Wednesday, February 24, 2021

राज्य_सूचना_आयोग

भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #राज्य_सूचना_आयोग सूचना का अधिकार अधिनियम 2005, राज्य स्तर पर राज्य सूचना आयोग के निर्माण की अनुमति प्रदान करता है। #राज्य_सूचना_आयोग_की_संरचना : राज्य सूचना आयोग में एक मुख्य सूचना आयुक्त और दस राज्य सूचना आयुक्तों होते हैं। जिनकी नियुक्ति एक समिति की सिफारिश के बाद राज्यपाल द्वारा की जाती है। इस समिति का अध्यक्ष, राज्य का मुख्यमंत्री होता है तथा इसमें राज्य विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष और मुख्यमंत्री द्वारा नामित राज्य का एक कैबिनेट मंत्री शामिल होता है। इस पद पर नियुक्त होने वाले व्यक्ति को सार्वजनिक जीवन में श्रेष्ठतम् व्यक्ति होना चाहिए और उसके पास लाभ का कोई अन्य पद नहीं होना चाहिए तथा वह किसी भी राजनीतिक दल के साथ या किसी भी व्यापार या किसी पेशे से नहीं जुड़ा हुआ होना चाहिए। #कार्यकाल_और_सेवा : राज्य के मुख्य सूचना आयुक्त और राज्य सूचना आयुक्त के पास 5 साल की अवधि या 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक अपने पद पर बने रह सकते हैं। वे पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं होते हैं। #राज्य_सूचना_आयोग_की_शक्तियां_और_कार्य : ▪️आयोग इस अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्व्यन से संबंधित अपनी वार्षिक रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करता है। राज्य सरकार, राज्य विधानसभा के पटल पर इस रिपोर्ट को प्रस्तुत करती है। ▪️यदि कोई उचित आधार मिलता है तो राज्य सूचना आयोग किसी भी मामले में जांच का आदेश दे सकता है। ▪️आयोग के पास लोक प्राधिकरण द्वारा अपने निर्णय के अनुपालन को सुरक्षित करने का अधिकार है। ▪️यह आयोग का कर्तव्य है कि किसी भी व्यक्ति से प्राप्त एक शिकायत की पूछताछ करे। ▪️एक शिकायत की जांच के दौरान आयोग ऐसे किसी भी रिकार्ड की जांच कर सकता है जो लोक प्राधिकरण के नियंत्रण में है और इस तरह के रिकॉर्ड को किसी भी आधार पर रोका नहीं जा सकता है। जांच करते समय आयोग के पास निम्नलिखित मामलों के संबंध में सिविल न्यायालय की शक्ति है: ▪️दस्तावेजों की पड़ताल और निरीक्षण की आवश्यकता होती है। ▪️गवाहों, या द्स्तावेजों और अन्य किसी मामलों का, जिसका निर्धारण किया जा सकता है, की पूछताछ के लिए सम्मन जारी करना। ▪️लोगों को बुलाना और या उन्हें उपस्थिति होने के लिए कहना तथा उन्हें सही मौखिक या लिखित सबूतों का प्रपत्र देना व दस्तावेजों या चीजों को उनके सम्मुख प्रस्तुत करना। ▪️शपथ पत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना। ▪️किसी भी अदालत या कार्यालय से कोई भी सार्वजनिक रिकार्ड प्राप्त करने के लिए प्रार्थन करना। ▪️जब एक लोक प्राधिकरण इस अधिनियम के प्रावधानों का पालन नहीं करता है तब आयोग इसके पालन को सुनिश्चत करने के लिए कदम उठाने की सिफारिश कर सकता है। #मूल्यांकन : केंद्र की तरह, इन आयोगों के पास भी बकाया मामलों का बोझ बढता जा रहा है। कम स्टाफ और रिक्त पदों पर नियुक्ति नहीं होने के कारण बकाया मामलों में बढोत्तरी होते जा रही है। अक्टूबर 2014 में, उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा अपीले और शिकायतें लंबित थी। लेकिन, इस तरह के उदाहरण भी हैं जहां कोई भी बकाया मामला नहीं है जैसे- मिजोरम, सिक्किम और त्रिपुरा के पास कोई भी मामला लंबित नहीं है। जानकारी देने के लिए आयोग के पास सीमित शक्तियां हैं और विसंगतियों को देखने के बावजूद भी वह कोई कार्रवाई नहीं कर सकता है। हालांकि, राज्य सूचना आयोग सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। इस प्रकार ये भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, उत्पीड़न और अधिकार के दुरुपयोग से निपटने में मदद कर रहे हैं। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #कैबिनेट_मिशन_योजना [ 16 मई 1946 ] द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हो गया था और इंगलैंड ने पहले आश्वासन दे रखा था कि युद्ध में विजयी होने के बाद वह भारत को स्वशासन का अधिकार दे देगा. इस युद्ध के फलस्वरूप ब्रिटिश सरकार की स्थिति स्वयं दयनीय हो गयी थी और अब भारतीय साम्राज्य पर नियंत्रण रखना सरल नहीं रह गया था. बार-बार पुलिस, सेना, कर्मचारी और श्रमिकों का विद्रोह हो रहा था. अधिक दिनों तक भारतीय साम्राज्य को सुरक्षित रख पाना इंगलैंड के लिए असंभव होता जा रहा था. भारत की राजनीति परिस्थिति का अध्ययन करने और समस्या का निदान खोजने के लिए ब्रिटिश संसद ने एक प्रतिनिधिमंडल मार्च, 1946 को भेजा. इस प्रतिनिधिमंडल ने लॉर्ड वेवेल तथा भारतीय नेताओं से मिलकर एक योजना तैयार की जिसे "कैबिनेट मिशन के नाम से जाना जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य था भारत में पूर्ण स्वराज्य लाना. इसने भारत के लिए एक नया संविधान तथा एक अस्थाई सरकार की स्थापना का लक्ष्य रखा था. महात्मा गाँधी के विचारानुसार "तत्कालीन परिस्थतियों में ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तुत यह सर्वोत्तम प्रलेख था." लेकिन इस योजना का सबसे बड़ा दोष यह था कि इसमें केंद्र सरकार को काफी दुर्बल रखा गया था और प्रांत को अपना निजी संविधान बनाने का अधिकार था. क्रिप्स मिशन की तरह ही कैबिनेट मिशन भी न तो पूरी तरह स्वीकृत की जा सकती थी और न ही अस्वीकृत. #कैबिनेट_मिशन_योजना_की_मुख्य_बातें : ▪️ब्रिटिश प्रान्तों और देशी राज्यों को मिलाकर एक भारतीय संघ का निर्माण किया जायेगा. भारतीय संघ के अधीन परराष्ट्र नीति, प्रतिरक्षा और संचार व्यवस्था रहेगी, जिसके लिए आवश्यक धन भी संघ को ही जुटाना होगा. ▪️संघ की एक कार्पालिका और विधानमंडल होगा जिसमें ब्रिटिश प्रान्तों और देशी राज्यों के प्रतिनिधि शामिल होंगे. अन्य सभी विषय सरकार के अधीन होंगे. ▪️प्रान्तों को यह अधिकार दिया गया कि वे अलग शासन सबंधी समूह बनाएँ. भारत के विभिन्न प्रान्तों को तीन समूहों में बाँटा गया – • मद्रास, बम्बई, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, बिहार और उड़ीसा • उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रांत, पंजाब और सिंध • बंगाल और असम. प्रत्येक समूह को अधिकार दिया गया कि वह अपने विषय के सम्बन्ध में निर्णय लें और शेष विषय प्रांतीय मंत्रमंडल को सौंप दें. ▪️देशी राज्यों के द्वारा जो विषय संघ को नहीं सौंपे जायेंगे उन पर देशी राज्यों का ही अधिकार होगा. ▪️संविधान के निर्माण के बाद ब्रिटिश सरकार देशी राज्यों को सार्वभौम संप्रभुता का अधिकार हस्तांतरित कर देगी. भारतीय संघ में सम्मिलित होने अथवा उससे अलग रहने का निर्णय देशी राज्य स्वयं करेंगे. ▪️योजना के कार्यान्वित होने के दस वर्ष पश्चात् या प्रत्येक दस वर्ष पर प्रांतीय विधानमंडल बहुमत द्वारा संविधान की धाराओं पर पुनर्विचार कर सकता है. #संविधान_के_निर्माण_से_सम्बंधित_निम्नलिखित #बातें_कैबिनेट_मिशन_में_निहित_थीं : ▪️प्रति दस लाख की जनसँख्या पर एक सदस्य का निर्वाचन होगा. ▪️प्रान्तों के संविधानसभा में प्रतिनिधित्व आबादी के आधार पर दिया जायेगा. ▪️अल्पसंख्यक वर्गों को आबादी से अधिक स्थान देने की प्रथा समाप्त हो जाएगी. ▪️रियासतों को भी जनसंख्या के आधार पर ही प्रतिनिधित्व दिया जायेगा. ▪️संविधानसभा की बैठक दिल्ली में होगी और प्रारम्भिक बैठक में अध्यक्ष एवं अन्य पदाधिकारियों का चुनाव कर लिया जायेगा. ▪️प्रान्तों के लिए अलग संविधान की व्यवस्था भी योजना के अंतर्गत थी. प्रत्येक समूह अपने संविधान के सम्बन्ध में तथा संघ में रहने का निर्णय करेगा. ▪️केंद्र में एक अस्थायी सरकार की स्थापना होगी और उसमें भारत के सभी प्रमुख दलों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जायेगा. केन्द्रीय शासन के सभी विभाग इन प्रतिनिधियों के अधीन रहेंगे तथा वायसराय इनकी अध्यक्षता करेगा. ▪️इंगलैंड भारत को सत्ता सौंप देगा. इस सिलसिले में जो मामले उत्पन्न हों उन्हें तय करने के लिए भारत और इंगलैंड के बीच एक संधि होगी. अंततः 14 जून, 1946 को कांग्रेस और मुस्लीम लीग दोनों ने इस योजना को स्वीकृत दे दी. हिन्दू महासभा तथा साम्यवादी दल ने इसकी कटु आलोचना की. अंतरिम सरकार की स्थापना के प्रश्न पर कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग में मतभेद हो गया. मुस्लिम लीग ने दावा किया कि वह कांग्रेस के बिना ही अंतरिम सरकार का निर्माण कर लेगी लेकिन वायसराय ने लीग के इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया. 1946 के चुनाव में निर्वाचन के लिए निर्धारित कुल 102 स्थानों में कांग्रेस को 59 स्थान प्राप्त हुए थे और मुस्लिम लीग को मात्र 30 स्थान प्राप्त हुए. मुस्लिम लीग को इस चुनाव परिणाम से घोर निराशा हुई. 8 अगस्त, 1946 को कांग्रेस की कार्य समिति ने प्रस्ताव पारित कर अंतरिम सरकार बनाने की योजना स्वीकार कर ली. अंतरिम सरकार ने 2 सितम्बर, 1946 को अपना कार्यभार संभाल लिया और पंडित नेहरु इसके प्रधानमंत्री बने. आगे चलकर वायसराय की सलाह पर मुस्लिम लीग ने अक्टूबर 1946 को सरकार में शामिल होना स्वीकार कर लिया, लेकिन सरकार को सहयोग देने के बदले यह हमेशा उसके कार्य में अड़ंगा डालती रही. कैबिनेट मिशन ने भारत के विभाजन का मार्ग तैयार कर दिया था. #निष्कर्ष : कैबिनेट मिशन का प्रमुख उद्देश्य भारत में सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण के तरीकों को खोजना ओर संविधान का निर्माण करने वाले तंत्र के बारे में सुझाव देना था। अंतरिम सरकार का गठन करना भी इसका एक प्रमुख उद्देश्य था। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #केंद्रीय_सूचना_आयोग सूचना के अधिकार अधिनियम (2005) के प्रावधानों के तहत केंद्रीय सूचना आयोग की स्थापना 2005 में भारत सरकार द्वारा की गयी थी। केंद्रीय सूचना आयोग शासन की प्रणाली में पारदर्शिता बनाए रखने में अपनी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जो लोकतंत्र के लिए जरूरी है। इस तरह की पारदर्शिता भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, उत्पीड़न और दुरुपयोग या अधिकार के दुरुपयोग की जांच करने के लिए आवश्यक है। #केंद्रीय_सूचना_आयोग_की_संरचना : केंद्रीय सूचना आयोग में एक मुख्य केंद्रीय सूचना आयुक्त और दस से अधिक सूचना आयुक्त होते हैं। मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक समिति की सिफारिश के बाद की जाती है। इस समिति में प्रधानमंत्री के अलावा, लोक सभा में नेता विपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री शामिल रहते हैं। उक्त सदस्य एक ऐसा व्यक्ति होने चाहिए जिन्हें सार्वजनिक जीवन में ख्याति प्राप्त हो। इसके साथ-साथ उनके कानून की जानकारी, प्रबंधन, पत्रकारिता, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, प्रशासन व शासन, मास मीडिया और सामाजिक सेवा का अनुभव होना चाहिए। उक्त सदस्य किसी भी राज्य या संघ शासित प्रदेश की विधान सभा का सदस्य नहीं होने चाहिए। वह किसी भी राजनीतिक दल या किसी भी व्यवसाय के साथ जुड़ा नहीं होने चाहिए तथा उसके पास कोई लाभ का पद नहीं होना चाहिए या उनके पास कोई अन्य लाभ का पेशा नहीं होना चाहिए। #केंद्रीय_सूचना_आयोग_के_कार्य_और_शक्तियां : केंद्रीय सूचना आयोग के कार्य और शक्तियां निम्नलिखित हैं- ▪️यदि किसी मामले में कोई उचित आधार होता है तो आयोग किसी भी मामले में जांच का आदेश दे सकता है। ▪️आयोग के पास लोक प्राधिकरण द्वारा अपने फैसले के अनुपालन को सुरक्षित करने की शक्ति है। ▪️यदि लोक प्राधिकरण इस अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है तो आयोग उन कदमों को उठाने की सिफारिश कर सकता है जो इस तरह के समानता को बढ़ावा देने के लिए लिये जाने चाहिए। ▪️यदि किसी भी व्यक्ति द्वारा शिकायत प्राप्त होती है यह आयोग का कर्तव्य है कि वह उस प्राप्त शिकायत की पूछताछ करे। 1. निर्दिष्ट समय सीमा के भीतर कौन अपनी अनुरोधित जानकारी का जवाब प्राप्त नहीं कर सका है। 2. वह यह तय करता है कि दी गई जानकारी, अधूरी, भ्रामक या गलत है और प्राप्त जानकारी किसी अन्य मामले से संबंधित है। 3. एक जन सूचना अधिकारी की नियुक्ति के अभाव में कौन व्यक्ति एक सूचना अनुरोध प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं हो पाया है। 4. वह यह तय करता है कि शुल्क के रूप में ली जा रही फीस अनुचित है। 5. किसने उस जानकारी देने से मना कर दिया था जिसका अनुरोध किया गया था। ▪️एक शिकायत की जांच के दौरान आयोग उस किसी भी रिकार्ड की जांच कर सकता है जो किसी भी लोक प्राधिकरण के नियंत्रण में है और इस तरह के रिकॉर्ड पर किसी भी आधार पर रोक नहीं लगाई जा सकती है। दूसरे शब्दों में जांच के दौरान सभी सार्वजनिक विवरणों को जांच के लिए आयोग के सामने प्रस्तुत करना चाहिए। ▪️जांच होने के दौरान, आयोग के पास एक सामान्य अदालत की शक्तियां हैं। ▪️आयोग को इस अधिनियम के प्रावधानों के कार्यान्वयन के आधार पर केंद्र सरकार को एक वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करना होता है। केंद्र सरकार को संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष इस रिपोर्ट को प्रस्तुत करना होता है। सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई एक्ट) इसलिए पारित किया गया था ताकि मांगी जा रही जानकारी बहुत सरल, आसान, समयबद्ध और सुगम हो सके जो इस कानून को सफल शक्तिशाली और प्रभावी बनाता है। जानकारी देने के लिए आयोग के पास केवल सीमित शक्तियां हैं और यदि कोई विसंगतियां पायी भी जाती हैं आयोग के पास कार्रवाई करने तक का अधिकार नहीं है। आयोग के पास कम कर्मचारी हैं और इसके पास बहुत सारे मामलों का बोझ है। आयोग में समय पर रिक्त पदों नहीं भरे जा रहे हैं। इन कारणों की वजह से आयोग के पास विशाल मात्रा में पिछला कार्य बकाया है। सूचना का अधिकार अधिनियम केवल सरकारी संस्थानों पर लागू होता है और यह निजी उद्यमों पर लागू नहीं होता है। यहां तक कि कुछ सार्वजनिक संस्थाएं इस कानून के दायरे में नहीं आना चाहती हैं। जैसे- भारतीय क्रिके़ट बोर्ड (बीसीसीआई)। यहां तक कि राजनीतिक दल अपने धन के बारे में जानकारी देने तथा अन्य गतिविधियों को जनता के साथ साझा करने की अनिच्छुक रही हैं। #निष्कर्ष : इसलिए, आयोग में रिक्त पदों को जल्द से जल्द भरा जाना चाहिए। आयोग को कुशलता से चलाने के लिए आयोग के पास जरूरी लोगों की संख्या हो, इसके लिए एक महत्वपूर्ण समीक्षा जरूर होनी चाहिए। सभी सार्वजनिक संस्थानों को आरटीआई अधिनियम के तहत जनता के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। लोगों को राजनैतिक दलों से जानकारी लेनी चाहिए ताकि वो और अधिक जिम्मेदार बन सके और उनके वित्त पोषण के स्रोत और अधिक पारदर्शी हो सके। इसे चुनावों में काले धन के उपयोग की भी जांच करनी चाहिए। इसके अलावा, उन निजी कंपनियों को भी इस अधिनियम के दायरे में आना चाहिए जो सार्वजनिक कार्यों में शामिल हैं। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #बेवेल_योजना_और_शिमला_समझौता 14 जून 1945 में लार्ड वेवेल द्वारा भारत की वैधानिक समस्या के समाधान के लिए शिमला सम्मेलन में जो योजना प्रस्तुत की गई उसे ही वेवेल योजना के नाम से जाना जाता है ▪️अक्टूबर 1943 में लार्ड लिनलिथगो के स्थान पर लार्ड बिस्काउंट वेवल पर वायसराय और गवर्नर जनरल नियुक्त किए गए। ▪️इस समय भारत की स्थिति तनावपूर्ण थी उन्होंने भारतीय संवैधानिक गतिरोध दूर करने की दिशा में प्रयास प्रारंभ किया। ▪️सर्वप्रथम भारत छोड़ो आंदोलन के समय गिरफ्तार कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य को रिहा किया गया मार्च 1945 में वायसराय इंग्लैंड गए और वहां ब्रिटिश सरकार से भारतीय मामलों पर चर्चा की। ▪️14 जून 1945 को उन्होंने अपने विचार विमर्श के परिणामों से जनता को एक रेडियो प्रसारण द्वारा अवगत करवाया। ▪️भारत राज्य सचिव लार्ड एमरी ने कॉमंस सभा में इसी प्रकार का वक्तव्य दिया और यह कहा कि मार्च 1942 का प्रस्ताव पूर्णरूपेण फिर भी उपस्थित था। ▪️वायसराय और भारत सचिव दोनों के विचार और मनोभाव. समान थे। ▪️भारत के विद्यमान राजनीतिक गतिरोध को दूर करना ,भारत को उसके पूर्ण स्वशासन के लक्ष्य को आगे बढ़ाना और संवैधानिक समझौता प्राप्त करना था। वेवेल योजना के प्रमुख प्रावधान निम्न प्रकार थे #वेवेल_योजना_के_मुख्य_बिंदु : ▪️वॉयस राय की कार्यकारिणी परिषद का पुर्नगठन किया जाएगा, परिषद में वायसराय और कमांडर-इन-चीफ को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय होंगे। ▪️प्रतिरक्षा को छोड़कर समस्त भाग भारतीय को दिए जाएंगे। ▪️कार्यकारिणी में मुसलमान सदस्य की संख्या सवर्ण हिंदुओं के बराबर होगी। ▪️कार्यकारिणी परिषद एक अंतरिम राष्ट्रीय सरकार के समान होगा,इसे देश का शासन तब तक चलाना है जब तक कि एक नए स्थाई सविधान पर आम सहमति नहीं बन जाती है, गवर्नर जनरल बिना कारण निशेषाधिकार का प्रयोग नहीं करेगा। ▪️कांग्रेस के नेता रिहा किए जाएंगे और शीघृ शिमला में एक सम्मेलन बुलाया जाएगा। ▪️युद्ध समाप्त होने के बाद भारतीय स्वयं ही अपना संविधान बनाएंगे। ▪️भारत में ग्रेट ब्रिटेन के वाणिज्य और अन्य हितों की देखभाल के लिए एक उच्चायुक्त की नियुक्ति की जाएगी। ▪️ब्रिटिश सरकार का अंतिम उद्देश्य भारत संघ का निर्माण करके भारत में स्वशासन की स्थापना करना है। ▪️हिंदू और मुसलमान समुदाय के अतिरिक्त भारत के अन्य समुदायों जेसे दलित सिक्ख पारसी आदि को भी उचित प्रतिनिधित्व जाएगा। #शिमला_समझौता : भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड वेवेल द्वारा 25 जून 1945 में भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों का एक सम्मेलन शिमला में आयोजित किया गया था इस सम्मेलन को ही शिमला सम्मेलन के नाम से जाना जाता है इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भारत की वैधानिक समस्या को सुलझाना था। ▪️शिमला सम्मेलन के आयोजन से जनता में ऊंची ऊंची आशाएं बंद गई। ▪️शिमला सम्मेलन 25 जून 1945 से प्रारंभ हुआ जिसे 3 दिन की बातचीत के पश्चात स्थगित कर दिया गया। ▪️यह सम्मेलन वायसराय लार्ड बिस्काउंट वेवेल ने बुलाया था जिसमें 21 नेताओं को आमंत्रित किया था सम्मेलन में भाग लेने वाले प्रमुख नेता थे जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना ,अबुल कलाम आजाद ,सरदार वल्लभभाई पटेल, खान अब्दुल गफ्फार खॉ तारा सिंह और इस्माइल खान थे। ▪️इस सम्मेलन में कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व अबुल कलाम आजाद ने किया था। ▪️गांधीजी ने इस सम्मेलन में भाग नहीं लिया था यद्यपि वे शिमला में उपस्थित रहे। ▪️मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि के रूप में मोहम्मद अली जिन्ना ने भाग लिया था। ▪️11 जुलाई को मोहम्मद अली जिन्ना वेवेल से मिले और इस बात पर बल दिया कि मुस्लिम लीग को ही समस्त मुसलमानों का प्रतिनिधित्व माना जाए और वॉइस राय की सूची में मुस्लिम लीग से बाहर का कोई मुसलमान नहीं होना चाहिए। ▪️अर्थात अर्थात मोहम्मद अली जिन्ना ने इस सम्मेलन में शर्त रखी कि वॉइस राय की कार्यकारिणी परिषद में नियुक्ति हेतु मुस्लिमों सदस्यों का चयन वह स्वयं करेगी। #वेवेल_योजना_की_असफलता_के_कारण_व #प्रतिक्रिया : ▪️अबुल कलाम आज़ाद ने शिमला सम्मेलन की असफलता को भारत के राजनीतिक इतिहास में एक जल विभाजक की संज्ञा दी। ▪️वेवेल योजना का असफल होने का मुख्य कारण मुस्लिम लीग का अपनी शर्तों पर अडना और स्वयं वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के सदस्य चुनाव करना। ▪️इस सफलता के लिए वेवेल और जिन्ना आंशिक रूप से उत्तरदायी थे। ▪️जैसा कि मोहम्मद अली जिन्ना ने समाचार पत्र सम्मेलन में कहा “यह वैवेल योजना हमारे लिए एक फंदा था इससे हम लोग मारे जाते। ▪️प्रस्तावित कार्यकारिणी में हमारी संख्या 1/3 रह जाती क्योंकि अन्य अल्पसंख्यक वर्ग, अनुसूचित जातियां सिक्ख, ईसाइयों के प्रतिनिधि होने थे। ▪️सबसे महत्वपूर्ण यह बात थी की पंजाब से मलिक खिजर हयात खॉ जो संघर्ष दल के थे और मुस्लिम लीगी नहीं थे वेवेल उन्हें रखने पर हठ करते थे। ▪️कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद में इस गतिरोध का उत्तरदायित्व मोहम्मद अली जिन्ना को दिया। ▪️कुछ हग तक वेवेल योजना की असफलता का उत्तरदायित्व वेवेल पर भी था उन्हें भारतीय नेताओं से सलाह करके अपनी परिषद की रचना करनी चाहिए थी ▪️सम्भवत:कुछ परिवर्तनों के साथ कांग्रेसी नेता उस सूची को स्वीकार कर लेते हैं। ▪️दूसरे मुस्लिम लीग को इस योजना को कार्य करने की और उन्नति के मार्ग में रूकावट डालने की अनुमति नही देनी चाहिए। ▪️आरंभ में वेवल ने कांग्रेस अध्यक्ष को इस बात का विश्वास दिलाया गया की किसी भी दल को इस योजना में जानबूझकर बाधा डालने की अनुमति नहीं दी जाएगी लेकिन उस समय ऐसा कुछ नहीं हुआ​। ▪️लेकिन शिमला सम्मेलन का एक परिणाम यह हुआ कि मोहम्मद अली जिन्ना की स्थिति और भी सुदृढ हो गई जिस का दृश्य 1945- 46 के चुनाव में स्पष्ट दिखाई देता है। ▪️कुछ आलोचकों का विचार है कि शिमला सम्मेलन चर्चिल की सरकार पर लेबर पार्टी की संभावित विजय अथवा रूस के दबाव के कारण हुआ है जैसा की क्रिप्स शिष्टमंडल अमेरिका के दबाव के कारण था। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #राज्य_मानवाधिकार_आयोग मानव संरक्षण अधिकार अधिनियम (1993), के आधार पर राज्य स्तर पर राज्य मानवाधिकार आयोग बना है। एक राज्य मानवाधिकार आयोग भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची में राज्य सूची और समवर्ती सूची के अंतर्गत शामिल विषयों से संबंधित मानव अधिकारों के उल्लंघन की जांच कर सकता है। #संरचना : मानव अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2006 में एक अध्यक्ष के साथ तीन सदस्य शामिल होते हैं। अध्यक्ष, उच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए। इसके अन्य सदस्य होने चाहिए, ▪️जिला न्यायाधीश के रूप में कम से कम सात साल के अनुभव के साथ राज्य में उच्च न्यायालय का सेवारत या सेनानिवृत न्यायाधीश या जिला न्यायाधीश। ▪️एक व्यक्ति के पास मानव अधिकारों से संबंधित व्यावहारिक अनुभव या ज्ञान होना चाहिए। राज्य का राज्यपाल समिति के सिफ़ारिश से जिसमें मुख्यमंत्री प्रमुख के रूप में, विधान सभा के स्पीकर, गृह राज्य मंत्री और विधान सभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं अध्यक्ष व अन्य सदस्यों की नियुक्ति करता है। अध्यक्ष और विधान परिषद के विपक्ष के नेता भी समिति के सदस्य हो सकते हैं, यदि राज्य में विधान परिषद हो। आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है या जब तक वे 70 वर्ष की आयु प्राप्त कर लें, जो भी पहले हो| उनके कार्यकाल के पूरा होने के बाद, वे राज्य सरकार या केंद्र सरकार के अधीन आगे रोजगार के पात्र नहीं होते हैं। हालांकि, अध्यक्ष या सदस्य एक और कार्यकाल के लिए योग्य होते हैं (यदि वे 70 वर्ष की तय आयु सीमा के भीतर हों)। #आयोग_के_कार्य : मानव अधिकार अधिनियम, 1993 के संरक्षण के अनुसार नीचे दिए गए राज्य मानवाधिकार आयोग के कार्य हैं : ▪️आयोग के समक्ष पीड़ित द्वारा स्वतः संज्ञान या याचिका पर पूछताछ करना या किसी भी व्यक्ति का मानव अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत करना या एक लोक सेवक द्वारा इस तरह के उल्लंघन की रोकथाम में लापरवाही करना। ▪️इस तरह के कोर्ट के अनुमोदन के साथ एक न्यायालय के समक्ष मानव अधिकारों के उल्लंघन के किसी भी आरोप से जुड़े किसी भी कार्यवाही में हस्तक्षेप करना। ▪️राज्य सरकार के नियंत्रण में किसी भी जेल या अन्य संस्था का दौरा करना और कैदियों के रहने वाली जगह को रहने लायक बनाने के लिए सम्बंधित लोगों को निर्देश देना। ▪️तत्समय प्रभाव के लिए संविधान के तहत मानव अधिकारों के संरक्षण के लिए दिये गए सुरक्षा उपायों की समीक्षा करना तथा उसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उपायों की सिफ़ारिश करना। ▪️मानव अधिकारों के क्षेत्र में अनुसंधान का जिम्मा लेना व उसे बढ़ावा देना। ▪️समाज के विभिन्न वर्गों के बीच में मानव अधिकारों की साक्षरता को फैलाना और इन अधिकारों के संरक्षण के लिए उपलब्ध सुरक्षा उपायों के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देना। ▪️मानव अधिकारों के क्षेत्र में काम कर रहे गैर सरकारी संगठनों और संस्थाओं के प्रयासों को प्रोत्साहित करना। ▪️इस तरह के अन्य कार्य की ज़िम्मेदारी लेना करना जिससे मानव अधिकारों को बढ़ावा देने के लिए विचार किया जा सके। #आयोग_के_अधिकार : ▪️आयोग के पास अपनी प्रक्रिया को नियंत्रित करने का अधिकार निहित है। ▪️आयोग के पास सिविल अदालत के सभी अधिकार होते हैं और इसकी कार्यवाही में एक न्यायिक प्रतिष्ठा होती है। ▪️यह राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी के अधीनस्थ से जानकारी या रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कह सकता हैं। आयोग के पास तत्समय प्रभाव के लिए किसी भी व्यक्ति को किसी भी विशेषाधिकार के अधीन जो किसी भी कानून के तहत हो, पूछताछ करने का अधिकार है, सार्थक मसलों पर पूछताछ से संबन्धित मसलों पर जानकारी पेश करने का अधिकार है| इसके होने के एक वर्ष के भीतर आयोग इस मामले पर गौर कर सकता है। #विवेचना : राज्य मानवाधिकार आयोग के सीमित अधिकार होते हैं और इसकी कार्यप्रकृति केवल सलाहकार की है| आयोग के पास मानव अधिकारों के उल्लंघन करने वालों को दंडित करने का अधिकार नहीं होता है| यहां तक की पीड़ित को आर्थिक राहत के साथ यह किसी भी प्रकार की राहत प्रदान नहीं कर सकता। राज्य मानवाधिकार आयोग की सिफ़ारिशें राज्य सरकार या प्राधिकारी पर बाध्य नहीं हैं, लेकिन आयोग को एक महीने के भीतर उसकी सिफारिश पर की गई कार्रवाई के बारे में सूचित किया जाना चाहिए। #निष्कर्ष : राज्य मानवाधिकार आयोग को अपने अधिकार बढ़ाने की आवश्यकता है। इसे पीड़ितों को न्याय दिलवाने में विभिन्न तरीकों से बढ़ाया जा सकता है। आयोग के पास पीड़ित को आर्थिक राहत के साथ साथ अंतरिम और तत्काल राहत प्रदान करने का अधिकार होना चाहिए। आयोग के पास मानव अधिकारों का उल्लंघन करने वालों को दंडित करने का अधिकार भी होना चाहिए, जो भविष्य में इस तरह के कार्यों को करने में निवारक के रूप में काम कर सकें| आयोग की कार्यप्रणाली में राज्य सरकार का हस्तक्षेप कम से कम होना चाहिए क्योंकि यह आयोग के कामकाज को प्रभावित कर सकता है| [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #राजगोपालाचारी_फार्मूला [ 1944 ] राजगोपालाचारी द्वारा कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के बीच सहयोग बढ़ाने के लिए 10 जुलाई 1944 को एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, जिसे राजगोपालाचारी फार्मूला के नाम से जाना जाता है । यह फार्मूला अप्रत्यक्ष रूप से पृथक पाकिस्तान की अवधारणा पर आधारित प्रस्ताव था। #राजगोपालाचारी_फार्मूला_की_मुख्य_विशेषताएं : इस प्रस्ताव की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार थीं- ▪️मुस्लिम लीग, भारतीय स्वतंत्रता की मांग का समर्थन करे। ▪️प्रांतो में अस्थायी सरकारों की स्थापना के कार्य में मुस्लिम लीग, कांग्रेस के साथ सहयोग करे। ▪️युद्ध की समाप्ति के उपरान्त एक कमीशन द्वारा उत्तर-पूर्वी तथा उत्तर पश्चिमी भारत में उन क्षेत्रों को निर्धारित किया जाय जिसमें मुसलमान स्पष्ट बहुमत में है. उन क्षेत्रों में जनमत सर्वैक्षण कराया जाय तथा उसके आधार पर यह निश्चित किया जाय कि वे भारत से पृथक होना चाहते है या नही । ▪️देश की विभाजन की स्थिति में आवश्यक विषयों-प्रतिरक्षा, वाणिज्य, संचार तथा आवागमन इत्यादि के संबंध में दोनों राष्ट्रों के मध्य कोई संयुक्त समझौता किया जाये। ▪️यह बातें उसी स्थिति में स्वीकृति होंगी, जब ब्रिटेन भारत को पूरी तरह से स्वतंत्र घोषित कर देगा । ▪️इस प्रस्ताव को भी मुस्लिम लीग ने अस्वीकार कर दिया । हिन्दू नेताओं ने भी तीब्र आलोचना की। #जिन्ना_द्वारा_राजगोपालाचारी_योजना_को #अस्वीकार_करने_के_कारण- ▪️इस योजना में मुसलमानों को अपूर्ण, अंगहीन तथा दीमक लगा हुआ पाकिस्तान दिया गया, क्योंकि वह तो संपूर्ण बंगाल, असम, सिंध, पंजाब और उत्तरी-पश्चिमी प्रांत व बलूचिस्तान चाहता था। ▪️इसमें जनमत संग्रह में गैर मुसलमानों को भी भाग लेने की अनुमति दे दी गई थी, जबकि जिन्ना केवल मुसलमानों को मताधिकार देना चाहता था। ▪️इसमें प्रतिरक्षा, संचार और आवागमन के साधनों के संबंध में संयुक्त व्यवस्था का प्रस्ताव था, जिसे जिन्ना मानने को तैयार नहीं था। अतः इन सभी बातों को लेकर सी.आर.फार्मूले के संबंध में वार्ता असफल रही। #निष्कर्ष राजगोपालाचारी फार्मूले की मूल संकल्पना द्विराष्ट्र सिद्धांत और ब्रिटिशों से भारत की स्वतंत्रता को लेकर मुस्लिम लीग और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अलग अलग विचारों के कारण पैदा हुए मतभेदों को सुलझाने की थी। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #राष्ट्रीय_अनुसूचित_जनजाति_आयोग संविधान के अनुच्छेद 338A में यह उल्लेख किया गया है कि अनुसूचित जनजातियों के लिए एक आयोग होगा जिसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) के नाम से जाना जाएगा। आयोग का यह कर्तव्य है कि वह संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों को उपलब्ध कराए गये सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच करे। हालांकि, आयोग के विभिन्न कार्य और शक्तियां हैं जिनका उल्लेख संविधान में किया गया है। #राष्ट्रीय_अनुसूचित_जनजाति_आयोग : भारतीय संविधान का अनुच्छेद 366 (25) उन समुदायों को अनुसूचित जनजाति के लिए सदर्भित करता है जिनका निर्धारण संविधान के अनुच्छेद 342 के अनुसार किया गया है। यह अनुच्छेद कहता है कि केवल वो समुदाय जिन्हें एक आरंभिक सार्वजनिक अधिसूचना के माध्यम से या एक संसदीय संशोधन अधिनियम के माध्यम से राष्ट्रपति द्वारा घोषित किया गया है उन्हें ही अनुसूचित जनजाति माना जाएगा। अनुच्छेद 338A में इस बात का उल्लेख है कि अनुसूचित जनजातियों के लिए लिए एक आयोग होगा जिसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के रूप में जाना जाएगा। राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के कार्यालय के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल कार्यालय में कार्यभार ग्रहण करने की तिथि से तीन वर्ष का होता है। आयोग के अध्यक्ष को एक केंद्रीय मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है और उपाध्यक्ष को एक राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है। आयोग के अन्य सदस्यों को भारत सरकार के एक सचिव का रैंक प्राप्त होता है। #संवैधानिक_प्रावधान : #संविधान_के_अनुसार: ▪️अनुसूचित जनजातियों के लिए लिए एक आयोग होगा जिसे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के रूप में जाना जाएगा। ▪️आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुहर सहित एक अधिपत्र के माध्यम से की जाएगी। ▪️आयोग के पास अपनी प्रक्रिया को नियंत्रित करने की शक्ति रहेगी। हालांकि, केंद्र और प्रत्येक राज्य सरकारें उन प्रमुख सभी नीतिगत मामलों पर आयोग से परामर्श करेंगे जो अनुसूचित जनजातियों को प्रभावित करते हैं। उदाहरण के लिए, भारत की अनुसूचित जनजातियां गोंड, आंध्र प्रदेश में भील, अरुणाचल प्रदेश में अपातनी व अदि जैसी जनजातियां हैं। आयोग की शक्तियों और कार्यों का उल्लेख निम्नवत किया जा रहा है: #शक्तियां : ▪️किसी भी व्यक्ति को सम्मन जारी करना और उपस्थित होने के लिए बुलाना तथा पूछताछ करना; ▪️किसी भी दस्तावेजों की खोज करना और प्रस्तुत करना; ▪️हलफनामों पर सबूत प्राप्त करना ▪️किसी भी न्यायालय अथवा कार्यालय से कोई भी सार्वजनिक रिकॉर्ड या उसकी प्रति की मांग करना; ▪️गवाहों और दस्तावेजों की जांच के लिए मुद्दे को आयोग के पास भेजना; और ▪️राष्ट्रपति शासन द्वारा, निर्धारित किसी भी मामले का निर्धारण करना। #आयोग_के_कार्य : ▪️संविधान के तहत अनुसूचित जनजातियों को उपलब्ध कराए गये सुरक्षा उपायों से संबंधित सभी मामलों की जांच करना और उन पर नजर रखना या अन्य किसी कानून के तहत कुछ समय के लिए लागू करना या भारत सरकार के किसी भी आदेश और सुरक्षा उपायों की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन करना; ▪️अनुसूचित जनजातियों के लिए बनायी जाने वाली सामाजिक आर्थिक विकास की योजना प्रक्रिया में हिस्सा लेना और सलाह देना तथा केंद्र तथा किसी भी राज्य के अधीन उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना; ▪️केंद्र या किसी राज्य द्वारा बनाये गये सुरक्षा उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन और अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण और सामाजिक-आर्थिक विकास के अन्य उपायों की रिपोर्ट तैयार करना जिसके लिए इन्हें प्रभावी बनाने की सिफारिश की गयी है; ▪️राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट, और संसद द्वारा अनुसूचित जनजातियों के संरक्षण, कल्याण, विकास और उन्नति से संबंधित अन्य कार्यों के लिए बनाये गये कानूनों को लागू कर इनका निर्वहन करना ▪️उन उपायों का निर्माण करना जिससे वन क्षेत्रों में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों को लघु वन उपज से संबंधित स्वामित्व अधिकार देने की जरूरत हेतु कदम उठाना। ▪️खनिज संसाधन, जल संसाधनों आदि पर कानून के अनुसार आदिवासी समुदायों के अधिकारों से संबंधित नियम तय करने के लिए और अधिक कदम उठाना। ▪️जनजातियों के विकास तथा व्यावहारिक आजीविका की रणनीतियां बनाने के लिए और अधिक कदम उठाना। ▪️विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित आदिवासी समूहों के लिए राहत और पुनर्वास उपायों की क्षमता में सुधार करने के लिए कदम उठाना। ▪️अपनी भूमि या जगह से जनजातीय लोगों के अलगाव को रोकने और प्रभावी ढंग से उन लोगों का पुर्नवासन करना और उनमें पहले से ही निहित अलगाव की भावना को दूर करने के लिए कदम उठाना। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #देसाई_लियाकत_प्रस्ताव [ 1945 ] महात्मा गाँधी ये मान चुके थे कि जब तक कांग्रेस और मुस्लिम लीग देश के भविष्य या अंतरिम सरकार के गठन को लेकर किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँच जाती तब तक ब्रिटिश शासक देश को स्वतंत्रता प्रदान नहीं करेंगे। इसीलिए महात्मा गांधी ने भूलाभाई जीवनजी देसाई को मुस्लिम लीग के नेताओं को संतुष्ट करने और 1942-1945 के राजनीतिक गतिरोध को दूर करने का एक और प्रयास करने का निर्देश किया। देसाई, केंद्रीय सभा में कांग्रेस के नेता और लियाकत अली (मुस्लिम लीग के नेता) के मित्र होने के नाते,ने लियाकत अली से मुलाकात कर जनवरी 1945 में केंद्र में अंतरिम सरकार के गठन से सम्बंधित एक प्रस्ताव सौंपा| देसाई की घोषणा के बाद, लियाकत अली ने समझौते को प्रकाशित किया,जिसके प्रमुख बिंदु निम्न थे- ▪️दोनों द्वारा केन्द्रीय कार्यपालिका में समान संख्या में लोगों को नामित करना। ▪️अल्पसंख्यकों, विशेषकर अनुसूचित जाति और सिखों, का प्रतिनिधितित्व। ▪️सरकार का गठन करना जोकि उस समय प्रचलित भारत शासन अधिनियम, 1935 के ढ़ांचे के अनुसार कार्य करती। #निष्कर्ष महात्मा गांधी ने भूलाभाई जीवनजी देसाई को मुस्लिम लीग के नेताओं को संतुष्ट करने और राजनीतिक गतिरोध को दूर करने के लिए एक प्रस्ताव तैयार करने का निर्देश दिया लेकिन इस प्रस्ताव को न तो कांग्रेस ने और न ही लीग ने औपचारिक रूप से अनुमोदित किया। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #राष्ट्रीय_मानवाधिकार_आयोग राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भारत में मानवाधिकारों की रक्षा और उसे बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार सांविधिक निकाय है। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 कहता है कि आयोग " संविधान या अंतरराष्ट्रीय संविदा द्वारा व्यक्ति को दिए गए जीवन, आजादी, समानता और मर्यादा से संबंधित अधिकारों" का रक्षक है। #एनएचआरसी_की_संरचना : एनएचआरसी में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते हैं। अध्यक्ष को भारत का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए। अन्य सदस्य होने चाहिए– ▪️एक सदस्य, भारत के सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश या भूतपूर्व न्यायाधीश। ▪️एक सदस्य, उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या भूतपूर्व न्यायाधीश। ▪️दो ऐसे सदस्यों की नियुक्ति की जाएगी जिन्हें मानवाधिकार संबंधित मामलों की जानकारी हो या वे इस क्षेत्र में व्यावहारिक अनुभव रखते हों। इन सदस्यों के अलावा, राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग पदेन सदस्य के तौर पर काम करते हैं। राष्ट्रपति छह सदस्यी समिति की अनुशंसा के आधार पर एनएचआरसी के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति करते हैं। छह सदस्यी समिति में निम्नलिखित लोग होते हैं– ▪️प्रधानमंत्री (अध्यक्ष) ▪️गृह मंत्री ▪️लोकसभा अध्यक्ष ▪️लोकसभा में विपक्ष के नेता ▪️राज्यसभा के उपाध्यक्ष ▪️राज्यसभा में विपक्ष के नेता सुप्रीम कोर्ट या उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश की नियुक्ति, भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद ही की जा सकती है। #एनएचआरसी_के_कार्य : मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अनुसार, एनएचआरसी के कार्य इस प्रकार है– ▪️मानवाधिकारों के उल्लंघन या किसी लोक सेवक द्वारा ऐसे उल्लंघन की रोकथाम में लापरवाही के खिलाफ किसी पीड़ित या किसी व्यक्ति द्वारा दायर याचिका की या स्वप्रेरणा से पूछताछ करना। ▪️किसी न्यायालय के समक्ष न्यायालय की अनुमति के साथ मानवाधिकारों के उल्लंघन के किसी भी मामले की सुनवाई में हस्तक्षेप। ▪️कैदियों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए किसी भी जेल या नदरबंद स्थान की यात्रा करना और उस पर अनुशंसाएं देना। ▪️मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए प्रदान किए गए सुरक्षा उपायों या तत्कालीन प्रवृत्त किसी कानून के संविधान के तहत की समीक्षा करना और उसके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए उपायों की सिफारिश करना। ▪️मानवाधिकारों के उपयोग को रोकने वाले आतंकवादी कृत्यों समेत कारकों की समीक्षा करना और उपयुक्त उपचारात्मक उपायों की सिफारिश करना। ▪️मानवाधिकार के क्षेत्र में अनुसंधान करना और उसे बढ़ावा देना। ▪️समाज के विभिन्न वर्गों में मानवाधिकार साक्षरता फैलाना और इन अधिकारों के संरक्षण हेतु उपलब्ध सुरक्षा उपायों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देना। ▪️मानवाधिकार के क्षेत्र में काम करने वाले गैर– सरकारी संगठनों और संस्थानों के प्रयासों को प्रोत्साहित करना। ▪️मानवाधिकारों के लिए अनिवार्य समझे जा सकने वाले अन्य कार्यों को करना। #एनएचआरसी_की_कार्यप्रणाली : ▪️आयोग का मुख्यालय दिल्ली में है। ▪️आयोग को अपनी प्रक्रिया को नियंत्रित करने की शक्ति दी गई है। ▪️इसे नागरिक अदालत के सभी अधिकार प्राप्त हैं और इसकी कार्यवाही का चरित्र न्यायिक है। ▪️यह केंद्रीय या किसी भी राज्य सरकारी या किसी अन्य अधीनस्थ प्राधिकरण से सूचना की मांग या रिपोर्ट की मांग कर सकता है। हालांकि, मानवाधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की जांच के लिए आयोग के पास अपने खुद के कर्मचारी हैं। इसे अपने उद्देश्य के लिए किसी भी अधिकारीया केंद्र सरकार या किसी भी राज्य सरकार की जांच एजेंसी की सेवा लेने का अधिकार दिया गया है। आयोग मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित सूचना के लिए विभिन्न एनजीओ के साथ सहयोग भी करता है। आयोग घटना के एक वर्ष के भीतर उस पर गौर कर सकता है। आयोग जांच के दौरान या उसके पूरा हो जाने के बाद निम्नलिखित में से कोई भी कदम उठा सकता हैः ▪️यह संबंधित सरकार या प्राधिकरण को पीड़ित को मुआवजा या क्षतिपूर्ति देने की सिफारिश कर सकता है। ▪️यह अभियोजन पक्ष के लिए या दोषी लोक सेवक के खिलाफ कार्यवाही शुरु करने के लिए संबंधित सरकार या प्राधिकरण को सिफारिश भेज सकता है। ▪️यह संबंधित सरकार या प्राधिकरण को पीड़ित को तत्काल अंतरिम राहत प्रदान करने की सिफारिश कर सकता है। ▪️यह अनिवार्य निर्देशों, आदेशों या रिट्स के लिए सुप्रीम कोर्ट या संबंधित उच्च न्यायालय में जा सकता है। पीड़ितों को न्याय दिलाने हेतु एनएचआरसी को अधिक प्रभावी बनाने के लिए, इसकी प्रभावकारिता और दक्षता को बढ़ाने के लिए, इसे दी गई शक्तियों को बढ़ाया जा सकता है। आयोग को अंतरिम और तात्कालिक राहत जिसमें पीड़ित को मौद्रिक राहत दिया जाना भी शामिल है, की शक्ति प्रदान की जानी चाहिए। इसके अलावा, मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वालों को दंडित करने की शक्ति भी आयोग के पास होनी चाहिए, यह भविष्य में मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वालों के लिए निवारक के रूप में कार्य कर सकता है। आयोग के कार्य में सरकार और अन्य प्राधिकरणों का हस्तक्षेप न्यूनतम होना चाहिए, क्योंकि ऐसा होने से आयोग का काम प्रभावित हो सकता है। इसलिए, एनएचआरसी को सशस्त्र बलों के सदस्यों द्वारा मानवाधिकारों से संबंधित मामलों की जांच कराने की शक्ति दी जानी चाहिए। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #सुभाषचन्द्र_बोस_और_आजाद_हिन्द_फौज गुलामी की बेड़ियों में जकड़े हुये भारत को आजाद कराने के लिये अनेक देशभक्तों ने अपने-अपने तरीकों से भारत को आजाद कराने की कोशिश की। किसी ने क्रान्ति के मार्ग को अपनाया तो किसी ने अहिंसा और शान्ति के मार्ग को, पर दोनों मार्गों के समर्थकों के संयुक्त प्रयासों से ही भारत की आजादी का मार्ग निर्धारित हुआ। भारत की आजादी के लिये संघर्ष करते हुये अनेक क्रान्तिकारी भारतीय शहीद हुये। ऐसे ही महान क्रान्तिकारी, भारतीय स्वतंत्रता सेनानी थे सुभाष चन्द्र बोस। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपने कार्यों से अंग्रेजी सरकार के छक्के छुड़ा दिये। इन्होंने अपने देश को आजाद कराने के लिये की गयी क्रान्तिकारी गतिविधियों से ब्रिटिश भारत सरकार को इतना ज्यादा आंतकित कर दिया कि वो बस इन्हें भारत से दूर रखने के बहाने खोजती रहती, फिर भी इन्होंने देश की आजादी के लिये देश के बाहर से ही संघर्ष जारी रखा और वो भारतीय इतिहास में पहले ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हुये जिसने ब्रिटिश भारत सरकार के खिलाफ देश से बाहर रहते हुये सेना संगठित की और सरकार को सीधे युद्ध की चुनौती दी और युद्ध किया। इनके महान कार्यों के कारण लोग इन्हें ‘नेताजी’ कहते थे। #सुभाष_चन्द्र_बोस_से_सम्बन्धित_प्रमुख_तथ्य : ▪️पूरा नाम– सुभाष चन्द्र बोस ▪️अन्य नाम- नेताजी ▪️जन्म– 23 जनवरी 1897 ▪️जन्म स्थान– कटक, उड़ीसा ▪️माता-पिता– प्रभावती, जानकीनाथ बोस (प्रसिद्ध वकील) ▪️पत्नी– ऐमिली शिंकल ▪️बच्चे– इकलौती पुत्री अनीता बोस ▪️अन्य करीबी सम्बन्धी– शरत् चन्द्र बोस (बड़े भाई), विभावती (भाभी), शिशिर कुमार बोस (भतीजा) ▪️शिक्षा– मैट्रिक (1912-13), इंटरमिडिएट (1915), बी. ए. आनर्स (1919), भारतीय प्रशासनिक सेवा (1920-21) ▪️विद्यालय– रेवेंशॉव कॉलेजिएट (1909-13), प्रेजिडेंसी कॉलेज (1915), स्कॉटिश चर्च कॉलेज (1919), केंब्रिज विश्वविद्यालय (1920-21) ▪️संगठन– आजाद हिन्द फौज, आल इंडिया नेशनल ब्लाक फॉर्वड, स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार ▪️उपलब्धी– आई.सी.एस. बनने वाले प्रथम भारतीय, दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष, भारत को स्वतंत्र कराने के संघर्ष में 11 बार जेल की एतिहासिक यात्रा, भारतीय स्वतंत्रता के लिये अन्तिम सांस तक प्रयास करते हुये शहीद हुये। ▪️मृत्यु– 18 अगस्त 1945 (विवादित) ▪️मृत्यु का कारण– विमान दुर्घटना ▪️मृत्यु स्थान– ताइहोकू, ताइवान #आजाद_हिन्द_फौज : आजाद हिन्द फौज का गठन 1942 में किया गया था। 28-30 मार्च, 1942 को टोक्यो में रह रहे भारतीय रासबिहारी बोस ने आजाद हिन्द फौज के गठन पर विचार के लिए सम्मेलन बुलाया। कैप्टन मोहन सिंह, रासबिहारी बोस एवं निरंजन सिंह गिल के सहयोग से इण्डियन नेशनल आर्मी का गठन किया गया। आजाद हिन्द फौज की स्थापना का विचार सर्वप्रथम मोहन सिंह के मन में आया था। इसी बीच विदेशों में रह रहे भारतीयों के लिए इंडियन इंडिपेंडेंस लीग की स्थापना की गई, जिसका प्रथम सम्मेलन जून 1942, को बैंकाक में हुआ। आजाद हिन्द फौज की प्रथम डिवीजन का गठन 1 दिसम्बर, 1942 को मोहन सिंह के अधीन हुआ। इसमें लगभग 16,300 सैनिक थे। कालान्तर में जापान ने 60,000 युद्ध बंदियों को आजाद हिन्द फौज में शामिल होने के लिए छोड़ दिया। जापानी सरकार और मोहन सिंह के अधीन भारतीय सैनिकों के बीच आजाद हिन्द फौज की भूमिका के संबध में विवाद उत्पन्न हो जाने के कारण मोहन सिंह एवं निरंजन सिंह गिल को गिरफ्तार कर लिया गया। आजाद हिन्द फौज का दूसरा चरण तब प्रारम्भ हुआ, जब सुभाषचन्द्र बोस सिंगापुर गये। सुभाषचन्द्र बोस ने 1941 में बर्लिन में इंडियन लीग की स्थापना की, किन्तु जब जर्मनी ने उन्हें रूस के विरुद्ध प्रयुक्त करने का प्रयास किया, तब कठिनाई उत्पन्न हो गई और बोस ने दक्षिण पूर्व एशिया जाने का निश्चय किया। जुलाई, 1943 में सुभाषचन्द्र बोस पनडुब्बी द्वारा जर्मनी से जापानी नियंत्रण वाले सिंगापुर पहुँचे। वहाँ उन्होंने दिल्ली चलो का प्रसिद्ध नारा दिया। 4 जुलाई, 1943 को सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज एवं इंडियन लीग की कमान को संभाला। आजाद हिन्द फौज के सिपाही सुभाषचन्द्र बोस को नेताजी कहते थे। बोस ने अपने अनुयायियों को जय हिन्द का नारा दिया। उन्होंने 21 अक्टूबर, 1943 को सिंगापुर में अस्थायी भारत सरकार आजाद हिन्द सरकार की स्थापना की। सुभाषचन्द्र बोस इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा सेनाध्यक्ष तीनों थे। वित्त विभाग एस.सी चटर्जी को, प्रचार विभाग एस.ए. अय्यर को तथा महिला संगठन लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपा गया। आजाद हिन्द फौज के प्रतीक चिह्न के लिए एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था। कदम कदम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा इस संगठन का वह गीत था, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे। जापानी सैनिकों के साथ तथाकथित आजाद हिन्द फौज रंगून (यांगून) से होती हुई थलमार्ग से भारत की ओर बढ़ती हुई 18 मार्च 1944 को कोहिमा और इम्फाल के भारतीय मैदानी क्षेत्रों में पहुँच गई। जर्मनी, जापान तथा उनके समर्थक देशों द्वारा आजाद हिन्द सरकार को मान्यता प्रदान की गई। इसके पश्चात नेताजी बोस ने सिंगापुर एवं रंगून में आजाद हिन्द फौज का मुख्यालय बनाया। पहली बार सुभाषचन्द्र बोस द्वारा ही गाँधी जी के लिए राष्ट्रपिता शब्द का प्रयोग किया गया। जुलाई, 1944 को सुभाषचन्द्र बोस ने रेडियों पर गाँधी जी को संबोधित करते हुए कहा भारत की स्वाधीनता का आखिरी युद्ध शुरू हो चुका हैं। हे राष्ट्रपिता! भारत की मुक्ति के इस पवित्र युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और शुभकामनाएँ चाहते हैं। इसके अतिरिक्त फौज की बिग्रेड को नाम भी दिये गए महात्मा गाँधी ब्रिगेड,अबुल कलाम आजाद ब्रिगेड, जवाहरलाल नेहरू ब्रिगेड तथा सुभाषचन्द्र बोस ब्रिगेड। सुभाषचन्द्र बोस ब्रिगेड के सेनापति शाहनवाज खाँ थे। सुभाषचन्द्र बोस ने सैनिकों का आहवान करते हुए कहा तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूँगा। फरवरी से जून, 1944 ई. के मध्य आजाद हिन्द फौज की तीन ब्रिगेडों ने जापानियों के साथ मिलकर भारत की पूर्वी सीमा एवं बर्मा से युद्ध लड़ा, परन्तु दुर्भाग्यवश दूसरे विश्व युद्ध में जापान की सेनाओं के मात खाने के साथ ही आजाद हिन्द फौज को भी पराजय का सामना करना पड़ा। आजाद हिन्द फौज के सैनिक एवं अधिकारियों को अंग्रेजों ने 1945 में गिरफ्तार कर लिया। साथ ही एक हवाई दुर्घटना में सुभाषचन्द्र बोस की भी 18 अगस्त, 1945 ई. को मृत्यु हो गई। हालांकि हवाई दुर्घटना में उनकी मृत्यु अभी भी संदेह के घेरे में हैं। बोस की मृत्यु का किसी को विश्वास ही नहीं हुआ। आजाद हिन्द फौज के गिरफ्तार सैनिकों एवं अधिकारियों पर अंग्रेज सरकार ने दिल्ली के लाल किले में नवम्बर, 1945 को मुकदमा चलाया। इस मुकदमें के मुख्य अभियुक्त कर्नल सहगल, कर्नल ढिल्लों एवं मेजर शाहवाज खाँ पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया। इनके पक्ष में सर तेजबहादुर सप्रु, जवाहरलाल नेहरू, भूला भाई देसाई और के.एन. काटजू ने दलीलें दी। लेकिन फिर भी इन तीनों की फांसी को सजा सुनाई गयी। इस निर्णय के खिलाफ पूरे देश में कड़ी प्रतिक्रिया हुई, नारे लगाये गये लाल किले को तोड़ दो, आजाद हिन्द फौज को छोड़ दो। विवश होकर तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवेल ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर इनकी मृत्युदण्ड की सजा को माफ कर दिया। #विश्लेषण : यह जरुर है कि आजाद हिन्द फ़ौज के सैनिक देश प्रेम की भावना से ओत-प्रोत थे पर वे अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सके. इसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय परिस्थतियाँ जिम्मेदार थीं. जापान ने प्रारंभ से ही आजाद हिन्द फ़ौज को स्वतंत्र रूप से काम करने नहीं दिया. धन की कमी तो थी ही, आजाद हिंदी फ़ौज के सैनिकों के पास अच्छे हथियार भी नहीं थे. फिर भी इस फ़ौज के प्रयासों का प्रभाव पूरे देश पर पड़ा और देशप्रेम की लहर पूरे भारतवर्ष पर दौड़ पड़ी.

भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #राज्य_लोक_सेवा_आयोग

भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #राज्य_लोक_सेवा_आयोग भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने प्रांतीय स्तर पर लोक सेवा आयोग की स्थापना की जिसे राज्य लोक सेवा आयोग के रूप में जाना जाता है तथा भारत के संविधान ने इसे स्वायत्त निकायों के रूप में संवैधानिक दर्जा दिया है| #संरचना : एक राज्य लोक सेवा आयोग (SPSC) में एक अध्यक्ष और राज्य के राज्यपाल द्वारा नियुक्त किए गए अन्य सदस्य शामिल होते हैं। नियुक्त सदस्यों में से आधे सदस्यों को भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य की सरकार के तहत कार्यालय में कम से कम दस साल के लिए कार्यरत होना चाहिए| संविधान ने आयोग के सामर्थ्य को स्पष्ट रूप से नहीं बताया है| राज्यपाल के पास सदस्यों की संख्या के साथ साथ आयोग के कर्मचारियों और उनकी सेवा की शर्तों को निर्धारित करने का अधिकार होता है। राज्यपाल SPSC के सदस्यों में से किसी एक को कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में नियुक्त कर सकते हैं यदि : ▪️आयोग के अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाये; या ▪️आयोग का अध्यक्ष अनुपस्थिति के कारण या किसी अन्य कारण से अपने कार्यालय के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो। इस तरह का सदस्य एक कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में कार्य करता है जब तक किसी व्यक्ति को कार्यालय के कर्तव्यों का पालन करने के लिए अध्यक्ष के रूप में नियुक्त ना किया जाये या जब तक अध्यक्ष पुनः अपना कार्य आरंभ ना कर दे, जैसी भी स्थिति हो| #कार्यकाल : SPSC का अध्यक्ष और सदस्य छह साल की अवधि के लिए या जब तक वे 62 वर्ष की आयु प्राप्त न कर लें, जो भी पहले हो, कार्यरत रहते हैं| SPSC के सदस्य राज्यपाल को संबोधित करते हुए कार्यकाल की अवधि के बीच में अपना इस्तीफा सौंप सकते हैं| #कर्तव्य_और_कार्य : SPSC के कर्तव्य और कार्य निम्न प्रकार से हैं: 1. यह राज्य की सेवाओं में नियुक्तियों के लिए परीक्षाएं आयोजित करता है। 2. नीचे दिये गए मामलों पर SPSC से विचार-विमर्श किया जाता है: ▪️सिविल सेवाओं व सिविल पदों की भर्ती की प्रक्रियाओं से संबन्धित सभी मामले| ▪️सिविल सेवाओं और पदों के लिए नियुक्तियों और एक सेवा से दूसरे में पदोन्नतियों व स्थानांतरण और इस तरह की नियुक्तियों, पदोन्नति या स्थानांतरण के लिए उम्मीदवारों के चयन के लिए नियमों का पालन करना| ▪️एक नागरिक की हैसियत से भारत सरकार के अधीन सेवारत व्यक्ति को प्रभावित करने वाले सभी अनुशासनात्मक मामले जिसमें इन मामलों से संबन्धित स्मृति पत्र या याचिकाएं शामिल हों| ▪️अपने आधिकारिक कर्तव्य के निष्पादन में या किए गए कार्यों के खिलाफ किए गए कानूनी कार्यवाही के बचाव में एक सिविल सेवक द्वारा किए गए किसी भी प्रकार के खर्च पर दावा करना| ▪️भारत सरकार के अधीन सेवारत व्यक्ति घायल होने पर पेंशन के हक़ के लिए दावा कर सकता है और किसी भी हक़ के लिए राशि से संबन्धित कोई भी प्रश्न कर सकता है| ▪️कार्मिक प्रबंधन से संबन्धित कोई भी मामले। ▪️यह राज्यपाल को आयोग द्वारा किए गए कार्य की सालाना वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करता हैं| राज्य विधायिका राज्य की सेवाओं से संबंधित SPSC को अतिरिक्त कार्य प्रदान कर सकती है। SPSC के कार्य का विस्तार निगमित निकाय की कार्मिक प्रणाली के द्वारा या कानून द्वारा गठित अन्य निगमित निकाय या इसके तहत कोई भी सार्वजनिक संस्था द्वारा किया जा सकता है| SPSC की वार्षिक रिपोर्ट उनके प्रदर्शन के बारे में बताते हुए राज्यपाल को सौंपी जाती है| उसके बाद राज्यपाल इस रिपोर्ट को राज्य विधानमण्डल के समक्ष मामलों को समझाते हुए ज्ञापन के साथ रखता है| [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #क्रिप्स_मिशन [ 1942 ] क्रिप्स मिशन को 1942 ई० में ब्रिटिश सरकार द्वारा भेजा गया था। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने मजदूर नेता सर स्टैफ़ोर्ड क्रिप्स को 1942 ई० में भारत भेजा था। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध में भारत का पूर्ण सहयोग प्राप्त करना था। इसमें ऐसे बहुत से प्रस्ताव थे जो भारत की एकता अखंडता के विरुद्ध थे। इसलिए सभी लोगों ने इसका बहिष्कार कर दिया और यह मिशन असफल हो गया। भारत की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी, मुस्लिम लीग और दूसरे दलों ने भी इस मिशन का बहिष्कार कर दिया था। #क्रिप्स_मिशन_क्यों_भेजा_गया_था? उस समय द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। ब्रिटेन को दक्षिण पूर्व एशिया में हार का सामना करना पड़ रहा था। मित्र राष्ट्र (अमेरिका, चीन और सोवियत संघ) चाहते थे कि भारत द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन का समर्थन प्राप्त करें और उसकी मदद करें। भारत ने इस शर्त पर ब्रिटेन को समर्थन दिया था कि युद्ध के उपरांत भारत को पूर्ण आज़ादी दे दी जाए और ठोस उत्तरदायी शासन का हस्तांतरण तुरंत कर दिया जाए। #क्रिप्स_मिशन_के_मुख्य_प्रावधान : ▪️डोमिनियन राज्य के दर्जे के साथ भारतीय संघ की स्थापना की जाएगी। यह भारतीय संघ राष्ट्रमंडल देशों, संयुक्त राष्ट्र संघ, अन्य अंतरराष्ट्रीय निकायों एवं संस्थाओं से अपने संबंध स्वतंत्र रूप से बना सकेगा। ▪️भारत के लोग आज़ाद होने पर स्वयं अपना संविधान का निर्माण कर सकेंगे। ▪️आज़ाद भारत के संविधान निर्मात्री सभा के गठन के लिए एक ठोस योजना बनाई जाएगी। ▪️भारत के विभिन्न प्रांत अपने अलग संविधान बना सकेंगे (बहुत से लोग इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि इससे भारत का विभाजन सुनिश्चित हो जाता)। ▪️भारत के पास राष्ट्रमंडल से अलग होने का अधिकार होगा। ▪️स्वतंत्र भारत के प्रशासन की बागडोर भारतीयों के हाथ में दी जाएगी। #क्रिप्स_मिशन_क्यों_असफल_हुआ? क्रिप्स मिशन द्वारा भारतीयों को लुभाने के लिए अनेक आकर्षक प्रस्ताव दिए गए थे, उसके बावजूद भी यह असफल रहा। भारतीयों को यह नही कर पाया। देश की जनता के बड़े वर्ग ने इसे स्वीकृति नहीं दी। कई राजनीतिक दल और समूहों ने इसका विरोध किया। #कांग्रेस_पार्टी_ने_निम्न_आधार_पर_इसका #विरोध_किया : ▪️भारत को पूर्ण स्वतंत्रता के स्थान पर डोमिनियन राज्य का दर्जा दिया गया था जो स्वीकार्य नहीं था। ▪️देश की रियासतों के प्रतिनिधियों के लिए निर्वाचन (वोट द्वारा चयन) के स्थान पर मनोनयन (इच्छा अनुसार चयन) की व्यवस्था रखी गई थी जो उचित नहीं थी। ▪️क्रिप्स मिशन में भारत के दूसरे प्रांतों को पृथक संविधान बनाने की व्यवस्था की गई थी जिसका छिपा हुआ लक्ष्य भारत को टुकड़ों में विभाजित करना था। यह प्रस्ताव भारत की राष्ट्रीय एकता के सिद्धांत के विरुद्ध था। इस प्रस्ताव में भारत के दूसरे प्रांत भारतीय संघ से पृथक भी हो सकते थे। ये सभी प्रस्ताव अनुचित और अस्वीकार्य थे। ▪️इस मिशन में अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद सत्ता के त्वरित हस्तांतरण की योजना नहीं सम्मिलित थी. राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी चाहती थी कि आज़ाद भारत के प्रशासन की बागडोर भारतीयों के हाथ में हो, पर इसे स्पष्ट रूप से क्रिप्स मिशन में नहीं बताया गया था। इसलिए यह मिशन संदेहास्पद और अस्पष्ट था। ▪️इस मिशन में यह प्रस्ताव दिया गया था कि भारत के आज़ाद होने के बाद भी गवर्नर जनरल सर्वोच्च माना जाएगा। #मुस्लिम_लीग_ने_निम्न_आधार_पर_इसका #विरोध_किया : ▪️मुस्लिम लीग ने “एकल भारतीय संघ” की व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। ▪️मुस्लिम लीग ने पृथक पाकिस्तान की मांग को स्वीकार नहीं किया। ▪️3स्वतंत्र भारत के दिए जिस संविधान निर्मात्री परिषद के गठन की बात की गई थी उसे भी मुस्लिम लीग ने स्वीकार नहीं किया। ▪️मुस्लिम लीग राज्यों के पृथक संविधान बनाने के पक्ष में भी नहीं था। #अन्य_दलों_ने_निम्न_आधार_पर_इसका_बहिष्कार #किया : ▪️भारत के अन्य दल चाहते थे कि एकल भारतीय संघ की स्थापना हो। भारत के दूसरे प्रांतों को संघ से अलग होने का अधिकार ना दिया जाए। इसलिए उन्होंने क्रिप्स मिशन का बहिष्कार कर दिया। ▪️बहुत से लोगों का मानना था कि इस तरह धीरे-धीरे भारत के तमाम प्रांत इस नियम का फायदा उठाकर अलग हो जाएंगे और देश कमजोर हो जाएगा। ▪️हिंदू महासभा ने भी क्रिप्स मिशन का बहिष्कार इसी आधार पर किया था। ▪️क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव पर दलित लोग सोच रहे थे कि एकल भारतीय संघ स्थापित होने के बाद बहुसंख्यक हिंदू उन पर हावी हो सकते हैं और दलितों को हिंदुओं (विशेष रूप से उच्च जातियों) की कृपा पर जीवन जीना होगा। ▪️सिख समुदाय ने क्रिप्स मिशन का बहिष्कार किया क्योंकि उन्हें लगता था कि पंजाब राज्य उनसे छिन जाएगा। ▪️क्रिप्स मिशन को लेकर ब्रिटिश सरकार स्वयं ईमानदार नहीं दिखाई दे रही थी। पहले क्रिप्स मिशन द्वारा कहा गया कि स्वतंत्र भारत घोषित होने पर “मंत्रिमंडल का गठन” और “राष्ट्रीय सरकार” की स्थापना की जाएगी। पर बाद में ब्रिटिश सरकार अपने ही कथन से मुकर गई और कहने लगी कि उसका आशय केवल कार्यकारिणी परिषद का विस्तार करना था। ▪️क्रिप्स मिशन में भारत के दूसरे प्रांतों को विलय या पृथक होने का विकल्प दिया गया था। पर इस प्रस्ताव को विधान मंडल में पारित होने के लिए 60% सदस्यों के मत चाहिए थे। #ब्रिटिश_सरकार_की_वास्तविक_मंशा : ब्रिटिश सरकार स्वयं चाहती थी कि क्रिप्स मिशन सफल ना हो। वह भारतीयों को सत्ता का हस्तांतरण नहीं करना चाहती थी। ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल, विदेश मंत्री एमरी, वायसराय लिनलिथगो, और कमांडर इन चीफ वेवेल स्वयं चाहते थे कि क्रिप्स मिशन असफल हो जाए। वायसराय के वीटो के मुद्दे पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं और स्टैफोर्ड क्रिप्स के बीच बातचीत टूट गई और क्रिप्स मिशन असफल हो गया। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #भारत_छोड़ो_आंदोलन क्रिप्स मिशन के भारत आगमन से भारतीयों को काफी उम्मीदें थीं, किन्तु जब क्रिप्स मिशन खाली हाथ गया तो भारतीयों को अत्यन्त निराशा हुई। अत: 5 जुलाई, 1942 को ‘हरिजन’ नामक पत्रिका में गाँधीजी ने उद्घोष किया कि- ‘‘अंग्रेजो भारत छोड़ो। भारत को जापान के लिए मत छोड़ों, बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ा जाय। महात्मा गांधीजी का यह अन्तिम आन्दोलन था जो सन् 1942 में चलाया गया था। #भारत_छोड़ो_आंदोलन_के_कारण : ▪️क्रिप्स मिशन से निराशा- भारतीयों के मन में यह बात बैठ गई थी कि क्रिप्स मिशन अंग्रेजों की एक चाल थी जो भारतीयों को धोखे में रखने के लिए चली गई थी। क्रिप्स मिशन की असफलता के कारण उसे वापस बुला लिया गया था। ▪️बर्मा में भारतीयों पर अत्याचार- बर्मा में भारतीयों के साथ किये गए दुव्र्यवहार से भारतीयों के मन में आन्दोलन प्रारम्भ करने की तीव्र भावना जागृत हुई। ▪️द्वितीय विश्व युद्ध के लक्ष्य के घोषणा- ब्रिटिश सरकार भारतीयों को भी द्वितीय विश्व युद्ध की लड़ाई में सम्मिलित कर चुकी थी, परन्तु अपना स्पष्ट लक्ष्य घोषित नहीं कर रही थी। ▪️आर्थिक दुर्दशा- अंग्रेजी सरकार की नीतियों से भारत की आर्थिक स्थिति अत्यन्त खराब हो गई थी और दिनों-दिन स्थिति बदतर होती जा रही थी। ▪️जापानी आक्रमण का भय- द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना रंगून तक पहुंच चुकी थी, लगता था कि वे भारत पर भी आक्रमण करेंगी। #भारत_छोडो_आंदोलन_का_निर्णय : 14 जुलाई, 1942 मे बर्मा में कांग्रेस की कार्यसमिति की बैठक में ‘भारत छोड़़ो प्रस्ताव’ पारित किया गया। 6 और 7 अगस्त, 1942 को बम्बई में अखिल भारतीय कांग्रेस की बैठक हुई। गाँधीजी ने देश में ‘भारत छोड़़ो आन्दोलन’ चलाने की आवश्यकता पर बल दिया। गाँधीजी ने नारा दिया- ‘‘इस क्षण तुम में से हर एक को अपने को स्वतन्त्र पुरुष अथवा स्त्री समझना चाहिए और ऐसे आचरण करना चाहिए मानों स्वतन्त्र हो। मैं पूर्ण स्वतन्त्रता से कम किसी चीज से सन्तुष्ट नहीं हो सकता। हम करेंगे अथवा मरेंगे। या तो हम भारत को स्वतंत्र करके रहेंगे या उसके पय्रत्न में प्राण दे देगें।’’, ‘‘करो या मरो।’’ #भारत_छोड़ो_आंदोलन_का_आरम्भ_और_प्रगति : 8 अगस्त, 1942 को ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पास हुआ और 9 अगस्त की रात को गांधीजी सहित कांग्रेस के समस्त बड़े नेता बन्दी बना लिए गये। गाँधीजी के गिरफ्तार होने के बाद अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने एकसूत्रीय कार्यक्रम तैयार किया और जनता को ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन में सम्मिलित होने के लिए आव्हान किया। जनता के लिए निम्न कार्यक्रय तय किए गये- ▪️आन्दोलन में किसी प्रकार की हिंसात्मक कार्यवाही न की जाए। ▪️नमक कानून को भंग किया जाए तथा सरकार को किसी भी प्रकार का कर न दिया जाए। अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के प्रति दुव्र्यवहार का विरोध। ▪️सरकार विरोधी हड़तालें, प्रदर्शन तथा सार्वजनिक सभाएं करके अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश किया जाए। ▪️मूल्यों में असाधारण वृद्धि, आवश्यक वस्तु उपलब्ध न होने के विरोध में। ▪️पूर्वी बंगाल में आतंक शासन के खिलाफ। #भारत_छोड़ो_आंदोलन_की_विफलता_के_मुख्य #कारण : ▪️आन्दोलन की न तो सुनियोजित तैयारी की गई थी और न ही उसकी रूपरेखा स्पष्ट थी, न ही उसका स्वरूप.जनसाधारण को यह ज्ञात नहीं था कि आखिर उन्हें करना क्या है? ▪️सरकार का दमन-चक्र बहुत कठोर था और क्रान्ति को दबाने के लिए पुलिस राज्य की स्थापना कर दी गयी थी, फिर गांधीजी के विचार स्पष्ट नहीं थे। ▪️भारत में कई वर्गो ने आन्दोलन का विरोध किया। ▪️कांग्रेस के नेता भी मानसिक रूप से व्यापक आन्दोलन चलाने की स्थिति में नहीं थे । ▪️आन्दोलन अब अहिंसक नहीं रह गया था। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरूद्ध सशक्त अभियान था । #भारत_छोडो_आंदोलन_के_महत्व_तथा_परिणाम : ▪️ब्रिटिश सरकार ने हजारों भारतीय आन्दोलनकारियों को बन्दी बना लिया तथा बहुतों को दमन का शिकार होकर मृत्यु का वरण करना पड़ा। ▪️अंतर्राष्ट्रीय जनमत को इंग्लैण्ड के विरूद्ध जागृत किया। चीन और अमेरिका चाहते थे कि अंग्रेज भारत को पूर्ण रूप से स्वतंत्र कर दें। ▪️इस आंदोलन ने जनता में अंग्रेजों के विरूद्ध अपार उत्साह तथा जागृति उत्पन्न की। ▪️इस आन्दोलन में जमींदार, युवा, मजदूर, किसान और महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया। यहां तक कि पुलिस व प्रशासन के निचले वर्ग के कर्मचारियों ने आंदोलनकारियों को अप्रत्यक्ष सहायता दी एवं आंदोलनकारियों के प्रति सहानुभूति दिखाई। ▪️भारत छोड़ो आन्दोलन के प्रति मुस्लिम लीग ने उपेक्षा बरती, इस आंदोलन के प्रति लीग में कोर्इ उत्साह नहीं था। कांग्रेस विरोधी होने के कारण लीग का महत्व अंग्रेजों की दृष्टि में बढ़ गया। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #संघ_लोक_सेवा_आयोग भारतीय संविधान का अनुच्छेद 315 संघों व राज्यों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं के आधार पर लोक सेवकों की नियुक्ति करता है। संघ लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक निकाय है। संघ लोक सेवा आयोग में एक अध्यक्ष और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त अन्य सदस्य शामिल होते हैं। आयोग का अध्यक्ष व सदस्य छह साल की अवधि के लिए (राष्ट्रपति द्वारा चयनित) या 65 वर्ष की आयु पाने तक, जो भी पहले हो, कार्यरत रहते हैं। #संघ_लोक_सेवा_आयोग_की_संरचना : अनुच्छेद 316 सदस्यों के पद की नियुक्ति और कार्यकाल से संबंध रखता है संघ लोक सेवा आयोग में एक अध्यक्ष और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त अन्य सदस्य शामिल होते हैं। आयोग के नियुक्त सदस्यों में से आधे सदस्यों को भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य की सरकार के तहत कार्यालय में कम से कम दस साल के लिए कार्यरत होना चाहिए। राष्ट्रपति आयोग के सदस्यों में से एक सदस्य को एक कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में नियुक्त कर सकता है यदि : ▪️आयोग के अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाये। ▪️आयोग का अध्यक्ष अनुपस्थिति के कारण या किसी अन्य कारण से अपने कार्यालय के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो। इस तरह का सदस्य एक कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में कार्य करता है जब तक किसी व्यक्ति को कार्यालय के कर्तव्यों का पालन करने के लिए अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया जाये या जब तक अध्यक्ष पुनः अपना कार्य आरंभ ना कर दे, जैस भी मामला हो। #कार्यकाल : आयोग का अध्यक्ष व सदस्य छह साल की अवधि के लिए या 65 वर्ष की आयु पाने तक, जो भी पहले हो, कार्यरत रहते हैं| सदस्य राष्ट्रपति को संबोधित करते हुए अवधि के बीच में इस्तीफा दे सकते हैं| उन्हें संविधान में दी गई प्रक्रिया के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा भी हटाया जा सकता है। #कर्तव्य_और_कार्य : संघ लोक सेवा आयोग के कर्तव्य और कार्य निम्नलिखित वर्णित हैं: 1. यह संघ की सेवाओं में नियुक्तियों के लिए परीक्षाएं आयोजित करता है, जिसमें केंद्र शासित प्रदेशों की अखिल भारतीय सेवाएँ, केंद्रीय सेवाएँ, और सार्वजनिक सेवाएँ शामिल हैं। 2. यह किसी भी सेवा के लिए संयुक्त भर्ती तैयार करने और परिचालन योजनाओं में राज्यों को सहायता करता है जिसके लिए विशेष योग्यता रखने वाले उम्मीदवारों की आवश्यकता होती है, जिसके लिए दो या उससे अधिक राज्यों द्वारा अनुरोध किया गया हो। 3. निम्नलिखित मामलों पर इनसे विचार-विमर्श किया जाता है: ▪️सभी मामले सिविल सेवाओं तथा सिविल पदों की नियुक्ति के तरीके से संबन्धित। ▪️सिविल सेवाओं और पदों के लिए नियुक्तियों करने में और एक सेवा से दूसरे में स्थानांतरण तथा पदोन्नति और इस तरह की नियुक्तियों, स्थानान्तरण और पदोन्नति के लिए उम्मीदवारों की उपयुक्तता पर सिद्धांतों का अनुसरण करना। ▪️एक नागरिक की हैसियत से भारत सरकार के अधीन सेवारत व्यक्ति को प्रभावित करने वाले सभी अनुशासनात्मक मामले जिसमें इन मामलों से संबन्धित स्मारक या याचिकाएं शामिल हों। ▪️अपने आधिकारिक कर्तव्य के निष्पादन में या किए गए कृत्यों का उसके खिलाफ स्थापित कानूनी कार्यवाही की रक्षा करने में एक सिविल सेवक द्वारा उठाए गए खर्च का किसी भी प्रकार का दावा करना। ▪️भारत सरकार के अधीन सेवारत व्यक्ति घायल होने पर पेंशन के हक़ के लिए दावा कर सकता है और किसी भी हक़ के लिए राशि से संबन्धित कोई भी प्रश्न कर सकता है। ▪️कार्मिक प्रबंधन से संबंधित कोई भी मामला राष्ट्रपति द्वारा संदर्भित। ▪️कमीशन राष्ट्रपति के समक्ष आयोग द्वारा किए गए कार्य की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करते हैं। हालांकि, संसद संघ की सेवाओं से संबंधित अतिरिक्त कार्य यूपीएससी को प्रदान कर सकती है। यूपीएससी के कार्य का विस्तार निगमित निकाय की कार्मिक प्रणाली के द्वारा या कानून द्वारा गठित अन्य निगमित निकाय या इसके तहत कोई भी सार्वजनिक संस्था द्वारा किया जा सकता है। संघ लोक सेवा आयोग के प्रदर्शन से संबन्धित वार्षिक रिपोर्ट को राष्ट्रपति के समक्ष पेश किया जाता है| इसके बाद राष्ट्रपति इस रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों में ज्ञापन के साथ प्रस्तुत करता है जिसमें यह बताया गया होता है कि कहाँ पर आयोग की सलाह को नहीं स्वीकार किया गया और इस गैर स्वीकृति के पीछे का कारण क्या है। #संघ_लोक_सेवा_आयोग_की_भूमिका_विश्लेषण : संघ लोक सेवा आयोग केंद्रीय भर्ती एजेंसी है। यह प्रतिभा प्रणाली को बनाए रखने और पदों के लिए सबसे उपयुक्त लोगों को आगे लाने के लिए उत्तरदायी है। यह परीक्षा आयोजित करता है और ग्रुप ए एव ग्रुप बी में अखिल भारतीय सेवाओं और केंद्रीय सेवाओं में कर्मियों की नियुक्ति के लिए सरकार को अपनी सिफ़ारिश भेजता है| यूपीएससी की भूमिका स्वभाव से सलाहकार की होती है और सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं होती है| हालांकि, सरकार संसद के प्रति जवाबदेह है, यदि, वह आयोग की सलाह को खारिज कर दे। इसके अलावा, यूपीएससी का संबंध परीक्षा प्रक्रिया से है और ना की सेवाओं के वर्गीकरण, कैडर प्रबंधन, प्रशिक्षण, सेवा शर्तों आदि के साथ संबंध रखता है| इन मामलों को कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय के अधीन कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा नियंत्रित किया जाता है| सरकार पदोन्नति और अनुशासनात्मक मामलों पर संघ लोक सेवा आयोग से सलाह लेती है। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #केंद्रीय_प्रशासनिक_अधिकरण [ कैट ] संविधान का भाग XIV-क अधिकरण प्रदान करता है। प्रावधान को 1976 के 42 वें संशोधन अधिनियम के माध्यम से जोड़ा गया। अनुच्छेद 323 क और 323 ख क्रमश: अन्य मामलों से संबंधित प्रशासनिक न्यायाधिकरण अथवा अधिकरण प्रदान करता हैं। अनुच्छेद 323-क के तहत, नियुक्ति और संघ के या किसी राज्य अथवा स्थानीय मामलों या फिर भारत सरकार के स्वामित्व या सरकार द्वारा नियंत्रित किसी भी निगम और सरकार द्वारा नियंत्रित संस्थाओं के संबंध में सार्वजनिक सेवाओं और पदों पर नियुक्त व्यक्तियों की सेवा शर्तों से संबंधित विवादों और शिकायतों पर अधिनिर्णय करने के लिए संसद के पास प्रशासनिक न्यायाधिकरण की स्थापना करने का अधिकार है। संसद द्वारा 1985 में पारित प्रशासनिक न्यायाधिकरण अधिनियम, केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण और राज्य प्रशासनिक न्यायाधिकरण की स्थापना के लिए केंद्र सरकार को अधिकृत करता है। #केंद्रीय_प्रशासनिक_न्यायाधिकरण (कैट) : केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण की प्रमुख पीठ (प्रिंसिपल बेंच) दिल्ली में स्थित है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न राज्यों में अतिरिक्त पीठें भी हैं। वर्तमान में 17 नियमित पीठ (बैंचे) और 4 सर्किट बेंच हैं। कैट के पास निम्नलिखित सेवा क्षेत्र के मामलों में अधिकार है: ▪️अखिल भारतीय सेवा का कोई भी एक सदस्य संघ के किसी भी सिविल सेवा या संघ के तहत किसी भी सिविल पद पर नियुक्त एक व्यक्ति। ▪️रक्षा सेवाओं में नियुक्त कोई भी नागरिक या रक्षा से जुड़ा कोई भी एक पद। ▪️हालांकि, रक्षा बलों के सदस्य, अधिकारी, सुप्रीम कोर्ट और संसद के सचिवालय के स्टाफ कर्मचारी कैट के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं। ▪️कैट में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य शामिल हैं जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। न्यायिक और प्रशासनिक क्षेत्रों से कैट के सदस्यों की नियुक्ति होती है। सेवा की अवधि 5 साल या अध्यक्ष और उपाध्यक्ष अध्यक्ष के लिए 65 वर्ष और सदस्यों के लिए 62 वर्ष जो भी पहले हो, तक होती है। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या कैट का कोई भी अन्य सदस्य अपने कार्यकाल के बीच में ही अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को भेज सकता है। #कैट_की_कार्यप्रणाली : सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की संहिता में निर्धारित प्रक्रिया के लिए कैट बाध्य नहीं है, लेकिन प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा निर्देशित है। एक अधिकरण के पास उसी प्रकार की शक्तियां होती हैं जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की संहिता के तहत एक सिविल कोर्ट के पास होती हैं। एक व्यक्ति अधिकरण में आवेदन कानूनी सहायता के माध्यम से या फिर स्वंय हाजिर होकर कर सकता है। एक न्यायाधिकरण अथवा अधिकरण के आदेश के खिलाफ उच्च न्यायालय में तो अपील की जा सकती है लेकिन सुप्रीम कोर्ट में नहीं। चंद्र कुमार मामले (1997) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक अधिकरण के आदेश के खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपील नहीं की जा सकती है और इसके लिए पीड़ित व्यक्ति को पहले संबंधित उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) से संपर्क करना चाहिए। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #अगस्त_प्रस्ताव भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को शिमला से एक वक्तव्य जारी किया, जिसे अगस्त प्रस्ताव कहा गया|यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य को लेकर पूछे गए सवाल के जबाव में लाया गया था| #अगस्त_प्रस्ताव_के_प्रावधान ▪️सलाहकारी युद्ध परिषद् की स्थापना ▪️युद्ध के पश्चात भारत के संविधान निर्माण के लिए प्रतिनिधिक भारतीय निकाय की स्थापना करना ▪️वायसराय की कार्यकारी परिषद् का तत्काल विस्तार ▪️अल्पसंख्यकों को यह आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार,शासन के किसी ऐसे तंत्र को सत्ता नहीं सौंपेगी जिसके प्राधिकार को भारतीय राष्ट्रीय जीवन के किसी बड़े और शक्तिशाली तबके द्वारा स्वीकार न किया गया हो यह प्रथम अवसर था जब भारतीयों के संविधान निर्माण के अधिकार को स्वीकार किया गया और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की| कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया| जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि डोमिनियन दर्जे का सिद्धांत अब मृतप्राय हो चुका है| गाँधी ने कहा कि इस घोषणा नेराष्ट्रवादियों और ब्रिटिश शासकों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है| मुस्लिम लीग इसमें दिए गए वीटो अधिकार के चलते खुश थी और उसने कहा कि राजनीतिक गतिरोध को दूर करने का एकमात्र उपाय विभाजन है| कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत की गयी मांगों को स्वीकार न करने से व्याप्त व्यापक असंतोष के सन्दर्भ में गाँधी ने वर्धा में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अपनी व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा को शुरू करने की योजना को प्रस्तुत किया| #निष्कर्ष यह भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के द्वारा जारी किया गया औपचारिक वक्तव्य था,जिसने संविधान निर्माण प्रक्रिया की नींव रखी और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की| [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #राष्ट्रीय_भारत_परिवर्तन_संस्था [ नीति आयोग ] 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग को समाप्त कर नीति आयोग का गठन किया गया था। यह भारत सरकार को सामाजिक एवं आर्थिक मुद्दों पर परामर्श निकाय या एक "थिंक टैंक" के तौर पर अपनी सेवाएं देगा। #नीति_आयोग_की_संरचना : नीति आयोग में निम्नलिखित शामिल हैं– 1. भारत का प्रधानमंत्री, पदेन अध्यक्ष। 2. शासी परिषद में सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों के लेफ्टिनेंट गवर्नर शामिल हैं। 3. क्षेत्रीय परिषद का संचालन विशेष मुद्दों के समाधान के लिए किया जाएगा और एक से अधिक राज्य या क्षेत्र को प्रभावित करने वाली आकस्मिकताओं पर प्रधानमंत्री गौर करेंगे। इसमें सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और केंद्र शासित प्रदेशों के लेफ्टिनेंट गवर्नर शामिल होंगे। 4. प्रासंगिक विषयों में ज्ञान रखने वाले विद्वानों, विशेषज्ञों और काम करने वाले लोगों को प्रधानमंत्री विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर नामित करेंगे। 5. अध्यक्ष के तौर पर प्रधानमंत्री के अलावा पूर्ण– कालिक संगठनात्मक ढांचे में शामिल होगें– ▪️प्रधानमंत्री द्वारा नियुक्त उपाध्यक्ष। ▪️पूर्णकालिक सदस्य। ▪️पदेन क्षमता में अग्रणी विश्वविद्यालयों अनुसंधान संगठनों और अन्य प्रासंगिक संस्थानों से अधिकतम दो अंश–कालिक (पार्ट–टाइम) सदस्य। ▪️पदेन सदस्यों के रूप में प्रधानमंत्री द्वारा केंद्रीय मंत्रीपरिषद से अधिकतम 4 सदस्यों को नामित किया जाना है। ▪️निश्चित अवधि के लिए मुख्य कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति प्रधानमंत्री द्वारा की जाएगी। यह अधिकारी भारत सरकार में सचिव रैंक के अधिकारी में से होंगे। ▪️सचिवालय (आवश्यक मानकर)। #नीति_आयोग_के_उद्देश्य : नीति आयोग के मुख्य उद्देश्यों का नीचे वर्णन किया जा रहा है– ▪️राष्ट्रीय उद्देश्यों के आलोक में राज्यों की सक्रिए भागीदारी के साथ राष्ट्रीय विकास प्राथमिकताओं, क्षेत्रों और रणनीतियों का साझा दृष्टिकोण विकसित करना। ▪️सतत आधार पर राज्यों के साथ संरचित समर्थन पहलों और प्रणालियों के माध्यम से सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना, मजबूत राज्य ही मजबूत देश का निर्माण कर सकता है, इसे मान्यता प्रदान करना। ▪️ग्राम स्तर पर विश्वसनीय योजना तैयार करने के लिए प्रणाली विकसित करना और सरकार के उच्च स्तर पर उत्तरोत्तर इसका पालन करना। ▪️यह सुनिश्चित करना की राष्ट्रीय सुरक्षा के हित आर्थिक रणनीति और नीति में निहित है। ▪️हमारे समाज के उन वर्गों पर विशेष ध्यान देना जिनको आर्थिक प्रगति से पर्याप्त लाभ नहीं हुआ है। ▪️रणनीतिक एवं दीर्ध कालिक नीति एवं कार्यक्रम और पहलों की रूपरेखाएं तैयार करना और उनकी प्रगति एवं प्रभावकारिता पर नजर रखना। ▪️सलाह देना और मुख्य हितधारकों एवं समान विचारधारा वाले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंक के साथ– साथ शैक्षणिक एवं नीति अनुसंधान संस्थानों के बीच भागीदारी को बढ़ावा देना। ▪️कार्यक्रमों और पहलों के कार्यान्वयन के लिए प्रौद्योगिकी के उन्नयन और क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #भारतीय_निर्वाचन_आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 में संसद, राज्य विधानमंडल के साथ साथ राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनावों के अधीक्षण,निर्देशन और निर्वाचन नामावलियों की तैयारी पर नियंत्रण रखने के लिए निर्वाचन आयोग का प्रावधान किया गया है | अतः निर्वाचन आयोग केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर होने वाले चुनावों के लिए उत्तरदायी है. #चुनाव_आयोग_की_संरचना : वर्तमान में भारत के निर्वाचन आयोग में 3 आयुक्त काम कर रहे हैं जिनमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा हैं जबकि चुनाव आयुक्त के पद पर राजीव कुमार और सुशील चंद्रा हैं. संविधान में निर्वाचन आयोग की संरचना से सम्बंधित निम्न प्रावधान शामिल किया गये हैं- ▪️निर्वाचन आयोग एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उसके अन्य निर्वाचन आयुक्तों से,यदि कोई हों,जितने समय समय पर राष्ट्रपति नियत करे,मिलाकर बनता है| ▪️मुख्य निर्वाचन आयुक्त व अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी | ▪️यदि एक से अधिक निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किये जाते है तो ऐसी स्थिति में मुख्य निर्वाचन आयुक्त, निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष के रूप कार्य करेंगें | ▪️निर्वाचन आयोग से सलाह लेने के बाद राष्ट्रपति उतनी संख्या में प्रादेशिक निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति भी कर सकता है जितने की निर्वाचन आयोग को सहायता देने के लिए आवश्यक हों | ▪️निर्वाचन आयुक्तों और प्रादेशिक निर्वाचन आयुक्तों की सेवा की शर्तें और पदावधि ऐसी होगीं जो राष्ट्रपति, नियम द्वारा तय करे | हालाँकि,मुख्य निर्वाचन आयुक्त निर्वाचन आयोग का अध्यक्ष होता है लेकिन उसकी शक्तियां अन्य निर्वाचन आयुक्तों के समान ही होती हैं|आयोग द्वारा सभी मसलों पर बहुमत से निर्णय लिया जाते है| मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य दो निर्वाचन आयुक्त समान वेतन,भत्ते व अन्य सुविधाएँ प्राप्त करते हैं। #कार्यकाल : मुख्य निर्वाचन आयुक्त व अन्य निर्वाचन आयुक्त छह वर्ष या 65 साल की आयु,जो भी पहले हो,प्राप्त करने तक अपने पद बने रहते है| वे किसी भी समय राष्ट्रपति को संबोधित अपने त्यागपत्र द्वारा अपना पद छोड़ सकते हैं| राष्ट्रपति किसी भी निर्वाचन आयुक्त को संविधान में वर्णित प्रक्रिया द्वारा ही उसके पद से हटा सकता है| #शक्तियां_एवं_कार्य : निर्वाचन आयोग की शक्तियां व कार्य निम्नलिखित हैं- ▪️यह परिसीमन आयोग अधिनियम के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करता है ▪️यह निर्वाचक नामावलियों को तैयार करता है और समय समय पर उनमें सुधार करता है|यह सभी योग्य मतदाताओं को पंजीकृत करता है| ▪️यह चुनावों कार्यक्रम निर्धारित करता है और उसे अधिसूचित करता है ▪️यह चुनाव हेतु प्रत्याशियों के नामांकन स्वीकार करता है उनकी जाँच करता है ▪️यह राजनीतिक दलों को पंजीकृत करता है और उन्हें चुनाव चिन्ह प्रदान करता है ▪️यह चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा किये गए प्रदर्शन के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय दलों का दर्जा प्रदान करता है ▪️यह राजनीतिक दलों की पहचान और चुनाव चिन्ह से सम्बंधित विवादों में न्यायालय की भूमिका निभाता है ▪️यह निर्वाचन व्यवस्था से सम्बंधित विवादों की जाँच के लिए अधिकारियों की नियुक्ति करता है| ▪️यह राजनीतिक दलों को दूरदर्शन व रेडियो पर अपनी नीतियों व कार्यक्रमों के प्रचार के लिए समय सीमा का निर्धारण करता है | ▪️यह सुनिश्चित करता है कि आदर्श आचार संहिता का सभी दलों व प्रत्याशियों द्वारा पालन किया जाये | ▪️यह संसद सदस्यों की अयोग्यता से सम्बंधित मामलों में राष्ट्रपति को सलाह प्रदान करता है | ▪️यह राज्य विधानमंडल के सदस्यों की अयोग्यता से सम्बंधित मामलों में राज्य के राज्यपाल को सलाह प्रदान करता है | ▪️यह राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास चुनाव को सम्पन्न कराने के लिए जरुरी स्टाफ को उपलब्ध करने के लिए निवेदन करता है | ▪️यह चुनाव कार्यप्रणाली का सर्वेक्षण करता है और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव को संपन्न कराना सुनिश्चित करता है | ▪️यह अनियमितता व दुरूपयोग के आधार पर किसी निर्वाचन क्षेत्र के मतदान को रद्द कर सकता है | ▪️यह राष्ट्रपति को इस सम्बन्ध में सलाह देता है कि किसी राज्य में चुनाव कराये जा सकते है या नहीं| तीन निर्वाचन आयुक्तों के अलावा निर्वाचक आयुक्तों को सहायता प्रदान करने के लिए उप-निर्वाचन आयुक्त भी होते है| इन अधिकारियों की नियुक्ति निर्वाचन आयोग द्वारा निश्चित कार्यकाल के साथ सिविल सेवकों में से की जाती है| इनकी सहायता आयोग के सचिवालय में सेवारत सचिव,संयुक्त सचिव,उप सचिव,अपर सचिव द्वारा की जाती है| मुख्य निर्वाचन आयुक्त, राज्य सरकार से सलाह करने के बाद, राज्य के मुख्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति करता है| जिलाधिकारी जिला स्तर पर मुख्य निर्वाचन अधिकारी होता है| मुख्य निर्वाचन अधिकारी द्वारा प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए निर्वाचन अधिकारी नियुक्त किये जाते हैं और वही निर्वाचन क्षेत्र के प्रत्येक मतदान केंद्र के लिए अधिष्ठाता की नियुक्ति करता है| अतः निर्वाचन आयोग भारत की निर्वाचन प्रणाली की निगरानी करने वाली संस्था है| राजनीतिक दलों के लिए यह आवश्यक है कि वे अपने आयकर का भुगतान करें| यह कदम चुनावों में पैसे और ताकत के प्रयोग को कम करने के लिए उठाया गया था| अब यह जरुरी कर दिया गया है कि चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति को एक शपथ पत्र जमा करना होगा जिसमे उसके खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमों व संपत्ति से सम्बंधित जानकारी शामिल होगी| इस कदम का लाभ यह हुआ कि मतदाताओं को प्रत्याशियों से सम्बंधित जानकारी हासिल हो सकी है| #राजनीतिक_दलों_को_मान्यता_प्रदान_करना : यह राजनीतिक दलों को पंजीकृत करता है और उन्हें चुनाव चिन्ह प्रदान करता है|यह चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा किये गए प्रदर्शन के आधार पर उन्हें राष्ट्रीय व राज्य स्तरीय दलों का दर्जा प्रदान करता है| निर्वाचन आयोग प्रत्येक राष्ट्रीय राजनीतिक दल को एक विशेष चिन्ह आवंटित करती है,जिसे वह राजनीतिक दल पूरे देश में प्रयोग कर सकता है| इसी तरह प्रत्येक राज्य स्तरीय दल को एक चिन्ह आवंटित किया जाता है,जिसे वह पूरे राज्य में प्रयोग कर सकता है| इन चिन्हों को आरक्षित चिन्ह कहा जाता है,जिन्हें कोई अन्य दल या प्रत्याशी प्रयोग नहीं कर सकता है. [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #व्यक्तिगत_सत्याग्रह [ 1940 ] व्यक्तिगत सत्याग्रह राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी द्वारा सन 1940 में प्रारम्भ किया गया था। इस सत्याग्रह कि सबसे बड़ी बात यह थी कि इसमें महात्मा गाँधी द्वारा चुना हुआ सत्याग्रही पूर्व निर्धारित स्थान पर भाषण देकर अपनी गिरफ्तारी देता था। अपने भाषण से पूर्व सत्याग्रही अपने सत्याग्रह की सूचना ज़िला मजिस्ट्रेट को भी देता था। #शुरुआत 3 सितम्बर, सन 1939 को भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने यह घोषणा की कि भारत भी द्वितीय विश्वयुद्ध में सम्मिलित है। वायसराय ने इस घोषणा से पूर्व किसी भी राजनीतिक दल से परामर्श नहीं किया। इससे कांग्रेस असंतुष्ट हो गई। महात्मा गाँधी ने भी ब्रिटिश सरकार की युद्धनीति का विरोध करने के लिए सन 1940 में अहिंसात्मक 'व्यक्तिगत सत्याग्रह' आरम्भ किया। #प्रथम_सत्याग्रही 11 अक्टूबर, 1940 को गाँधीजी द्वारा 'व्‍यक्तिगत सत्‍याग्रह' के प्रथम सत्‍याग्रही के तौर पर विनोबा भावे को चुना गया। प्रसिद्धि की चाहत से दूर विनोबा भावे इस सत्‍याग्रह के कारण बेहद मशहूर हो गए। उनको गाँव-गाँव में युद्ध विरोधी तक़रीरें करते हुए आगे बढते चले जाना था। ब्रिटिश सरकार द्वारा 21 अक्टूबर को विनोबा को गिरफ्तार किया गया। #द्वितीय_सत्याग्रही 5 जनवरी 1941 को जवाहर लाल नेहरू ने पुनः यह सत्याग्रह प्रारंभ किया। व्यक्तिगत सत्याग्रह के दूसरे सत्याग्रही जवाहरलाल नेहरु थे। इस आंदोलन के दूसरे चरण में 20000 से अधिक सत्याग्रहियों की गिरफ्तारी हुई इसमें राजगोपालाचारी, अरुणा आसफ अली ,सरोजिनी नायडू भी थे। व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन को दिल्ली चलो आंदोलन भी कहा गया। #व्यक्तिगत_सत्याग्रह_के_उद्देश्य • यह प्रदर्शित करना की राष्ट्रवादियों का धैर्य उनकी कमजोरी के कारण नहीं है। • जन भावना को अभिव्यक्त करना अर्थात यह बताना कि जनता युद्ध में रूचि नहीं रखती है और वह नाजीबाद तथा दोहरी निरंकुशता, जिसके द्वारा भारत पर शासन किया जा रहा है, के बीच कोई भेद नहीं मानती है। • कांग्रेस की मांगों को शांतिपूर्ण ढ़ंग से मानने के लिए सरकार को एक और मौका प्रदान करना। इसमें सत्याग्रही की मांग युद्ध-विरोधी घोषणा के माध्यम से युद्ध का विरोध करने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग करने की थी।यदि सत्याग्रही को सरकार द्वारा गिरफ्तार नहीं किया जाता है तो वह गांवों से होते हुए दिल्ली की ओर मार्च करेगा (“दिल्ली चलो आन्दोलन)। व्यक्तिगत सत्याग्रह का केंद्रबिंदु अहिंसा था जिसे सत्याग्रहियों के चयन द्वारा ही पाया जा सकता था।आचार्य विनोबा भावे, पंडित जवाहर लाल नेहरु और ब्रह्म दत्त क्रमशः प्रथम, द्वितीय और तृतीय चयनित सत्याग्रही थे। #निष्कर्ष अतः स्वतंत्रता को समर्पित व्यक्तिगत सत्याग्रह अगस्त प्रस्ताव का परिणाम था और यह आन्दोलन केवल स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए ही नहीं था बल्कि इसमें अभिव्यक्ति के अधिकार को भी दृढ़तापूर्वक प्रस्तुत किया गया। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #कांग्रेस_का_त्रिपुरी_संकट [ 1939 ] 3 सितंबर,1939 को द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी (हिटलर) द्वारा पौलैण्ड पर आक्रमण करने के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने जर्मनी पर आक्रमण कर दिया। तत्कालीन भारतीय वायसराय लार्ड लिनलिथगो ने भारतीयों की अनुमति के बिना यह घोषणा कर दी कि भारत भी जर्मनी के विरुद्ध ब्रिटेन के साथ युद्ध में शामिल है। कांग्रेस कार्यसमिति ने सरकार से युद्ध के उद्देश्यों को स्पष्ट करने की मांग की, परंतु सरकार ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। वायसराय ने भारतीयों के सामने युद्ध के बाद औपनिवेशिक स्वराज का पुराना वायदा दुहराया। कांग्रेस शासित प्रदेशों के मंत्रियों ने कांग्रेस कार्य समिति की अनुमति के बाद 15 नवंबर,1939 को मंत्रिमंडलों से त्यागपत्र दे दिया। कांग्रेसी मंत्रियों के त्यागपत्र के बाद मुस्लिम लीग ने दलित नेता भीमराव अंबेडकर के साथ 22 दिसंबर,1939 को मुक्ति दिवस मनाया। #त्रिपुरी_संकट : ▪️1938 में हरिपुरा अधिवेशन के वार्षिक अधिवेशन के लिए सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। ▪️हरिपुरा में कांग्रेस अधिवेशन के समय सुभाष बोस ने जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक राष्ट्रीय योजना समिति की स्थापना की जिसके सदस्यों में बिङला,लाला श्रीराम, विश्वरैया शामिल थे। ▪️1939 के त्रिपुरी कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में सुभाषचंद्र बोस दूसरी बार अध्यक्ष पद के उम्मीदवार बने।वे गांधी के पसंद के उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैय्या को परास्त कर दूसरी बार अध्यक्ष चुन लिये गये। ▪️गांधी जी ने पट्टाभि सीतारमैय्या की हार को अपनी हार बताया। ▪️चुनाव के बाद अधिवेशन में पारित प्रस्ताव द्वारा अध्यक्ष को गांधी जी की इच्छानुसार कार्य समिति के सदस्य नियुक्त करने को कहा गया, लेकिन गांधी ने कोई भी नाम सुझाने से इंकार कर दिया। ▪️अन्ततः सुभाषचंद्र बोस ने अप्रैल,1939 को कांग्रेस अध्यक्ष पद से स्तीफा दे दिया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को सुभाष चंद्र बोस की जगह नया कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया। ▪️3 मई,1939 को सुभाष चंद्र बोस ने फारवर्ड ब्लाक की स्थापना की। अगस्त 1939 को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी तथा बंगाल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद से सुभाष को हटा दिया गया – साथ ही कांग्रेस के सभी पदों से उन्हें तीन वर्षों के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया।

भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #योजना_आयोग

भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #योजना_आयोग योजना आयोग भारत सरकार की प्रमुख स्वतंत्र संस्थाओं में से एक था । भारत में योजना आयोग के संबंध में कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। 15 मार्च 1950 को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा पारित प्रस्ताव के द्वारा योजना की स्थापना की गई थी। इसका मुख्य कार्य 'पंचवर्षीय योजनाएँ' बनाना था । इस आयोग की स्थापना 15 मार्च, 1950 को की गई थी। इस आयोग की बैठकों की अध्यक्षता प्रधानमंत्री ही करता था। #योजना_आयोग_का_गठन : योजना आयोग के पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते थे । इसके बाद आयोग का उपाध्यक्ष संस्था के कामकाज को मुख्य रूप से देखता था। मा.नरेंद्र मोदी की सरकार बनने तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया थे, जिन्होंने बाद में इस्तीफ़ा दे दिया। कुछ महत्त्वपूर्ण विभागों के कैबिनेट मंत्री आयोग के अस्थायी सदस्य होते हैं, जबकि स्थायी सदस्यों में अर्थशास्त्री, उद्योगपति, वैज्ञानिक एवं सामान्य प्रशासन जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल होते थे । ये विशेषज्ञ विभिन्न विषयों पर अपनी राय सरकार को देते थे । आयोग अपने विभिन्न प्रभागों के माध्यम से कार्य करता था । #आयोग_के_उपाध्यक्ष : अब तक आयोग के उपाध्यक्ष का पद निम्नलिखित लोगों ने संभाला- गुलजारीलाल नंदा, टी. कृष्णमाचारी, सी. सुब्रह्मण्यम, पी. एन. हक्सर, मनमोहन सिंह, प्रणब मुखर्जी, के. सी. पंत, जसवंत सिंह, मधु दंडवते, मोहन धारिया और आर. के. हेगड़े आदि । सन 1950 में एक संकल्प द्वारा योजना आयोग की स्थापना के समय इसके कार्यों को इस प्रकार परिभाषित किया गया- ▪️देश में उपलब्ध तकनीकी कर्मचारियों सहित सामग्री, पंजी और मानव संसाधनों का आकलन और राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप इन संसाधनों की कमी को दूर करने हेतु उन्हें बढ़ाने की सम्भावनाओं का पता लगाना। ▪️देश के संसाधनों के सर्वाधिक प्रभावी तथा संतुलित उपयोग के लिए योजना बनाना। ▪️प्राथमिकताएँ निर्धारित करते ऐसे क्रमों को परिभाषित करना, जिनके अनुसार योजना को कार्यान्वित किया जाये और प्रत्येक क्रम को यथोचित पूरा करने के लिए संसाधन आवंटित करने का प्रस्ताव रखना। ▪️ऐसे कारकों के बारे में बताना, जो आर्थिक विकास में बाधक हैं और वर्तमान सामाजिक तथा राजनीतिक स्थिति के दृष्टिगत ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करने की जानकारी देना, जिनसे योजना को सफलतापूर्वक निष्पादित किया जा सके। ▪️इस प्रकार के तंत्र का निर्धारण करना, जो योजना के प्रत्येक पहलू को एक चरण में कार्यान्वित करने हेतु ज़रूरी हो। ▪️योजना के प्रत्येक चरण में हुई प्रगति का समय-समय पर मूल्यांकन और उस नीति तथा उपायों के समायोजना की सिफारिश करना जो मूल्यांकन के दौरान ज़रूरी समझे जाएँ। ▪️ऐसी अंतरिम या अनुषंगी सिफारिशें करना, जो उसे सौंपे गए कर्तव्यों को पूरा करने के लिए उचित हों अथवा वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों, चालू नीतियों उपायों और विकास कार्यक्रमों पर विचार करते हुए अथवा परामर्श के लिए केंद्रीय या राज्य सरकारों द्वारा उसे सौंपी गई विशिष्ट समस्याओं की जाँच के बाद उचित लगती हों। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपने पहले स्वतंत्र दिवस के भाषण में यह कहा कि उनका इरादा योजना कमीशन को भंग करना है। 2014 में इस संस्था का नाम बदलकर नीति आयोग (राष्‍ट्रीय भारत परिवर्तन संस्‍थान) किया गया और परिणामस्वरूप 1 जनवरी 2015 को नीति आयोग का जन्म हुआ। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #प्रांतीय_चुनाव_और_मंत्रिमंडल_का_गठन [ 1937 ] ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय जनता पर किए जा रहे सख्त नियंत्रण को कमजोर करने के लिए विभिन्न प्रकार के प्रयास और आंदोलन किए गए थे। इनमें से कुछ प्रयास कुछ देर सफल भी रहे जिनमें गांधी जी द्वारा चलाये गए नमक आंदोलन या सविनय अवज्ञा आंदोलन। लेकिन इन आंदोलनों की उम्र 2-3 वर्ष थी। इसके बाद इनका असर जनता पर खत्म होने लगा। इसके बाद उस समय की सबसे प्रभावशाली राजनैतिक पार्टी कांग्रेस ने एक दूसरा रास्ता अपनाने का प्रयास किया। यह रास्ता था संवैधानिक सुधारो और प्रयासों का जिसके माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया गया कि भारतीय जनता अपना शासन स्वयं निर्मित भी कर सकती है और नियंत्रित भी कर सकती है। आइए जानते हैं प्रांतीय चुनाव और मत्रिमंडल के गठन के बारे में विस्तार से - #चुनावी_बिगुल : 1936 में लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस द्वारा प्रांतीय चुनाव में हिस्सा लेना का निर्णय लिया गया । इस सभा में डॉ रजेंदर प्रसाद और वल्लभभाई पटेल ने गांधी जी की अव्यक्त सहमति से चुनावी दंगल के माध्यम से ब्रितानी सरकार का सामना करने का निश्चय किया। इसके साथ ही यह निर्णय भी लिया गया कि जब तक चुनाव पूरी तरह समाप्त न हो जाएँ, तब सत्ता की भागीदारी पर कोई भी विचार नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही भारत में चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी गईं। इसके साथ ही कांग्रेस ने 1935 के अधिनियम के अंतर्गत विधानसभा के चुनाव भी लड़ने का फैसला किया । भारत के 11 प्रांत जिनमें मद्रास, आसाम, बिहार, संघीय प्रांत, बंबई, बंगाल, उत्तर प्रदेश के सीमांत प्रांत, पंजाब, मध्य प्रांत, सिंध, और उड़ीसा आदि शामिल थे में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और जीत का झण्डा लहरा दिया। #कांग्रेस_का_इनामी_परिणाम: भारतीय संविधान अधिनियम 1935 के अंतर्गत ब्रिटिश अधीन भारत में पहली बार चुनाव करवाए गए और इसमें बड़ी संख्या में जनता ने खुशी से हिसा लिया। इस खुशी में भारत की लगभग 30.1 लाख लोगों ने जिसमें 15.5 लाख महिलाएं थीं, पहली बार वोट डालने के अपने अधिकार का इस्तेमाल किया। कुल 1585 सीटों में से कॉंग्रेस ने 707 सीट जीत कर भारतीय संसद में अपनी पहुँच सिद्ध कर दी। इसके साथ ही मुस्लिम लीग ने भी 106 सीटें जीत कर अपनी पहुँच को भी बरकरार रखा। इस चुनावी परिणाम से मुस्लिम लीग को थोड़ी हताशा भी हुई क्योंकि भारत के अनेक मुस्लिम बहुत क्षेत्रों में भी उसे हार का मुंह देखना पड़ा, जो उनकी उम्मीदों से परे था। इस चोट के मलहम के रूप में लीग ने कांग्रेस के सामने के प्रस्ताव रखा। जिसके अनुसार वे मंत्रिमंडल में तभी कांग्रेस को सहयोग देंगे जब कांग्रेस अपनी ओर से किसी भी मुस्लिम प्रतिनिधि को नियुक्त नहीं करेगी। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को नकार दिया और लीग ने कांग्रेस के सहयोग से हाथ खींच लिया। चुनाव में इन दोनों दिग्गजों के अलावा एक छोटी पार्टी और थी जिसने अपना खाता खोल दिया था। यह पार्टी थी यूनिनियस्ट (पंजाब) जिसने कुल सीटों में से 5% की सीटें जीत ली थीं। #मंत्रिमंडल_का_गठन : चुनावी मैदान में जीत कर कांग्रेस ने 1937 की जुलाई में भारत के छह प्रान्तों बम्बई, मद्रास, मध्य भारत, उड़ीसा, बिहार और संयुक्त प्रांत में अपने प्रतिनिधियों के द्वारा मंत्रिमंडल का गठन कर दिया। इसके कुछ समय बाद कांग्रेस की इस सूची में असम और पश्च्मिओत्तर प्रांत भी जुड़ गए। इस मंत्रिमंडल ने गांधी जी की उस सलाह को आत्मसात किया हुआ था जिसमें उन्होनें कहा था कि ब्रिटिश सरकार के बनाए हुए 1935 के अधिनियम को उनकी मर्ज़ी के अनुसार नहीं बल्कि राष्ट्रवादी लक्ष्य की पूर्ति के लिए इस्तेमाल करना है। इसके लिए अधिनियम की शक्तियों का उपयोग जनता के हितों के लिए किया जाएगा। हालांकि चुने हुए जनता के प्रतिनिधियों के पास अधिकार और वित्तीय संसाधन भी सीमित थे। #मंत्रिमंडल_के_लिए_निर्णय” कांग्रेस के चुनाव जीत कर संसद में आने से एक नयी समिति बनाई गई जिसे संसदीय समिति का नाम दिया गया। इस समिति में वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद और डॉ राजेन्द्र प्रसाद थे। कांग्रेस के जीते हुए सभी प्रान्तों के प्रमुख को प्रधानमंत्री नाम दिया गया था। इस समिति और कांग्रेस के मिले जुले कार्य और निर्णय प्रमुख रूप से जनता के हितों में थे। इन निर्णयों का उद्देश्य नागरिक आज़ादी, कृषि सुधार, जन-शिक्षा को प्रोत्साहन, सार्वजनिक न्याय व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए कांग्रेस पुलिस स्टेशन की स्थापना और लोक शिकायतों को सरकार के सम्मुख प्रस्तुत करके उनका हल निकलवाना था। इसके लिए कांग्रेस मंत्रिमंडल द्वारा लिए गए निर्णयों में से कुछ इस प्रकार थे : ▪️किसानों को साहूकारों के कब्जे से छुटाने के लिए विभिन्न प्रकार के बिल पारित किए गए जिनसे किसानों और काश्तकारों की बुनियादी जरूरतें पूरी करने में मदद मिली। इसके अलावा पशुओं के चरागाह के रूप में जंगली जमीन उपलब्ध करवाना, भू-राजस्व की दरों में कमी और नज़राना व बेगारी को भी खत्म करने के प्रयास किए गए। ▪️बंबई में कपड़ा मिलों और कपड़ा मजदूरों की अवस्था में सुधार करने के लिए 1938 में औध्योगिक विवाद अधिनियम भी प्रस्तुत किया गया। ▪️गांवों में रहने वाले लोगों की बुनियादी आवशयकताएँ जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी कार्यों के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू किए गए। ▪️बंबई में जिन लोगों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में योगदान के रूप में अपनी ज़मीन दान दी थी, उन्हें वह ज़मीन वापस कर दी गई। ▪️भारतीय प्रेस पर लगाए गए सभी आरोप वापस कर दिये गए। #कांग्रेस_का_मूल्यांकन : 1937 में चुन कर आई कांग्रेस सरकार का कार्यकाल लगभग 28 माह तक रहा। इस अवधि में उनके द्वारा किए कार्यों का मूल्यांकन करने से पता चलता है कि : ▪️चुना गया कांग्रेसी मंत्रिमंडल यह सिद्ध कर सका कि भारतीय जनता अपना शासन स्वयं बिना किसी बाहरी सहायता के चला सकती है। ▪️ब्रिटिश सरकार के अफसरों के मानसिक बलों में भारी कमी आई। ▪️जमींदारी प्रथा को समाप्त करने में कांग्रेसी मंत्रिमंडल बहुत हद तक सफल रहा। ▪️चुनाव और मंत्रिमंडल के कार्यों से भारतीय जनता को लंबे समय बाद अपने हाथों ही अपने शासन का स्वाद चखने को मिला। ▪️सम्पूर्ण प्रान्तों के मंत्रिमंडल ने यह सिद्ध कर दिया कि भारत के सम्पूर्ण विकास के लिए सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक विकास का किया जाना बहुत जरूरी है। सम्पूर्ण विश्व पर द्वितीय विश्व युद्ध के संकट के कारण भारतीय मंत्रिमंडल को भी त्यागपत्र देकर पुनः ब्रिटिश सरकार के हाथों शासन को सौंपना पड़ा। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #वित्त_आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत अर्द्ध न्यायिक निकाय के रूप में वित्त आयोग का प्रावधान किया गया है । इसका गठन राष्ट्रपति द्वारा हर पांचवें वर्ष या आवश्यकतानुसार उससे पहले किया जाता है। #गठन : ▪️वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और 4 अन्य सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है । उनका कार्यकाल राष्ट्रपति के आदेश के तहत तय होता है उनकी पुनः नियुक्ति भी हो सकती है । ▪️संविधान ने संसद को इन सदस्यों की योग्यता और चयन विधि का निर्धारण करने का अधिकार दिया है । इसी के तहत संसद ने आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की विशेष योग्यताओं का निर्धारण किया है। अध्यक्ष को सार्वजनिक मामलों का अनुभव होना चाहिए और अन्य चार सदस्यों को निम्नलिखित में से चुना जाना चाहिए - ▪️किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या इस पद के लिए योग्य व्यक्ति, ▪️ऐसा व्यक्ति जिसे भारत की लेखा एवं वित्त मामलों का विशेष ज्ञान हो, ▪️ऐसा व्यक्ति जिसे प्रशासन और वित्तीय मामलों का व्यापक अनुभव हो, ▪️ऐसा व्यक्ति जो अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञाता हो । #कार्य : वित आयोग भारत के राष्ट्रपति को निम्नांकित मामलों पर सिफारिश करता है- ▪️संघ और राज्यों के बीच करों कि शुद्ध आगमों का वितरण और राज्यों के बीच ऐसे आगमों का आवंटन, ▪️भारत की संचित निधि में से राज्यों के राजस्व में सहायता अनुदान को शासित करने वाले सिद्धांत, ▪️राज्य वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर राज्य में नगर पालिकाओं और पंचायतों के संसाधनों की अनुपूर्ति के लिए राज्य की संचित निधि के संवर्धन के लिए आवश्यक उपाय, ▪️राष्ट्रपति द्वारा आयोग को सुदृढ़ वित्त के हित में निर्दिष्ट कोई अन्य विषय । 1960 तक आयोग असम बिहार उड़ीसा एवं पश्चिम बंगाल को क्षतिग्रस्त जूट और जूट उत्पादों के निर्यात शुल्क में निवल प्राप्तियों के एवज में दी जाने वाली सहायता राशि के बारे में भी सुझाव देता था । संविधान के अनुसार यह सहायता राशि 10 वर्ष की स्थाई अवधि तक दी जाती रही । आयोग अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को दे सकता है जो इसे संसद के दोनों सदनों में रखता है । रिपोर्ट के साथ उसका आकलन संबंधी ज्ञापन एवं इस संबंध में उठाए जा सकने वाले कदमों के बारे में विवरण भी रखा जाता है। गौरतलब है कि वित्त आयोग की सिफारिशों की प्रकृति सलाहकार की होती है और इनको मानने के लिए सरकार बाध्य नहीं होती । यह केंद्र सरकार पर निर्भर करता है कि वह राज्य सरकारों को दी जाने वाली सहायता के संबंध में आयोग की सिफारिशों को लागू करें या ना करें। #अब_तक_नियुक्त_आयोग : वित्त आयोग के अध्यक्षों की सूची : वित्त आयोग : अध्यक्ष का नाम : कार्यकाल अवधि ▪️पहला : क्षितिज चंद्र नियोगी : 1952 से 1957 तक ▪️दूसरा : कस्तुरीरंगा संथानम :1957 से 1962 तक ▪️तीसरा : ए.के.चंदा : 1962 से 1966 तक ▪️चौथा : पाकला वेंकटरामन राव राजामन्नर : 1966 से 1969 तक ▪️पॉचवां : महावीर त्‍यागी : 1969 से 1974 तक ▪️छठा : ब्रह्मानन्द रेड्डी : 1974 से 1979 तक ▪️सातवां : जे.एम.शैलट : 1979 से 1984 तक ▪️आठवां : वाई.वी. चव्हाण :1984 से 1989 तक ▪️नौवां : एन.के.पी.साल्‍वे : 1989 से 1995 तक ▪️दसवां : कृष्ण चंद्र पंत : 1995 से 2000 तक ▪️ग्‍यारहवां : डा. अली मोहम्मद खुसरो : 2000 से 2005 तक ▪️बारहवां : चक्रवर्ती रंगराजन : 2005 से 2010 तक ▪️तेरहवा : विजय.एल.केलकर : 2010 से 2015 तक ▪️चौदहवां : डॉ. यागा वेणुगोपाल रेड्डी : 2015 से 2020 तक ▪️पंद्रहवां : एनके सिंह : 2020 से 2025 तक [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #कांग्रेस_समाजवादी_पार्टी [1934] इस समय पूरी दुनिया में समाजवाद का दौर चल रहा था. सन 1917 की रूसी क्रांति के बाद मार्क्सवाद तथा लेनिनवाद का प्रभाव यूरोप सहित उपनिवेशवाद से ग्रसित समस्त देशों में युवा वर्ग को अपनी तरफ आकर्षित कर रहा था. इसके प्रभाव में कांग्रेस भी अछूती नहीं बची थी. नेहरू भी इस समय समाजवाद के प्रभाव में थे. वे ब्रूसलेस में अंतरराष्ट्रीय दमित राष्ट्रीयता के सम्मेलन में फरवरी 1927, में शामिल हुए थे. अपने क्रांतिकारी और वामपंथी विचारों के कारण वह कांग्रेस के अंदर समाजवाद से प्रभावित युवा वर्ग के नेता बन चुके थे. इस बीच जयप्रकाश नारायण, फूलन प्रसाद वर्मा, तथा राहुल सांकृत्यायन के द्वारा जुलाई 1931 में बिहार सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की गई. इसका उद्देश्य भारत में एक ऐसे समाजवादी राज्य की स्थापना करना था जिसमें निजी संपत्ति के लिए न कोई स्थान था न भूमि व पुंजी पर व्यक्ति के स्वामित्व का. इसी तर्ज पर प्रांत में समाजवादी दलों की स्थापना संपूर्णानंद, परिपूर्णानंद, कमल पति त्रिपाठी तथा तारक भट्टाचार्य जी ने और युसूफ मेहर अली, एम. आर मसानी, अच्युत पटवर्धन तथा कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने मुंबई में जेल में बंद कांग्रेस के कई युवा समाजवादी ने कांग्रेस के अंदर सन 1933 में एक अखिल भारतीय समाज वादी संगठन बनाने का विचार किया. जयप्रकाश नारायण, अच्युत पटवर्धन, एम. आर. मसानी, एन. जी. गोरे, अशोक मेहता, एस. एम. दूषित का एम. एल. दांतवाला इस विचार को प्रारंभ करने वाले में प्रमुख थे. अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सदस्य संपूर्णानंद ने बनारस में अप्रैल 1934 मैं एक पर्चा लिखा तथा भारत के लिए एक प्रयोगिक समाजवादी दल निर्मित करने की आवश्यकता पर बल दिया. यह कांग्रेस में प्रभावशाली हो चुके पूंजीवादी और सामंतवादी तत्वों को चुनौती देने के लिए आवश्यकता था. इसमें यह बात भी स्पष्ट रूप से उल्लेखित थी कि जब समाजवादियों के हाथ में सता आएगी, उद्योगों, बैंकों में भूमि का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाएगा तथा जमीदारी प्रथा का उन्मूलन कर दिया जाएगा. कांग्रेस में समाजवादियों ने सन 1934 में, कांग्रेस के एक समूह के द्वारा विधान परिषद में प्रवेश का समर्थन करने के बाद कांग्रेस अलग दल बनाने का मन बना लिया. आचार्य नरेंद्र देव की अध्यक्षता में पटना में 17 मई, 1934 को समाजवादियों का एक सम्मेलन आयोजित किया गया. कांग्रेस के अंदर नए समाजवादी दल की स्थापना की आलोचना करते हुए आचार्य जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कांग्रेस समाजवादी दल की प्रसंगिकता को स्पष्ट किया. इस दल के सचिव की हैसियत से जयप्रकाश नारायण में अन्य प्रांतों में भी इसके प्रचार के लिए देश का दौरा प्रारंभ कर दिया. 21-22 अक्टूबर, 1934 को संपूर्णानंद की अध्यक्षता में मुंबई में कांग्रेस समाजवादी दल का प्रथम वार्षिक सम्मेलन हुआ. इसमें 13 प्रांतों के 150 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया. इसकी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जयप्रकाश नारायण (मुख्य सचिव) एस. आर. मसानी, मोहनलाल गौतम, एनजी गोरे तथा ई. एम. एस. नंबूद्रीपाद (सहायक सचिव), आचार्य नरेंद्र देव, संपूर्णानंद, श्रीमती कमला चट्टोपाध्याय, पुरुषोत्तम दास, त्रिकक दास, पी.वी. देशपांडे, राम मनोहर लोहिया, एम. एस. जोशी अमरेंद्र प्रसाद मिश्रा, चार्ल्स मस्करीनास, नवकृष्ण चौधरी तथा अच्युत पटवर्धन, (सदस्य) निर्वाचित किए गए. इस सम्मेलन में दल का संविधान तथा कार्यक्रम भी तय किया गया. यद्यपि जवाहरलाल नेहरू तथा सुभाष चंद्र बोस ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना का समर्थन किया, परंतु दोनों में से किसी ने इसकी सदस्यता भी ग्रहण की. कांग्रेस के दक्षिणपंथी गुट इसका जमकर विरोध किया वल्लभ भाई पटेल ने इसे मूर्खतापूर्ण कार्य बताया. कृषको मजदूरों और छात्रों को आकर्षण कांग्रेस समाजवादी आंदोलन के प्रति तेजी से बढ़ने लगा. लखनऊ में सन 1936 में, प्रो० एन. जी. रंगा, इंदूलाल याग्निक, स्वामी सहजानंद आदि के प्रयासों से अखिल भारतीय किसान सम्मेलन का आयोजन किया गया. इस सम्मेलन में सामंतवाद के उन्मुलन तथा लगान और कर्ज के छुट की मांग रखी गई. इस प्रकार कांग्रेस के अंदर समाजवाद के प्रति आस्था रखने वालों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी थी. इसके साथ ही स्पष्ट रूप से कांग्रेस वामपंथी और दक्षिणपंथी गुटों में लामबंद होने लगी. वामपंथियों का नेतृत्व यदि नेहरू कर रहे थे तो दक्षिणपंथीयों का पटेल. गांधी यद्यपि समाजवादियों की मार्क्सवादी और लेनिनवादी रुझान के कारण उनकी आलोचना कर रहे थे, परंतु वह दक्षिणपंथियों के साथ भी नहीं थे. यही कारण है कि उन्होंने कांग्रेस से त्यागपत्र दे देना ही उचित समझा था. ब्रिटिश संसद ने इसी बीच 2 अगस्त, 1935 को अधिनियम को मंजूरी दे दी. यद्यपि कांग्रेस ने सर्वसम्मति से इस अधिनियम को खारिज कर दिया, परंतु अब यह स्पष्ट हो चुका था कि कांग्रेस का दक्षिणपंथी गुट इसके अंतर्गत पदों को स्वीकार करने का मन बना बैठा था. जबकि कांग्रेस का वामपंथी गुट समाजवादियों के नेतृत्व में इस अधिनियम के विरोध आंदोलन चलाने तक ही बात कर रहा था. इसका वार्षिक सम्मेलन कांग्रेस के इसी गुट बंदी के दौर में अप्रैल, 1936 में लखनऊ में हुआ यद्यपि सन 1935 के अधिनियम में की जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में संपन्न इस सम्मेलन में कड़ी आलोचना की गई, परंतु इसके अंतर्गत चुनाव में हिस्सा लेने के बाद को भी इस ने स्वीकार कर लिया. कांग्रेस के अंदर समाजवादियों की यह एक करारी हार थी. [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #आपात_उपबंध सामान्‍य परिस्थितियों में भारतीय संविधान ससंघात्‍मक ढांचे का अनुसरण करता है परन्‍तु, हमारे संविधान निर्माताओं को इस बात का अहसास था कि यदि देश की सुरक्षा खतरे में हो या उसकी एकता और अखण्‍डता को खतरा हो, तो यह ढॉंचा परेशानी का कारण भी बन सकता है। ऐसी परिसस्‍थतियों में देश की रक्षा के लिये परिसंघ के सिद्धातों को त्‍याग दिया जाता है और जैसे ही देश की स्थितियां सामान्‍य होती हैं, संविधान पुन: अपने सामान्‍य रूप में कार्य करने लगता है। भारतीय संविधान निर्माताओं ने संविधान के भाग 18 के अनुच्छेद (352-360) में तीन प्रकार के आपातों का उल्‍लेख किया है – 1. युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्‍त्र विद्रोह की स्थिति में उत्‍पन्‍न आपात जिसे आम-बोलचाल में #राष्ट्रीय_आपात कहा जाता है। हालॉंकि संविधान में इसके लिये ‘आपात की उद्घोषणा‘ शीर्षक का प्रयोग हुआ है। 2. राज्‍यों में संवैधानिक तंत्र के विफल हो जाने की स्थिति से उत्‍पन्‍न परिस्थिति। प्रचलित भाषा में इसे #राष्ट्रपति_शासन के नाम से जाना जाता है। संविधान में इसके लिये कहीं भी आपात या आपातकाल शब्द का उल्‍लेख नहीं मिलता है। 3. ऐसी स्थिति जिसमें भारत का वित्‍तीय स्‍थायित्‍व या साख संकट में हो, तो उसे #वित्तीय_आपात कहते हैं। संविधान में भी इसे ‘वित्‍तीय आपात‘ कहा गया है। 1. #राष्ट्रीय_आपातकाल : #वर्णन- अनुच्छेद 352 #कारण – बाहय आक्रमण , युद्ध एवं सशस्त्र विद्रोह | #क्षेत्र – संपूर्ण भारत तथा भारत के किसी भी भाग पर लगाया जा सकता है | #संशोधन- ▪️1976 के 42 वें संविधान संशोधन से राष्ट्रपति भारत के किसी विशेष भाग पर भी राष्ट्रपति आपातकाल लागू कर सकता है | ▪️अतः 1978 के 44 वे संशोधन अधिनियम द्वारा आंतरिक गड़बड़ी के स्थान पर सशस्त्र विद्रोह शब्द से स्थापित किया गया | ▪️44 वे संशोधन 1978 से प्रधानमंत्री को मंत्रिमंडल की सहमति लेना आवश्यक किया गया है | #संसदीय_अनुमोदन – ▪️आपातकाल जारी रखने के लिए दोनों पद से विशेष बहुमत (कुल सदस्यों का 50 प्रतिशत + 1 द्वारा अनुमोदित या कुल उपस्थित सदस्यों के दो तिहाई द्वारा अनुमोदित )। ▪️दोनों सदनों द्वारा विधयेक पारित होने पर एक माह के भीतर इसे अनुमोदित कर दिया जाता है। ▪️संसद द्वारा अनुमोदन हो जाने पर आपातकाल 6 माह तक जारी रहता है, तथा प्रत्येक 6 माह बाद इसे अनुमोदित कर के अनंत समय तक बढाया जा सकता है। ▪️बिना संसद के अनुमोदन के 7 माह तक चलाया जा सकता है। #समाप्ति – ▪️राष्ट्रपति द्वारा दूसरी उद्घोषणा से। ▪️लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 1/10 सदस्य स्पीकर अथवा राष्ट्रपति को लिखित नोटिस दे तो 14 दिन के अंदर उद्घोषणा के जारी रहने के प्रस्ताव को अस्वीकार करने के लिए संसद की विशेष बैठक/ मतदान होगा (साधारण बहुमत)। #आपातकाल_के_प्रभाव – #केंद्र_राज्य_संबंध_पर_प्रभाव ▪️कार्यपालक – केंद्र हर विषय पर राज्य को निर्देश दे सकता है | ▪️विधायी – राज्य सूची में केंद्र को कानून बनाने व राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार | ( आपातकाल की समाप्ति के बाद कानून छह माह तक प्रभावी ) ▪️वितिय – राष्ट्रपति केंद्र एवं राज्यों के मध्य कर वितरण को संशोधित कर सकता है | #लोकसभा_व_राज्यसभा_के_कार्यकाल_पर_प्रभाव – दोनों का कार्यकाल, संसद विधि बनाकर 1 वर्ष के लिए बढ़ा सकता है (अनगिनत बार) | #मूल_अधिकारों_पर_प्रभाव – आपातकाल के समय अनुच्छेद 358-359 लागु हो जाते है | ▪️अनुच्छेद 358- अनुच्छेद 19 के समस्त अधिकार स्वत समाप्त ( युद्ध एवं बाह्य आक्रमण के समय, सशस्त्र विद्रोह के समय नहीं ) ▪️अनुच्छेद 358 संपूर्ण आपातकालीन समयावधि तक लागु रहता है | ▪️अनुच्छेद 359- (अनुच्छेद- 20, 21) को छोड़ अन्य अधिकार केंद्र नियम बनाकर नियंत्रित कर सकती है | #राष्ट्रीय_आपातकाल_को_अब_तक_तीन_बार #लगाया_गया_है – ▪️1962 ( भारत-चीन युद्ध : अरुणाचल प्रदेश ) ▪️1971 ( भारत-पाकिस्तान युद्ध : बांग्लादेश स्वतंत्रता ) ▪️1975( इंदिरा गांधी ) राष्ट्रीय आपातकाल के विषय में सुप्रीम कोर्ट को न्यायिक पुनर्विलोपन की शक्ति है | ____________________________________________ 2. #राष्ट्रपति_शासन : #कारण – ▪️अनुच्छेद 356 – राज्य में संवैधानिक तंत्र का विफल होना। ▪️अनुच्छेद 365 – केंद्र के निर्देशों के पालन में असफलता। #क्षेत्र – सम्पूर्ण भारत या भारत के किसी भी भाग पर। राष्ट्रपति शासन की घोषणा राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिमंडल की सिफारिश पर की जाती है | घोषणा के पश्चात इसे संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता होती है #संसदीय_अनुमोदन_की_समयाविधि – ▪️लोकसभा सत्र में है तो 2 माह के अंदर अनुमोदन लेना आवश्यक। ▪️अगर लोकसभा सत्र में नहीं है तो सत्र में आने पर 30 दिन के भीतर अनुमोदन लेना आवश्यक। ▪️बिना अनुमोदन के राष्ट्रपति शासन को maximum 8 माह तक लगाया जा सकता है। ▪️यह अनुमोदन सामान्य बहुमत से पारित किया जाता है। #अधिकतम_अवधि – 3 वर्ष ( प्रत्येक 6 माह में अनुमोदन करा कर) 44 ववे संविधान संशोधन के तहत संसद द्वारा राष्ट्रपति शासन को एक वर्ष के बाद भी जाती रखने की शक्ति पर प्रतिबन्ध लगाने हेतु एक उपबंध जोड़ा गया – #यह_तभी_संभव_है_जब- ▪️पूरे देश में या देश के किसी भाग में राष्ट्रीय आपात की घोषणा की गई हो | ▪️चुनाव आयोग द्वारा प्रमाणित करने पर की चुनाव नहीं हो सकते कठिनाई आ रही है | ▪️राष्ट्रपति किसी भी समय राष्ट्रपति शासन हटा सकता है | #प्रभाव – ▪️जिस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागु होता है वहां राज्य सरकार के संपूर्ण अधिकार केंद्र के पास चले जाते है। ▪️राष्ट्रपति को राज्य के प्रति अध्यादेश जारी करने, बजट बनाने, राज्य की संचित निधि का प्रयोग करने का पूर्ण अधिकार होता है। ▪️उच्च न्यायलय की शक्तियों में कोई कटौती नहीं होती। ▪️यह सर्वप्रथम 1951 में पंजाब में लगा था सर्वाधिक बार केरल में लगाया गया है (9 बार)। #राष्ट्रपति_शासन_का_प्रयोग_उचित_होगा_जब – ▪️त्रिशंकु विधानसभा हो। ▪️बहुमत प्राप्त दल सरकार बनाने से इंकार कर दे और राज्यपाल के समक्ष विधानसभा में स्पष्ट बहुमत किसी के पास ना हो। ▪️मंत्री परिषद त्यागपत्र दे दे और अन्य सरकार बनाने का इच्छुक ना हो अथवा स्पष्ट बहुमत का अभाव हो। ▪️राज्य केंद्र के निर्देश को मानने से इंकार कर दे। ▪️राज्य की सुरक्षा खतरे में हो। यह न्यायिक समीक्षा योग्य है | डॉक्टर अंबेडकर के अनुसार “ यह उपबंध अंतिम साधन के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए “ | ____________________________________________ 3. #वित्तीय_आपातकाल : आधार – “अनुच्छेद 360” के तहत राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सिफारिश पर इसे लागु कर सकता है | ▪️बिना संसदीय अनुमोदन के इसे अधिकतम 8 माह तक लागु रखा जा सकता है | ▪️यह न्यायिक समीक्षा योग्य विषय है ( 44 वें संशोधन 1978 के तहत ) | ▪️एक बार अनुमोदन मिलने पर इसे अनिश्चितकाल तक प्रभावी रखा जा सकता है | ▪️संसद से इसे सामान्य बहुमत द्वारा पारित करवाया जा सकता है | ▪️वित्तीय आपातकाल को राष्ट्रपति घोषणा के माध्यम से समाप्त कर सकता है | #वित्तीय_आपातकाल_के_प्रभाव – ▪️भारत सरकार की अधिकारिक कार्यकारिणी में बढ़ोतरी होती है। ▪️केंद्र, राज्य को वित्तीय मामलों में निर्देशित करता है। ▪️केंद्र सरकार, राज्य सेवा में कार्यरत सेवकों की वेतन भत्तों में कटौती कर सकती है। ▪️वित्तीय आपातकाल के समय राज्य द्वारा लाये गए धन विधयेक या वित्तीय विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के बिना पारित नहीं किया जा सकता हैं। अब तक वित्तीय आपातकाल घोषित नहीं हुआ है। यद्यपि 1991 में वित्तीय संकट आया था। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #सांप्रदायिक_अधिनिर्णय_एवं_पूना_समझौता ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रेम्जे मेकडोनाल्ड ने 16 अगस्त 1932 को ‘साम्प्रदायिक निर्णय’ की घोषणा की। साम्प्रदायिक निर्णय, उपनिवेशवादी शासन की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का एक और प्रमाण था। #साम्प्रदायिक_अधिनिर्णय_के_प्रावधान : ▪️मुसलमानों, सिखों एवं यूरोपियों को पृथक साम्प्रदायिक मताधिकार प्रदान किया गया। ▪️आंग्ल भारतीयों, भारतीय ईसाईयों तथा स्त्रियों को भी पृथक सांप्रदायिक मताधिकार प्रदान किया गया। ▪️प्रांतीय विधानमंडल में साम्प्रदायिक आधार पर स्थानों का वितरण किया गया। ▪️सभी प्रांतों को विभिन्न सम्प्रदायों के निर्वाचन क्षेत्रों में विभक्त कर दिया गया। ▪️अन्य शेष मतदाता, जिन्हें पृथक निर्वाचन क्षेत्रों में मताधिकार प्राप्त नहीं हो सका था उन्हें सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान का अधिकार प्रदान किया गया। ▪️बम्बई प्रांत में सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में से सात स्थान मराठों के लिये आरक्षित कर दिये गये। ▪️विशेष निर्वाचन क्षेत्रों में दलित जाति के मतदाताओं के लिये दोहरी व्यवस्था की गयी। उन्हें सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों तथा विशेष निर्वाचन क्षेत्रों दोनों जगह मतदान का अधिकार दिया गया। ▪️सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में दलित जातियों के निर्वाचन का अधिकार बना रहा। ▪️दलित जातियों के लिये विशेष निर्वाचन की यह व्यवस्था बीस वर्षों के लिये की गयी। ▪️दलितों को अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता दी गयी। कांग्रेस का पक्ष यद्यपि कांग्रेस साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध थी किंतु अल्पसंख्यकों से विचार-विमर्श किये बिना वह इसमें किसी भी प्रकार के परिवर्तन के पक्ष में नहीं थी। इस प्रकार साम्प्रदायिक निर्णय से गहरी असहमति रखते हुये कांग्रेस ने निर्णय किया कि वह न तो साम्प्रदायिक निर्णय को स्वीकार करेगी न ही इसे अस्वीकार करेगी। साम्प्रदायिक निर्णय द्वारा, दलितों को सामान्य हिन्दुओं से पृथक कर एक अल्पसंख्यक वर्ग के रूप मे मान्यता देने तथा पृथक प्रतिनिधित्व प्रदान करने का सभी राष्ट्रवादियों ने तीव्र विरोध किया। #गांधीजी_की_प्रतिक्रिया : गांधीजी ने साम्प्रदायिक निर्णय की राष्ट्रीय एकता एवं भारतीय राष्ट्रवाद पर प्रहार के रूप में देखा। उनका मत था कि यह हिन्दुओं एवं दलित वर्ग दोनों के लिये खतरनाक है। उनका कहना था कि दलित वर्ग की सामाजिक हालत सुधारने के लिये इसमें कोई व्यवस्था नहीं की गयी है। एक बार यदि पिछड़े एवं दलित वर्ग को पृथक समुदाय का दर्जा प्रदान कर दिया गया तो अश्पृश्यता को दूर करने का मुद्दा पिछड़ा जायेगा और हिन्दू समाज में सुधार की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जायेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि पृथक निर्वाचक मंडल का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह अछूतों के सदैव अछूत बने रहने की बात सुनिश्चित करता है। दलितों के हितों की सुरक्षा के नाम पर न ही विधानमंडलों या सरकारी सेवाओं में सीटें आरक्षित करने की आवश्यकता है और न ही उन्हें पृथक समुदाय बनाने की। अपितु सबसे मुख्य जरूरत समाज से अश्पृश्यता की कुरीति को जड़ से उखाड़ फेंकने की है। गांधीजी ने मांग की कि दलित वर्ग के प्रतिनिधियों का निर्वाचन आत्म-निर्वाचन मंडल के माध्यम से वयस्क मताधिकार के आधार पर होना चाहिए। तथापि उन्होंने दलित वर्ग के लिये बड़ी संख्या में सीटें आरक्षित करने की मांग का विरोध नहीं किया। अपनी मांगों को स्वीकार किये जाने के लिये 20 सितंबर 1932 से गांधी जी आमरण अनशन पर बैठ गये। कई राजनीतिज्ञों ने गांधीजी के अनशन को राजनीतिक आंदोलन की सही दिशा से भटकना कहा। इस बीच विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के नेता, जिनमें एम.सी. रजा, मदनमोहन मालवीय तथा बी.आर. अम्बेडकर सम्मिलित थे, सक्रिय हो गये। अंततः एक समझौता हुआ, जिसे पूना समझौता या पूनापैक्ट के नाम से जाना जाता है। #पूना_समझौता : सितंबर 1932 में डा. अम्बेडकर तथा अन्य हिन्दू नेताओं के प्रयत्न से सवर्ण हिन्दुओं तथा दलितों के मध्य एक समझौता किया गया। इसे पूना समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के अनुसार- ▪️दलित वर्ग के लिये पृथक निर्वाचक मंडल समाप्त कर दिया गया तथा व्यवस्थापिका सभा में अछूतों के स्थान हिन्दुओं के अंतर्गत ही सुरक्षित रखे गये। ▪️लेकिन प्रांतीय विधानमंडलों में दलितों के लिये आरक्षित सीटों की संख्या 47 से बढ़कर 147 कर दी गयी। ▪️मद्रास में 30, बंगाल में 30, मध्य प्रांत एवं संयुक्त प्रांत में 20-20, बिहार एवं उड़ीसा में 18-18, बम्बई एवं सिंध में 15-15, पंजाब में 8 तथा असम में 7 स्थान दलितों के लिये सुरक्षित किये गये। ▪️केंद्रीय विधानमंडल में दलित वर्ग को प्रतिनिधित्व देने के लिये संयुक्त व्यवस्था को मान्यता दी गयी। ▪️दलित वर्ग को सार्वजनिक सेवाओं तथा स्थानीय संस्थाओं में उनकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर उचित प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था की गयी। सरकार ने पूना समझौते को साम्प्रदायिक निर्णय का संशोधित रूप मानकर उसे स्वीकार कर लिया। #गांधीजी_का_हरिजन_अभियान : सांप्रदायिक निर्णय द्वारा भारतीयों को विभाजित करने तथा पुन पैक्ट के द्वारा हिन्दुओं से दलितों को पृथक करने की व्यवस्थाओं ने गांधीजी को बुरी तरह आहत कर दिया था। फिर भी गांधीजी ने पूना समझौते के प्रावधानों का पूरी तरह पालन किये जाने का वचन दिया। अपने वचन को पूरा करने के उद्देश्य से गांधीजी ने अपने अन्य कार्यों को छोड़ दिया तथा पूर्णरूपेण ‘अश्पृश्यता निवारण अभियान’ में जुट गये। उन्होंने अपना अभियान यरवदा जेल से ही प्रारंभ कर दिया था तत्पश्चात अगस्त 1933 में जेल से रिहा होने के उपरांत उनके आदोलन में और तेजी आ गयी। अपनी कारावास की अवधि में ही उन्होंने सितम्बर 1932 में ‘अखिल भारतीय अश्पृश्यता विरोधी लीग’ का गठन किया तथा जनवरी 1933 में उन्होंने हरिजन नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। जेल से रिहाई के उपरांत वे सत्याग्रह आश्रम वर्धा आ गये। साबरमती आश्रम, गांधीजी ने 1930 में ही छोड़ दिया था और प्रतिज्ञा की थी कि स्वराज्य मिलने के पश्चात ही वे साबरमती आश्रम (अहमदाबाद) में वापस लौटेंगे। 7 नवंबर 1933 को वर्धा से गांधीजी ने अपनी ‘हरिजन यात्रा‘ प्रारंभ की। नवंबर 1933 से जुलाई 1934 तक गांधीजी ने पूरे देश की यात्रा की तथा लगभग 20 हजार किलोमीटर का सफर तय किया। अपनी यात्रा के द्वारा गांधीजी ने स्वयं द्वारा स्थापित संगठन ‘हरिजन सेवक संघ’ जगह-जगह पर कोष एकत्रित करने का कार्य भी किया। गांधीजी की इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य था-हर रूप में अश्पृश्यता को समाप्त करना। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से आग्रह किया की गांवों का भ्रमण हरिजनों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उत्थान का कार्य करें। दलितों को ‘हरिजन’ नाम सर्वप्रथम गांधीजी ने ही दिया था। हरिजन उत्थान के इस अभियान में गांधीजी 8 मई व 16 अगस्त 1933 को दो बार लंबे अनशन पर बैठे। उनके अनशन का उद्देश्य, अपने प्रयासों की गंभीरता एवं अहमियत से अपने समर्थकों को अवगत कराना था। अनशन की रणनीति ने राष्ट्रवादी खेमे को बहुत प्रभावित किया। बहुत से लोग भावुक हो गये। अपने हरिजन आंदोलन के दौरान गांधीजी को हर कदम पर सामाजिक प्रतिक्रियावादियों तथा कट्टरपंथियों के विरोध का सामना करना पड़ा। उनके खिलाफ प्रदर्शन किये तथा उन पर हिंदूवाद पर कुठाराघात करने का आरोप लगाया गया। सविनय अवज्ञा आदोलन तथा कांग्रेस का विरोध करने के निमित्त, सरकार ने इन प्रतिक्रियावादी तत्वों का भरपूर साथ दिया। अगस्त 1934 में लेजिस्लेटिव एसेंबली में ‘मंदिर प्रवेश विधेयक’ को गिराकर, सरकार ने इन्हें अनुग्रहित करने का प्रयत्न किया। बंगाल में कट्टरपंथी हिन्दू विचारकों ने पूना समझौते द्वारा हरिजनों को हिन्दू अल्पसंख्यक का दर्जा दिये जाने की अवधारणा को पूर्णतयाः खारिज कर दिया। #गांधी_जी_के_जाति_संबंधी_विचार : गांधीजी ने अपने पूरे हरिजन आंदोलन, सामाजिक कार्य एवं अनशनों में कुछ मूलभूत तथ्यों पर सर्वाधिक जोर दिया- ▪️हिन्दू समाज में हरिजनों पर किये जा रहे अत्याचार तथा भेदभाव की उन्होंने तीव्र भर्त्सना की। ▪️दूसरा प्रमुख मुद्दा था- छुआछूत को जड़ से समाप्त करना। उन्होंने अश्पृश्यता की कुरीति को समूल नष्ट करने तथा हरिजनों को मंदिर में प्रवेश का अधिकार दिये जाने की मांग की। ▪️उन्होंने इस बात की मांग उठायी कि हिन्दुओं द्वारा सदियों से हरिजनों पर जो अत्याचार किया जाता रहा है, उसे अतिशीघ्र बंद किया जाना चाहिए तथा इस बात का प्रायश्चित करना चाहिए। शायद यही वजह थी कि गांधीजी ने अम्बेडकर या अन्य हरिजन नेताओं की आलोचनाओं का कभी बुरा नहीं माना। उन्होंने हिन्दू समाज को चेतावनी दी कि “यदि अश्पृश्यता का रोग समाप्त नहीं हुआ तो हिन्दू समाज समाप्त हो जायेगा। यदि हिंदूवाद को जीवित रखना है तो अश्पृश्यता को समाप्त करना ही होगा”। ▪️गांधीजी का सम्पूर्ण हरिजन अभियान मानवता एवं तर्क के सिद्धांत पर अवलंबित था। उन्होंने कहा कि शास्त्र छुआछूत की इजाजत नहीं देते हैं। लेकिन यदि वे ऐसी अवधारणा प्रस्तुत करते हैं तो हमें उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिए क्योंकि ऐसा करना मानवीय प्रतिष्ठा के विरुद्ध है। गांधीजी अस्पृश्यता निवारण के मुद्दे को अंतर्जातीय विवाह एवं अंतर्जातीय भोज जैसे मुद्दों के साथ जोड़ने के पक्षधर नहीं थे क्योंकि उनका मानना था कि ये चीजें स्वयं हिन्दू सवर्ण समाज एवं हरिजनों के बीच में भी हैं। उनका कहना था कि उनके हरिजन अभियान का मुख्य उद्देश्य, उन कठिनाइयों एवं कुरीतियों को दूर करना है, जिससे हरिजन समाज शोषित और पिछड़ा है। इसी तरह उन्होंने जाति निवारण तथा छुआछूत निवारण में भी भेद किया। इस मुद्दे पर वे डा. अम्बेडकर के इन विचारों से असहमत थे कि छुआछूत की बुराई जाति प्रथा की देन है तथा जब तक जाति प्रथा बनी रहेगी यह बुराई भी जीवित रहेगी। अतः जाति प्रथा को समाप्त किये बिना अछूतों का उद्धार संभव नहीं है। गांधीजी का कहना था कि वर्णाश्रम व्यवस्था के अपने कुछ दोष हो सकते हैं, लेकिन इसमें कोई पाप नहीं है। हां, छुआछूत अवश्य पाप है। उनका तर्क था कि छुआछूत, जाति प्रथा के कारण नहीं अपितु ऊच-नीच के कृत्रिम विभाजन के कारण है। यदि जातियां एक दूसरे की सहयोगी एवं पूरक बन कर रहें तो जाति प्रथा में कोई दोष नहीं है। कोई भी जाति न उच्च है न निम्न। उन्होंने वर्णाश्रम व्यवस्था के समर्थक एवं विरोधियों दोनों से आह्वान किया कि वे आपस में मिलकर काम करें क्योंकि दोनों ही छुआछूत के विरुद्ध हैं। गांधीजी का विचार था कि छुआछूत की बुराई का उन्मूलन करने से उसका साम्प्रदायिकता एवं ऐसे ही अन्य मुद्दों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जबकि इसकी उपस्थिति का तात्पर्य होगा जाति प्रथा में उच्च एवं निम्न की अवधारणा को स्वीकार करना। गांधीजी ने छुआछूत के समर्थक दकियानूसी प्रतिक्रियावादी हिन्दुओं को ‘सेनापति‘ कहा। किंतु वे इन पर किसी प्रकार का दबाव डाले जाने के विरोधी थे। उनका कहना था कि इन्हें समझा-बुझाकर तथा इनके दिलों को जीतकर इन्हें सही रास्ते पर लाना होगा न कि इन पर दबाव डालकर। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके अनशन का उद्देश्य, उनके द्वारा चलाये जा रहे छुआछूत विरोधी आंदोलन के संबंध में उनके मित्रों एवं अनुयायियों के उत्साह को दुगना करना है। #अभियान_का_प्रभाव : गांधीजी ने बार-बार यह बात दुहराई कि उनके हरिजन अभियान का उद्देश्य राजनीतिक नहीं है अपितु यह हिन्दू समाज एवं हिन्दुत्व का शुद्धीकरण आंदोलन है। वास्तव में गांधीजी ने अपने हरिजन अभियान के दौरान केवल हरिजनों के लिये ही कार्य नहीं किया। उन्होंने कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को बताया कि जनआंदोलन के निष्क्रिय या समाप्त हो जाने पर वे स्वयं को किस प्रकार के रचनात्मक कार्यों में लगा सकते हैं। उनके आंदोलन ने राष्ट्रवाद के संदेश को हरिजनों तक पहुंचाया। यह वह वर्ग था, जिसके अधिकांश सदस्य खेतिहर मजदूर थे तथा धीरे-धीरे किसान आंदोलन तथा राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ते जा रहे थे। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन : #केंद्र_राज्य_संबंध संविधान में केंद्रीय व्यवस्था के अनुरूप केंद्र तथा राज्य संबंधों की विस्तृत विवेचना की गयी है अत: भारतीय एकता व अखंडता के लिए केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया है | केंद्र व राज्य के मध्य संबंधो का अध्यनन तीन दृष्टिकोण से किया जाता है – ▪️विधायी संबंध अनुच्छेद : (245-255) ▪️प्रशासनिक संबंध अनुच्छेद : (256-263) ▪️वितीय संबंध अनुच्छेद : (268-293) #विधायी_संबंध : भारतीय संविधान के भाग -11 में अनुच्छेद 245 से 255 व अनुसूची 7 केंद्र व राज्य के मध्य विधायी संबंधों का उल्लेख किया गया है | 7 वीं अनुसूची के अंतर्गत केंद्र व् राज्य के मध्य विधायी संबंधो के लिए त्रिस्तरीय व्यवस्था की गयी है – ▪️राज्य सूची ▪️संघ सूची ▪️समवर्ती सूची #संघ_सूची – इसके अंतर्गत राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय महत्त्व के 100 विषय (मूलत: 97) सम्मिलित है जिन पर विधि बनाने का अधिकार केवल संसद के पास है। जैसे- रक्षा , बैंकिंग , मुद्रा , परमाण्विक ऊर्जा , सेना , बंदरगाह आदि। #राज्य_सूची – इसके अंतर्गत क्षेत्रीय व् स्थानीय महत्व के 61 विषय (मूलत: 66) शामिल है , राज्य विधानमंडल को सामान्य स्थिति में इन विषयों पर विधि निर्माण का अधिकार प्राप्त है | जैसे – कृषि , सार्वजनिक व्यवस्था , पुलिस , जेल , स्वास्थ्य आदि। #समवर्ती_सूची – इस सूची के अंतर्गत क्षेत्रीय व राष्ट्रीय महत्व के 52 विषय (मूलत: 47) शामिल है, जिन पर केंद्र व राज्य दोनों को विधि बनाने का अधिकार प्राप्त है। जैसे – शिक्षा , वन , बिजली , दवा , अखबार आदि। 42 वें संविधान संसोधन 1976 के द्वारा 5 विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में जोड़ा गया। ▪️शिक्षा ▪️वन ▪️मापतौल ▪️जंगली जानवरों व पक्षियों का संरक्षण ▪️उच्चतम व उच्च न्यायालयों के अतिरिक्त सभी का गठन अनुच्छेद : 248 के अंतर्गत ऐसे विषयों का वर्णन किया गया है जो किसी भी सूची में सम्मिलित नहीं है उनके संबंध में कानून बनाने का अधिकार संसद को प्राप्त है , भारतीय संविधान के अनुसार कुछ विशेष परिस्थितयों में राष्ट्रीय हित व एकता हेतु संसद को राज्यसूची के विषयों पर विधि बनाने का अधिकार प्राप्त है। जिसके लिए निम्न प्रावधान किये गए है — ▪️ अनुच्छेद : 249 के अनुसार यदि राज्यसभा द्वारा राज्यसूची के किसी विषय को विशेष बहुमत (2/3) से राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया जा सकता है तो संसद को उस विषय पर विधि निर्माण की शक्ति प्राप्त हो जाती है किंतु यह विधि केवल 1 वर्ष तक प्रभावी रहती है इसे आगे भी बढ़ाया जा सकता है। ▪️आपातकाल की स्थिति में अनुच्छेद : 250 के अनुसार राज्य की समस्त विधायी शक्तियों पर संसद का अधिकार हो जाता है किंतु आपातकाल समाप्त होने के 6 माह बाद तक ही यह विधि प्रभावी रहती है। ▪️ अनुच्छेद : 252 के अनुसार यदि दो या दो से अधिक राज्यों के विधानमंडल प्रस्ताव पारित कर यह इच्छा व्यक्त करते है की उनके संबंध में राज्यसूची के विषय पर संसद द्वारा कानून बनाया जा सकता है तो उस विषय पर विधि बनाने का अधिकार संसद को प्राप्त हो जाता है। #राज्यों_के_विधान_मंडल_द्वारा_नियंत्रण ▪️राज्यपाल कुछ विधेयकों को राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज सकता है व राष्ट्रपति को उन विधेयकों पर वीटो की शक्ति प्रदान है। ▪️राज्यसूची से संबंधित कुछ विधेयको को सिर्फ राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से संसद में लाया जा सकता है। ▪️वित्तीय आपातकाल के समय में राष्ट्रपति विधानमंडल द्वारा पारित धन विधेयक को सुरक्षित रख सकता है। ____________________________________________ #प्रशासनिक_संबंध : संविधान के भाग – 11 में अनुच्छेद : (256 से 263) तक केंद्र व राज्य के मध्य प्रशासनिक संबंधो का उल्लेख किया गया है – संघीय शासन प्रणाली में सामान्यत: संघ व् राज्यों के मध्य प्रशासनिक संबंध सामान्यत: विवाद ग्रस्त रहते है अत: संविधान द्वारा ऐसे प्रावधान किए गए है ताकि केंद्र व राज्यों के मध्य सहज संबंध बने रहे | #कार्यकारी_शक्तियों_का_विभाजन – केंद्र व राज्य के मध्य कुछ विषयों को छोड़कर कार्यकारी व विधायी शक्तियों का विभाजन किया गया है , इस प्रकार केंद्र की शक्तियां संपूर्ण भारत में विस्तृत है – ▪️उन विषयों (संघ सूची) के संदर्भ में जिसमें संसद को विधायी शक्तियां प्राप्त है। ▪️किसी संधि या समझोते के अंतर्गत अधिकार प्राधिकरण व न्यायक्षेत्र का कार्य। ▪️इसी प्रकार राज्य की कार्यकारी शक्तियां राज्यसूची के विषयों पर राज्य की सीमा तक विस्तृत है। ▪️समवर्ती सूची के विषय पर केंद्र व राज्य दोनों को शक्तियां प्राप्त है किंतु विवाद की स्थिति में केंद्र द्वारा बनाई गयी विधि सर्वोच्च होगी। #राज्यों_व_केंद्र_के_दायित्व – राज्य की कार्यकारी शक्तियों निम्न दो प्रकार से उपयोग किया जा सकता है – ▪️संसद द्वारा निर्मित किसी विधि के अनुरूप कार्य करना तथा इस संबंध में कार्यपालिका को राज्यों को दिशा – निर्देश देने का अधिकार प्राप्त है। ▪️राज्य कि कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए कि वह संघ की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में बाधक न हो। अत: किसी राज्य द्वारा संविधान के दिशा – निर्देशों के अनुसार कार्य ना करने पर अनुच्छेद : 365 के अंतर्गत राज्य पर राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। #केंद्र_व_राज्यों_के_मध्य_सहयोग – ▪️ अनुच्छेद : 258 के अनुसार केंद्र द्वारा राज्यों को कुछ प्रशासनिक कार्य सौंपे जा सकते है तथा राज्यों द्वारा केंद्र को कुछ प्रशासनिक कार्य सौंपे जा सकते है। ▪️ अनुच्छेद : 261 के अनुसार भारतीय राज्यक्षेत्र के सभी भागों में संघ तथा राज्यों के सार्वजनिक कार्यों अभिलेखों व् न्याय कार्यवाहियों को पूर्ण मान्यता प्रदान की जाएगी। ▪️ अनुच्छेद : 262 के अनुसार दो या दो से अधिक राज्यों के बीच में नदियों के पानी से संबंधित विवादों का निर्णय करने के लिए संसद को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है। अंतर्राज्यीय नदी घाटी के विकास के संबंध में सरकार को सलाह देने के लिए नदी बोर्ड की स्थापना (1956) में की गयी। अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम (1956) नदी विवाद को जल विवाद अधिकरण द्वारा मध्यस्थ के लिए निर्देश करने का उपबंध करता है। #अखिल_भारतीय_सेवा – भारत में भी किसी अन्य संघ की तरह केंद्र व राज्यों की सार्वजनिक सेवाएं विभाजित है , जिन्हें केंद्र या राज्य सेवाएं कहाँ जाता है। इसके अंतर्गत अखिल भारतीय सेवाएं (IAS, IPS, IFS) शामिल है। इन सेवाओं के अधिकारियों की नियुक्ति व प्रशिक्षण केंद्र द्वारा किया जाता है किंतु यह अधिकारी केंद्र व राज्यों के अंतर्गत उच्च पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान करते है। #राज्य_लोक_सेवा_आयोग – इस संदर्भ में केंद्र व राज्यों के मध्य संबंध को निम्न प्रकार से उल्लेखित किया जा सकता है- ▪️राज्य लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है लेकिन उन्हें केवल राष्ट्रपति दवा ही हटाया जा सकता है। ▪️दो या दो से अधित विधान मंडलों के अनुरोध पर संसद द्वारा संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग का गठन किया जा सकता है लेकिन इसके सदस्य व् अध्यक्षों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। #आपातकालीन_उपबंध ▪️ अनुच्छेद : 352 राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में राज्यों की समस्त शक्तियां केंद्र के पास आ जाती है। ▪️ अनुच्छेद : 356 राष्ट्रपति शासन की स्थिति में राज्यों की समस्त शक्तियां राष्ट्रपति के पास आ जाती है। ▪️ अनुच्छेद : 360 वित्तीय आपातकाल। ____________________________________________ #वित्तीय_संबंध : संविधान के भाग -12 में अनुच्छेद : 268 से 293 तक केंद्र व राज्यों के मध्य वित्तीय संबंधो का उल्लेख किया गया है जिसके अधिकांश प्रावधान भारत शासन अधिनियम -1935 से लिए गये है — ▪️संघ के राजस्व स्रोतो का उल्लेख संघ सूची में किया गया है जिसमे 15 विषय सम्मिलित है। ▪️राज्य के राजस्व स्रोतो का उल्लेख राज्य सूची में किया गया है जिसमे 20 विषय सम्मिलित है। ▪️समवर्ती सूची के अंतर्गत 3 विषय सम्मिलित है जिन पर केंद्र व राज्य दोनों को कर निर्धारण का अधिकार है। वर्तमान में संघ सूची व राज्य सूची के अंतर्गत निहित विषयों को समाप्त कर पूरे देश में एकीकृत कर व्यवस्था वस्तु और सेवा कर (GST- Goods & Services Tax) लागू कर दिया है। #आपातकालीन_स्थिति_में_वित्तीय_संबंध ▪️ अनुच्छेद : 352 के अंतर्गत राष्ट्रीय आपातकाल लागू होने की स्थिति में राष्ट्रपति केंद्र व राज्य के मध्य संवैधानिक राजस्व वितरण कम या रोक सकता है। ▪️अनुच्छेद : 356/365 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन लागू होने की स्थिति में संसद संबंधित राज्य संबंधित राज्य की विधायी शक्तियों का प्रयोग करती है , राज्य का मंत्रिमंडल समाप्त हो जाता है व संपूर्ण कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति के पास आ जाती है। राष्ट्रपति द्वारा इस शक्ति का प्रयोग राज्यपाल या अन्य प्राधिकारी के माध्यम से किया जाता है। ▪️ अनुच्छेद : 360 के अंतर्गत वित्तीय आपातकाल की स्थिति में केंद्र राज्यों को निर्देश दे सकता है कि राज्य द्वारा राज्य की सेवा में लगे सभी लोगों के वेतन व भत्ते कम करे तथा सभी धन विधेयक व वित्त विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए आरक्षित रखे जा सकते है। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #भारतीय_राजव्यवस्था_एवं_शासन #उच्च_न्यायालय भारतीय संविधान के अनुसार, उच्च न्यायालय राज्य न्यायपालिका का सर्वोच्च न्यायालय है । संविधान के अनुच्छेद 214 के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय की व्यवस्था की गयी है । यह आवश्यक नहीं की प्रत्येक राज्य के लिए एक पृथक उच्च न्यायालय हो। संविधान के अनुच्छेद 231 के अनुसार, संसद कानून द्वारा दो या दो से अधिक राज्यों या दो राज्यों और एक केन्द्र शासित प्रदेशों के लिए संयुक्त उच्च न्यायालय की व्यवस्था कर सकती है । उच्च न्यायालय राज्य का सबसे बड़ा न्यायालय है तथा राज्य के अन्य न्यायालय उसके अधीन होते है। #गठन : संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या निश्चित की गयी है, परंतु राज्य उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की संख्या निश्चित नहीं की गयी है । उनकी संख्या राष्ट्रपति पर निर्भर करती है । सभी उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या समान होती है। संविधान के अनुच्छेद 216 के अनुसार प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और ऐसे अन्य न्यायाधीश होते है, जिनको राष्ट्रपति भिन्न भिन्न समय पर आवश्यकता के अनुसार नियुक्त करता है । साथ ही अनुच्छेद 224 में यह भी प्रावधान है कि नियमित न्यायाधीशों के अतिरिक्त कुछ अन्य अतिरिक्त न्यायाधीश भी दो वर्ष के लिए नियुक्त किये जा सकते है । इसके अतिरिक्त उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति की स्वीकृति से उच्च न्यायालय के किसी सेवा-निवृत्त न्यायाधीश को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में कार्य करने के लिए आग्रह कर सकता है । #नियुक्ति : संविधान के अनुच्छेद 216 के अनुसार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है अनुच्छेद 317 के अनुसार मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा संबंधित राज्य के राज्यपाल का परामर्श लेता है । अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा संबंधित राज्य के राज्यपाल के अतिरिक्त उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का परामर्श लेना राष्ट्रपति के लिए अनिवार्य है, परंतु संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय राष्ट्रपति के लिए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श को मानना अनिवार्य है या नही 1993 के सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण निर्णय ने यह निश्चित कर दिया है कि भारत में मुख्य न्यायाधीश की सहमति के बिना किसी उच्च न्यायालय में किसी न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं हो सकती है यदि उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश का स्थान किसी कारणवश अस्थायी रूप से रिक्त हो जाए जो राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के किसी भी न्यायाधीश को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर सकता है । #योग्यताएं : संविधान के अनुच्छेद 217(2) के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निर्धारित की गयी है - ▪️वह भारत का नागरिक हो। ▪️भारत में कम से कम 10 वर्ष तक किसी न्यायिक पद पर आसीन रहा हो। ▪️किसी भी राज्य के उच्च न्यायालय में या एक से अधिक राज्य के उच्च न्यायालयों में कम से कम 10 वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो । #कार्यकाल : संविधान के अनुच्छेद 217 (1) के अनुसार उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक अपने पद पर आसीन रह सकते है । उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का पद इस निश्चित आयु से पूर्व भी निम्नलिखित कारणों के आधार पर रिक्त हो सकता है- ▪️यदि वह स्वयं त्यागपत्र दे दे। ▪️यदि संसद के दोनों सदन पृथक पृथक अपनी सदस्य संख्या के बहुमत से उपस्थित एवं मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों के दो तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पारित करके राष्ट्रपति को भेज दे तथा राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को अपदस्थ करने का आदेश जारी कर दे , एवं ▪️यदि राष्ट्रपति उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त कर दे या उसे किसी अन्य राज्य के उच्च न्यायालय में स्थानान्तरित कर दे। #वेतन_तथा_भत्ते : सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालय (सेवा शर्ते) संशोधन अधिनियम 1998 के अनुसार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को 2.50 लाख रूपये तथा न्यायाधीशों को 2.25 रूपये मासिक वेतन के रूप में मिलते है । इसके अतिरिक्त उन्हे कई प्रकार के भत्ते तथा सेवा निवृत्त के पश्चात पेंशन भी दी जाती है । उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते तथा नौकरी से संबंधित शर्ते संसद कानून द्वारा निश्चित करती है। न्यायाधीशों के वेतन तथा भत्ते राज्य की संचित निधि में से दिये जाते है और उनके कार्यकाल में उसे कम नहीं किया जा सकता है। #शपथ_ग्रहण : संविधान के अनुच्छेद 219 के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को अपने पद पर आसीन होने से पूर्व राज्य के राज्यपाल या उसके द्वारा नियुक्त किये गये किसी अधिकारी के सम्मुख संविधान के प्रति निष्ठावान रहने तथा अपने कर्तव्य का ईमानदारी से पालन करकने की शपथ ग्रहण करनी पड़ती है। #स्थानांतरण : संविधान के अनुच्छेद 22 के अनुसार राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के पश्चात किसी न्यायाधीश का एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में स्थानांतरण कर सकता है। #न्यायाधीशों_की_स्वतंत्रता : संविधान में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की स्वतंत्रता बनाये रखने के लिए कई प्रावधान किये गये है- ▪️संविधान के अनुच्छेद 218 के अनुसार न्यायाधीश अपने पद का कार्यकाल निश्चित किया हुआ है । अर्थात उच्च न्यायालय में नियुक्त न्यायाधीश के कार्यकाल को संवैधानिक गारंटी दी गई है। ▪️राज्य स्तर पर न्यायपालिका को वित्तीय मामलों में कुछ विशेष अधिकार प्राप्त है । इसका मूल उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखना है । उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन तथा भत्ते, अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन आदि तथा प्रशासनिक व्यय राज्य के संचित कोष से दिये जाते हैं। #उच्च_न्यायालय_का_क्षेत्राधिकार_शक्ति_तथा_कार्य : राज्य के उच्च न्यायालयों को कई प्रकार की शक्तियां प्रदान की गई है। संविधान को लागू होने के पूर्व ही उच्च न्यायालय अस्तित्व में थे । अतः उच्च न्यायालय अपने पहले के क्षेत्राधिकार बनाए हुए है। संविधान के अनुच्छेद 225 के अनुसार उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार एवं शक्तियां वही होंगी जो संविधान के प्रारंभ होने से पहले थीं । #आरंभिक_या_मूल_अधिकार_क्षेत्र : संविधान में उच्च न्यायालय की शक्तियों का वर्णन विस्तारपूर्वक नहीं किया गया है बल्कि यह कहा गया है कि उच्च न्यायालय को वही अधिकार क्षेत्र प्राप्त होगा जो संविधान के लागू होने के पूर्व उच्च न्यायालय को प्राप्त था। इसका अभिप्राय यह हुआ कि उच्च न्यायालयों का मूल अधिकार क्षेत्र लगभग वही है जो वर्तमान संविधान लागू होने के पूर्व उन्हें प्राप्त था । निम्नलिखित अभियोगों में उच्च न्यायालय को आरंभिक क्षेत्र प्राप्त है- ▪️संविधान के अनुच्छेद-226 के अनुसार मौलिक अधिकार से संबंधित कोई भी अभियोग सीधा उच्च न्यायालय में लाया जा सकता है। मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए उच्च न्यायालय को निम्नलिखित पांच प्रकार के लेख जारी करने का अधिकार प्राप्त है। 1.बंदी प्रत्यक्षीकरण आदेश 2. परमादेश लेख 3. प्रतिषेध लेख 4.अधिकार पृच्छा आदेश 5. उत्प्रेषण लेख। ▪️उच्च न्यायालय न केवल मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए उपर्युक्त लेख जारी कर सकते है बल्कि अन्य कार्यो के लिए भी उन्हे ऐसे लेख जारी करने का अधिकार प्राप्त है। ▪️तलाक, वसीयत, जल सेना विभाग, न्यायालय का अपमान, कम्पनी कानून आदि से संबंधित अभियोग भी उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। ▪️मुंबई, कलकत्ता तथा चेन्नई के उच्च न्यायालयों को दो हजार रूपये या इससे अधिक राशि या इस मूल्य की सम्पत्ति से संबंधित अभियोग सुनने का मूल अधिकार क्षेत्र प्राप्त है । परंतु अन्य राज्यों के उच्च न्यायालय को आरम्भिक अधिकार क्षेत्र प्राप्त नहीं है। #अपीलीय_अधिकार_क्षेत्र : उच्च न्यायालयों को निम्नलिखित दीवानी तथा फौजदारी मुकदमों में अधीनस्थ न्यायालयों के निर्णय के विरूद्व अपीलें सुनने का अधिकार प्राप्त है। ▪️उच्च न्यायालय निम्न न्यायालयों के निर्णय के विरूद्ध उन दीवानी मुकदमों की अपील सुन सकता है, जिसमें पांच हजार या इससे अधिक रकम या इतने मूल्य की सम्पत्ति का प्रश्न हो। ▪️उच्च न्यायालय निम्न न्यायालयों के निर्णय के विरूद्ध ऐसे फौजदरी मुकदमों की अपील सुन सकते हैं, जिनमें निम्न न्यायालयों ने अपराधी को चार वर्ष अथवा इससे अधिक समय के लिए कैद की सजा दी हो। ▪️जिले तथा सेशन जज हत्या के मुकदमों में दोषी को मृत्यु दण्ड दे सकते हैं परंतु जज द्वारा दिये गये मृत्युदण्ड की पुष्टि उच्च न्यायालयों की ओर से करवानी अनिवार्य है। उच्च न्यायालय की पुष्टि के बिना अपराधी को फांसी नहीं दी जा सकती है। ▪️कोई ऐसा मुकदमा जिसमें संविधान की व्याख्या का प्रश्न हो, उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। #न्यायिक_पुनरावलोकन_का_अधिकार : सर्वोच्च न्यायालय की तरह राज्य के उच्च न्यायालयों को भी कानून संबंधी न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार प्राप्त है। उच्च न्यायालय संसद तथा राज्य विधानमंडल द्वारा बनाये गये किसी ऐसे कानून को असंवैधानिक घोषित कर सकती है, जो संविधान के किसी अनुच्छेद के विरूद्ध हों परंतु उच्च न्यायालय के ऐसे निर्णयों के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। #प्रमाण_पत्र_देने_का_अधिकार : उच्च न्यायालय के निर्णय के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। परंतु इसके लिए संबंधित उच्च न्यायालय की आज्ञा आवश्यक है। इसके बावजूद संविधान के अनुच्छेद 136 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों की आज्ञा के बिना उसके निर्णय के विरूद्ध स्वेच्छा से भी मुकदमें की अपील करने की आज्ञा दे सकता है। #निम्न_न्यायालय_से_मुकदमें_को_स्थानांतरित #करने_का_अधिकार : यदि उच्च न्यायालय के विचार में किसी निम्न न्यायालयों में चल रहे किसी मुकदमे में कानून की व्याख्या का कोई विशेष प्रश्न हो तो वह उस मुकदमे को अपने पास मंगवा सकता है । उच्च न्यायालय ऐसे मुकदमों का निर्णय स्वयं भी कर सकता है अथवा संबंधित कानून की व्याख्या करके निम्न न्यायालय को मुकदमा वापस भेज सकता है । यदि उच्च न्यायालय कानून की व्याख्या करके मुकदमा अधीनस्थ न्यायालय को वापस कर दे तो अधीनस्थ न्यायालय मुकदमें का निर्णय उच्च न्यायालय की व्याख्या के अनुसार ही करता है । #प्रशासनिक_शक्तियां : राज्यों के उच्च न्यायालय को अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत स्थापित सभी न्यायालयों पर नियंत्रण रखने का अधिकार प्राप्त है। इसके संबंध में उच्च न्यायालय निम्नलिखित प्रशासनिक कार्य करते है- ▪️अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यवाही का विवरण मांग सकते हैं। ▪️अपने अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यवाही के संबंध में नियम बना सकते हैं। ▪️अधीनस्थ न्यायालयों की कार्य प्रणाली रिकार्ड, रजिस्टर तथा हिसाब-किताब आदि रखने के सम्बंध में नियम निर्धरित कर सकते हैं। ▪️उच्च न्यायालय, किसी मुकदमें को अपने किसी अधीनस्थ न्यायालय से किसी दूसरे अधीनस्थ न्यायालय में स्थानांतरित कर सकते हैं। ▪️उच्च न्यायालय, अपने अधीनस्थ न्यायालयों के रिकार्ड, कागज-पत्र आदि निरीक्षण के लिए मंगवा सकते हैं। ▪️उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों के कर्मचारियों के वेतन, भत्ते तथा सेवा आदि के नियम निर्धारित कर सकते हैं। ▪️उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश, न्यायालय के कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकता है। इस संबंध में राज्यपाल उसे लोकसेवा आयोग का परामर्श लेने के लिए कह सकता है। #अधिकार_क्षेत्र_का_विस्तार : संविधान के अनुच्छेद 230 के अनुसार संसद कानून द्वारा किसी राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में न्यायिक कार्यो के लिए किसी केंद्र शासित प्रदेश को सम्मिलित कर सकती है या उसको अधिकार क्षेत्र से बाहर निकाल सकती है। #अभिलेख_न्यायालय : संविधान के अनुच्छेद 215 के अनुसार प्रत्येक राज्य के उच्च न्यायालय को अभिलेख न्यायलय लेख न्यायालय में सभी निर्णय एवं कार्यवाहियों को प्रमाण के रूप में प्रकाशित किया जाता है और उसके निर्णय सम्बंधित राज्य के सभी न्यायालयों में भी माने जाते हैं। इसके निर्णय अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों में प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किये जा सकते हैं परंतु अन्य राज्यों के उच्च न्यायालयों के लिए इस निर्णय को मानना अनिवार्य नहीं है। जब किसी न्यायालय को अभिलेख न्यायालय का स्तर प्रदान किया जाता है तो वह न्यायालय किसी भी व्यक्ति को न्यायालय का अपमान करने के अपराध में दण्ड दे सकता है। राज्यों के उच्च न्यायालयों को न्यायालय का अपमान करने के दोष में दण्ड देने का अधिकार प्राप्त है। अतः राज्यों के उच्च न्यायालय भारतीय न्यायपालिका के महत्वपूर्ण अंग है। राज्य का सबसे बडा न्यायालय होने के कारण राज्य के अन्य न्यायालय उसके अधीन कार्य करते हैं। राज्य की कार्यपालिका तथा विधायिका से सर्वोच्च न्यायालय की भांति राज्य के उच्च न्यायालयों को भी स्वतंत्रता प्रदान की गई है। राज्य के उच्च न्यायालयों के संबंध में वे सभी सिद्वांत अपनाये गये हैं जो स्वतंत्र न्यायपालिका के लिए अनिवार्य हैं। [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #गोलमेज_सम्मेलन जिस दौरान पूरे भारत में सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रगति पर था और सरकार का दमन चक्र तेजी से चल रहा था, उसी समय वायसराय लॉर्ड इर्विन और मि. साइमन ने सरकार पर यह दबाव डाला कि वह भारतीय नेताओं तथा विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों से सलाह लेकर भारत की संवैधानिक समस्याओं का निर्णय करे. इसी उद्देश्य से लन्दन में तीन गोलमेज सम्मेलनों का आयोजन किया गया. इन सम्मेलन का कोई आशाजनक परिणाम नहीं निकल कर सामने आया. उल्टे इससे भारत के विभिन्न वर्गों और संप्रदायों में मतभेद ही बढ़ा और सांप्रदायिकता के विकास में अत्यधिक वृद्धि हुई. आइए जानते हैं तीनों गोलमेज सम्मेलनों के बारे में विस्तार से - #प्रथम_गोलमेज_सम्मेलन : प्रथम गोलमेज सम्मेलन 12 नवम्बर 1930 से 19 जनवरी 1931 तक लॉर्ड इर्विन के प्रयास से हुआ. सम्मेलन में कुल 86 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिसमें तीन ग्रेट ब्रिटेन, 16 भारतीय देशी रियासतों और शेष 57 अन्य प्रतिनिधि थे. ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों के प्रतिनिधियों में सर तेज बहादुर सप्रु, श्री निवास शास्त्री, डॉक्टर जयकर, सी. वाई. चिंतामणि और डा. अम्बडेकर जैसे व्यक्ति थे. सम्मेलन का उद्घाटन जॉर्ज पंचम ने किया एवं इसकी अध्यक्षता ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने की. प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड ने तीन आधारभूत सिद्धान्तों की चर्चा की – ▪️केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा का निर्माण संघ शासन के आधार पर होगा और ब्रिटिश भारतीय प्रांत तथा देशी राज्य संघ शासन की इकाई का रूप धारण करेंगे. ▪️केंद्र में उत्तरदायी शासन की स्थापना होगी, किन्तु सुरक्षा और विदेश विभाग भारत के गवर्नर जनरल के अधीन होंगे. ▪️अतिरिक्त काल में कुछ रक्षात्मक विधान अवश्य होंगे. ब्रिटिश प्रधानमंत्री के सुझावों के प्रति प्रतिनिधियों की भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएं हुईं. संघ शासन के सिद्धांत को सभी प्रतिनिधियों ने स्वीकार कर लिया. देशी नरेशों ने भी संघ में सम्मिलित होना स्वीकार कर लिया. प्रांतीय स्वतंत्रता के संबंध में भी विचारों में मतभेद नहीं था. भारतीय प्रतिनिधियों ने इसका समर्थन किया. कवेल सरंक्षण और उत्तरदायी मंत्रियों पर नियंत्रण के सबंध में पारस्परिक मतभेद पाया गया. कुछ लोगों ने केन्द्र में आंशिक उत्तरदायित्व की जगह पूर्ण उत्तरदायित्व की माँग की. श्री जयकर और श्री सप्रु ने भारत के लिए आपैनिवेशिक स्वराज की माँग की. प्रथम गोलमेज सममेलन में साप्रंदायिकता की समस्या सर्वाधिक विवादपूर्ण रही. मुसलमान पृथक् तथा सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के पक्ष में थे. जिन्ना ने अपने 14 सूत्र को सामने रखा, तो डा. अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों के लिए पृथक निवार्चक मडंल की माँग की. इस प्रकार प्रथम गोलमेज सम्मेलन असफल रहा और 19 जनवरी, 1931 को सम्मेलन अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गया. वस्तुतः कांग्रेस के बहिष्कार ने इस सममेलन को निरर्थक बना दिया था. ____________________________________________ #द्वितीय_गोलमेज_सम्मेलन : द्वितीय गोलमेज सम्मेलन 7 सितम्बर, 1931 से 1 दिसम्बर, 1931 तक चला. इस सम्मेलन में गाँधी जी आधिकारिक रूप से कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि थे. द्वितीय गोलमेज सम्मेलन शुरू होने के पूर्व इंग्लैण्ड की राजनीतिक स्थिति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. मजदूर दल की सरकार के स्थान पर राष्ट्रीय सरकार का निर्माण हुआ जिसमें मजदूर, अनुदार तथा उदार तीनों दल सम्मिलित हुए. सर सेमुअल होर भारत सचिव नियुक्त हुआ, जो पक्का अनुदारवादी था. लार्ड इर्विन जैसे उदारवादी के स्थान पर लॉर्ड वेलिगंटन वायसराय नियुक्त हुआ. इसी बीच प्रथम गालमेज सम्मेलन के बाद ‘गांधी-इरविन पैक्ट’ हो चुका था और कांग्रेसी प्रतिनिधि के रूप में गांधीजी द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए तैयार थे. सम्मेलन में गांधीजी ने भारतीय हितों की रक्षा करने की भरपूर कोशिश की, परंतु अंत में वे असफल होकर ही लौटे. सम्मेलन में मुख्यतया भारतीय संघ के प्रस्तावित ढांचे और अल्पसंख्यकों के प्रश्नों पर बहस हुई. गांधीजी ने यह प्रमाणित करने की कोशिश की कि कांग्रेस पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है. उन्होंने भारत में पूर्ण उत्तरदायी सरकार की स्थापना और वायसराय के अनावश्यक अधिकारों में कटौती की बात की, परंतु प्रारंभ से ही अंग्रेजों की मंशा ठीक नहीं थी . अतः उन लोगों ने साप्रंदायिक प्रश्नों को ही प्राथमिकता दी. भारतीय सांप्रदायिक वर्ग भी गांधी की बात सुनने को तैयार नहीं थे. #गाँधी_जी_की_माँगें : उन्होंने निम्नलिखित माँगें रखीं – ▪️केंद्र और प्रान्तों में तुरंत और पूर्ण रूप से एक उत्तरदायी सरकार स्थापित की जानी चाहिए. ▪️केवल कांग्रेस ही राजनीतिक भारत का प्रतिनिधित्व करती है. ▪️अस्पृश्य भी हिन्दू हैं अतः उन्हें “अल्पसंख्यक” नहीं माना जाना चाहिए. ▪️मुसलामानों या अन्य अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन या विशेष सुरक्षा उपायों को नहीं अपनाया जाना चाहिए. गाँधी जी की मांगों को सम्मेलन में स्वीकार नहीं किया गया. मुसलामानों, ईसाईयों, आंग्ल-भारतीयों एवं दलितों ने पृथक प्रतिनिधित्व की माँग प्रारम्भ कर दी. ये सभी एक “अल्पसंख्यक गठजोड़” के रूप में संगठित हो गये. गाँधी जी साम्प्रदायिक आधार पर किसी भी संवैधानिक प्रस्ताव के विरोध में अंत तक डटे रहे. #द्वितीय_गोलमेज_सम्मेलन_की_विफलता सम्मेलन की विफलता का लाभ उठाकर प्रधानमंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने अपनी योजना रखी, जो स्वीकार्य नहीं हो सकती थी. सरकारी रुख से दु:खी और निराश होकर गांधीजी दिसम्बर 1931 में भारत लौटे. इस बीच लॉर्ड विलिगंटन कठारेतापवूर्क राष्ट्रीयता की भावना को दबाने में लगे हुए थे. जवाहर लाल नहेरू, पुरुषोत्तमदास टडंन, खान अब्दुल गफ्फार खां आदि प्रमुख नेताओं को गांधीजी के भारत लौटने के पूर्व ही गिरफ्तार कर लिया गया था. गांधीजी ने पुनः आन्दोलन करने की धमकी दी, अतः गाँधी सहित अनके अन्य नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया. कांग्रेस पुनः गैरकानूनी संस्था घोषित कर दी गयी. पुलिस अत्याचार बढ़ गये, प्रेस पर पाबंदियां बढ़ गयीं और कानून के बदले अध्यादेश द्वारा शासन चलाया जाने लगा. गांधीजी ने बदलती परिस्थितियों में ‘व्यक्तिगत अवज्ञा आन्दालेन’ की योजना बनायी. लेकिन सरकार के सांप्रदायिक निर्णय से वे हतोत्साहित हो उठे. फलतः मई 1933 में आन्दोलन को कांग्रेस ने स्थगित कर दिया तथा मई 1934 में इसे वापस ले लिया. सारे देश में उल्लास की जगह निराशा छा गयी. गांधीजी पुनः राजनीति से कटकर हरिजनों की तरफ ध्यान देने लगे. #प्रभाव सरकार भारतीयों की प्रमुख माँग “स्वराज” देने में असफल रही. गाँधी जी लौट गये और 29 दिसम्बर, 1931 को कांग्रेस कार्यसमिति ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन फिर से शुरू करने का निर्णय लिया. भारतीय राजनीति में साम्प्रदायिता के तत्त्व और मजबूत हो गये. #निष्कर्ष सम्मेलन में साम्प्रदायिक मामले ही मुख्य विषय बन गये. मतभेद सम्पात होने के बजाय और बढ़ गये. सम्मेलन बिना किसी निष्कर्ष ने 1 दिसम्बर 1931 को समाप्त हो गया और भारत वापस आकार गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन को पुनः प्रारम्भ करने की घोषणा की. ____________________________________________ #तृतीय_गोलमेज_सम्मेलन : तृतीय गोलमेज सम्मेलन का आयोजन 17 नवम्बर 1932 से 24 दिसम्बर 1932 तक किया गया. इस सम्मेलन में केवल 46 प्रतिनिधियों ने भाग लिया. तृतीय गोलमेज सम्मेलन में मुख्यतः प्रतिक्रियावादी तत्वों ने ही भाग लिया. भारत की कांग्रेस तथा ब्रिटेन की लेबर पार्टी ने इस सम्मेलन में भाग नहीं लिया. इस सम्मेलन में भारतीयों के मूल अधिकारों की मांग की गयी तथा गवर्नर जनरल के अधिकारों को प्रतिबंधित करने की माँग रखी गयी, परंतु सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. फलतः यह सम्मेलन भी विफल रहा. इन गोलमेज सम्मेलनों द्वारा भारत के संवैधानिक प्रश्नों का हल ढूंढ़ने का नाटक किया गया, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. वर्ग विशेष के हितों और सरकारी नीतियों के चलते तीनों ही सम्मेलन विफल रहे. इनकी विपफलता के साथ-साथ साप्रंदायिकता का विकराल स्वरूप भी स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आ गया, जिसने बाद की घटनाओं को प्रभावित किया. तीसरे गोलमेज सम्मलेन की समाप्ति के बाद एक श्वेत पत्र जारी किया गया जिस पर विचार करने के लिए लॉर्ड लिनलिथगो की अध्यक्षता में ब्रिटिश संसद द्वारा एक संयुक्त समिति गठित की गई. इसी समिति की रिपोर्ट के आधार पर “भारत सरकार अधिनियम, 1935” का निर्माण हुआ. #तृतीय_गोलमेज_सम्मेलन_में_शामिल_प्रतिनिधि : #भारतीय_प्रान्तों_के_प्रतिनिधि अकबर हैदरी (हैदराबाद के दीवान), मिर्जा इस्माइल (मैसूर के दीवान), वी.टी. कृष्णामचारी (बड़ौदा के दीवान), वजाहत हुसैन (जम्मू और कश्मीर), सर सुखदेव प्रसाद (उदयपुर, जयपुर, जोधपुर), जे.ए. सुर्वे (कोल्हापुर), रजा अवध नारायण बिसर्य (भोपाल), मनु भाई मेहता (बीकानेर), नवाब लियाकत हयात खान (पटियाला). #ब्रिटिश_भारत_के_प्रतिनिधि आगा खां तृतीय, डॉ. अम्बेडकर (दलित वर्ग), बोब्बिली के रामकृष्ण रंगा राव, सर हुबर्ट कार्र (यूरोपियन), नानक चंद पंडित, ऐ.एच. गजनवी, हनरी गिड़ने (आंग्ल-भारतीय), हाफ़िज़ हिदायात हुसैन, मोहम्मद इकबाल, एम.आर. जयकर, कोवासजी जहाँगीर, एन.एम. जोशी (मजदूर), ऐ.पी. पेट्रो, तेज बहादुर सप्रू, डॉ. सफाअत अहमद खां, सर सादिलाल, तारा सिंह मल्होत्रा, सर निर्पेंद्र नाथ सरकार, सर पुरुषोत्तम दास ठाकुर दास, मुहम्मद जफरुल्लाह खां. सितम्बर, 1931 से मार्च, 1933 तक, भारत सचिव सैमुअल होअर के पर्यवेक्षण में, प्रस्तावित सुधारों को लेकर प्रपत्र तैयार किया गया जो भारत सरकार अधिनियम 1935 का प्रमुख आधार बना. [01/12, 8:26 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास : #गांधी_इरविन_समझौता लंदन में आयोजित प्रथम गोलमेज सम्मेलन की असफलता और असहयोग आन्दोलन की व्यापकता ने सरकार के सामने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस और गाँधी के बिना भारत की राजनीतिक समस्या का समाधान आसान नहीं है. इसलिए लॉर्ड इरविन ने मध्यस्थता द्वारा गाँधीजी से समझौते की बातचीत प्रारम्भ कर दी. गाँधीजी 26 जनवरी, 1931 को जेल से रिहा कर दिए गये. 17 फ़रवरी से दिल्ली में इरविन और गाँधी जी के बीच वार्ता चलने लगी. 5 मार्च, 1931 को गाँधी-इरविन समझौते (दिल्ली पैक्ट) के मसविदे पर हस्ताक्षर किये गये. #गाँधी_इरविन_पैक्ट (दिल्ली पैक्ट) : गाँधी-इरविन समझौते के अनुसार सरकार ने निम्नलिखित वायदे किये – ▪️सरकार सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा कर देगी. जिन लोगों की संपत्ति आंदोलन के दौरान जब्त की गई थी, उसे वापस कर दिया जाएगा . ▪️सरकार दमन बंद कर आंदोलन के दौरान जारी किए गए सभी अध्यादेशों और उनसे संबंधित मुकदमों को वापस ले लेगी. ▪️भारतीयों को नमक बनाने की छूट दी जाएगी. ▪️जिन लोगों ने आंदोलन के दौरान सरकारी नौकरियों से त्याग-पत्र दे दिया था, उन्हें सरकार पुनः वापस लेने का विचार करेगी. ▪️इन आश्वासनों के बदले गाँधीजी सविनय अवज्ञा आंदोलन बंद कर लेने, दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने, पुलिस अत्याचारों की जाँच-पड़ताल नहीं करवाने, ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार नहीं करने और बहिष्कार की नीति को त्यागने पर सहमत हो गए. #गाँधी_इरविन_समझौते_पर_प्रतिक्रियाएँ : गाँधी-इरविन समझौते पर भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएँ हुईं. ▪️काँग्रेस की स्वतंत्रता का प्रस्ताव और 26 जनवरी का वायदा, दोनों की समझौते की बातचीत के दौरान उपेक्षा की गई. इससे नेहरू और दूसरे वामपंथी नेता बहुत दुःखी हुए.” सरकार ने किसी भी महत्त्वपूर्ण माँग को स्वीकार नहीं किया, यहाँ तक कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फाँसी की सजा को कारावास में भी नहीं बदला. ▪️23 मार्च को इन तीनों वीरों को जेल में फाँसी पर लटका दिया गया. इसका तीव्र विरोध हुआ. ▪️केंद्रीय विधानसभा में विपक्ष के नेता सर अब्दुर रहीम तथा स्वतंत्र दल के उपाध्यक्ष कावसजी जहाँगीर ने विरोध प्रकट करने के लिए सभा से बहिर्गमन किया . ▪️दुःखी और क्षुब्ध जवाहरलाल ने घोषणा की, “भगत सिंह का शव हमारे और इंग्लैंड के बीच खड़ा रहेगा.” ▪️गाँधी और काँग्रेस की इससे कटु आलोचना हुई. श्री अयोध्या सिंह समझौते पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखते हैं, “पूर्ण स्वाधीनता या डोमिनियन स्टेट्स / (अधिराज्य) की बात जाने दीजिए; न तो लगान कम किया गया, न कोई टैक्स, न नमक पर सरकार की इजारेदारी हटाई गई, सिर्फ बुजुर्आ वर्ग को नाममात्र के लिए एक-दो सुविधाएँ दी गई. बस इसी पर सारा जन-आंदोलन उस वक्त बंद कर दिया गया, जब वह चरम सीमा पर पहुँच रहा था और क्रांतिकारी रूप ले रहा था. एक बार फिर बुर्जुआ वर्ग के स्वार्थ के लिए सारे देश के स्वार्थ की बलि दे दी गई. 1922 ई० की पुनरावृत्ति व्यापक रूप में की गई.” इसके बावजूद इतना तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि सरकार को गाँधी-इरविन समझौता करने को बाध्य होना पड़ा. यह एक बड़ी विजय थी और आम जनता ने उसे इसी रूप में लिया.