प्रेम में पड़ी स्त्री
अक्सर ‘बचलन’ कहलाती है,
जबकि उसकी गलती सिर्फ़ इतनी होती है
कि उसने किसी को दिल से चाहने की हिम्मत की होती है।
गलत वह नहीं…
गलत तो यह समाज है
जो स्त्री का प्रेम तो देखना चाहता है,
पर उसकी अपनी इच्छाओं को
दबा देना चाहता है।
जिस दुनिया में
पुरुष का इश्क़ ‘जुनून’ कहलाता है,
उसी दुनिया में
स्त्री का इश्क़ ‘चरित्र’ पर निशाना बन जाता है।
वह प्यार में पड़ती है
तो उसे कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है,
मानो मोहब्बत कोई गुनाह हो
और उस गुनाह की सज़ा
सिर्फ़ स्त्रियों के नाम लिखी गई हो।
सच तो यह है—
गलत स्त्री नहीं,
गलत वह सोच है
जो आज भी प्रेम को नहीं,
स्त्री को तौलती है।
जबकि प्यार करने का गुनाह
तो दोनों ने किया होता है
फिर सज़ा एक को ही क्यों????
स्त्री कभी संतुष्ट नहीं होती ...???
स्त्री से प्रेम में अगर आप ये उम्मीद करते हैं
कि वो आपसे पूरी तरह खुश है तो
आप नादानी में हैं...???
ये स्त्री के मूल में ही नहीं है...
अगर आप बहुत ज्यादा केयर करते है तो
उससे भी ऊब जाएगी,
अगर आप बहुत उग्र हैं तो वो
उससे भी बिदक जाएगी,
अगर आप बहुत ज्यादा विनम्र हैं तो वो
उससे भी चिढ जाएगी,
अगर आप उससे बहुत ज्यादा बात करते हैं तो वो आपको टेक इट फौर ग्रांटड लेने लगेगी,
अगर आप उससे बहुत कम बात करते हैं तो वो
मान लेगी कि आपका चक्कर कहीं और चल रहा है...
यानी आप कुछ भी कर लीजिए वो
संतुष्ट नहीं हो सकती...
ये उसका स्वभाव है वो
एक ऐसा डेडली काॅम्बीनेशन खोजती है जो
बना ही न हो बन ही न सकता हो....
ठीक वैसे ही जैसे कपड़ा खरीदने जाती है तो
कहती कि इसी कलर में कोई दूसरा डिजाइन दिखाओ, इसी डिजाइन में कोई दूसरा कलर दिखाओ
कपड़े का गट्ठर लगा देती है...
बहुत परिश्रम के बाद एक पसंद आ भी गया,
तो भी संतुष्ट नहीं हो सकती...
आखिरी तक सोचती है कि इसमे ये
डिजाइन ऐसे होता तो परफैक्ट होता...
इन सबके बावजूद एक बहुत बड़ी खूबी भी है
स्त्री के अंदर ...
एक बार उसे कुछ पसंद आ गया तो उसे
आखिरी दम तक सजो के रखती है वो
चाहे रिश्ते हो या चूड़ी...
रंग उतर जाएगा चमक खत्म हो जाएगी
पर खुद से जुदा नहीं करेगी...
बस यही खूबी स्त्री को विशिष्ट बनाती है...
स्त्री से प्रेम में अगर आप ये उम्मीद करते हैं कि
वो आपसे पूरी तरह खुश है तो
आप नादानी में हैं...
ये स्त्री के मूल में ही नहीं है...
स्त्री का प्रेम अक्सर पूर्ण समर्पण चाहता है। वह जिसे प्रेम करती है, उसमें अपनी पहचान ढूँढने लगती है। यही उसका सबसे बड़ा बल भी है और सबसे बड़ी कमजोरी भी। जब उसका सारा संसार एक व्यक्ति, एक विचार या एक उद्देश्य के इर्द-गिर्द सिमट जाता है, तब उसके भीतर यह डर जन्म लेने लगता है कि कहीं यह सब छिन न जाए। यही भय उसे नियंत्रक बना सकता है, कठोर बना सकता है, और कभी-कभी ऐसे निर्णयों की ओर धकेल देता है जिनका वह स्वयं अनुमान नहीं कर पाती।
वहीं पुरुष का प्रेम अक्सर स्वतंत्रता से जुड़ा होता है। वह चाहता है कि उसे समझा जाए, पर बाँधा न जाए। उसकी सबसे गहरी आशंका यह होती है कि कहीं प्रेम उसकी गति, उसकी सोच और उसके विस्तार को सीमित न कर दे। जब उसे लगता है कि कोई उसके चारों ओर घेरा बना रहा है, तब वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगता है। वह खुलकर संघर्ष नहीं करता, बल्कि चुप्पी, दूरी और अंततः त्याग का रास्ता चुन लेता है।
यहीं से दोनों के बीच का असंतुलन शुरू होता है। स्त्री जितना पास आती है, पुरुष उतना दूर जाने लगता है। स्त्री इस दूरी को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानती है और उसे भरने के लिए और अधिक प्रयास करती है। पुरुष उस प्रयास को दबाव समझने लगता है। यह टकराव प्रेम का नहीं, बल्कि दोनों की छिपी असुरक्षाओं का होता है।
स्त्री की आशंका यह होती है कि यदि उसने सब कुछ नहीं थामा, तो सब कुछ बिखर जाएगा। पुरुष की आशंका यह होती है कि यदि वह रुक गया, तो वह स्वयं को खो देगा। दोनों अपने-अपने डर से संचालित होते हैं, और यही डर प्रेम को धीरे-धीरे सत्ता, नियंत्रण और अपेक्षाओं के खेल में बदल देता है।
सबसे दुखद बात यह है कि जब यह संबंध टूटता है, तो दोनों ही खुद को पीड़ित मानते हैं। स्त्री सोचती है कि उसने सब कुछ दिया फिर भी उसे छोड़ा गया। पुरुष सोचता है कि उससे बहुत कुछ छीन लिया गया। दोनों ही सच होते हैं, और दोनों ही अधूरे।