काम में धीरे-धीरे गहराई तक उतरता है, वैसे ही ध्यान भी धीरे-धीरे जीवन का हिस्सा बनता है। इसमें समय लगता है, धैर्य लगता है और सबसे जरूरी है निरंतरता।


आज का इंसान तुरंत परिणाम चाहता है। वह हर काम का आउटपुट जल्दी देखना चाहता है, लेकिन उतनी ही ईमानदारी से इनपुट देने के लिए तैयार नहीं होता। जबकि सच्चाई यह है कि जितनी बारीकी, धैर्य और लगन से हम किसी काम में इनपुट देते हैं, उतना ही सुंदर और संतुलित उसका आउटपुट मिलता है। ध्यान भी इसी सिद्धांत पर काम करता है यह एक दिन या कुछ दिनों का अभ्यास नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है।


अभ्यास से ही ध्यान बनता है जीवन का हिस्सा


ध्यान के लिए लगातार अभ्यास आवश्यक है। शुरुआत में मन बहुत भटकता है। कभी इधर तो कभी उधर जैसे एक बंदर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदता रहता है। यही चंचलता इंसान के मन में भी होती है। मन एक जगह टिकता नहीं, और जब मन स्थिर नहीं होता, तो कोई भी बड़ा काम या जीवन में बड़ा बदलाव संभव नहीं हो पाता।


इसलिए अभ्यास का उद्देश्य मन को जबरदस्ती रोकना नहीं, बल्कि उसे धीरे-धीरे एक दिशा देना है। जब हम नियमित रूप से ध्यान का अभ्यास करते हैं, तो धीरे-धीरे मन शांत होने लगता है और ध्यान अपने आप गहराता जाता है।


ध्यान का तरीका: सरल और सहज


ध्यान का मतलब यह नहीं कि आपको हमेशा आंख बंद करके बैठना ही पड़े। आप किसी इष्ट के रूप, उनके गुणों या किसी सकारात्मक छवि पर ध्यान लगा सकते हैं। लेकिन सबसे अच्छा अभ्यास यह है कि आप जो भी काम कर रहे हैं, उसी में पूरी तरह से उपस्थित रहें।


जब भी आपका ध्यान काम से भटकता है, तो अपनी सांसों पर ध्यान केंद्रित करें। सांसें हमेशा वर्तमान में होती हैं, इसलिए जब आप सांसों पर ध्यान लाते हैं, तो आपका मन भी वर्तमान क्षण में लौट आता है। यही ध्यान का मूल है वर्तमान में जीना।


भावनाओं को समझना जरूरी है


जीवन में कई बार डर, गुस्सा, अहंकार या मोह जैसी भावनाएं आती हैं। ध्यान का मतलब इन भावनाओं को दबाना नहीं है, बल्कि उन्हें समझना है।


जब कोई भावना उठे, तो सबसे पहले यह जानने की कोशिश करें कि वह कहां से आ रही है। उसका कारण क्या है? क्या यह किसी पुराने अनुभव से जुड़ी है, या किसी वर्तमान स्थिति से?


जब आपको कारण समझ में आ जाए, तो अगला कदम है यह देखना कि उस स्थिति पर आपका नियंत्रण है या नहीं।


अगर आपके नियंत्रण में है, तो उस पर काम करें।


अगर आपके नियंत्रण में नहीं है, तो उसे स्वीकार करें और छोड़ दें।


यह समझ ही आपको मानसिक शांति की ओर ले जाती है।


शरीर पर ध्यान लाना


जब भावनाएं बहुत ज्यादा हावी हो जाएं, तो एक आसान तरीका है अपने ध्यान को शरीर पर लाना।

आप अपने हाथों को देखें, अपने शरीर के अलग-अलग अंगों को महसूस करें। धीरे-धीरे ध्यान को एक-एक अंग पर ले जाएं। इससे आपका ध्यान भावनाओं से हटकर शरीर में आ जाता है, और मन शांत होने लगता है।


यह एक बहुत प्रभावी तरीका है, जिससे आप खुद को वर्तमान में वापस ला सकते हैं।


वर्तमान में जीना ही सच्चा ध्यान है


अंत में, ध्यान का अर्थ सिर्फ बैठकर आंख बंद करना नहीं है। ध्यान का असली अर्थ है—हर पल को जागरूक होकर जीना।

आप जो भी काम कर रहे हैं, उसे पूरी एकाग्रता और शांति के साथ करें।


खाना खा रहे हैं, तो सिर्फ खाने पर ध्यान दें


काम कर रहे हैं, तो सिर्फ काम पर ध्यान दें


किसी से बात कर रहे हैं, तो पूरी तरह उस व्यक्ति के साथ उपस्थित रहें


यही ध्यान है, यही जीवन को सही तरीके से जीने की कला है।


ध्यान कोई जादू नहीं है, बल्कि एक प्रक्रिया है। यह धीरे-धीरे विकसित होता है। इसके लिए अभ्यास, धैर्य और समझ जरूरी है। जब आप नियमित रूप से अभ्यास करते हैं, अपने मन को समझते हैं और वर्तमान में जीना सीखते हैं, तो ध्यान अपने आप आपके जीवन का हिस्सा बन जाता है। और जब ध्यान जीवन बन जाता है, तब जीवन भी शांत, संतुलित और सुंदर हो जाता है।

क्या हर चीज़ में कारण और लाभ ढूँढना सही है...

क्या हर चीज़ में कारण और लाभ ढूँढना सही है? 

आज के समय में एक आम बात देखने को मिलती है लोग हर काम के पीछे कोई न कोई कारण और लाभ (फायदा) ढूँढते हैं। अगर कोई अच्छा काम भी करता है, तो तुरंत सवाल उठता है: “इसका फायदा क्या है?” या “इसने ऐसा क्यों किया?”


यह सोच धीरे-धीरे इतनी गहरी हो गई है कि कई बार लोग सही काम को भी गलत नज़रिए से देखने लगते हैं। आइए इसे सरल भाषा में समझते हैं।


1. ऐसी सोच आती कहाँ से है?


(क) अनुभव और समाज का असर

जब कोई व्यक्ति बार-बार ऐसे अनुभव करता है जहाँ लोग स्वार्थ से काम करते हैं, तो उसका दिमाग यह मान लेता है कि “हर कोई अपने फायदे के लिए ही काम करता है।”

समाज में भी जब हम धोखा, चालाकी या स्वार्थ देखते हैं, तो हमारी सोच उसी दिशा में ढलने लगती है।


(ख) परवरिश और माहौल

अगर बचपन से ही किसी को यह सिखाया जाए कि “बिना मतलब कोई कुछ नहीं करता”, तो वह बड़ा होकर हर चीज़ में मतलब ही ढूँढेगा।


(ग) डर और असुरक्षा

कई बार इंसान को डर होता है कि कहीं उसके साथ गलत न हो जाए। इस डर की वजह से वह हर चीज़ को शक की नज़र से देखने लगता है।


2. लोग हर काम में कारण और लाभ क्यों ढूँढते हैं?


(क) दिमाग की आदत (Pattern Finding)

हमारा दिमाग हर चीज़ में पैटर्न ढूँढने के लिए बना है। इसलिए वह हर काम के पीछे कारण खोजने लगता है।


(ख) खुद को सुरक्षित रखने की कोशिश

अगर हमें पहले कभी नुकसान हुआ हो, तो हम आगे से सतर्क हो जाते हैं। यह सतर्कता कभी-कभी शक में बदल जाती है।


(ग) आज का प्रतिस्पर्धी समय

आजकल हर जगह प्रतियोगिता है पढ़ाई, नौकरी, बिज़नेस। ऐसे में लोग मान लेते हैं कि “हर कोई अपने फायदे के लिए ही काम कर रहा है।”


3. सही चीज़ को भी गलत नजरिए से क्यों देखा जाता है?


अविश्वास (Trust Issues): जब विश्वास कम हो जाता है, तो अच्छी चीज़ भी गलत लगने लगती है।

नकारात्मक सोच (Negative Mindset): अगर दिमाग में पहले से ही नकारात्मकता भरी हो, तो हर चीज़ में कमी ही दिखती है।

पिछले अनुभव: अगर पहले धोखा मिला हो, तो व्यक्ति भविष्य में हर अच्छे काम पर भी शक करता है।


4. अगर कोई इंसान सही को भी गलत नजरिए से देखता है तो क्या करना चाहिए?


(क) शांत रहकर समझाना

सबसे पहले गुस्सा नहीं करना चाहिए। शांत तरीके से अपनी बात और अपने इरादे को स्पष्ट करें।


(ख) अपने काम पर ध्यान देना

हर किसी को बदलना संभव नहीं है। इसलिए अपना काम ईमानदारी से करते रहें।


(ग) समय को काम करने देना

कई बार शब्दों से ज्यादा काम बोलता है। समय के साथ लोग खुद समझ जाते हैं कि क्या सही है।


(घ) दूरी बनाना (जब ज़रूरी हो)

अगर कोई लगातार गलत ही समझता है और नकारात्मकता फैलाता है, तो उससे थोड़ी दूरी बनाना बेहतर होता है।


(ङ) खुद की सोच सकारात्मक रखना

दूसरों की सोच आपके ऊपर असर न करे, इसके लिए अपनी सोच को मजबूत और सकारात्मक बनाए रखें।


5. क्या हर चीज़ में कारण ढूँढना गलत है?


नहीं, हर बार ऐसा करना गलत नहीं है।

कारण समझना अच्छी बात है, लेकिन हर चीज़ को शक की नजर से देखना गलत है।


संतुलन जरूरी है...


जहाँ ज़रूरी हो, वहाँ सवाल पूछें

लेकिन हर अच्छे काम में भी बुराई ढूँढना छोड़ें


आज के समय में हर काम के पीछे कारण और लाभ ढूँढने की आदत आम हो गई है। यह आदत हमारे अनुभव, समाज और डर से पैदा होती है।


लेकिन यह जरूरी है कि हम अपनी सोच को संतुलित रखें। हर किसी को शक की नजर से देखना हमें अंदर से कमजोर बनाता है, जबकि विश्वास और सकारात्मकता हमें मजबूत बनाती है।


इसलिए कोशिश करें...

हर चीज़ में शक नहीं, समझ और संतुलन ढूँढें।

मनुष्य का मन बहुत विचित्र होता है

मनुष्य का मन बहुत विचित्र होता है। इसमें यादें भी रहती हैं, पीड़ा भी, डर भी, प्रेम भी और अनगिनत इच्छाएँ भी। अक्सर हमें सिखाया जाता है कि दुखद यादों को भुला दो, डर को दबा दो, और पीड़ा से दूर भागो। लेकिन सच यह है कि ये सब हमारी मानवता का हिस्सा हैं। इन्हें निकाल फेंकना नहीं, समझना और अपने भीतर समेटना ही असली परिपक्वता है।


जब हम अपने आप को इतना विशाल बना लेते हैं कि हर भावना हमारे भीतर स्थान पा सके, लेकिन हमें बाहर से विचलित न कर सके तभी हम सच में मजबूत बनते हैं। यह मजबूती बाहर से नहीं आती, यह भीतर से विकसित करनी पड़ती है।


मन को उदार बनाना क्यों जरूरी है?


मन का उदार होना मतलब यह नहीं कि आप सब कुछ सहते रहें, बल्कि इसका अर्थ है कि आप हर अनुभव को समझदारी से स्वीकार कर सकें। जब मन संकीर्ण होता है, तो छोटी-छोटी बातें भी हमें तोड़ देती हैं। लेकिन जब मन उदार होता है, तो वही बातें हमें सिखाने लगती हैं।


उदार मन बनाने के लिए सबसे पहला कदम है अपने इन्द्रियों के साथ दोस्ती करना।


इन्द्रियों से दोस्ती कैसे करें?


हमारी इन्द्रियाँ (देखना, सुनना, स्वाद लेना, स्पर्श और गंध) ही हमें दुनिया से जोड़ती हैं। लेकिन समस्या तब होती है जब हम इनके गुलाम बन जाते हैं।


दोस्ती का मतलब है संतुलन।


कभी इन्द्रियों को सुने....

  जैसे अगर शरीर थका हुआ है, तो उसे आराम दें। अगर मन भारी है, तो थोड़ी शांति लें।


कभी इन्द्रियों को सुनाएँ....

  जैसे सुबह नींद अच्छी लगती है, फिर भी उठकर योग या कसरत करना। शुरुआत में मन नहीं करेगा, लेकिन यही अनुशासन धीरे-धीरे शक्ति बनता है।


उदाहरण....

मान लीजिए आपको मीठा बहुत पसंद है। इन्द्रियाँ कहेंगी "और खाओ"। अगर आप हर बार मानते रहेंगे, तो यह लत बन जाएगी। लेकिन अगर आप कभी-कभी खुद से कहें—"बस, आज इतना ही काफी है" तो आप इन्द्रियों को दिशा देना सीख रहे हैं।


"जागरूकता की भूमिका"


इन्द्रियों से संतुलित रिश्ता बनाने के लिए जागरूकता जरूरी है। बिना जागरूकता के हम बस आदतों के गुलाम बने रहते हैं।


जागरूकता का मतलब है हर क्षण खुद को देखना:


मैं अभी क्या महसूस कर रहा हूँ?

मैं यह क्यों कर रहा हूँ?

क्या यह सच में जरूरी है?


जब आप ये सवाल खुद से पूछना शुरू करते हैं, तभी बदलाव शुरू होता है।


"ध्यान और मानसिक तैयारी"


मन को समझे बिना उसे नियंत्रित करना संभव नहीं है। इसलिए ध्यान (मेडिटेशन) बहुत जरूरी है।


ध्यान का अर्थ सिर्फ आँख बंद करके बैठना नहीं है, बल्कि अपने विचारों को देखना है बिना उनसे जुड़ने के।


धीरे-धीरे आप समझने लगते हैं:


कब इन्द्रियाँ ज्यादा मांग रही हैं

कब आपको खुद को रोकना चाहिए

और कब आपको खुद को खुलकर जीने देना चाहिए


"इन्द्रियों का अंधा प्रेम"


हम अक्सर अपनी इन्द्रियों से अंधा प्रेम करते हैं। जो अच्छा लगता है, वही करते जाते हैं चाहे वह हमारे लिए सही हो या नहीं।


ज्यादा आराम..... "शरीर कमजोर"

ज्यादा भोग...... "मन अशांत"

ज्यादा सोच.... "चिंता"


और इसी कारण हम हमेशा एक "बचाव मुद्रा" में रहते हैं हर असुविधा से बचने की कोशिश करते हुए।


"जीवन का संतुलन"


जीवन में योग, व्यायाम, ध्यान ये सब सुनने में आसान लगते हैं, लेकिन करने में कठिन इसलिए लगते हैं क्योंकि हमारी इन्द्रियाँ आराम चाहती हैं।


"आज नहीं, कल से करेंगे" यह सोच हमें वहीं रोक देती है।


दूसरी ओर, माया, मोह, काम, वासना ये हमें बार-बार खींचते हैं क्योंकि इनमें तुरंत सुख मिलता है।


समाधान क्या है?


समाधान किसी चीज़ को छोड़ देना नहीं है।

न ही खुद को जबरदस्ती रोकना है।


समाधान है अपने आप को इतना मजबूत बनाना कि आप हर भावना, हर इच्छा, हर अनुभव को संभाल सकें।


खुशी आए.... "बहें नहीं"

दुख आए..... "टूटें नहीं"

इच्छा आए.... " बहकें नहीं"


बल्कि हर चीज़ को समझें, स्वीकारें और संतुलन में रखें।


मन को उदार बनाना एक दिन का काम नहीं है। यह एक अभ्यास है हर दिन थोड़ा-थोड़ा खुद को समझने का।


जब आप अपने मन और इन्द्रियों के साथ संतुलन बना लेते हैं, तब जीवन बोझ नहीं लगता, बल्कि एक सुंदर अनुभव बन जाता है।


आपको कुछ छोड़ने की जरूरत नहीं है बस खुद को इतना विशाल बनाना है कि सब कुछ आपके भीतर समा जाए, लेकिन आप किसी के भीतर न समा जाएँ।



भावनाएँ हमेशा हमारे साथ रहती हैं

 1. भावनाएँ हमेशा हमारे साथ रहती हैं


हम जहाँ भी जाते हैं, जो भी करते हैं भावनाएँ हमारे अंदर होती ही हैं।


किसी से बात कर रहे हों मन में पसंद/नापसंद चल रही होती है


कोई निर्णय ले रहे हों डर, उम्मीद, लालच, या अहंकार जुड़ जाता है 


मतलब, भावनाएँ हमारी “डिफ़ॉल्ट सेटिंग” हैं।


2. समस्या भावनाओं में नहीं, उनसे बह जाने में है


भावनाएँ बुरी नहीं हैं।

समस्या तब होती है जब हम...


गुस्से में निर्णय लेते हैं


डर के कारण पीछे हट जाते हैं


मोह या लालच में फँस जाते हैं


तब निर्णय साफ नहीं होता, और बाद में हमें लगता है:

“शायद मैंने सही नहीं किया…”


3. “भावनाओं के बिना” नहीं, “भावनाओं को देखकर” जीना


तुमने जो कहा वो बहुत महत्वपूर्ण है:


“भावना तो रहे, पर उसे बस देखें”


यही असली समझ है।


इसका मतलब है:


गुस्सा आया....पर तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दी


डर लगा.... पर उसे समझा, उसके हिसाब से नहीं चले


खुशी आई.... पर उसमें बहकर गलत फैसला नहीं किया


यानी भावना तुम्हारे अंदर है, लेकिन तुम उसके गुलाम नहीं हो।


4. ऐसा करने से क्या बदलता है?


जब हम भावनाओं को “देखते” हैं, उनसे “बहते” नहीं...


निर्णय साफ होते हैं

मन में कम संदेह होता है

बाद में पछतावा नहीं होता

जीवन थोड़ा शांत हो जाता है


5. क्यों मुश्किल है ऐसा करना?


क्युकी....


बचपन से हमने सीखा है “भावना = मैं”


हमें लगता है “मैं गुस्से में हूँ”

जबकि सच है “मेरे अंदर गुस्सा आ रहा है”


ये छोटा सा फर्क बहुत बड़ा है।


6. आम जीवन का उदाहरण


मान लो: किसी ने तुम्हें कुछ गलत कह दिया।


भावनाओं में बहकर...


तुम तुरंत गुस्से में जवाब दोगे


बाद में पछताओगे


भावनाओं को देखकर....


तुम नोटिस करोगे: “मुझे गुस्सा आ रहा है”


थोड़ा रुक जाओगे


फिर सोचकर जवाब दोगे या चुप रहोगे


7. क्या पूरी तरह भावनाएँ खत्म हो सकती हैं?


नहीं।

और जरूरत भी नहीं है।


लक्ष्य ये नहीं है कि: भावनाएँ खत्म कर दी जाएँ

बल्कि: उनके साथ संतुलन में जीना सीखें


8. असली शांति कहाँ है?


जब....


भावनाएँ आती हैं


तुम उन्हें देखते हो


लेकिन उनसे बंधते नहीं


तभी अंदर एक स्थिरता आती है।


भावनाएँ होना स्वाभाविक है

उनसे बह जाना समस्या है

उन्हें देखना समझदारी है

उनके पार जाकर निर्णय लेना ही संतुलन है

मन क्या है...

 मन…

यह कोई दिखाई देने वाली चीज़ नहीं,

पर पूरी दुनिया को चलाने वाली सबसे बड़ी ताकत यही है।


कभी यह हवा जैसा हल्का हो जाता है,

कभी पत्थर जैसा भारी बैठ जाता है।


मन आसमान पर क्यों चढ़ता है?

क्योंकि उसे विस्तार पसंद है,

जैसे खुला आकाश हर दिशा में फैलता है।


जब कोई हमारी तारीफ़ करता है,

मन गुब्बारे की तरह फूल जाता है,

और हम खुद को बादलों के ऊपर महसूस करने लगते हैं।


जैसे सूरज निकलते ही कमल खिल जाता है,

वैसे ही मन को जब सुख का स्पर्श मिलता है,

वह अपने आप खिल उठता है।


पर मन नीचे क्यों गिरता है?

क्योंकि यह पकड़ना जानता है, छोड़ना नहीं,

और हर चोट को बार-बार जीता है।


जैसे तेज हवा पेड़ की कमजोर शाखा को तोड़ देती है,

वैसे ही एक नकारात्मक बात

मन को भीतर से हिला देती है।


बाहरी चीज़ें मन को क्यों प्रभावित करती हैं?

क्योंकि मन एक दर्पण है,

जो सामने जो आता है, वही दिखाता है।


अगर आसपास शोर है,

तो मन भी बेचैन हो जाता है,

जैसे गंदे पानी में चाँद साफ नहीं दिखता।


अगर आसपास शांति है,

तो मन भी शांत हो जाता है,

जैसे शांत झील में आकाश साफ झलकता है।


खुशी क्या है?

यह कोई वस्तु नहीं,

यह मन की एक अवस्था है।


जब हमारी अपेक्षाएँ पूरी होती हैं,

तो मन खुश हो जाता है,

और जब टूटती हैं, तो दुख में गिर जाता है।


दुख के भी कई रूप होते हैं,

कभी शरीर का दर्द,

कभी मन का खालीपन।


शरीर का दुख दिखाई देता है,

पर मन का दुख छुपा रहता है,

और धीरे-धीरे पूरे जीवन को प्रभावित करता है।


मन का असर शरीर पर क्यों पड़ता है?

क्योंकि दोनों अलग नहीं, जुड़े हुए हैं,

जैसे जड़ और पेड़ एक ही होते हैं।


अगर मन परेशान है,

तो शरीर भी थकान महसूस करता है,

और अगर मन शांत है, तो शरीर हल्का लगता है।


आज के समय में मन और भी ज्यादा भटकता है,

मोबाइल, सोशल मीडिया, तुलना

यह सब मन को कभी ऊपर, कभी नीचे ले जाते हैं।


दूसरों की ज़िंदगी देखकर,

हम अपने जीवन को कम समझने लगते हैं,

और यही तुलना मन को गिरा देती है।


मन को समझना क्यों ज़रूरी है?

क्योंकि यही हमारा असली साथी है,

और यही सबसे बड़ा भटकाने वाला भी।


अगर मन को साध लिया,

तो जीवन सरल हो जाता है,

वरना हर छोटी बात तूफान बन जाती है।


मन को कैसे संभालें?

उसे रोको मत, समझो,

जैसे नदी को रोका नहीं जाता, दिशा दी जाती है।


धीरे-धीरे अपने विचारों को देखो,

कौन सा विचार तुम्हें ऊपर ले जा रहा है,

और कौन सा नीचे गिरा रहा है।


प्रकृति से सीखो,

हर रात के बाद सुबह आती है,

हर पतझड़ के बाद बसंत आता है।


वैसे ही मन भी बदलता है,

यह स्थायी नहीं है,

यह सिर्फ एक गुजरता हुआ अनुभव है।


मन ना अच्छा है, ना बुरा,

यह सिर्फ वैसा बनता है जैसा हम उसे बनाते हैं।


अगर हम उसे समझ लें,

तो यही मन स्वर्ग बना देता है,

और अगर न समझें, तो यही मन नरक भी बना सकता है।


मनुष्य का जीवन सच में बहुत अनमोल है...

 मनुष्य का जीवन सच में बहुत अनमोल है, लेकिन उससे भी अधिक मूल्यवान है उसके द्वारा किए गए कर्म। हर इंसान की अपनी एक अलग दुनिया होती है उसकी सोच, उसके अनुभव, उसकी भावनाएँ इसलिए कोई भी व्यक्ति सबको खुश नहीं रख सकता। यह एक सच्चाई है जिसे स्वीकार करना ही शांति की पहली सीढ़ी है।


लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इंसान कुछ कर ही नहीं सकता। हर व्यक्ति ऐसा कार्य जरूर कर सकता है जिससे उसके जीवन में बदलाव आए और समाज में भी शांति फैले। समस्या यह है कि हर मनुष्य के अंदर एक अलग दुनिया बसती है, और उस दुनिया को प्रभावित करने वाले अनगिनत कारण होते हैं परिस्थितियाँ, संबंध, इच्छाएँ, डर और भावनाएँ।


अक्सर देखा जाता है कि इंसान अपने सही कर्म के मार्ग से भटक जाता है। इसका मुख्य कारण है उसका अशांत मन। जब मन शांत नहीं होता, तो भावनाएँ नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। और जब भावनाओं पर नियंत्रण नहीं होता, तब व्यक्ति क्षणिक सुख के लिए ऐसे निर्णय ले लेता है, जिनकी सजा उसे जीवन भर भुगतनी पड़ती है।


यही कारण है कि ध्यान (मेडिटेशन) का महत्व इतना अधिक है। पुराने समय के साधु-संत ध्यान क्यों करते थे? क्योंकि वे जीवन के गहरे सत्य को समझते थे। वे जानते थे कि मन को स्थिर किए बिना सही दृष्टि प्राप्त नहीं हो सकती। जब व्यक्ति ध्यान की अवस्था में होता है, तब वह स्वयं को और दूसरों को उनके वास्तविक रूप में देख पाता है।


इसके विपरीत, जब हम भावनाओं में बह रहे होते हैं जैसे क्रोध, दुख या अहंकार तो हम सामने वाले व्यक्ति को सही ढंग से देख ही नहीं पाते। हम उसे समझने के बजाय अपने मन की स्थिति के अनुसार उसका आकलन करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति क्रोधित है, तो वह प्रकृति के बीच जाकर भी शांति का अनुभव नहीं कर सकता। उसके सामने फूल, झरने, पहाड़, पेड़, पक्षी सब कुछ होते हुए भी वह उन्हें महसूस नहीं कर पाता।


लेकिन एक जागरूक और ध्यानमय व्यक्ति का अनुभव बिल्कुल अलग होता है। वह भीड़-भाड़, तनाव या संघर्ष के माहौल में भी भीतर से शांत रहता है। उसकी शांति बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं होती, बल्कि उसके भीतर से उत्पन्न होती है।


महाभारत में श्रीकृष्ण इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इतना बड़ा युद्ध चल रहा था, चारों ओर अशांति और विनाश था, फिर भी वे पूरी तरह शांत, जागरूक और संतुलित थे। उन्हें स्पष्ट रूप से पता था कि वे क्या कर रहे हैं और क्यों कर रहे हैं। यही जागरूकता उन्हें भावनाओं के प्रभाव से मुक्त रखती थी।


जो व्यक्ति सच में जागरूक होता है, वह अपनी भावनाओं का गुलाम नहीं बनता। बल्कि वह उन्हें समझता है और नियंत्रित करता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि इंसान ध्यान को सही रूप में समझे। आज बहुत से लोग शांति चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह पता ही नहीं होता कि ध्यान वास्तव में क्या है और इसे कैसे अपनाया जाए।


ध्यान अपने मन को समझने और उसे स्थिर करने की एक सरल विधि है। जब व्यक्ति धीरे-धीरे ध्यान को अपने जीवन का हिस्सा बनाता है, तब उसके विचार स्पष्ट होते हैं, भावनाएँ संतुलित होती हैं और जीवन में एक गहरी शांति का अनुभव होने लगता है।


Friday, March 27, 2026

Raj Sir Words

सुनो दोस्तों जीवन का रहस्य जानो, संसार के वास्तविक रूप को समझो...गंगा के प्रवाह मे मुठी डाल के निकली जाय तो कुछ भी प्राप्त नहीं होता, परन्तु उस मुठी को हथेली बना कर गंगा के प्रावह मे डाली जाय तो गंगा जल हामरे मुख तक पहुंच पता है... विचार करो दोस्तों आपने अहंकार की मुठी बँधी या समर्पण की अंजलि बनाई है अपने...ऐ संसार क्या है दोस्तों मानव, दानव, पशु,पक्षी, जंतू, वृक्ष ऐ सब कैसे बनत्ते है... किन पदर्थो से इनका जन्म होता...कैसे चलते, कैसे जीते है... मृत्यु कैसे होती इन सब का...और मृत्यु के पश्चात क्या होता...इस रहस्यमय बात का विचार करो...मनुष्य का देह मिटी से बनी, जल उसमे रक्त बन कर परवाह करता है...और अग्नि उस देह मे तापमान प्रदान करती...यानि याग्नि, वायु, जल, जमीन,और आकाश इन पांच तत्वों से ही हम बने है...ना ही मनुष्य के सम्बन्ध उस देह से है और न ही उसका आधार उस देह से है दोस्तों...मानव सभाव, बर्ताव और उसका कर्म ही परिचय है...हम सब का जीवन दृश्य और अदृश्य मेल है दोस्तों...अपनी धर्म, सत्य और परम्परा के विचार का हमेशा ध्यान रखे...ताकि आपके विचारों और वेयहारो पे आंच न आये...आपका समस्त जीवन बस तीन पीलर पे टिका है, पहला आपका बात, दूसरा आपका विचार, तीसरा वेयहार...मनुष्य केवल पांच महाभुत नहीं,पांच पदार्थ नहीं,पांच ज्ञानिंद्रा,पांच कार्मिक इन्द्रिया नहीं है...इन सब का मतलब है प्रकृति... और इन सब का मतलब है है चेतना... जिसमे आत्मा आवास करता है...और आत्मा का अंश परमात्मा बन कर शरीर मे निवास करता है तब मानवता का निर्माण होता है... ध्यान रहे मानव जब मानवता का धर्म खो देता तब वो मानव बल्कि दानव कहलाता है... नास शरीर का होगा आत्मा और परमात्मा की नहीं...Raj Sir...


Friens...You know Wat's the meaning of mind... See...My dear, you notice even our mind made computer but It can never take place of computer...because mind may be use superior to computer... It's called mind....moreover Mind has power, soever Computer has never BQZ Computer has limit of storage but our mind has no limitations...


दोस्तों ज़िन्दगी जीने के लिए हमें ये सिखाना जरुरी नहीं है की, क्या क्या चाहिए बल्कि ये सिखाना अति आवश्यक है की क्या क्या नहीं चहिये...क्यूंकि क्या करे..क्या न करे यही सोंच इंसान को इंसानियत सिखाती है


रईसी तो किसी के भी दम पे प्राप्त की जा सकती है दोस्तों बस एक काबलियत है जो सिर्फ और सिर्फ अपने दम पे ही ली जाती है...इसलिए रईस नहीं काबिल बनने की सोंच रखो। रईसी खरीदी और बेचीं जा सकती है पर याद रहे....काबलियत कभी नहीं।


In this world, None is perfect in any field... BQZ


The process of learning is never end...So don't proud upon yourself that You're a learner or superior to others...


Put this thing inside your mind forever, There are no limitation of varieties in the world...


In area of Education nobody is superior or senior, Everyone work as a processor.someone's processor is little bit high while somebody's processor is a less low....


You know my dear what's the problem while you go to dealing about any products/Projects/tender and assignment from somebody...We mostly empower & enhance to argument together that faculty... this way assist you to be a good seals man..but when your unique trying is to be agree with that person. It's route lead you a Superior Executive...


You never keep wish to be an or a engineer/actor/doctor/singer/leader/ porpheser/master/pilot and a owner of a heavy organization but keep wish to learned some special things which assist you how to produce them....


Never Tyr to be fan of anybody, try to examine extremely unique technique about somebody whom you like most...and care about carefully....you will be not only popular but also famous among Everyone....My Dear


समस्या ये नहीं की हमे लोग नहीं समझते बल्कि गम्भीर समस्या ये की हम लोगों को आपने बारे में समझा नहीं पाते........खुद को समझते हुए दुसरों को भी समझे और उनको अपने सुन्दर सोंच और पवित्र विचार के बारे में बताये..... क्युकी लाज़बाब जिन्दगी जीने के लिए इस्से बेहतर कोई दूसरी निती बनीं ही नहीं....


दुश्मनी से बेहतर है की आप मेरे दोस्त बन जाओ... ये कथन हमें उस ऊंचाई तक ले जाती है जिसे आप और हम सफ़लता कहते....याद रहे तोड़ी सी भी अगर सक की लहर उठी तो....आपकी दोस्ती दुश्मनो के दुश्मनी से जयदा खतरनाक बन सकती है...मेरे दोस्त....


ज़िंदगी में जो भी आप पाना चाहते है वही बाँटिये...पक्का इरादा,कड़ी मेहनत और अनुशासन सफलता महत्तवपूर्ण मार्ग हैं..जो कुछ आप है उससे अधिक अच्छा और अधिक महत्तवपूर्ण दिखने की कोशिश न करे हर वय्क्ति हर क्षेत्र में सफल नहीं हो सकता..अपना क्षेत्र अपने रुची और क्षमता के आधार पर चुनिए...ध्यान रहे....घमंड से अपना सर ऊँचा न करे...जीतने वाले भी ....अपना गोल्ड मैडल सिर झुका के हासिल करते है... Raj Sir