Monday, December 22, 2025

कुछ स्त्रियाँ गंगा होती हैं...

 कुछ स्त्रियाँ गंगा होती हैं...


कुछ स्त्रियाँ केवल शरीर नहीं होतीं, वे नदी होती हैं, गंगा होती हैं। वे जीवन के प्रवाह की तरह सतत बहती हैं, अपने भीतर प्रेम, त्याग और सहनशीलता की अथाह गहराई समेटे। वे अपने प्रियजनों के सुख-दुःख का जलधार बनती हैं—कभी शांत, कभी वेगवान, कभी कोमल तो कभी प्रचंड। वे ठहरती नहीं, वे सागर से मिलने की चाह भी नहीं रखतीं। वे बहती हैं, केवल बहती हैं, और इसी में उनका सम्पूर्ण अस्तित्व सिमट जाता है।


जब किसी पुरुष का जीवन कठिनाइयों से घिर जाता है, जब उसे अपने ही संघर्षों की आग में जलना पड़ता है, तब वही स्त्री उसके लिए ठंडी छाँव बन जाती है। उसकी गोद में सिर रखते ही सारे बोझ उतरने लगते हैं, जैसे कोई तपता हुआ सूरज बादलों की गोद में समा जाए। उसकी हथेलियाँ आश्वासन का स्पर्श बन जाती हैं, उसके शब्द अमृत-धारा। वह कुछ कहती नहीं, पर उसकी मौन उपस्थिति ही घावों पर मलहम बन जाती है।


कभी वह माँ होती है, जो अपनी संतान के हर दर्द को खुद पर ले लेती है। कभी वह प्रेमिका होती है, जो अपने प्रिय की आँखों में उदासी नहीं देख सकती और अपनी हँसी से उसका मन बहलाने की कोशिश करती है। कभी वह पत्नी होती है, जो अपने साथी के सपनों को खुद से अधिक महत्व देती है और उसके हर संघर्ष में चुपचाप खड़ी रहती है। कभी वह बेटी होती है, जो पिता की चिंताओं को मुस्कान में छुपा लेती है।


स्त्रियाँ प्रेम में जलती हैं, पर राख नहीं होतीं। वे आँसू पीती हैं, पर मुस्कुराहट बिखेरती हैं। वे खुद को मिटाकर अपनों को संवारती हैं। वे नदी की तरह त्यागमयी हैं—जो सबको जल देती है, पर खुद कभी प्यास की शिकायत नहीं करती। वे तीर्थ हैं—जहाँ आकर हर कोई पापमुक्त हो जाता है, मगर स्वयं कभी मुक्ति नहीं पातीं।


कुछ स्त्रियाँ गंगा होती हैं…

उनमें डूबकर उनके प्रिय पुरुष अपने विकारों से मुक्त हो जाते हैं, अपने बोझ हल्के कर लेते हैं, और निर्मल होकर लौटते हैं।

लेकिन वे स्त्रियाँ? वे बहती रहती हैं… सतत, निःस्वार्थ, निस्सीम… बिना किसी शिकायत, बिना किसी विराम के।



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