जब जीवन जीना ही है, तो क्यों न इसे पूरी जागरूकता के साथ जिया जाए।
शांति ही जीवन का असली धन है, बाकी सब तो आते-जाते साये हैं।
दुःख बाहर से नहीं आता, उसका जन्म भीतर की पकड़ से होता है।
जहाँ पकड़ है, वहीं पीड़ा है जहाँ छोड़ना है, वहीं मुक्ति है।
मनुष्य चीज़ों को नहीं, उनके विचारों को पकड़े रहता है।
घटना बीत जाती है, पर उसका बोझ मन सालों तक ढोता रहता है।
मान लो मन एक पुरानी अलमारी है।
जिसमें तुम हर टूटे रिश्ते, हर अपमान, हर असफलता को सहेज कर रखते हो।
अलमारी भर चुकी है, पर तुम नया जीवन उसमें ठूँसना चाहते हो।
जगह नहीं है, फिर भी शिकायत है कि जीवन भारी क्यों लग रहा है।
एक अनोखा उदाहरण समझो
तुम नदी किनारे खड़े हो और हाथ में पानी पकड़ने की कोशिश कर रहे हो।
जितना जोर से पकड़ोगे, पानी उतनी तेजी से फिसलेगा।
और अंत में हाथ खाली रह जाएगा, बस थकान बचेगी।
यही दुःख का कारण है पकड़ने की कोशिश उस चीज़ को जो स्वभाव से बहने वाली है।
जीवन नदी है, और तुम उसे मुट्ठी में कैद करना चाहते हो।
जो बीत गया, वह हवा के झोंके जैसा था।
तुम उसे रोक नहीं सके, पर उसकी यादों की दीवार जरूर खड़ी कर ली।
पेड़ का फल पककर गिरता है क्योंकि वह जानता है
छोड़ना ही आगे बढ़ने का रास्ता है, पकड़ना नहीं।
मनुष्य फल नहीं बन पाता, इसलिए गिरने से डरता है।
वह सड़ना स्वीकार कर लेता है, पर छोड़ना नहीं।
गुस्सा भी पकड़ का ही एक रूप है।
जब चीजें मन के अनुसार नहीं होतीं, तो भीतर आग जलती है।
अगर उसी क्षण तुम ध्यान बदल दो,
तो आग बिना ईंधन के खुद ही बुझ जाती है।
भावनाएँ समस्या नहीं हैं, उनसे जुड़ जाना समस्या है।
उन्हें देखो जैसे आसमान बादलों को देखता है बिना छुए, बिना रोके।
ध्यान कोई कठिन साधना नहीं, बल्कि देखने की कला है।
जो हो रहा है, उसे बिना निर्णय के देखना ही ध्यान है।
लोग सोचते हैं ध्यान करने से शांति मिलेगी।
पर सच यह है शांति में रहने वाला ही ध्यान को जान पाता है।
हम हर चीज़ के पहले धारणा बना लेते हैं।
और फिर उसी धारणा के चश्मे से पूरी दुनिया को देखने लगते हैं।
यही धारणा धीरे-धीरे सच लगने लगती है।
और हम वास्तविकता से दूर होते जाते हैं।
अगर तुम सच में जीना चाहते हो,
तो हर पल को बिना पुराने बोझ के देखना सीखो।
जीवन न तो बीते कल में है, न आने वाले कल में।
वह केवल इसी क्षण में सांस ले रहा है।
जो इस क्षण को पकड़ने की जगह महसूस करता है,
वही दुःख से मुक्त होकर सच में जीना शुरू करता है।
No comments:
Post a Comment