Friday, June 12, 2020

जीवन का रक्षा कवच हैं श्री गणेश के 12 पवित्र नाम...

जीवन का रक्षा कवच हैं श्री गणेश के 12 पवित्र नाम...
 
भगवान गणेश के 12 नाम लेने से सभी प्रकार की मनोकामना पूरी होती है। यह 12 नाम सुनकर श्री गणेश विशेष प्रसन्न होते हैं। वास्तव में जीवन का रक्षा कवच है श्री गणेश के 12 पवित्र नाम। इन्हें श्री गणेश के सामने धूप व दीपक लगाकर बोलें -

गणपर्तिविघ्रराजो लम्बतुण्डो गजानन:।
द्वेमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिप:।।
विनायकश्चारुकर्ण: पशुपालो भवात्मज:।
द्वाद्वशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय य: पठेत्।।
विश्वं तस्य भवे नित्यं न च विघ्नमं भवेद् क्वचिद्।

1- सुमुख - सुन्दर मुख वाले : - भगवान गणेश का बहुत सुंदर चेहरा भगवान शिव एवं माता पार्वती के तेज के कारण है जिसकी मुनियों ने वैज्ञानिक व्याख्या की है । भगवान गणेश का शरीर सूरज की तरह चमकदार होना बताया गया और चन्द्र मंडल में प्रवेश भी चंद्रमा की तरह शीतल होना दर्शाता है. 👌चंद्रमा को सौंदर्य के भगवान के रूप में जाना जाता है।

चन्द्र मंडल में प्रवेश करने पर, यह भगवान में चमकदार अनुभाग गणेश उसके साथ चंद्रमा के सभी प्रमुख विशेषताओं के साथ जीवन के लिए आया था, और इसलिए नाम सुमुख दिया गया था। भगवान गणेश किसी भी शुभ अवसर की शुरुआत में पूजा की जाती है जब भी अपने पवित्र और सुंदर चेहरा हमेशा हमारे ध्यान का केंद्र है। उनकी छोटी आँखों गंभीरता को दर्शाता है।

लंबी नाक उसकी लंबी फ्लैट कानों चरम प्रकृति के अपने ज्ञान कौशल के रूप में सुझाव जहां उसकी बुद्धि और बुद्धि, पता चलता है। उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण हैं जो घटनाओं को सुनता है, इसलिए यह भी ध्यान से शिकायतों और उनके भक्तों की शिकायतों को सुनता है। दीर्घ कर्ण (लंबे कान) इस का मतलब है। उन्होंने यानी ब्रम्ह विष्णु और महेश ओमकार के एकीकृत प्रकृति भी इन सभी आयामों को एक साथ सुमु्रख के रूप में अपने नाम का औचित्य साबित होता है ।

2. एक दन्त - एक दांत वाले : - भगवान श्री गणेश जी की कोई प्रतिमा देखेंगे तो उसमे पाएंगे कि उनका एक दन्त खंडित है उनके एकदंती होने के पीछे एक कथा है । इस कथा के अनुसार तीनों लोकों की क्षत्रिय विहीन करने के पश्चात परशुराम जी अपने गुरुदेव भगवान शिव जी और गुरु माता से मिलने कैलाश पर्वत पहुंचे

 उस समय भगवान शिव जी विश्राम कर रहे थे और भगवान श्री गणेश जी द्वार पर पहरेदार के रूप में बैठे थे । द्वार पर भगवान श्री गणेश को देख कर परशुराम जी ने उन्हें नमस्कार किया और अन्दर के ओर जाने लगे , इस पर भगवान श्री गणेशजी ने उनको अन्दर जाने से रोका ।

धीरे धीरे दोनों के मध्य विवाद बढ़ता चला गया । परशुराम जी ने अपने अमोध फरसे को , जो की उनको श्री शिव भगवान ने दिया था , चला दिया ।फरसे के वार से भगवान गणेश जी का एक दन्त खंडित हो गया द्य तब से भगवान गणेशजी एकदंत के नाम से भी जाने जाते हैं ।

और एक दूसरी कथा के अनुसार महाभारत विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है। महर्षि वेद व्यास के मुताबिक महाभारत धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की कथा है। इस ग्रंथ को लिखने के पीछे भी रोचक कथा है। कहा जाता है कि ब्रह्मा ने स्वप्न में महर्षि व्यास को महाभारत लिखने की प्रेरणा दी थी।

 महर्षि व्यास ने यह काम स्वीकार कर लिया, लेकिन उन्हें कोई इसे लिखने वाला न मिला। वे ऐसे किसी व्यक्ति की खोज में लग गए जो इसे लिख सके। महाभारत के प्रथम अध्याय में उल्लेख है कि वेद व्यास ने गणेशजी को इसे लिखने का प्रस्ताव दिया तो वे तैयार हो गए।

 उन्होंने लिखने के पहले शर्त रखी कि महर्षि कथा लिखवाते समय एक पल के लिए भी नहीं रुकेंगे। इस शर्त को मानते हुए महर्षि ने भी एक शर्त रख दी कि गणेश भी एक-एक वाक्य को बिना समझे नहीं लिखेंगे। इस तरह गणेशजी के समझने के दौरान महर्षि को सोचने का अवसर मिल गया।

3 .कपिल : - जिनके श्री विग्रह से नीले और पीले वर्ण की आभा का प्रसार होता है
जिनके श्री विग्रह से नीले और पीले वर्ण की आभा का प्रसार होता है। ग्रे रंग का एक विशेषण साधन है शक्की ग्रे रंग की गाय कपिला कहा जाता है गाय इसी प्रकार भगवान गणेश के रूप में ज्ञान और दूध के रूप में ज्ञान के रूप में दही घी देता है वह रंग में ग्रे है, हालांकि आदि घी दूध, दही, जैसे उत्पादों देकर उसे स्वस्थ रखने के लिए एक आदमी की जरूरतों को संतुष्ट अभिव्यक्ति की।

उन्होंने कहा कि आदमी को स्वस्थ बनाता है उसके सभी बुराइयों को नष्ट कर देता है और अपनी चिंताओं से दूर साफ करता है। इसलिए उसका नाम कपिल यह किया जाता है, इस अर्थ में फिट बैठता है।

4. गजकर्णक - हाथी के कान वाले : - श्री गणेश लंबे एवं बड़े कानों वाले हैं। उनका एक नाम गजकर्ण भी है। लंबे कान वालों को भाग्यशाली भी कहा जाता है। श्री गणेश तो भाग्य विधाता और शुभ फल दाता हैं। गणेश जी के कानों से यह संदेश मिलता है कि मनुष्य को सुननी सबकी चाहिए, लेकिन अपने बुद्धि विवेक से ही किसी कार्य का क्रियान्वयन करना चाहिए।

 गणेश जी के लंबे कानों का एक रहस्य यह भी है कि क्षुद्र कानों वाला व्यक्ति सदैव व्यर्थ की बातों को सुनकर अपना ही अहित करने लगता है। इसलिए व्यक्ति को अपने कान इतने बड़े कर लेने चाहिए कि हजारों निन्दकों की भली-बुरी बातें उनमें इस तरह समा जाए कि वे बातें कभी मुंह से बाहर न निकल सकें।

5. लम्बोदर - लम्बे उदर (पेट) वाले : - भगवान् श्री गणेश का लम्बोदर अवतार सत्स्वरूप तथा ब्रह्मशक्ति का धारक है, भगवान लम्बोदर को क्रोधासुर का वध करने वाला तथा मूषक वाहन पर चलने वाला कहा जाता है । कथारू- एक बार भगवान विष्णु के मोहिनी रुप को देखकर भगवान शिव कामातुर हो गये ।

जब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप का त्याग किया तो कामातुर भगवान् शिव का मन दुखी हो गया । उसी समय उनका शुक्र धरती पर स्खलित हो गया । उससे एक प्रतापी काले रंग का असुर पैदा हुआ।

उसके नेत्र तांबे की तरह चमकदार थे । वह असुर शुक्राचार्य के पास गया और उनके समक्ष अपनी इच्छा प्रकट की । शुक्राचार्य कुछ क्षण विचार करने के बाद उस असुर का नाम क्रोधासुर रखा और उसे अपनी शिष्यता से अभिभूत किया । फिर उन्होंने शम्बर दैत्य की रूपवती कन्या प्रीति के साथ उसका विवाह कर दिया ।

 एक दिन क्रोधासुर ने आचार्य के समक्ष हाथ जोड़कर कहा - ‘मैं आप की आज्ञा से सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों पर विजय प्राप्त करना चाहता हूँ । अतरू आप मुझे यश प्रदान करने वाला मन्त्र देने की कृपा करें ।’ शुक्राचार्य ने उसे सविधि सूर्य-मन्त्र की दीक्षा दी। क्रोधासुर शुक्राचार्य की आज्ञा लेकर वन मे चल गया । वहाँ उसने एक पैर पर खड़े होकर सूर्य-मन्त्र का जप किया ।

 उस धैर्यशाली दैत्य ने निराहार रह कर वर्षा, शीत और धूप का कष्ट सहन करते हुए कठोर तप किया । असुर के हजारों वर्षो की तपस्या के बाद भगवान सूर्य प्रकट हुए । क्रोधासुर ने उनका भक्ति पूर्वक पूजन किया । भगवान सूर्य को प्रसन्न देख कर उसने कहा- ‘प्रभो ! मेरी मृत्यु न हो । मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों को जीत लूँ । सभी योद्धाओं में श्रेष्ठ सिद्ध होऊँ ।’ तथास्तु ! कहकर भगवान सूर्य अन्तर्धान हो गये ।

घर लोटकर क्रोधासुर ने शुक्राचार्य के चरणों में प्रणाम किया। शुक्राचार्य ने उसका आवेश्पुरी में दैत्यों के राजा के पद पर अभिषेक कर दिया । कुछ दिनों के बाद उसने असुरों से ब्रह्माण्ड विजय की इच्छा व्यक्त की। असुर बड़े प्रसन्न हुए । विजय यात्रा प्रारम्भ हुई। उसने पृथ्वी पर सहज ही अधिकार कर लिया। इसी प्रकार वैकुण्ठ और कैलाश पर भी उस महादैत्य का राज्य स्थापित हो गया । क्रोधासुर ने भगवान सूर्य के सूर्य लोक को भी जीत लिया।

 वरदान देने के कारण उन्होंने भी सूर्यलोक का दुखी ह्रदय से त्याग कर दिया । अत्यंत दुखी देवताओं और ऋषियों ने आराधना की । इससे संतुष्ट होकर लम्बोदर प्रकट हुए । उन्होंने कहा - ’देवताओं और ऋषियों ! मैं क्रोधासुर का अहंकार चूर्ण कर दूंगा । आप लोग निश्चिंत हो जायें । लम्बोदर के साथ क्रोधासुर का भीषण संग्राम हुआ । देवगण भी असुरों का संहार करने लगे ।

 क्रोधासुर के बड़े - बड़े योद्धा युद्ध भूमि में आहत होकर गिर पड़े । क्रोधासुर दुखी होकर लम्बोदर के चरणों में गिर गया तथा उनकी भक्ति भाव से स्तुति कर ने लगा । सहज कृपालु लम्बोदर ने उसे अभयदान दे दिया । क्रोधासुर भगवान लम्बोदर का आशीर्वाद और भक्ति प्राप्त कर शान्त जीवन लिए पाताल चला गया । देवता अभय और प्रसन्न होकर भगवान लम्बोदर का गुणगान करने लगे ।

6. विकट - सर्वश्रेष्ठ : - भगवान श्रीगणेश को विकट नाम से भी जाना जाता है। दरअसल यह बप्पा के एक अवतार का नाम है। उन्होंने यह अवतार कामासुर के संहार के लिए लिया था। कहते हैं कि भगवान विष्णु जब जालंधर के वध के लिए वृन्दा का तप नष्ट करने गए तभी उसी समय उनके शुक्र से अत्यंत तेजस्वी दैत्य कामासुर पैदा हुआ।

 कामासुर ने अपनी पूरी शिक्षा दैत्यासुर शुक्राचार्य से ली। उन्हीं की आज्ञा पाकर वह भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तप किया। उसकी कठिन तप से खुश होकर। भगवान शिव उसके समक्ष प्रकट हुए। कामासुर ने वर मांगा कि उसे ब्रह्मांड का राज्य और शिवभक्ति प्रदान करें। इसके साथ ही उसे निर्भय और मृत्युंजयी होने का वरदान भी दें।

 भगवान शिव ने कामासुर को यह वरदान दे दिया। कामासुर प्रसन्न होकर दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास लौट आया। शुक्राचार्य ने कामासुर से प्रसन्न होकर महिषासुर की रूपवती पुत्री तृष्णा के साथ उसका विवाह कर दिया। वहीं सभी दैत्यों ने भी कामासुर के अधीन रहने का आश्वासन दिया। कामासुर ने अत्यंत सुंदर शहर रतिद को अपनी राजधानी बनाई। उसने कई दैत्यों को अपनी सेना में प्रधान बनाया। उस महा असुर ने पृथ्वी के सभी राजाओं को जीत लिया और स्वर्ग पर चढ़ाई की।

 इंद्र आदि देव भी उसके पराक्रम से घवरा कर हार गए। इस तरह चारों तरफ झूठ-कपट और छल का राज्य हो गया। चारों तरफ इस तरह का आतंक देखकर सभी देवता घबरा गए, तभी देवर्षि नारद वहां पहुंचे उन्होंने देवताओं को महर्षि मुद्गल से मिलने को कहा, महर्षि सभी देवताओं को लेकर गणेशधाम पहुंचे। वहां पहुंचकर उन्होंने मयूरवाहन गणेश की उपासना की।

 भगवान प्रकट हुए। उन्होंने कामासुर के आतंक से मुक्त कराने का वचन दिया। भगवान विकट रूप में प्रकट हुए, जिनका वाहन मोर था। वह कामासुर से युद्ध करने चले गए। भयानक युद्ध हुआ जिसमें कामासुर के पुत्र भी मारे गए।

 कामासुर मूर्छित हो गया। वह इतना थक चुका था कि युद्ध करने की स्थिति में नहीं था। आखिर कामासुर ने हार मान ली और उसने भगवान विकट से क्षमा मांगी। इस तरह कामासुर भगवान विकट की शरण में आ गया।

7. विघ्ननाश-विघ्नों (संकटों ) का नाश करने वाले : - सर्वप्रथम भगवान श्री गणेश जी का स्मरण किया जाता है। जिस कारण इन्हें विघ्नेश्वर, विघ्न हर्ता कहा जाता है। इनकी उपासना करने से सभी विघ्नों का नाश होता है तथा सुख-समृद्ध व ज्ञान की प्राप्ति होती है। विघ्नेश्वर नामक एक दैत्य का वध करने के कारण ही इसका नाम श्विघ्नेश्वर विनायकश् हुआ था।

 तभी से यहाँ भगवान श्री गणेश सभी विघ्नों को नष्ट करने वाले माने जाते हैं। एक अन्य कथानुसार अभयदान मांगते समय विघनसुर दैत्य की प्रार्थना थी कि गणेशजी के नाम के पहले उसका भी नाम लिया जाए, इसलिए गणपति को विघ्नहर्ता या विघ्नेश्वर का नाम यहीं से मिला।

एक कहानीके मुताबिक विघ्नासुर राक्षसको देवताके राजा इंद्र द्वारा राजा अभिनंदन द्वारा आयोजितप्रार्थना को नष्ट करने के लिए बनाया गया था, हालांकि, दानव एक कदम आगे चला गया और सभीवैदिक, धार्मिक कार्यको नष्ट कर दिया, उसी समय लोगोकी प्राथनासे प्रसन्न होके गणेशजी उसका वध करने के लिए आये थे पर कहानी के मुताबिक राक्षसने गणेशजीको विनंती करके दया बक्षने के लिए कहा था।

उस समय गणेशजीने उसको बक्ष दिया था परंतु एक शर्त रखी थी और वो येथी के जहा गणेश पूजा हो रही हाई वहा वो राक्षस नहीं जा पाएगा और उसके बदलेमे राक्षसने गणेशजी से यह वरदान माँगा था की आपके साथ मेरे नामभी जुड़ना चाहिए और तबसे यहाँ गणेशजीको विघ्नेश्वरध्विघ्नहर गणेशजी के नामसे जाना जाता हैं. यहाँ के गनेशको श्री विघ्नेश्वर विनायकभी कहा जाता हैं.

8. विनायक विशिष्ट नायक : - विनायक विशिष्ट नायक या स्वामी भगवान गणेश का नाम है। भगवान गणेश विघ्नकर्ता और हर्ता दोनों हैं। कहा जाता है भगवान गणेश की परिक्रमा कर के पूजा की जानी चाहिए। परिक्रमा करते वक्त अपनी इच्छाओं को लगातार दोहराते रहना चाहिए। भगवान ऐसा करने वाले भक्तों की मनोकामना जरुर पूरी करते हैं।

 भक्तों को विनायक के मंदिर की तीन परिक्रमा करनी चाहिए। इसके अलावा भक्त अगर भगवान विनायक को खुश करना चाहते हैं और अपनी इच्छाओं के पूरा करना चाहते हैं तो उन्हें विनायक के नाम से तर्पण करना चाहिए। सिद्धि विनायक गणेश जी का सबसे लोकप्रिय रूप है।

 गणेश जी जिन प्रतिमाओं की सूड़ दाईं तरह मुड़ी होती है, वे सिद्घपीठ से जुड़ी होती हैं और उनके मंदिर सिद्घिविनायक मंदिर कहलाते हैं। कहते हैं कि सिद्धि विनायक की महिमा अपरंपार है, वे भक्तों की मनोकामना को तुरंत पूरा करते हैं। मान्यता है कि ऐसे गणपति बहुत ही जल्दी प्रसन्न होते हैं और उतनी ही जल्दी कुपित भी होते हैं। सिद्धि विनायक की दूसरी विशेषता यह है कि वह चतुर्भुजी विग्रह है।

 उनके ऊपरी दाएं हाथ में कमल और बाएं हाथ में अंकुश है और नीचे के दाहिने हाथ में मोतियों की माला और बाएं हाथ में मोदक (लड्डुओं) भरा कटोरा है। गणपति के दोनों ओर उनकी दोनो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि मौजूद हैं जो धन, ऐश्वर्य, सफलता और सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने का प्रतीक है।

मस्तक पर अपने पिता शिव के समान एक तीसरा नेत्र और गले में एक सर्प हार के स्थान पर लिपटा है। सिद्धि विनायक का विग्रह ढाई फीट ऊंचा होता है और यह दो फीट चैड़े एक ही काले शिलाखंड से बना होता है। गणेश जी प्रतीक हैं मनुष्य और अन्य जीवों के सह अस्तित्व के ,जो इस प्रकृति में एक दूसरे पर आश्रित हैं । इनके अस्तित्व की मूल कल्पना बहुत ही वृहद है ,जिसे अध्ययन और ज्ञान के द्वारा ही समझा जा सकता है ।

हम अपने हर मंगल कार्य में भगवान गणेश की पूजा सबसे पहले करते हैं जो कार्य को निर्विघ्न सम्पन्न करवाने में हर जीव का आवाह्न है । जो इसे नकारते हैं उनको बस इतना ही कहना है की भारतीय हिन्दू संस्कृति के धार्मिक प्रतीक मनुष्य के अस्तित्व की पहचान हैं।

9. धूम्रकेतु : - धुएं के से वर्ण की ध्वजा वाले।
भविष्य पुराण के अनुसार, नाम धूम्रकेतु द्वारा गणेश के चैथे अवतार कलयुग में जन्म लेते हैं और अनर्थकारी नष्ट कर देगा। इस गणेश की एक भयंकर रूप माना जाता है और वह एक नीले घोड़े पर सवारी करेंगे। इस रूप में वह एक अंत कलियुग लाना होगा और सृष्टि के अगले चक्र के लिए ब्रह्मांड साफ होगा। धूम्रकेतु राख या धूम्रपान की तरह रंग में ग्रे है। उन्होंने कहा कि या तो दो या दो से चार हथियार है।

उन्होंने अपने पर्वत के रूप में एक नीला घोड़ा है। उन्होंने कहा की गिरावट समाप्त करने के लिए आ जाएगा कलियुग । इस अवतार के दौरान उन्होंने कई राक्षसों को मारता है। ग्रिम्स गणेश के इस अवतार और के दसवें और अंतिम अवतार के बीच एक समानांतर है कि कलियुग, वर्तमान युग उम्र में भ्रम की स्थिति, आतंकवाद, लालच और अराजकता की है।

 गणेश की चैथी अभिव्यक्ति धूम्रकेतु आना अभी बाकी है। गणेश पुराण में, यह आतंकवाद, नकारात्मक और अंधेरे शक्तियों को नष्ट करने के लिए (ब्लू अनंत का प्रतीक) धूम्रकेतु एक नीले घोड़े की सवारी कलियुग के अंत तक आ जाएगा कि लिखा है।

10 गणाध्यक्ष - गणों के स्वामी गणाध्यक्ष : - गणों के स्वामी यह श्री गणेश दसवीं नाम है । यह भी दो अर्थ वहन करती है. एक स्वामी या ऐसी बातों के एक नियंत्रक, जो गिना जा सकता है. दूसरा अर्थ स्वामी या ळंदंे के एक नियंत्रक है. (सामान्य लोग) (पुरुष) नर, असुर (डेमन) (सांप) नाग (चारों वेदों) चार पुरुषार्थ ....... गणेश इन सब के स्वामी है. विज्ञान इन सभी के स्वामी के रूप में गणेश कहता है. विज्ञान पूरे (ब्रम्ह) ब्रह्मांड इसलिए गणेशा अधिपति के रूप में जाना जाता है ।

 गणेश सैंकड़ों पुत्रों और सैकड़ों गणों से भी बढ़ कर है, इसलिए देवनिर्मित अमृतमय मोदक मैं इसी को प्रदान करती हूं। माता-पिता की भक्ति के कारण गणेश यज्ञादि में सर्वत्र अग्रपूज्य होगा।श् तब शिवजी बोले, श्इस गणेश की अग्रपूजा से ही समस्त देवगण प्रसन्न हों।श् साथ ही उन्हें गणों का अध्यक्ष भी बना दिया। इस तरह गणेश जी मोदकप्रेमी बने।

अगर पैसे की कमी न हो तो इन्हें 21 मोदक चढ़ाने चाहिए। पैसा न होने की स्थिति में 5 मोदक तो अवश्य चढ़ाने चाहिए। घर में बने मोदक, लड्डू उन्हें ज्यादा आनंद देते हैं, इसमें आपकी श्रद्धा और प्रेम जो मिला होता है। मूंग की दाल के बने लड्डू इन्हें बहुत प्रिय हैं तो माघ में तिल के लड्डू गणेश जी को बहुत पसंद हैं।

11. भाल चन्द्र - मस्तक पर चंद्रमा धारण करने वाले : - भगवान श्रीगणेश का एक स्वरूप भालचन्द्र के नाम से भी पूजनीय है। सरल शब्दों में श्भालचन्द्रश् का अर्थ है भाल यानी मस्तक पर चंद्र धारण करने वाले। श्रीगणेश के इस नाम में सफल जीवन का अहम सूत्र है। चूंकि शास्त्रों में चन्द्रमा को सभी जीवों के मन का नियंत्रक माना गया है, तो वहीं गणेश बुद्धि दाता हैं। मस्तक भी बुद्धि केन्द्र है।

श्रीगणेश ने मस्तक पर ही चन्द्र को धारण किया है। चन्द्र की प्रकृति शीतल व शांत होती है। इस तरह संकेत है कि सफलता और जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए मन-मस्तिष्क को शांत रख बुरी और नकारात्मक सोच से बचा जाए। मानसिक धैर्य, संयम व सूझबूझ ही कामयाबी और दायित्वों की राह में आने वाले हर उतार-चढ़ाव में दक्षता के साथ आगे बढने में मददगार साबित होते हैं।

 बुधवार को श्रीगणेश उपासना के दौरान भालचन्द्र स्वरूप का ध्यान कर सुनिश्चित सफलता का यही सूत्र अपनाना बड़ा ही असरदार उपाय माना गया है।

इसके लिए सुबह या शाम के वक्त इस विशेष मंत्र का ध्यान श्रीगणेश को सिंदूर, अक्षत व दूर्वा चढ़ाकर व यथाशक्ति लड्डुओं का भोग लगाकर कार्यसिद्धि की कामनाओं के साथ करें। पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन भालचन्द्र गणेश जी की अर्चना की जाती है।

 करवाचैथ में भी संकष्टीगणेश चतुर्थी की तरह दिन भर उपवास रखकर रात में चन्द्रमा को अर्घ्य देने के उपरांत ही भोजन करने का विधान है। वर्तमान समय में करवाचैथ व्रतोत्सव ज्यादातर महिलाएं अपने परिवार में प्रचलित प्रथा के अनुसार ही मनाती हैं लेकिन अधिकतर स्त्रियां निराहार रहकर चन्द्रोदय की प्रतीक्षा करती हैं।

12. गजानन - हाथी के मुख वाले ?????

शिव और पार्वती पुत्र भगवान गणेश का ही नाम गजानन है। लिंग पुराण के अनुसार एक बार देवताओं ने भगवान शिव की उपासना करके उनसे सुरद्रोही दानवों के दुष्टकर्म में विघ्न उपस्थित करने के लिये वर माँगा। आशुतोष शिव ने तथास्तु कहकर देवताओं को संतुष्ट कर दिया।

समय आने पर गणेश जी का प्राकट्य हुआ। उनका मुख हाथीके समान था और उनके एक हाथ में त्रिशूल तथा दूसरे में पाश था। देवताओं ने सुमन-वृष्टि करते हुए गजानन के चरणों में बार-बार प्रणाम किया। भगवान शिव ने गणेश जी को दैत्यों के कार्यों में विघ्न उपस्थित करके देवताओं और ब्राह्मणों का उपकार करने का आदेश दिया। द्वापर युग में उनका वर्ण लाल है।

 वे चार भुजाओं वाले और मूषक वाहनवाले हैं तथा गजानन नाम से प्रसिद्ध हैं।किसी नवजात शिशु का मस्तक उसके धड़ से लगा दो। एक गजराज का नवजात शिशु मिला उस समय। उसी का मस्तक पाकर वह बालक गजानन हो गया।

एक समय जब माता पार्वती मानसरोवर में स्नान कर रही थी तब उन्होंने स्नानस्थल पर कोई आ न सके इस हेतु अपनी माया से गणेश को जन्म देकर ‘बाल गणेश’ को पहरा देने के लिए नियुक्त कर दिया। इसी दौरान भगवान शिव उधर आ जाते हैं। महादेव इस बात से अंजान थे की बाल गणेश उनके पुत्र है गणेशजी उन्हें रोक कर कहते हैं कि आप उधर नहीं जा सकते हैं।

महादेव ने बालक से पूछा की आप कौन है? बाल गणेश ने कहा में माता पार्वती का पुत्र हूँद्य महादेव ने कहा की में पार्वती का पति हूँ मुझे अंदर जाने दो। किन्तु गणेश ने अनुमति नही दी। महादेव अपना क्रोध शांत करके वहां से चले गये। महादेव ने अपने गण को वहां भेजा।

 गणेश ने उनके साथ युद्ध किया गणेश ने उनकी ऐसी हालत कर दी की वह भगवान शिव की शरण में चले गये। उन्होंने अपनी व्यथा महादेव के आगे व्यक्त की। उनकी व्यथा सुनकर महादेव क्रोधित हो जाते हैं और पुनः वह गणेश से युद्ध करने चले जाते है। महादेव गणेश जी को रास्ते से हटने का कहते हैं किंतु गणेश जी अड़े रहते हैं तब दोनों में युद्ध हो जाता है।

 युद्ध के दौरान क्रोधित होकर शिवजी बाल गणेश का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। शिव के इस कृत्य का जब पार्वती को पता चलता है तो वे विलाप और क्रोध से प्रलय का सृजन करते हुए कहती है कि तुमने मेरे पुत्र को मार डाला। यह सुनकर महादेव को आश्चर्य होता हैद्य माता का रौद्ररूप देख महादेव अपने गण को कहते है की वह उत्तर दिशा की ओर जाये और कोई भी पहला प्राणी मिले तो उसका सर काटकर शाम होने से पूर्व ले आये।

 शिवगण उत्तर की ओर जाते है। उन्हें पहले दो हिरन मिले किन्तु वह माता पुत्र थे। यह देखकर गण आगे गये। फिर उन्हें एक हाथी मिला। हाथी ने गण को अपना शीष काटने की अनुमति दी। वह जल्दी से महादेव के पास गये।

  महादेव हाथी का सिर गणेश के धड़ से जोड़कर गणेश जी को पुनरूजीवित कर देते हैं। तभी से भगवान गणेश को गजानन गणेश कहा जाने लगा।लगा।

आधुनिक_भारत_का_इतिहास fantastic


आधुनिक_भारत_का_इतिहास :

1

#अगस्त_प्रस्ताव

भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को शिमला से एक वक्तव्य जारी किया, जिसे अगस्त प्रस्ताव कहा गया|यह प्रस्ताव कांग्रेस द्वारा ब्रिटेन से भारत की स्वतंत्रता के लक्ष्य को लेकर पूछे गए सवाल के जबाव में लाया गया था|

#अगस्त_प्रस्ताव_के_प्रावधान

• सलाहकारी युद्ध परिषद् की स्थापना

• युद्ध के पश्चात भारत के संविधान निर्माण के लिए प्रतिनिधिक भारतीय निकाय की स्थापना करना

• वायसराय की कार्यकारी परिषद् का तत्काल विस्तार

• अल्पसंख्यकों को यह आश्वासन दिया गया कि ब्रिटिश सरकार,शासन के किसी ऐसे तंत्र को सत्ता नहीं सौंपेगी जिसके प्राधिकार को भारतीय राष्ट्रीय जीवन के किसी बड़े और शक्तिशाली तबके द्वारा स्वीकार न किया गया हो

यह प्रथम अवसर था जब भारतीयों के संविधान निर्माण के अधिकार को स्वीकार किया गया और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की| कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया| जवाहर लाल नेहरु ने कहा कि डोमिनियन दर्जे का सिद्धांत अब मृतप्राय हो चुका है| गाँधी ने कहा कि इस घोषणा नेराष्ट्रवादियों और ब्रिटिश शासकों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिया है| मुस्लिम लीग इसमें दिए गए वीटो अधिकार के चलते खुश थी और उसने कहा कि राजनीतिक गतिरोध को दूर करने का एकमात्र उपाय विभाजन है| कांग्रेस द्वारा प्रस्तुत की गयी मांगों को स्वीकार न करने से व्याप्त व्यापक असंतोष के सन्दर्भ में गाँधी ने वर्धा में हुई कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में अपनी व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा को शुरू करने की योजना को प्रस्तुत किया|

#निष्कर्ष

यह भारत के वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के द्वारा जारी किया गया औपचारिक वक्तव्य था,जिसने संविधान निर्माण प्रक्रिया की नींव रखी और कांग्रेस ने संविधान सभा के गठन को सहमति प्रदान की|


2

#आधुनिक_भारत_का_इतिहास :
#नेहरू_रिपोर्ट
 
12 फरवरी, 1928 को डॉ.एम.ए.अंसारी की अध्यक्षता में दिल्ली में सर्वदलीय सम्मलेन बुलाया गया जिसमे 29 संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे| इस सम्मलेन का आयोजन भारत सचिव लॉर्ड बिर्केन्हेड की चुनौती और साइमन आयोग के प्रत्युत्तर में किया गया था| बम्बई में 19 मई 1928 को इस सम्मलेन की बैठक में मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गयी जिसका उद्देश्य भारत के संविधान की रुपरेखा व सिद्धांतों का निर्धारण करना था|

#नेहरु_रिपोर्ट_की_अनुशंसाएं

• भारत को डोमिनियन का दर्जा दिया जाये और संसदीय रूप की सरकार स्थापित की जाये जिसमे द्विसदनीय विधायिका- सीनेट और प्रतिनिधि सदन,हो|

• सीनेट का गठन सात साल के लिए चुने जाने वाले दो सौ सदस्यों से मिलकर हो और प्रतिनिध सदन में पांच साल के लिए चुने जाने वाले पांच सौ सदस्य शामिल हों|गवर्नर जनरल कार्यकारी परिषद् की सलाह पर कार्य करे जो सामूहिक रूप से संसद के प्रति उत्तरदायी हो|

• भारत में संघीय रूप की सरकार स्थापित की जाये जिसमे अवशिष्ट शक्तियां केंद्र को प्रदान की गयीं हों |अल्पसंख्यकों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली को समाप्त कर दिया जाये क्योकि यह सांप्रदायिक भावनाओं को जाग्रत करती है और संयुक्त निर्वाचन प्रणाली स्थापित की जाये|

• पंजाब व बंगाल में समुदायों के लिए कोई सीट आरक्षित नहीं हो लेकिन उन राज्यों में,जहाँ मुस्लिम जनसंख्या उस राज्य की कुल जनसंख्या के दस प्रतिशत से भी कम है,मुस्लिमों के लिए सीटों का आरक्षण किया जा सकता है|

• न्यायपालिका विधायिका से स्वतंत्र हो|

• केंद्र में एक चौथाई मुस्लिम प्रतिनिधित्व होना चाहिए|

• सिंध को बम्बई प्रान्त से अलग किया जाये|

#निष्कर्ष

नेहरु रिपोर्ट में कहा गया कि भारत के लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता है| इस रिपोर्ट ने अमेरिका के अधिकार पत्र से प्रेरणा ग्रहण की, जिसने भारत के संविधान में मूल अधिकारों सम्बन्धी प्रावधानों की आधारशिला रखी थी|

3

#आधुनिक_भारत_का_इतिहास :
#साम्प्रदायिक_अधिनिर्णय_और_पूना_समझौता

16 अगस्त,1932 को मैकडोनाल्ड ने सांप्रदायिक अधिनिर्णय के रूप में चर्चित प्रस्ताव की घोषणा की,जिसमें सांप्रदायिक निर्वाचक मंडल की संस्तुति की गयी थी| इसे ‘मैकडोनाल्ड अवार्ड’ के रूप में भी जाना जाता है| देश में लगभग सभी जगह जनसभाएं आयोजित की गयीं, मदनमोहन मालवीय, बी.आर.अम्बेडकर और एम.सी.रजा जैसे विभिन्न धडों के नेता सक्रिय हो गए|इसका अंत एक समझौते के रूप में हुआ जिसे ‘पूना समझौता’ के रूप में जाना गया|

#सांप्रदायिक_अधिनिर्णय (16 अगस्त,1932)

16 अगस्त,1932 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने ब्रिटिश भारत में उच्च जातियों, निम्न जातियों, मुस्लिमों, बौद्धों, सिखों, भारतीय ईसाईयों, आंग्ल-भारतियों ,यूरोपियों, और अछूतों (जिन्हें अब दलितों के रूप में जाना जाता है) के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की व्यवस्था प्रदान करने के लिए इसकी घोषणा की|

#पूना_समझौता (24 सितम्बर1932)

यह समझौता बी.आर.अम्बेडकर और महात्मा गाँधी के बीच पुणे की यरवदा सेंट्रल जेल में हुआ था और सरकार ने इस समझौते को सांप्रदायिक अधिनिर्णय में संशोधन के रूप में अनुमति प्रदान की|

#समझौते_के_प्रमुख_बिंदु

• समझौते में दलित वर्ग के लिए पृथक निर्वाचक मंडल को त्याग दिया गया लेकिन दलित वर्ग के लिए आरक्षित सीटों की संख्या प्रांतीय विधानमंडलों में 71 से बढ़ाकर 147 और केन्द्रीय विधायिका में कुल सीटों की 18% कर दीं गयीं|

• सीटों का चुनाव संयुक्त निर्वाचक मंडल द्वारा होगा लेकिन उसकी प्रक्रिया निम्नलिखित होगी: किसी निर्वाचन क्षेत्र की सामान्य निर्वाचन सूची में दर्ज सभी दलित सदस्य मिलकर एक निर्वाचक मंडल बनायेंगे| यह निर्वाचक मंडल प्रत्येक आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र के लिए, एक मत प्रणाली के माध्यम से, दलित वर्ग के चार सदस्यों के एक पैनल का चयन करेगा| इस प्राथमिक मतदान में सबसे ज्यादा मतों को प्राप्त करने वाले चार व्यक्ति ही सामान्य निर्वाचन मंडल के लिए प्रत्याशी होंगे|

• प्राथमिक निर्वाचन और चार सदस्यीय पैनल की ऊपर वर्णित प्रणाली दस वर्षों के बाद समाप्त हो जाएगी,बशर्ते उससे पूर्व आपसी सहमति के द्वारा इसे ख़त्म न किया गया हो|

• आरक्षित सीटों के माध्यम से दलित वर्गों के प्रतिनिधित्व की प्रणाली निश्चित समय तक ही लागू होगी अन्यथा इसे सम्बंधित समुदायों की आपसी सहमति के द्वारा समाप्त किया जा सकता है|

• दलित वर्ग का मताधिकार लोथियन समिति (भारतीय मताधिकार समिति) की रिपोर्ट के अनुसार होगा|

• स्थानीय निकायों के चुनाव और लोक सेवा में नियुक्ति के लिए कोई भी व्यक्ति केवल इस आधार पर निर्योग्य नहीं माना जायेगा कि वह किसी दलित वर्ग का सदस्य है| इस सन्दर्भ में दलित वर्ग के उचित प्रतिनिधित्व की रक्षा करने के लिए हर तरह का प्रयास किया जायेगा|


4

#आधुनिक_भारत_का_इतिहास :
#मुडीमैन_समिति_1924

भारतीय नेताओं की मांगों को पूरा करने और 1920 के दशक के आरंभिक वर्षों में स्वराज पार्टी द्वारा स्वीकृत किये गए प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सरकार ने सर अलेक्जेंडर मुडीनमैन की अध्यक्षता में एक समिति,जिसे मुडीनमैन समिति के नाम से भी जाना जाता है,गठित की| समिति में ब्रिटिशों के अतिरिक्त चार भारतीय सदस्य भी शामिल थे| भारतीय सदस्यों में निम्नलिखित शामिल थे-

a. सर शिवास्वामी अय्यर,

b. डॉ.आर.पी.परांजपे,

c. सर तेज बहादुर सप्रे

d. मोहम्मद अली जिन्ना

इस समिति के गठन के पीछे का कारण भारतीय परिषद् अधिनियम,1919 के तहत 1921 में स्थापित संविधान और द्वैध शासन प्रणाली की कामकाज की समीक्षा करना था| इस समिति की रिपोर्ट को 1925 में प्रस्तुत किया गया जो दो भागों में विभाजित थी-अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक रिपोर्ट|

• बहुसंख्यक/बहुमत रिपोर्ट: इसमें सरकारी कर्मचारी और निष्ठावान लोग शामिल थे| इन्होने घोषित किया कि द्वैध शासन स्थापित नहीं हो सका है | उनका यह भी मानना था कि प्रणाली को सही तरह से मौका नहीं दिया गया है अतः केवल छोटे-मोटे बदलावों की अनुशंसा की|

• अल्पसंख्यक/अल्पमत रिपोर्ट: इसमें केवल गैर-सरकारी भारतीय शामिल थे | इसका मानना था कि 1919 का एक्ट असफल साबित हुआ है| इसमें यह भी बताया गया कि स्थायी और भविष्य की प्रगति को स्वयं प्रेरित करने वाले संविधान में क्या क्या शामिल होना चाहिए|

अतः इस समिति ने शाही आयोग/रॉयल कमीशन की नियुक्ति की सिफारिश की| भारत सचिव लॉर्ड बिर्केनहेड ने कहा कि बहुमत/बहुसंख्यक की रिपोर्ट के आधार पर कदम उठाये जायेंगे|

विश्व_का_भूगोल SPECIAL

विश्व_का_भूगोल :

#पृथ्वी_का_भूगर्भिक_इतिहास

उल्का पिंडों एवं चन्द्रमा के चट्‌टानों के नमूनों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि हमारी पृथ्वी की आयु 4.6 अरब वर्ष है । पृथ्वी पर सबसे प्राचीन पत्थर नमूनों के रेडियोधर्मी तत्वों के परीक्षण से उसके 3.9 बिलियन वर्ष पुराना होने का पता चला है ।

रेडियोसक्रिय पदार्थों के अध्ययन के द्वारा पृथ्वी के आयु की सबसे विश्वसनीय व्याख्या हो सकी है । पियरे क्यूरी एवं रदरफोर्ड ने इनके आधार पर पृथ्वी की आयु दो से तीन अरब वर्ष अनुमानित की है

पृथ्वी के भूगर्भिक इतिहास की व्याख्या का सर्वप्रथम प्रयास फ्रांसीसी वैज्ञानिक कास्ते-द-बफन ने किया । वर्तमान समय में पृथ्वी के इतिहास को कई कल्प (Era) में विभाजित किया गया है । ये कल्प पुनः क्रमिक रूप से युगों (Epoch) में व्यवस्थित किए गए हैं ।

प्रत्येक युग पुनः छोटे उपविभागों में विभक्त किया गया है, जिन्हें ‘शक’ (Period) कहा जाता है । प्रत्येक शक की कालावधि निर्धारित की गई है तथा जीवों और वनस्पतियों के विकास पर भी प्रकाश डाला गया है ।

#पृथ्वी_के_भूगर्भिक_इतिहास_से_सम्बंधित_प्रमुख_तथ्य:

1. #आद्य_कल्प (Pre-Paleozoic Era):

इसे आर्कियन व प्री-कैम्ब्रियन दो भागों में बाँटा गया है:

i. #आर्कियन_काल (Archean Era):

इस काल के शैलों में जीवाश्मों का पूर्णतः अभाव है । इसलिए इसे प्राग्जैविक (Azoic) काल भी कहते हैं । इन चट्‌टानों में ग्रेनाइट और नीस की प्रधानता है, जिनमें सोना और लोहा पाया जाता है । इसी काल में कनाडियन व फेनोस्केंडिया शील्ड निर्मित हुए हैं ।

ii. #प्री_कैम्ब्रियन_काल (Pre-Cambrian Period):

इस काल में रीढ़विहीन जीव का प्रादुर्भाव हो गया था । इस काल में गर्म सागरों में मुख्यतः नर्म त्वचा वाले रीढ़विहीन जीव थे । यद्यपि समुद्रों में रीढ़युक्त जीवों का भी प्रादुर्भाव हो गया, परंतु स्थलभाग जीवरहित था । भारत में प्री-कैम्ब्रियन काल में ही अरावली पर्वत व धारवाड़ क्रम की चट्‌टानों का निर्माण हुआ ।

2. #पुराजीवी_महाकल्प (Paleozoic Era):

इसे प्राथमिक युग भी कहा जाता है ।

इसके निम्न उपभाग हैं:

i. #कैम्ब्रियन_काल (Cambrian Period):

इस काल में प्रथम बार स्थल भागों पर समुद्रों का अतिक्रमण हुआ । प्राचीनतम अवसादी शैलों (Sedimentary Rocks) का निर्माण कैम्ब्रियन काल में ही हुआ था । भारत में विंध्याचल पर्वतमाला का निर्माण इसी काल में हुआ था ।

पृथ्वी पर इसी काल में सर्वप्रथम वनस्पति एवं जीवों की उत्पत्ति हुई । ये जीव बिना रीढ़ की हड्‌डी वाले थे । इसी समय समुद्रों में घास की उत्पत्ति हुई ।

ii. #आर्डोविसियन_काल (Ordovician Period):

इस काल में समुद्र के विस्तार ने उत्तरी अमेरिका का आधा भाग डुबो दिया, जबकि पूर्वी अमेरिका टैकोनियन पर्वत निर्माणकारी गतिविधियों से प्रभावित हुआ । इस काल में वनस्पतियों का विस्तार हुआ तथा समुद्र में रेंगने वाले जीव भी उत्पन्न हुए । स्थल भाग अभी भी जीवविहीन था ।

iii. #सिल्यूरियन_काल (Silurian Period):

इस काल में सभी महाद्वीप पृथ्वी की कैलीडोनियन हलचल से प्रभावित हुए तथा इस काल में रीढ़ वाले जीवों का सर्वप्रथम आविर्भाव हुआ एवं समुद्रों में मछलियों की उत्पत्ति हुई । सिल्यूरियन काल में रीढ़ वाले जीवों का विस्तार मिलता है, इसलिए इसे ‘रीढ़ वाले जीवों का काल’ (Age of Vertebrates) कहते हैं ।

इस काल में प्रवाल जीवों का विस्तार मिलता है । स्थल पर पहली बार पौधों का उद्‌भव इसी समय हुआ । ये पौधे पत्ती विहीन थे तथा आस्ट्रेलिया में उत्पन्न हुए थे । यह काल व्यापक कैलिडोनियन पर्वतीय हलचलों का काल भी है । इसी समय स्कैंडिनेविया व स्कॉटलैंड के पर्वतों का निर्माण हुआ ।

iv. #डिवोनियन_काल (Devonian Period):

इस काल में कैलीडोनियन हलचल के परिणामस्वरूप सभी महाद्वीपों पर ऊँची पर्वत शृंखलाएँ विकसित हुई, जिसके प्रमाण स्कैंडिनेविया, दक्षिण-पश्चिम स्कॉटलैण्ड, उत्तरी आयरलैण्ड एवं पूर्वी अमेरिका में देखे जा सकते हैं । इस काल में पृथ्वी की जलवायु समुद्री जीवों विशेषकर मछलियों के सर्वाधिक अनुकूल थी । इसी समय शार्क मछली का भी आविर्भाव हुआ ।

अतः इसे ‘मत्स्य युग’ (Fish Age) के रूप में जाना जाता है । इसी समय उभयचर जीवों (Amphibians) की उत्पत्ति हुई तथा फर्न वनस्पतियों की भी उत्पत्ति हुई । पौधों की ऊँचाई 40 फीट तक पहुँच गई थी । इस समय कैलिडोनियन पर्वतीकरण भी बड़े पैमाने पर हुआ तथा ज्वालामुखी क्रियाएँ भी सक्रिय हुईं ।

v. #कार्बोनीफेरस_काल (Carboniferous Period):

इस काल में कैलीडोनियन हलचलों का स्थान आर्मेरिकन हलचलों ने ले लिया, जिससे ब्रिटेन एवं फ्रांस सर्वाधिक प्रभावित हुए तथा इस युग में उभयचरों का विकास व विस्तार बढ़ता गया । रेंगने वाले जीव (Raptiles) का भी स्थल पर आविर्भाव हुआ।

इस काल में 100 फीट ऊँचे पेड़ भी उत्पन्न हुए । यह ‘बड़े वृक्षों (ग्लोसोप्टिरस वनस्पतियों) का काल’ कहलाता है । इस समय बने भ्रंशों में पेड़ों के दब जाने से गोंडवाना क्रम के चट्‌टानों का निर्माण हुआ, जिसमें कोयले के व्यापक निक्षेप मिलते हैं ।

vi. #पर्मियन_काल (Permian Age):

इस काल में वैरीसन हलचल हुई, जिसने मुख्य रूप से यूरोप को प्रभावित किया । जलवायु धीरे-धीरे शुष्क होने लगी तथा इस समय वैरीसन हलचल के फलस्वरूप भ्रंशों के निर्माण के कारण ब्लैक फॉरेस्ट व वास्जेज जैसे भ्रंशोत्थ पर्वतों का निर्माण हुआ ।

स्पेनिश मेसेटा, अल्ताई, तिएनशान, अप्लेशियन जैसे पर्वत भी इसी काल में निर्मित हुए । इस समय स्थल पर जीवों व वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों का विकास देखा गया । भ्रंशन के कारण उत्पन्न आंतरिक झीलों के वाष्पीकरण से पृथ्वी पर पोटाश भंडारों का निर्माण हुआ ।

3. #मध्यजीवी_महाकल्प (Mesozoic Era):

इसे द्वितीयक युग भी कहा जाता है ।

इसे ट्रियासिक, जुरैसिक व क्रिटेशियस कालों में बाँटा गया है:

i. #ट्रियासिक_काल (Triassic Period):

इस काल में स्थल पर बड़े-बड़े रेंगने वाले जीव का विकास हुआ । इसीलिए इसे ‘रेंगने वाले जीवों का काल’ (Age of Reptiles) कहा जाता है । यह काल आर्कियोप्टेरिक्स की उत्पत्ति का काल था । ये स्थल एवं आकाश दोनों में चल सकते थे ।

इस समय तीव्र गति से तैरने वाले लॉबस्टर (केकड़ा समूह का प्राणी) का उद्‌भव भी हुआ । स्तनधारी भी उत्पन्न होने लगे थे । मांसाहारी मत्स्यतुल्य रेप्टाइल्स सागरों में उत्पन्न हुए । रेप्टाइल्स में भी स्तनधारियों की उत्पत्ति हो गई थी ।

ii. #जुरैसिक_काल (Jurassic Period):

इस काल में मगरमच्छ के समान मुख और मछली के समान धड़ वाले जीव, डायनासोर रेप्टाइल्स का विस्तार हुआ एवं लॉबस्टर प्राणी बढ़ते चले गए तथा इस काल में जलचर, स्थलचर व नभचर तीनों का आविर्भाव हो गया था । जूरा पर्वत का सम्बंध इसी काल से जोड़ा जाता है । पुष्पयुक्त वनस्पतियाँ इसी काल में आई थीं ।

iii. #क्रिटेशियस_काल (Cretaceous Period):

इस काल में एंजियोस्पर्म (आवृत्तबीजी) पौधों का विकास प्रारंभ हुआ । बड़े-बड़े कछुओं का उद्‌भव भी इस काल में देखा गया । मैग्नेलिया व पोपनार जैसे शीतोष्ण पतझड़ वन के वृक्ष विकसित हुए । उत्तरी-पश्चिमी अलास्का, कनाडा, मैक्सिको, ब्रिटेन के डोबर क्षेत्र व आस्ट्रेलिया आदि में खड़िया मिट्‌टी का जमाव हुआ ।

पर्वतीकरण अत्यधिक सक्रिय था । रॉकी व एंडीज की उत्पत्ति आरंभ हो गई । भारत के पठारी भाग में क्रिटेशियस काल में ही ज्वालामुखी लावा का दरारी उद्‌भेदन हुआ, जिससे ‘दक्कन ट्रैप’ व काली मिट्‌टी का निर्माण हुआ है ।

4. #नवजीवी_महाकल्प (Cenozoic Era):

इस कल्प को तृतीयक या ‘टर्शियरी युग’ भी कहा जाता है । इसे पैल्योसीन, इओसीन, ओलीगोसीन, मायोसीन व प्लायोसीन कालों में बाँटा गया है । इसी कल्प के विभिन्न कालों में अल्पाइन पर्वतीकरण हुए तथा विश्व के सभी नवीन मोड़दार पर्वतों आल्प्स, हिमालय, रॉकी, एंडीज आदि की उत्पत्ति हुई ।

i. #पैल्योसीन_काल (Paleocene Period):

इस युग के दौरान हुई लैरामाइड हलचल के फलस्वरूप उत्तरी अमेरिका में रॉकी पर्वतमाला का निर्माण हुआ तथा स्थल पर स्तनपाइयों का विस्तार हुआ । इसी कल्प में सर्वप्रथम स्तनपाई (Mammalians) जीवों व पुच्छहीन बंदरों (Ape) का आविर्भाव हुआ ।

ii. #इओसीन_काल (Eocene Period):

इस युग में भूतल पर विभिन्न दरारों के माध्यम से ज्वालामुखी का उद्‌गार हुआ तथा स्थल पर रेंगने वाले जीव प्रायः विलुप्त हो गए । प्राचीन बंदर व गिब्बन म्यांमार में उत्पन्न हुए । हाथी, घोड़ा, रेनोसेरस (गैंडा), सूअर के पूर्वजों का आविर्भाव हुआ ।

iii. #ओलीगोसीन_काल (Oligocene Period):

इस काल में ‘अल्पाइन पर्वतीकरण’ प्रारंभ हुआ एवं इसी काल में बिल्ली, कुत्ता, भालू आदि की उत्पत्ति हुई । इसी काल में पुच्छहीन बंदर का आविर्भाव हुआ, जिसे मानव का पूर्वज कहा जा सकता है । ‘वृहत् हिमालय’ की उत्पत्ति का मुख्यकाल यही है ।

iv. #मायोसीन_काल (Miocene Period):

इस काल में अल्पाइन पर्वत निर्माणकारी गतिविधियों द्वारा सम्पूर्ण यूरोप एवं एशिया में वलनों का विकास हुआ, जिनके विस्तार की दिशा पूर्व-पश्चिम था ।

इस काल में बड़े आकार के (60 फीट) शार्क मछली, प्रोकानसल (पुच्छहीन बंदर), जल पक्षी (हंस, बत्तख) पेंग्विन आदि उत्पन्न हुए । हाथी का भी विकास इसी काल में हुआ । मध्य या लघु हिमालय की उत्पत्ति का मुख्य काल यही है ।

v. #प्लायोसीन_काल:

इस काल में समुद्रों के निरन्तर अवसादीकरण से यूरोप, मेसोपोटामिया, उत्तरी भारत, सिन्ध एवं उत्तरी अमेरिका में विस्तृत मैदानों का विकास हुआ तथा इस काल में बड़े स्तनपाई प्राणियों की संख्या में कमी आई । शार्क का विनाश हो गया, मानव के पूर्वज का विकास हुआ तथाआधुनिक स्तनपाइयों का आविर्भाव हुआ ।

शिवालिक की उत्पत्ति इसी काल में हुई । हिमालय पर्वतमाला एवं दक्षिण के प्रायद्वीपीय भाग के बीच स्थित जलपूर्ण द्रोणी टेथिस भू-सन्नति में अवसादों के जमाव से उत्तरी विशाल मैदान का आविर्भाव इसी काल में होने लगा था ।

5. #नूतन_महाकल्प (Neozoic Era):

इसे चतुर्थक युग भी कहा जाता है ।

प्लीस्टोसीन व होलोसीन इसके दो उपभाग हैं:

i. #प्लीस्टोसीन_काल (Pleistocene Period):

इस युग में तापमान का स्तर नीचे आ गया, जिसके कारण यूरोप ने क्रमशः चार हिमयुग देखा । जो इस प्रकार हैं- गुंज (Gunz), मिन्डेल (Mindel), रिस (Riss) एवं वुर्म (Wurm) । विभिन्न हिमकालों के बीच में अंतर्हिम काल (Inter Glacial Age) देखे गए जो तुलनात्मक रूप से उष्णकाल था । मिन्हेल व रिस के बीच का अंतर्हिम काल सर्वाधिक लम्बी अवधि का था ।

उत्तरी अमेरिका में इस समय नेब्रास्कन, कन्सान, इलीनोइन या आयोवा व विंस्कासिन हिमकाल देखे गए । नेब्रास्कन व कन्सान के बीच अफ्टोनियन, कन्सान व इलीनोइन के बीच यारमाउथ, इलीनोइन व विंस्कासिन के बीच संगमन अंतर्हिम काल था ।

इस युग के अंत में हिम चादर पिघलते चले गए एवं स्कैंडिनेवियन क्षेत्र की ऊँचाई में निरंतर वृद्धि हुई । पृथ्वी पर उड़ने वाले ‘पक्षियों का आविर्भाव’ प्लीस्टोसीन काल में ही माना जाता है । मानव तथा अन्य स्तनपाई जीव वर्तमान स्वरूप में इसी काल में विकसित हुए ।

ii. #होलोसीन_या_अभिनव_काल (Holocene or Innovative Period):

इस काल में तापमान वृद्धि के कारण प्लीस्टोसीन काल के हिम की समाप्ति हो गई तथा विश्व की वर्तमान दशा प्राप्त हुई जो अभी भी जारी है । इसी समय सागरीय जीव वर्तमान अवस्था को प्राप्त हुए । स्थल पर मनुष्य ने कृषि कार्य तथा पशुपालन प्रारंभ कर दिया ।

2

#विश्व_का_भूगोल :
#पृथ्वी_की_गतियां

पृथ्वी की गति दो प्रकार की है

▪️घूर्णन अथवा दैनिक गति – पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना घूर्णन कहलाता है।
▪️परिक्रमण अथवा वार्षिक गति– सूर्य के चारों ओर एक स्थिर कक्ष में पृथ्वी की गति को परिक्रमण कहते हैं।

#घूर्णन_अथवा_दैनिक_गति:

पृथ्वी सदैव अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व लट्‌टू की भांति घूमती रहती है, जिसे ‘पृथ्वी का घूर्णन या परिभ्रमण’ कहते हैं । इसके कारण दिन व रात होते हैं । अतः इस गति को ‘दैनिक गति’ भी कहते हैं ।

i. #नक्षत्र_दिवस :

एक मध्याह्न रेखा के ऊपर किसी निश्चित नक्षत्र के उत्तरोत्तर दो बार गुजरने के बीच की अवधि को नक्षत्र दिवस कहते हैं । यह 23 घंटे व 56 मिनट अवधि की होती है ।

ii. #सौर_दिवस :

जब सूर्य को गतिहीन मानकर पृथ्वी द्वारा उसके परिक्रमण की गणना दिवसों के रूप में की जाती है तब सौर दिवस ज्ञात होता है । इसकी अवधि पूरे 24 घंटे की होती है ।

#परिक्रमण_अथवा_वार्षिक_गति:

पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमने के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर एक अंडाकार मार्ग (Geoid) पर 365 दिन तथा 6 घंटे में एक चक्कर पूरा करती है । पृथ्वी के इस अंडाकार मार्ग को ‘भू-कक्षा’ (Earth Orbit) कहते हैं । पृथ्वी की इस गति को परिक्रमण या वार्षिक गति कहते हैं ।

i. #उपसौर :

पृथ्वी जब सूर्य के अत्यधिक पास होती है तो इसे उपसौर कहते हैं । ऐसी स्थिति 3 जनवरी को होती है ।

ii. #अपसौर :

पृथ्वी जब सूर्य से अधिकतम दूरी पर होती है तो इसे अपसौर कहते हैं । ऐसी स्थिति 4 जुलाई को होती है ।

#दिन_रात_का_छोटा_व_बड़ा_होना:

यदि पृथ्वी अपनी धुरी पर झुकी हुई न होती तो सर्वत्र दिन-रात बराबर होते । इसी प्रकार यदि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा न करती तो एक गोलार्द्ध में दिन सदा ही बड़े और रातें छोटी रहती जबकि दूसरे गोलार्द्ध में रातें बड़ी और दिन छोटे होते । परंतु विषुवतरेखीय भाग को छोड़कर विश्व के अन्य सभी भागों में विभिन्न ऋतुओं में दिन-रात की लम्बाई में अंतर पाया जाता है ।

विषुवत रेखा पर सदैव दिन-रात बराबर होते हैं, क्योंकि इसे प्रकाश वृत्त हमेशा दो बराबर भागों में बाँटता है । अतः विषुवत रेखा का आधा भाग प्रत्येक स्थिति में प्रकाश प्राप्त करता है ।

#पृथ्वी_पर_दिन_और_रात_की_स्थिति :

21 मार्च से 23 सितम्बर की अवधि में उत्तरी गोलार्द्ध सूर्य का प्रकाश 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त करता है । अतः यहाँ दिन बड़े एवं रातें छोटी होती हैं । जैसे-जैसे उत्तरी ध्रुव की ओर बढ़ते जाते हैं, दिन की अवधि भी बढ़ती जाती है ।

उत्तरी ध्रुव पर तो दिन की अवधि छः महीने की होती है । 23 सितम्बर से 21 मार्च तक सूर्य का प्रकाश दक्षिणी गोलार्द्ध में 12 घंटे या अधिक समय तक प्राप्त होता है ।

जैसे-जैसे दक्षिणी ध्रुव की ओर बढ़ते हैं, दिन की अवधि भी बढ़ती है । दक्षिणी ध्रुव पर इसी कारण छः महीने तक दिन रहता है । इस प्रकार उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव दोनों पर ही छः महीने तक दिन व छः महीने तक रात रहती है ।

#ऋतु_परिवर्तन :

चूंकि पृथ्वी न सिर्फ अपने अक्ष पर घूमती है वरन् सूर्य की परिक्रमा भी करती है । अतः पृथ्वी की सूर्य से सापेक्ष स्थितियाँ बदलती रहती हैं ।

पृथ्वी के परिक्रमण में चार मुख्य अवस्थाएँ आती हैं तथा इन अवस्थाओं में ऋतु परिवर्तन होते हैं:

i. #21_जून_की_स्थिति :

इस समय सूर्य कर्क रेखा पर लम्बवत् चमकता है । इस स्थिति को ग्रीष्म अयनांत (Summer Solistice) कहते हैं । वस्तुतः 21 मार्च के बाद सूर्य उत्तरायण होने लगता है तथा उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की अवधि बढ़ने लगती है, जिससे वहाँ ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है ।

21 जून को उत्तरी गोलार्द्ध में दिन की लम्बाई सबसे अधिक रहती है । दक्षिणी गोलार्द्ध में इस समय शीत ऋतु होती है । 21 जून के पश्चात् 23 सितम्बर तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है । परिणामस्वरूप धीरे-धीरे उत्तरी गोलार्द्ध में गर्मी कम होने लगती है ।

ii. #22_दिसम्बर_की_स्थिति :

इस समय सूर्य मकर रेखा पर लम्बवत् चमकता है । इस स्थिति को शीत अयनांत (Winter Solistice) कहते हैं । इस समय दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन की अवधि लम्बी व रात छोटी होती हैं ।

वस्तुतः सूर्य के दक्षिणायन होने अर्थात् दक्षिणी गोलार्द्ध में उन्मुख होने की प्रक्रिया 23 सितम्बर के बाद प्रारंभ हो जाती है, जिससे दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन बड़े व रातें छोटी होने लगती हैं ।

इस समय उत्तरी गोलार्द्ध में ठीक विपरीत स्थिति देखी जाती है । 22 दिसम्बर के उपरान्त 21 मार्च तक सूर्य पुनः विषुवत रेखा की ओर उन्मुख होता है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु की समाप्ति हो जाती है ।

iii. #21_मार्च_व_23_सितम्बर_की_स्थितियाँ :

इन दोनों स्थितियों में सूर्य विषुवत रेखा पर लम्बवत चमकता है । अतः इस समय समस्त अक्षांश रेखाओं का आधा भाग सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है । अतः सर्वत्र दिन व रात की अवधि बराबर होती है ।

इस समय दिन व रात की अवधि के बराबर रहने एवं ऋतु की समानता के कारण इन दोनों स्थितियों को ‘विषुव’ अथवा ‘सम रात-दिन’ (Equinox) कहा जाता है । 21 मार्च की स्थिति को ‘बसंत विषुव’ (Spring Equinox) एवं 23 सितम्बर वाली स्थिति को ‘शरद विषुव’ (Autumn Equinox) कहा जाता है ।

#ज्वार_भाटा :

सूर्य व चन्द्रमा की आकर्षण शक्तियों के कारण सागरीय जल के ऊपर उठने तथा गिरने को ‘ज्वार भाटा’ कहा जाता है । इससे उत्पन्न तरंगों को ज्वारीय तरंग कहते हैं । विभिन्न स्थानों पर ज्वार-भाटा की ऊँचाई में पर्याप्त भिन्नता होती है, जो सागर में जल की गहराई, सागरीय तट की रूपरेखा तथा सागर के खुले होने या बंद होने पर आधारित होती है ।

यद्यपि सूर्य चन्द्रमा से बहुत बड़ा है, तथापि सूर्य की अपेक्षा चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति का प्रभाव दोगुना है । इसका कारण सूर्य का चन्द्रमा की तुलना में पृथ्वी से दूर होना है ।

24 घंटे में प्रत्येक स्थान पर दो बार ज्वार भाटा आता है । जब सूर्य, पृथ्वी तथा चन्द्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं तो इस समय उनकी सम्मिलित शक्ति के परिणामस्वरूप दीर्घ ज्वार का अनुभव किया जाता है । यह स्थिति सिजिगी (Syzygy) कहलाती है । ऐसा पूर्णमासी व अमावस्या को होता है ।

इसके विपरीत जब सूर्य, पृथ्वी व चन्द्रमा मिलकर समकोण बनाते हैं तो चन्द्रमा व सूर्य का आकर्षण बल एक दूसरे के विपरीत कार्य करते हैं । फलस्वरूप निम्न ज्वार का अनुभव किया जाता है । ऐसी स्थिति कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष के सप्तमी या अष्टमी को देखा जाता है । लघु ज्वार सामान्य ज्वार से 20% नीचा व दीर्घ ज्वार सामान्य ज्वार से 20% ऊँचा होता है ।

पृथ्वी पर चन्द्रमा के सम्मुख स्थित भाग पर चन्द्रमा की आकर्षण शक्ति के कारण ज्वार आता है, किन्तु इसी समय पृथ्वी पर चन्द्राविमुखी भाग पर ज्वार आता है । इसका कारण पृथ्वी के घूर्णन को संतुलित करने के लिए अपकेन्द्री बल (Centrifugal Force) का शक्तिशाली होना है ।

उपरोक्त बलों के प्रभाव के कारण प्रत्येक स्थान पर 12 घंटे के बाद ज्वार आना चाहिए किन्तु यह प्रति दिन लगभग 26 मिनट की देरी से आता है । इसका कारण चन्द्रमा का पृथ्वी के सापेक्ष गतिशील होना है ।

कनाडा के न्यू ब्रंसविक तथा नोवा स्कोशिया के मध्य स्थित फंडी की खाड़ी में ज्वार की ऊँचाई सर्वाधिक (15 से 18 मी.) होती है, जबकि भारत के ओखा तट पर मात्र 2.7 मी. होती है ।

इंग्लैंड के दक्षिणी तट पर स्थित साउथैम्पटन में प्रतिदिन चार बार ज्वार आते हैं । ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ये दो बार इंग्लिश चैनल होकर एवं दो बार उत्तरी सागर से होकर विभिन्न अंतरालों पर वहाँ पहुँचते हैं ।

नदियों को बड़े जलयानों के लिए नौ संचालन योग्य बनाने में ज्वार सहायक होतेहैं । टेम्स और हुगली नदियों में प्रवेश करने वाले ज्वारीय धाराओं के कारण ही क्रमशः लंदन व कोलकाता महत्वपूर्ण पत्तन बन सके हैं । नदियों द्वारा लाए गए अवसाद भाटा के साथ बहकर समुद्र में चले जाते हैं तथा इस प्रकार डेल्टा निर्माण की प्रक्रिया में बाधा पहुँचती है ।

जल विद्युत के उत्पादन हेतु भी ज्वारीय ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है । फ्रांस व जापान में ज्वारीय ऊर्जा पर आधारित कुछ विद्युत केन्द्र विकसित किए गए हैं । भारत में खंभात की खाड़ी व कच्छ की खाड़ी में इसके विकास की अच्छी संभावना है ।

#ज्वार_भाटा_के_उत्पत्ति_की_संकल्पनाएँ :

i. न्यूटन का गुरूत्वाकर्षण बल सिद्धान्त (1687 ई.)
ii. लाप्लास का गतिक सिद्धान्त (1755 ई.)
iii. ह्वैवेल का प्रगामी तरंग सिद्धांत (1833 ई.)
iv. एयरी का नहर सिद्धांत (1842 ई.)
v. हैरिस का स्थैतिक तरंग सिद्धान्त

#सूर्यग्रहण_और_चन्द्रग्रहण :

पृथ्वी और चन्द्रमा दोनों को प्रकाश सूर्य से मिलता है । पृथ्वी पर से चन्द्रमा का एक भाग ही दिखता है, क्योंकि पृथ्वी और चन्द्रमा की घूर्णन गति समान है । पृथ्वी पर चन्द्रमा का सम्पूर्ण प्रकाशित भाग महीने में केवल एक बार अर्थात् पूर्णिमा (Full Moon) को दिखाई देता है ।

इसी प्रकार महीने में एक बार चन्द्रमा का सम्पूर्ण अप्रकाशित भाग पृथ्वी के सामने होता है तथा तब चन्द्रमा दिखाई नहीं देता; इसे अमावस्या (New Moon) कहते हैं ।

जब सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा एक सरल रेखा में होते हैं तो इस स्थिति को युति-वियुति (Conjuction) या सिजिगी (Syzygy) कहते हैं, जिसमें युति सूर्यग्रहण की स्थिति में व वियुति (Opposition) चन्द्रग्रहण की स्थिति में बनते हैं ।

जब पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा के बीच आ जाता है तो सूर्य की रोशनी चन्द्रमा तक नहीं पहुँच पाती तथा पृथ्वी की छाया के कारण उस पर अंधेरा छा जाता है । इस स्थिति को चन्द्रग्रहण (Lunar Eclipse) कहते हैं । चन्द्रग्रहण हमेशा पूर्णिमा की रात को होता है ।

सूर्यग्रहण की स्थिति तब बनती है, जब सूर्य एवं पृथ्वी के बीच चन्द्रमा आ जाए तथा पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश न पड़कर चन्द्रमा की परछाईं पड़े । सूर्यग्रहण (Solar Eclipse) हमेशा अमावस्या को होता है । प्रत्येक अमावस्या को सूर्यग्रहण एवं प्रत्येक पूर्णिमा को चन्द्रग्रहण लगना चाहिए, परंतु ऐसा नहीं होता क्योंकि चन्द्रमा अपने अक्ष पर 50 झुकाव लिए हुए है ।

जब चन्द्रमा और पृथ्वी एक ही बिंदु पर परिक्रमण पथ में पहुँचती हैं तो उस समय चन्द्रमा अपने अक्षीय झुकाव के कारण थोड़ा आगे निकल जाता है ।

इसी कारण प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या की स्थिति में ग्रहण नहीं लगता एक वर्ष में अधिकतम सात चन्द्रग्रहण एवं सूर्यग्रहण की स्थिति हो सकती है पूर्ण सूर्यग्रहण देखे जाते हैं, परंतु पूर्ण चन्द्र ग्रहण प्रायः नहीं देखा जाता, क्योंकि सूर्य, चन्द्रमा एवं पृथ्वी के आकार में पर्याप्त अंतर है ।

22 जुलाई, 2009 को 21वीं सदी का सबसे लंबा पूर्ण सूर्यग्रहण देखा गया । सूर्यग्रहण के समय बड़ी मात्रा में पराबैंगनी (Ultra Violet) किरणें उत्सर्जित होती हैं इसीलिए नंगी आँखों से सूर्य ग्रहण देखने से मना किया जाता है । पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सूर्य के परिधीय क्षेत्रों में हीरक वलय (Diamond Ring) की स्थिति बनती है ।


3

#विश्व_का_भूगोल :
#अक्षांश_और_देशांतर_रेखाएं

पृथ्वी में किसी स्थान की भौगोलिक स्थिति का निर्धारण अक्षांश (latitude) और देशांतर (Longitude) रेखाओं द्वारा किया जाता है।

किसी स्थान का अक्षांश (latitude), धरातल पर उस स्थान की  “उत्तर से दक्षिण” की स्थिति को तथा किसी स्थान का देशांतर (Longitude), धरातल पर उस स्थान की “पूर्व से पश्चिम” की स्थिति को प्रदर्शित करता है। उत्तरी ध्रुवों (North Pole) व दक्षिणी ध्रुवों (South Pole) के अक्षांश (latitude) क्रमशः 90° उत्तर तथा 90° दक्षिण है।

नोट : किसी भी स्थान के देशांतर (Longitude) को प्रधान याम्योत्तर (Prime Mediterranean) के सापेक्ष अभिव्यक्त किया जाता है।

#अक्षांश_रेखाएँ (Latitude lines)

भूमध्य रेखा (Equator) के समानांतर से किसी भी स्थान की उत्तरी अथवा दक्षिणी ध्रुव की ओर की ओर खींची गई रेखाओं को अक्षांश (latitude) रेखा कहते है। भूमध्य रेखा (Equator) को (0°) की अक्षांश रेखा माना गया है। भूमध्य रेखा (Equator) से उत्तरी ध्रुव की ओर की सभी दूरियाँ उत्तरी अक्षांश और दक्षिणी ध्रुव की ओर की सभी दूरियाँ दक्षिणी अक्षांश में मापी जाती है। ध्रुवों की ओर बढ़ने पर भूमध्य रेखा (Equator) से अक्षांश (latitude) की दूरी बढ़ने लगती है। इसके अतिरिक्त सभी अक्षांश रेखाएँ (Latitude lines) परस्पर समानांतर और पूर्ण वृत्त होती हैं। ध्रुवों की ओर जाने से वृत्त छोटे होने लगते हैं। 90° का अक्षांश ध्रुव पर एक बिंदु में परिवर्तित हो जाता है।

#महत्वपूर्ण_वृत्त

▪️विषुवत् वृत्त (0°) (E)
▪️उत्तर ध्रुव (90°)
▪️दक्षिण ध्रुव (90°)

#महत्त्वपूर्ण_अक्षांश_रेखाएँ

▪️विषुवत्  रेखा (0°) (Equator Line)
▪️उत्तरी गोलार्ध में कर्क रेखा (23.5°) (Cancer Line)
▪️दक्षिणी गोलार्ध में मकर रेखा (23.5°)  (Capcorian line)

#पृथ्वी_के_ताप_कटिबंध

#उष्ण_कटिबंध – कर्क रेखा एवं मकर रेखा के बीच के सभी अक्षांशों पर सूर्य वर्ष में एक बार दोपहर में सिर के ठीक ऊपर होता है। इसलिए इस क्षेत्र में सबसे अधिक ऊष्मा प्राप्त होती है तथा इसे उष्ण कटिबंध कहा जाता है। कर्क रेखा तथा मकर रेखा के बाद किसी भी अक्षांश पर दोपहर का सूर्य कभी भी सिर के ऊपर नहीं होता है। ध्रुव की तरफ सूर्य की किरणें तिरछी होती जाती हैं।

#शीतोष्ण_कटिबंध – उत्तरी गोलार्ध में कर्क रेखा एवं उत्तर ध्रुव वृत्त तथा दक्षिणी गोलार्ध में मकर रेखा एवं दक्षिण ध्रुव वृत्त के बीच वाले क्षेत्र का तापमान मध्यम रहता है। इसलिए इन्हें, शीतोष्ण कटिबंध कहा जाता है।

#शीत_कटिबंध – उत्तरी गोलार्ध में उत्तर ध्रुव वृत्त एव  उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण ध्रुव वृत्त एव  दक्षिणी ध्रुव  के बीच के क्षेत्र में ठडं बहतु होती है। क्योंकि, यहाँ सूर्य क्षितिज से ज़्यादा ऊपर नहीं आ पाता है। इसलिए ये शीत कटिबंध कहलाते हैं।

#देशांतर_रेखाएँ (Longitudes lines)

उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव को मिलाने वाली 360 डिग्री रेखाओं को देशांतर रेखाएं कहा जाता है, यह ग्‍लोब पर उत्तर से दक्षिण  दोनों भूगोलीय ध्रुवों (उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव ) के बीच खींची हुई काल्पनिक मध्याह्न रेखाओं को देशांतर रेखाएं कहा जाता है । जो मध्याह्न रेखा जिस बिंदु या स्थान से गुजरती है उसका कोणीय मान उस स्थान का देशांतर होता है। सभी देशांतर रेखाएं अर्ध-वृत्ताकार होती हैं। ये समांनांतर नहीं होती हैं व उत्तरी व दक्षिणी ध्रुवों पर अभिसरित होकर मिल जाती हैं।

ग्रीनविच , जहाँ ब्रिटिश राजकीय वेधशाला स्थित है, से गुजरने वाली याम्योत्तर से पूर्व और पश्चिम की ओर गिनती शुरू की जाए। इस याम्योत्तर को प्रमुख याम्योत्तर (Prime Mediterranean)  कहते हैं। इसका मान 0° देशांतर है तथा यहाँ से हम 180° पूर्व या 180° पश्चिम तक गणना करते हैं। प्रधान याम्योत्तर (Prime Mediterranean) तथा 180° याम्योत्तर मिलकर पृथ्वी को दो समान भागों, पूर्वी गोलार्ध एवं पश्चिमी गोलार्ध में विभक्त करती है। इसलिए किसी स्थान के देशांतर के आगे पूर्व के लिए अक्षर पू. तथा पश्चिम के लिए अक्षर प. का उपयोग करते हैं।  180° पूर्व और 180° पश्चिम याम्योत्तर एक ही रेखा पर स्थित हैं।

#देशांतर_और_समय (Longitude & Time)

समय को मापने का सबसे अच्छा साधन पृथ्वी, चंद्रमा एवं ग्रहों की गति है। सूर्योदय एवं सूर्यास्त प्रतिदिन होता है। अतः स्वाभाविक ही है कि यह पूरे विश्व में समय निर्धारण का सबसे अच्छा साधन है। स्थानीय समय का अनुमान सूर्य के द्वारा बनने वाली परछाईं से लगाया जा सकता है, जो दोपहर में सबसे छोटी एवं सूर्योदय तथा सूर्यास्त केसमय सबसे लंबी होती है।

ग्रीनविच  पर स्थित प्रमुख याम्योत्तर पर सूर्य जिस समय आकाश के सबसे ऊँचे बिंदु पर होगा, उस समय याम्योत्तर पर स्थित सभी स्थानों
पर दोपहर होगी। चूँकि, पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर चक्कर लगाती है, अतः वे स्थान जो  ग्रीनविच  के पूर्व में हैं, उनका समय ग्रीनविच समय से आगे होगा तथा जो पश्चिम में हैं, उनका समय पीछे होगा ।

भारत के मध्य भाग इलाहाबाद के मिर्जापुर के नैनी से होकर गुजरने वाली  याम्योत्तर रेखा (82,1/2°) (Standard Mediterranean Line) के स्थानीय समय को देश का मानक समय माना जाता है।
पृथ्वी लगभग 24 घंटे में अपने अक्ष पर 360° घूम जाती है अर्थात्  1 घंटे में (360/24) 15°  एवं 4 मिनट में 1° घूमती है। अर्थात डिग्री देशांतर दुरी तय करने में 4 Minute का समय लगता है
भारत में गुजरात के द्वारका तथा असम के डिब्रूगढ़ वेफ स्थानीय समय में लगभग 1 घंटा 45 मिनट का अंतर है।
भारत और ग्रीनविच (लंदन) के समय में 5:30 घंटे का अंतर  है , इसलिए जब लंदन में दोपहर के 2 बजे होंगे, तब भारत में शाम के 7ः30 बजे होंगे।
कुछ देशों का देशांतरीय विस्तार अधिक होता है, जिसके कारण वहाँ एक से अधिक मानक समय अपनाए गए हैं। उदाहरण के लिए, रूस में 11 मानक समयों को अपनाया गया है।
विषुवत रेखा पर इसके बीच की दूरी अधिकतम 111.32 Km होती है।

Wonderful Questions

प्रश्नों का संकलन बहुत ही सुन्दर ढंग से किया गया है...


बहुत आराम से पढ़िएगा मजा अन्तिम में आएगा। हमने आपको बता दिया खैर कोई बात नहीं आनंदित होइए ।।


*1.* क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का देश में कौन सा स्थान है ?
*2.* मोदी सरकार का यह  कौन-सा कार्यकाल है ?
*3.* कितने चम्मच से एक टेबल स्पून बनता है ?
*4*  हिन्दू पुराणों में कितने वेद होते हैं ?
*5*. राष्ट्रपति का कार्यकाल कितने-कितने वर्ष का होता है ?
*6*. भारत की तुलना में और कितने देशों का क्षेत्रफल बड़ा  है ?
*7.* पानी का Ph. मान क्या होता है ?
*8*. सौर मण्डल में कुल कितने ग्रह हैं ?
*9*.संविधान की कौन सी अनुसूची प्रथम संशोधन द्वारा शामिल की गयी ?
*10.* कितने मिलीमीटर का एक सेण्टीमीटर बनता है ?
*11.* एक फुटबॉल टीम में कितने खिलाड़ी होते हैं ?
*12.* कितने इंच का एक फीट  होता है ?
*13* उद्देश्य प्रस्ताव दिसम्बर की किस तारीख को प्रस्तुत किया गया था ?
*14*. लोकसभा में पारित बजट को राज्यसभा कितने दिनों तक रोक सकती है ?
*15.* एक समय का वाहन कर कितने वर्षों के लिए वैध होता है ?
*16.* शटल कॉक में कितने पंख होते हैं ?
*17*. भारतीय मुद्रा में कितनी भाषाएँ छपी होती हैं ?
*18*. महाभारत में कुल कितने अध्याय हैं ?
*19*.वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार संविधान के किस अनुच्छेद में है ?
*20*. टी -20 क्रिकेट में प्रति टीम कितने ओवर होते हैं ?
*21*. महात्मा गाँधी ने दक्षिण अफ्रीका में कुल कितने वर्ष गुजारे थे ?
*22*. भारत के संविधान में मूलतः कितने भाग हैं ?
*23*.मानव शरीर में कुल कितने जोड़ी गुणसूत्र (क्रोमोजोम) होते हैं ?
*24*. एक अशोक चक्र में कुल कितनी लाइन्स होती हैं ?
*25*. M.L.A. बनने के लिए कम से कम कितने वर्ष आयु की अनिवार्यता होती है ?

                *.....*उत्तर*....*

*सभी प्रश्नों के उत्तर उनके *क्रमांक* ही हैं।

                       🙏🏻🙏🏻

Wednesday, June 10, 2020

चार_युग_और_उनकी_विशेषताएं

चार_युग_और_उनकी_विशेषताएं

#युग शब्द का अर्थ होता है एक निर्धारित संख्या के वर्षों की काल-अवधि। जैसे सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग आदि। आज में हम चारों युगों का वर्णन करेंगें। युग वर्णन से तात्पर्य है कि उस युग में किस प्रकार से व्यक्ति का जीवन, आयु, ऊँचाई, एवं उनमें होने वाले अवतारों के बारे में विस्तार से परिचय देना। प्रत्येक युग के वर्ष प्रमाण और उनकी विस्तृत जानकारी कुछ इस तरह है –

⚜️ #सत्ययुग- यह प्रथम युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

सत्ययुग का तीर्थ – पुष्कर है ।

इस युग में पाप की मात्र – 0 विश्वा अर्थात् (0%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 20 विश्वा अर्थात् (100%) होती है !

इस युग के अवतार – मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह (सभी अमानवीय अवतार हुए) है ! अवतार होने का कारण – शंखासुर का वध एंव वेदों का उद्धार, पृथ्वी का भार हरण, हरिण्याक्ष दैत्य का वध, हिरण्यकश्यपु का वध एवं प्रह्लाद को सुख देने के लिए।

इस युग की मुद्रा – रत्नमय है ।
इस युग के पात्र – स्वर्ण के है ।
काल - 17,28000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई - 32 फ़ीट
आयु - 1 लाख वर्ष

⚜️ 2) #त्रेतायुग – यह द्वितीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

त्रेतायुग का तीर्थ – नैमिषारण्य है ।

इस युग में पाप की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।
इस युग के अवतार – वामन, परशुराम, राम (राजा दशरथ के घर)

अवतार होने के कारण – बलि का उद्धार कर पाताल भेजा, मदान्ध क्षत्रियों का संहार, रावण-वध एवं देवों को बन्धनमुक्त करने के लिए ।

इस युग की मुद्रा – स्वर्ण है ।
इस युग के पात्र – चाँदी के है ।
काल - 12,96,000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई - 21 फ़ीट
आयु - 10,000 वर्ष

⚜️ 3) #द्वापरयुग – यह तृतीय युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

द्वापरयुग का तीर्थ – कुरुक्षेत्र है ।

इस युग में पाप की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 10 विश्वा अर्थात् (50%) होती है ।
इस युग के अवतार – कृष्ण, (देवकी के गर्भ से एंव नंद के घर पालन-पोषण)।

अवतार होने के कारण – कंसादि दुष्टो का संहार एंव गोपों की भलाई, दैत्यो को मोहित करने के लिए ।
इस युग की मुद्रा – चाँदी है ।
इस युग के पात्र – ताम्र के हैं ।
काल - 8,64,000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई - 11 फ़ीट
आयु - 1,000 वर्ष

⚜️ 4) #कलियुग – यह चतुर्थ युग है इस युग की विशेषताएं इस प्रकार है –

कलियुग का तीर्थ – गंगा है ।

इस युग में पाप की मात्रा – 15 विश्वा अर्थात् (75%) होती है ।
इस युग में पुण्य की मात्रा – 5 विश्वा अर्थात् (25%) होती है ।
इस युग के अवतार – कल्कि (ब्राह्मण विष्णु यश के घर) ।

अवतार होने के कारण – मनुष्य जाति के उद्धार अधर्मियों का विनाश एंव धर्म कि रक्षा के लिए।

इस युग की मुद्रा – लोहा है।
इस युग के पात्र – मिट्टी के है।
काल - 4,32,000 वर्ष
मनुष्य की लंबाई - 5.5 फ़ीट
आयु - 60-100 वर्ष.

Tuesday, June 9, 2020

Special इंडिया या About India

Special इंडिया या About India...

भारत के आविष्कार व खोज...

*पाई का मान भारत की देन है।*

*योग की शुरूआत भारत में हुई।*

*70% मसाले भारत की देन है।*

*शैंपू का आविष्कार भारत में हुआ।*

*बटन का आविष्कार भारत में हुआ।*

*लोहे का आविष्कार भारत में हुआ।*

*चीनी का आविष्कार भारत में हुआ।*

*स्याही का आविष्कार भारत में हुआ।*

*USB का आविष्कार भारत में*

*चाँद पर पानी की खोज भारत ने की।*

*Ruler का आविष्कार भारत में हुआ।*

*Chess का आविष्कार भारत में हुआ।*

*दशमलव का आविष्कार भारत में हुआ*

*बाइनरी कोड का आविष्कार भारत में हुआ।*

*पेंटियम चिप का आविष्कार भारत में हुआ।*

*स्केल (फुटा) का आविष्कार भारत में हुआ।*

*ताश के खेल का आविष्कार भारत में हुआ।*

*फ्लश टॉयलेट का आविष्कार भारत में हुआ।*

*प्लास्टिक सर्जरी का आविष्कार भारत में हुआ।*

*नौकायन की कला का आविष्कार भारत में हुआ।*

*ऑप्टिकल फाइबर का आविष्कार भारत में हुआ।*

*Steel का उत्पादन करने वाला भारत पहला देश है।*

*0, Zero का आविष्कार भारत के आर्यभट्ट ने किया।*

*सांप-सीढ़ी और लूडो के खेल का आविष्कार भारत में हुआ।*

*दुनिया के पहले फिंगरप्रिंट ब्यरों की स्थापना 1897 में भारत में हुई।*

*दुनिया की पहली मोतियाबिंद सर्जरी भारत में हुई!!*

*दुनिया का पहला विश्वविद्यालय ‘तक्षशिला’ भारत में है!!*

आधुनिक_भारत_का_इतिहास

आधुनिक_भारत_का_इतिहास

#खिलाफ़त_और_असहयोग_आन्दोलन

ब्रिटिश शासन के प्रति बढ़ते क्रोध ने खिलाफत आन्दोलन और असहयोग आन्दोलन को जन्म दिया| तुर्की ने प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन के विरुद्ध भाग लिया था| तुर्की,जोकि पराजित देशों में से एक था,के साथ ब्रिटेन ने अन्याय किया|1919 ई. में मोहम्मद अली और शौकत अली (अली बंधुओं के नाम से प्रसिद्ध), मौलाना अबुल कलाम आज़ाद,हसरत मोहानी व कुछ अन्य के नेतृत्व में तुर्की के साथ हुए अन्याय के विरोध में खिलाफत आन्दोलन चलाया गया| तुर्की के सुल्तान को खलीफा अर्थात मुस्लिमों का धर्मगुरु भी माना जाता था| अतः तुर्की के साथ हुए अन्याय के मुद्दे को लेकर जो आन्दोलन शुरू हुआ,उसे ही खिलाफत आन्दोलन कहा गया| इसने असहयोग का आह्वाहन किया| खिलाफत के मुद्दे को लेकर शुरू हुआ आन्दोलन जल्द ही स्वराज और पंजाब में दमन के विरोध में चलाये जा रहे आन्दोलन के साथ मिल गया| गाँधी जी नेतृत्व में 1920 ई. में कलकत्ता में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में पहली बार और बाद में नागपुर के कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में सरकार के विरुद्ध संघर्ष हेतु एक नए कार्यक्रम को स्वीकृत किया गया | नागपुर अधिवेशन,जिसमे 15000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था,में कांग्रेस के संविधान में संशोधन किया गया और “वैधानिक व शांतिपूर्ण तरीकों से भारतीयों के द्वारा स्वराज्य की प्राप्ति” को कांग्रेस के संविधान का प्रथम प्रावधान बना दिया गया|

यह आन्दोलन तुर्की और पंजाब में हुए अन्याय के विरोध और स्वराज्य की प्राप्ति के लिए शुरू हुआ था| इसमें अपनाये गए तरीकों के कारण इसे असहयोग आन्दोलन कहा गया, इसकी शुरुआत ब्रिटिशों द्वारा भारतीयों को प्रदान की जाने वाली ‘सर’ की उपाधि की वापसी के साथ हुई| सुब्रमण्यम अय्यर और रबिन्द्रनाथ टैगोर पहले ही ऐसा कर चुके थे| अगस्त 1920 में गाँधी ने अपनी कैसर-ए-हिन्द की उपाधि लौटा दी | अन्य लोगों ने भी ऐसा ही किया| ब्रिटिश सरकार से इन उपाधियों का प्राप्त करना अब भारतीयों के लिए सम्मान का विषय नहीं रह गया अतः सरकार के साथ असहयोग किया गया| बाद में विधायिकाओं का भी बहिष्कार किया गया|

अनेक लोगों ने विधायिकाओं के चुनाव में अपना मत देने से इंकार कर दिया| हजारों छात्रों व शिक्षकों ने स्कूलों व कॉलेजों को छोड़ दिया| जामिया मिलिया इस्लामिया,अलीगढ (जो बाद में दिल्ली में स्थापित हो गया था) और कशी विद्यापीठ,बनारस जैसे नए शिक्षा संस्थानों की स्थापना राष्ट्रवादियों द्वारा की गयी| सरकारी कर्मचारियों ने अपनी नौकरी छोड़ दी,वकीलों ने न्यायालयों का बहिष्कार किया,विदेशी वस्तुओं की होली जलाई गयी और पूरे देश में बंद व हड़तालों का आयोजन किया गया| आन्दोलन को अपार सफलता मिली और गोलीबारी व गिरफ्तारियां इसे रोक न सकीं|

वर्ष 1921 की समाप्ति से पूर्व तक लगभग 30,000 लोगों को जेल में डाल दिया गया था| इनमे कई प्रमुख नेता भी शामिल थे| गाँधी जी को किसी भी तरह से अभी गिरफ्तार नहीं किया जा सका था| केरल के कुछ हिस्सों में विद्रोह भड़क गया जिसमे ज्यादातर विद्रोही मोपला किसान थे,इसीलिए इसे मोपला विद्रोह कहा गया| विद्रोह को क्रूर तरीकों से दबा दिया गया | 2000 से ज्यादा मोपला विद्रोही मार दिए गए और 45,000 को गिरफ्तार कर लिया गया| एक स्थान से दुसरे स्थान पर ले जाते समय 67 कैदियों की एक रेलवे वैगन में दम घुटने से हुई मृत्यु इस क्रूरता का ही जीता जागता उदाहरण था|

1921 का कांग्रेस अधिवेशन अहमदाबाद में आयोजित हुआ था जिसकी अध्यक्षता हकीम अजमल खान  ने की थी| इस अधिवेशन में आन्दोलन को जारी रखने का निर्णय किया गया और असहयोग आन्दोलन के अंतिम चरण की शुरुआत करने का भी निर्णय किया गया|इस चरण की शुरुआत लोगों से कर अदा न करने की अपील के साथ होनी थी| इसकी शुरुआत गांधीजी ने गुजरात के बारदोली से की | यह चरण बहुत महत्वपूर्ण था क्योंकि जब लोग सरकार को कर अदा करना से मन कर देंगे तो सरकार की वैधानिकता पर ही प्रश्नचिह्न लग जायेगा| गाँधी जी हमेशा इस बात पर बल दिया कि पूरा आन्दोलन शंतिपूर्ण ढंग से होना चाहिए| लेकिन लोग स्वयं को संयमित नहीं रख सके |उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा में 5 फरवरी ,1922 को पुलिस ने बगैर किसी पूर्व सूचना के प्रदर्शन कर रही भीड़ पर गोली चला दी | लोगों ने गुस्से में आकर पुलिस स्टेशन पर धावा बोल दिया और उसमे आग लगा दी| पुलिस स्टेशन के अन्दर कैद 22 पुलिस वाले इस आग में मारे गए| चूँकि गाँधी जी ने यह शर्त रखी थी कि पूरा आन्दोलन शंतिपूर्ण होगा अतः इस घटना की खबर सुनने के बाद ही उन्होंने आन्दोलन को वापस ले लिया |

10 मार्च,1922 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और छह साल की सजा सुनाई गयी| इस आन्दोलन को वापस लेने के साथ ही राष्ट्रवादी आन्दोलन का एक और चरण समाप्त हो गया| इस आन्दोलन में पुरे देश से लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया था| यह गावों तक फ़ैल गया था|
[09/06, 8:55 AM] Raj Kumar: #आधुनिक_भारत_का_इतिहास :
#साइमन_कमीशन

भारत में 1922 के बाद से जो शांति छाई हुई थी वह 1927 में आकर टूटी|इस साल ब्रिटिश सरकार ने साइमन आयोग का गठन सर जॉन साइमन के नेतृत्व में भारत में भारतीय शासन अधिनियम -1919 की कार्यप्रणाली की जांच करने और प्रशासन में  सुधार हेतु सुझाव देने के लिए किया|इसके अध्यक्ष सर जॉन साइमन के नाम पर इस आयोग को साइमन आयोग के नाम से जाना गया|इसकी नियुक्ति भारतीय लोगों के लिए एक झटके जैसी थी क्योकि इसके सारे सदस्य अंग्रेज थे और एक भी भारतीय सदस्य को इसमें शामिल नहीं किया गया था|सरकार ने स्वराज की मांग के प्रति कोई झुकाव प्रदर्शित नहीं किया|आयोग की संरचना ने भारतियों की शंका को सच साबित कर दिया|आयोग की नियुक्ति से पूरे भारत में विरोध प्रदर्शनों की लहर सी दौड़ गयी|

1927 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मद्रास में आयोजित किया गया जिसमे आयोग के बहिष्कार का निर्णय लिया गया|मुस्लिम लीग ने भी इसका बहिष्कार किया|आयोग 3 फरवरी 1928 को भारत पहुंचा और इस दिन विरोधस्वरूप पुरे भारत में हड़ताल का आयोजन किया गया|उस दिन दोपहर के बाद,आयोग के गठन की निंदा करने के लिए,पूरे भारत में सभाएं की गयीं और यह घोषित किया कि भारत के लोगों का इस आयोग से कोई लेना-देना नहीं है|मद्रास में इन प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलायीं गयीं और अनेक अन्य जगहों पर लाठी-चार्ज की गयीं|आयोग जहाँ भी गया उसे विरोध प्रदर्शनों और हड़तालों का सामना करना पड़ा|केंद्रीय विधायिका ने बहुमत से यह निर्णय लिया कि उसे इस आयोग से कुछ लेना-देना नहीं है|पूरा भारत ‘साइमन वापस जाओ’ के नारे से गूँज रहा था|

पुलिस ने दमनात्मक उपायों का सहारा लिया और हजारों लोगों की पिटायी की गयी |इन्हीं विरोध प्रदर्शनों के दौरान शेर-ए-पंजाब नाम से प्रसिद्ध महान नेता लाला लाजपत राय की पुलिस द्वारा बर्बरता से पिटाई की गयी| पुलिस द्वारा की पिटायी से लगीं चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गयी|लखनऊ में नेहरु और गोविन्द बल्लभ पन्त को भी पुलिस की लाठियां खानी पड़ीं| इन लाठियों की मार ने गोविन्द बल्लभ पन्त को जीवन भर के लिए अपंग बना दिया था|

साइमन आयोग के विरोध के दौरान भारतियों ने एक बार फिर प्रदर्शित कर दिया कि वे स्वतंत्रता के एकजुट और द्रढ़प्रतिज्ञ हैं|उन्होंने स्वयं को अब एक बड़े संघर्ष के लिए तैयार कर लिया|डॉ. एम.ए.अंसारी की अध्यक्षता में मद्रास में हुए कांग्रेस के अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित किया गया और पूर्ण स्वतंत्रता की प्राप्ति को भारत के लोगों का लक्ष्य घोषित किया गया|यह प्रस्ताव नेहरु द्वारा प्रस्तुत किया गया था और एस.सत्यमूर्ति ने इसका समर्थन किया था|इसी दौरान पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को मजबूती से प्रस्तुत करने के लिए इन्डियन इंडिपेंडेंस लीग नाम के एक संगठन की स्थापना की गयी|लीग का नेतृत्व जवाहर लाल नेहरु,सुभाष चन्द्र बोस व उनके बड़े भाई शरत चन्द्र बोस,श्रीनिवास अयंगर,सत्यमूर्ति जैसे महत्वपूर्ण नेताओं ने किया|

दिसंबर 1928 में मोतीलाल नेहरु की अध्यक्षता में कलकत्ता में कांग्रेस का सम्मलेन आयोजित हुआ|इस सम्मलेन में जवाहर लाल नेहरु,सुभाष चन्द्र बोस और कई एनी नेताओं ने कांग्रेस पर पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करने के लिए दबाव डाला|लेकिन कांग्रेस ने डोमिनियन दर्जे की मांग से सम्बंधित प्रस्ताव पारित किया जोकि पूर्ण स्वतंत्रता की तुलना में कमतर थी| लेकिन यह घोषित किया गया कि अगर एक साल के भीतर डोमिनियन का दर्जा भारत को प्रदान नहीं किया गया तो कांग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करेगी और उसकी प्राप्ति के लिए एक जन-आन्दोलन भी चलाएगी|1929 के पूरे साल के दौरान इन्डियन इंडिपेंडेंस लीग पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को लेकर लोगों को रैलियों के माध्यम से तैयार करती रही|जब तक कांग्रेस का अगला वार्षिक अधिवेशन आयोजित होता तब तक लोगों की सोच में परिवर्तन आ चुका था|

#निष्कर्ष

साइमन आयोग का गठन सर जॉन साइमन के नेतृत्व में भारत में संवैधानिक प्रणाली की कार्यप्रणाली की जांच करने और उसमे बदलाव हेतु सुझाव देने के लिए किया गया था|इसका औपचारिक नाम ‘भारतीय संविधायी आयोग’ था और इसमें ब्रिटिश संसद के दो कंजरवेटिव,दो लेबर और एक लिबरल सदस्य शामिल थे|आयोग का कोई भी सदस्य भारतीय नहीं था|इसीलिए उनके भारत आगमन का स्वागत ‘साइमन वापस जाओ’ के नारे के साथ किया गया था|विरोध प्रदर्शन को शांत करने के लिए वायसराय लॉर्ड इरविन ने अक्टूबर 1929 में भारत को ‘डोमिनियन’ का दर्जा देने की घोषणा की और भविष्य के संविधान पर विचार-विमर्श करने के लिए गोलमेज सम्मेलनों को आयोजित करने की भी घोषणा की गयी|


 #आंग्ल_मैसूर_युद्ध

मैसूर राज्य तथा अंग्रेजों के मध्य हुए संघर्ष को आंग्ल-मैसूर युद्ध के नाम से जाना जाता है। 1767-1799 के बीच कुल 4 युद्ध लड़े गए और इन आंग्ल-मैसूर युद्ध के पीछे कई कारण थे जिनमें से कुछ कारण निम्न हैं-

▪️हैदर अली के उत्कर्ष से अंग्रेज उसे अपने प्रमुख प्रतिद्वन्द्वी के रूप में देखने लगे थे।
▪️अंग्रेजों और हैदर अली के मध्य संघर्ष होने का एक प्रमुख कारण यह भी था कि दोनों ही अपने क्षेत्र में वृद्धि करने को उत्सुक थे।
▪️अंग्रेजों का मराठों तथा हैदराबाद के निजाम के साथ साठ-गाँठ करना हैदर अली की आँखों में खटकता रहा।
▪️हैदर अली अंग्रेजों के कट्टर विरोधी फ्रांसीसियों की ओर अधिक आकर्षित था।
▪️हैदर अली अपनी नौ-सेना बनाना चाहता था, जिसके लिए उसने अपनी सीमाओं का विस्तार समुद्र तट तक करने का प्रयास किया। पर अंग्रेजों ने उसके हर प्रयास को असफल करा और गुन्टूर तथा माही पर अधिकार कर लिया।

#4_आंग्ल_मैसूर_युद्ध (1767-1799)

#प्रथम_आंग्ल_मैसूर_युद्ध (1767-1769)

▪️अंग्रेजों ने मराठों और हैदराबाद के निजाम के साथ मिलकर मैसूर पर हमला किया। अंग्रेजों का नेतृत्व जनरल जोसेफ स्मिथ ने किया।
▪️हैदर अली ने कूटनीति का प्रयोग कर मराठों और हैदराबाद के निजाम को अपनी तरफ मिला लिया और इस युद्ध में अंग्रेजों को बुरी तरह हराया।
▪️उसने मराठों और निजाम के साथ मिलकर मद्रास को घेर लिया। जिससे अंग्रेज बुरी तरह भयभीत हो गये और उन्होंने 4 अप्रैल, 1769 को मद्रास की संधि कर ली। संधि के तहत –
▪️अंग्रेज बंदियों को छोड़ दिया गया।
▪️दोनो एक दूसरे के क्षेत्र पर कब्जा छोड़ेंगे।
▪️अंग्रेज युद्ध के दौरान हुयी युद्ध हानि का जुर्माना भरेंगे।
▪️किसी भी विपत्ति के समय दोनों एक दूसरे का सहयोग करेंगे।

▪️परन्तु अंग्रेजों ने धोखा दिया और 1771 में जब तीसरी बार मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया तब अंग्रेजों ने हैदर अली की मद्द करने से इनकार कर दिया। जिस कारण हैदर अली जब तक जिया तब तक अंग्रेजों से नफरत करता रहा।

#द्वितीय_आंग्ल_मैसूर_युद्ध (1780-1784)

▪️प्रथम युद्ध की संधि केवल नाम मात्र की थी। संधि होने के बावजूद भी अंग्रेजों तथा हैदर अली के मध्य संबंध अच्छे नहीं थे। अंग्रेजों को बस अपना काम निकालना था।
▪️1773 में गवर्नर जनरल का पद शुरू हो गया था। 1780 के दौरान बंगाल का गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स था।
▪️इस युद्ध में हैदर अली ने मराठों और हैदराबाद के निजाम के साथ मिलकर अंग्रेजी सेना के साथ युद्ध किया। अंग्रेज कर्नल बेली को हराकर कर्नाटक की राजधानी अर्काट पर अधिकार कर लिया।
▪️परन्तु 7 दिसंबर 1782 में हैदर अली की मृत्यु हो गयी।
▪️इसका बेटा टीपू सुल्तान मैसूर का अलगा शासक बना, और उसने युद्ध को जारी रखा।
▪️मार्च 1784 में टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के साथ मंगलौर की संधि की और द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध का अंत हुआ।

#तृतीय_आंग्ल_मैसूर_युद्ध (1790-1792)

▪️अंग्रेजों की शासन नीति के अनुसार युद्ध के बाद होने वाली संधियाँ केवल अगले आक्रमण से पहले का आराम भर होती थी। अंग्रेजों ने इसी नियत से मंगलौर की संधि भी करी थी।
▪️1790 में लॉर्ड कॉर्नवालिस ने मराठों और निजाम के साथ मिलकर टीपू के विरूद्ध एक त्रिदलीय संगठन बना लिया।
▪️1792 को लार्ड कार्नवालिस के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने वैल्लौर, अम्बूर तथा बंगलौर को जीत लिया और श्रीरंगपट्टनम को घेर लिया। टीपू सुल्तान ने इसका विरोध करते हुए युद्ध जारी रखा पर अंततः जब उसने देखा कि इस युद्ध में जीत हासिल करना असंभव है तो उसने संधि कर ली। 1792 में श्रीरंगपट्टनम की संधि से तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध समाप्त हुआ –
▪️श्रीरंगपट्टनम की संधि- 1792
▪️टीपू सुल्तान को अपने प्रदेश का लगभग आधा भाग अंग्रेजों तथा उसके साथियों को देना पड़ा।
▪️टीपू सुल्तान को 3 करोड़ रुपये युद्ध हानि के रूप में भरने पड़े।

▪️श्रीरंगपट्टनम वर्तमान कर्नाटक में है।
▪️इस समय बंगाल का गवर्नर जनरल लॉर्ड कॉर्नवालिस था। इसी के नेतृत्व में ये यद्ध भी लड़ा गया था। ▪️कार्नवालिस ने अपने शब्दों में इस युद्ध की विजय को कुछ इस तरह वर्णित किया “हमने अपने शत्रु को लगभग पंगु बना दिया है तथा इसके साथ ही अपने सहयोगियों को और शक्तिशाली नहीं बनने दिया”।
▪️1796 में टीपू सुल्तान ने नौसेना बोर्ड का गठन किया।
▪️इसी वर्ष टीपू सुल्तान ने नई राइफलों की फैक्ट्री तथा फ्रांसीसी दूतावास भी स्थापित किया।

#चतुर्थ_आंग्ल_मैसूर_युद्ध (1799)

▪️अंग्रेजों का ध्यान फिर से मैसूर की तरफ आकर्षित होने लगा।
▪️तृतीय मैसूर-युद्ध के उपरान्त टीपू की शक्ति काफी कम हो चुकी थी।
▪️अंग्रेजों तथा टीपू सुल्तान के मध्य संधि भी हो चुकी थी, परन्तु टीपू सुल्तान अपनी पराजय को भूला नहीं था तथा वो अग्रेंजो से बदला लेना चाहता था।
▪️इसके चलते ही उसने यूरोप में फ्रांस की सरकार से संपर्क स्थापित किया। उसने फ्रांसीसियों को अपनी सेना में भी भर्ती किया।
▪️वेलेजली ने भारत आते ही परिस्थिति का शीघ्र ही अध्ययन कर लिया और ये समझ गया कि युद्ध अवश्यम्भावी है।
▪️वेलेजली ने युद्ध की तैयारी आरम्भ कर दी। मगर इससे पूर्व उसने निजाम तथा मराठों को अपनी तरफ मिला लिया।
▪️1799 में जब बंगाल के गवर्नर जनरल लार्ड वेलेजली ने टीपू सुल्तान के पास सहायक संधि का प्रस्ताव भेजा, जिसे टीपू सुल्तान ने अस्वीकार कर दिया। यही चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध का मुख्य कारण बना।
▪️इसी के बाद लार्ड वेलेजली ने मैसूर पर आक्रमण कर दिया और अंत में 4 मई, 1799 में चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध में लड़ते हुये ही टीपू सुल्तान की श्रीरंगपट्टनम के दुर्ग के पास मृत्यु हो गयी। और इसके साथ ही आंग्ल-मैसूर संघर्ष भी समाप्त हो गया।


#आधुनिक_भारत_का_इतिहास :
#स्वराज_दल

असहयोग आन्दोलन को वापस लेने के बाद कांग्रेस पार्टी दो भागों में बंट गयी| जब असहयोग आन्दोलन प्रारंभ हुआ था तो उस समय विधायिकाओं के बहिष्कार का निर्णय लिया गया था|चितरंजन दास,मोतीलाल नेहरु और विट्ठलभाई पटेल के नेतृत्व वाले एक गुट का मानना था की कांग्रेस को चुनाव में भाग लेना चाहिए और विधायिकाओं के अन्दर पहुँचकर उनके काम को बाधित जाना चाहिए| वल्लभभाई पटेल,सी.राजगोपालाचारी और राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व वाले गुट ने इसका विरोध किया| वे कांग्रेस को रचनात्मक कार्यों में लगाना चाहते थे|

1922 में गया में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन,जिसकी अध्यक्षता चितरंजन दास ने की थी,में विधायिकाओं में प्रवेश सम्बन्धी प्रस्ताव अस्वीकृत हो गया |इस प्रस्ताव के समर्थकों ने 1923 में कांग्रेस खिलाफत स्वराज पार्टी,जो स्वराज पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हुई,की स्थापना की|1923 में अबुल कलाम आज़ाद की अध्यक्षता में दिल्ली में आयोजित कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में कांग्रेस ने  स्वराजियों को चुनाव में भाग लेने की अनुमति प्रदान कर दी| स्वराजियों ने केंद्रीय व प्रांतीय विधायिकाओं में बड़ी संख्या में सीटें जीतीं| वृहद् स्तर की राजनीतिक गतिविधियों के अभाव के इस दौर में स्वाराजियों ने ब्रिटिश विरोधी प्रदर्शन व भावना को जीवित बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था| उन्होंने ब्रिटिश शासकों की नीतियों व प्रस्तावों का विधायिकाओं से पारित होना लगभग असंभव बना दिया |उदाहरण के लिए 1928 में एक बिल लाया गया जिसमें ब्रिटिश सरकार को यह शक्ति प्रदान करने का प्रावधान था कि वह किसी भी ऐसे गैर-भारतीय को भारत से बाहर निकाल सकती है जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थन करता हो| स्वराजियों के विरोध के कारण यह बिल पारित न हो सका| जब सरकार ने इस बिल को दोबारा पेश किया तो विट्ठलभाई पटेल,जोकि सदन के अध्यक्ष थे, ने ऐसा करने की अनुमति प्रदान नहीं की| विधायिकाओं में होने वाली बहसों,जिनमें भारतीय सदस्य प्रायः अपनी दलीलों से सरकार को मत दे देते थे,को पूरे भारत में जोश और रूचि के साथ पढ़ा जाता था|

सन 1030 में जब जन राजनीतिक संघर्ष को पुनः प्रारंभ किया तो फिर से विधायिकाओं का बहिष्कार किया जाने लगा| गाँधी जी को फरवरी 1924 में जेल से रिहा कर दिया गया और रचनात्मक कार्यक्रम,जिन्हें कांग्रेस के दोनों गुटों ने स्वीकृत किया था,कांग्रेस की प्रमुख गतिविधियाँ बन गयीं| रचनात्मक कार्यक्रमों के सबसे महत्वपूर्ण घटक खादी का प्रसार,हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढावा और अस्पृश्यता की समाप्ति थे| किसी भी कांग्रेस समिति के सदस्य के लिए यह अनिवार्य कर दिया गया की वह किसी राजनीतिक या कांग्रेस की गतिविधियों में भाग लेते समय हाथ से बुनी हुई खद्दर ही धारण करे और प्रति माह 2000 यार्ड सूत की बुनाई करे| अखिल भारतीय बुनकर संघ की स्थापना की गयी और पूरे देश में खद्दर भंडारों खोले गए| गाँधी जी खादी को गरीबों को उनकी निर्धनता से मुक्ति का और देश की आर्थिक समृद्धि का प्रमुख साधन मानते थे| इसने लाखों लोगों को आजीविका के अवसर प्रदान किये और स्वतंत्रता संघर्ष के सन्देश को देश के कोने-कोने तक पहुँचाया,विशेषकर ग्रामीण भागों में| इसने आम आदमी को कांग्रेस के साथ जोड़ा और आम जनता के उत्थान को कांग्रेस के कार्यों का अभिन्न अंग बना दिया| चरखा स्वतंत्रता संघर्ष का प्रतीक बन गया|

असहयोग आन्दोलन को वापस लेने के बाद देश के कुछ भागों में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए |स्वतंत्रता संघर्ष को जारी रखने और लोगों की एकता को बनाये रखने और मजबूत करने के लिए साम्प्रदायिकता के जहर से लड़ना जरुरी था| गाँधी जी का छुआछुत/अस्पृश्यता विरोधी कार्यक्रम भारतीय समाज की सबसे भयंकर बुराई को समाप्त करने और समाज के दलित वर्ग को स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ने के लिए बहुत महत्वपूर्ण था|


#हैदर_अली_का_उत्कर्ष

हैदर अली का जन्म 1721 में बुढ़ीकोटा (कर्नाटक) में हुआ था। हैदर अली के पिता का नाम फतेह महोम्मद था और वह मैसूर राज्य की सेना में फौजदार थे। मैसूर का वास्तविक संस्थापक हैदर अली को कहा जाता है। हैदर अली 1761 में वह मैसूर का शासक बना।

▪️जब मैसूर का राजा चिपका कृष्णराज था, तब उसके समय में सत्ता को धोखे से हथियाने की प्रथा चालू हो गयी।
▪️1732 में मैसूर पर 2 भाईयों देवराज और नंद राज का शासन था। जो पहले राजा चिपका कृष्णराज के मंत्री थे।
▪️हैदर अली इनकी ही सेना में सैनिक था।
▪️हैदर अली के पूर्वज दिल्ली प्रदेश के मूल निवासी थे। जोकि बाद में दक्षिण की ओर पलायन कर गए।
▪️सन 1728 ई० में पिता के देहांत के बाद हैदर अली को अनेक प्रारम्भिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। ▪️यही एक प्रमुख कारण था कि हैदर की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया और वो आजीवन अशिक्षित ही रहा। परन्तु इन चुनौतियों ने उसे दृढ़ निश्चयी, उत्साही, प्रखर बुद्धी और वीर योद्धा बनाया।
▪️हैदर अली की बहादुरी से प्रसन्न होकर नंदराज ने उसे 1755 में डिंडीगुल (तमिलनाडू) का फौजदार (मिलट्री कमाण्डर) बना दिया गया।
▪️ड़िडीगुल में ही हैदर अली ने फ्रांसीसियों की सहायता से शस्त्रागार स्थापित किया। अपने सैनिकों को फ्रांसीसी सेनापतियों से प्रशिक्षण दिलवाया।
▪️1759 में मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया तब हैदर अली ने ही मैसूर को सुरक्षित बचाया।
▪️इस विजय से खुश होकर नंदराज ने हैदर अली को मुख्य सेनापति नियुक्त कर दिया।
▪️कुछ समय उपरान्त उसे नंदराज के साथ त्रिचनापल्ली के घेरे में कार्य करने का अवसर मिला। इस अभियान में उसने अंग्रेजों की एक सैनिक टुकड़ी से बहुत सी बन्दूकें तथा भारी मात्रा में गोलाबारूद छीन लिया, इसके परिणामस्वरूप इसकी सैन्य शक्ति में असाधारण वृद्धि हो गई।
▪️1760 में सेनापति हैदर अली ने नंदराज की हत्या करके सारा शासन अपने कब्जे में कर लिया।
▪️तब जाकर 1761 में हैदर अली मैसूर का वास्तविक शासक बना।
▪️हैदर अली एक योग्य सुलतान था। सत्ता हाथ में आते ही अपने राज्य का विस्तार किया।
▪️उसने 1763 में बंदनूर पर अधिकर कर उसका नाम बदल कर हैदराबाद रखा। इसके अतिरिक्त सुण्डा, सेरा, कनारा, रायदुर्ग आदि पर भी अधिकार कर लिया।
▪️कालीकट, कोचीन तथा पालघाट के राजाओं को भी अपनी अधीनता स्वीकार करने पर विवश किया।
▪️हैदर अली ने श्रीरंगपटनम को अपनी राजधानी बनाया।
▪️उसके राज्य विस्तार से निकटवर्ती राज्य (ब्रिटिशर, निजाम और मराठे) भयभीत हो गये। ये सभी हैदरअली को अपना प्रबल प्रतिद्वंद्वी मानने लगे।
▪️मराठों ने माधव राव प्रथम के नेतृत्व में मैसूर पर 3 बार आक्रमण किया। तीनों ही युद्धों में हैदर अली को हार का सामना करना पड़ा। इन युद्धों में मराठों ने हैदर अली से धन और राज्य का कुछ भाग अपने अधिकार में कर लिया।

▪️पहला आक्रमण-1764
▪️दूसरा आक्रमण- 1766
▪️तीसरा आक्रमण- 1771

▪️1772 में माधवराव की मृत्यु उपरान्त हैदर अली ने 1774 से 1776 तक मराठों से संघर्ष कर अपने हारे हुए क्षेत्र को दुबारा प्राप्त कर लिया।
▪️अंग्रेजों ने भी मराठों की तरह ही मैसूर पर आक्रमण किया। इस संघर्ष में कुल 4 युद्ध लड़े गये थे। इन युद्धों को आंग्ल-मैसूर युद्ध के नाम से जाना जाता है तथा ये सभी युद्ध 1767 से 1799 के बीच में लड़े गये।

▪️प्रथम आंग्ल-मैसूर युद्ध (1767-1769)
▪️द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-1784)
▪️तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1790-1792)
▪️चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध (1799)

▪️द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के दौरान ही हैदर अली की मृत्यु हो गयी और अगला शासक उसका पुत्र टीपू सुल्तान बना।
▪️टीपू सुल्तान ने ही तृतीय और चतुर्थ आंग्ल-मैसूर युद्ध लड़े और चतुर्थ संघर्ष के दौरान ही इसकी भी मृत्यु हो गयी। और इसके साथ ही मैसूर को ब्रिटिश शासन के अधीन ले लिया गया।


#आधुनिक_भारत_का_इतिहास :
#मुडीमैन_समिति_1924

भारतीय नेताओं की मांगों को पूरा करने और 1920 के दशक के आरंभिक वर्षों में स्वराज पार्टी द्वारा स्वीकृत किये गए प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए ब्रिटिश सरकार ने सर अलेक्जेंडर मुडीनमैन की अध्यक्षता में एक समिति,जिसे मुडीनमैन समिति के नाम से भी जाना जाता है,गठित की| समिति में ब्रिटिशों के अतिरिक्त चार भारतीय सदस्य भी शामिल थे| भारतीय सदस्यों में निम्नलिखित शामिल थे-

a. सर शिवास्वामी अय्यर,

b. डॉ.आर.पी.परांजपे,

c. सर तेज बहादुर सप्रे

d. मोहम्मद अली जिन्ना

इस समिति के गठन के पीछे का कारण भारतीय परिषद् अधिनियम,1919 के तहत 1921 में स्थापित संविधान और द्वैध शासन प्रणाली की कामकाज की समीक्षा करना था| इस समिति की रिपोर्ट को 1925 में प्रस्तुत किया गया जो दो भागों में विभाजित थी-अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक रिपोर्ट|

• बहुसंख्यक/बहुमत रिपोर्ट: इसमें सरकारी कर्मचारी और निष्ठावान लोग शामिल थे| इन्होने घोषित किया कि द्वैध शासन स्थापित नहीं हो सका है | उनका यह भी मानना था कि प्रणाली को सही तरह से मौका नहीं दिया गया है अतः केवल छोटे-मोटे बदलावों की अनुशंसा की|

• अल्पसंख्यक/अल्पमत रिपोर्ट: इसमें केवल गैर-सरकारी भारतीय शामिल थे | इसका मानना था कि 1919 का एक्ट असफल साबित हुआ है| इसमें यह भी बताया गया कि स्थायी और भविष्य की प्रगति को स्वयं प्रेरित करने वाले संविधान में क्या क्या शामिल होना चाहिए|

अतः इस समिति ने शाही आयोग/रॉयल कमीशन की नियुक्ति की सिफारिश की| भारत सचिव लॉर्ड बिर्केनहेड ने कहा कि बहुमत/बहुसंख्यक की रिपोर्ट के आधार पर कदम उठाये जायेंगे|

सौर मण्डल Special

सौर_मण्डल...

सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने वाले ग्रहों, उपग्रहों, धूमकेतुओं, क्षुद्रग्रहों तथा अन्य अनेक आकाशीय पिण्डों के समूह या परिवार को सौरमण्डल कहते हैं। कोई भी ग्रह एक विशाल, ठंडा खगोलीय पिण्ड होता है जो एकनिश्चित कक्षा में अपने सूर्य की परिक्रमा करता है। सूर्य हमारे सौरमण्डल का केंद्र है, जिसके चारों ओर ग्रह- बुध, शुक्र, मंगल, पृथ्वी, बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून चक्कर लगाते हैं। अधिकतर ग्रहों के उपग्रह भी होते हैं जो अपने ग्रहों की परिक्रमा करते हैं। दो वर्ष पूर्व प्लूटो से ग्रह का दर्जा छीन लिया गया था, जिसकी वजह से अब हमारे सौर मण्डल में मात्र 8 ही ग्रह रह गये हैं। हमारे सौरमण्डल के ग्रहों का विभाजन आंतरिक ग्रहों और बाह्य ग्रहों के रूप में किया गया है। आंतरिक ग्रह हैं- बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल। आंतरिक ग्रहों का निर्माण धात्विक तत्वों एवँ कठोर पाषाणों से हुआ है। इन ग्रहों का घनत्व अत्यन्त उच्च होता है। इसमें पृथ्वी सबसे बड़ा ग्रह है। बाह्य ग्रह-बृहस्पति, शनि, यूरेनस और नेप्च्यून अत्यन्त विशाल हैं। इनका निर्माण प्राय: हाइड्र्रोजन व हीलियम गैसों से हुआ है। ये सभी ग्रह अत्यन्त द्रुतगति से घूमते हैं।

#सूर्य ▪️

सूर्य अन्य तारों की भांति गर्म गैस का गोला है और सौरमण्डल का केंद्र है। यद्यपि सूर्य अन्य तारों की तुलना में औसत आकार का बताया जाता है, किंतु 'मिल्की वे आकाशगंगा के 80 प्रतिशत तारों की तुलना में सूर्य का द्रव्यमान और चमक ज्यादा है। इसके गर्भ में स्थित हाइड्रोजन गैस सदैव हीलियम गैस में परिवर्तित होती रहती है। इस प्रक्रिया की वजह से सूर्य से प्रकाश एवँ ऊर्जा का उत्सर्जन होता है। सूर्य का 95 प्रतिशत हिस्सा हाइड्रोजन से निर्मित है। इसके केंद्र में हीलियम का एक क्रोड स्थित है। इस क्रोड के चारों ओर प्रत्येक सेकेण्ड सूर्य का 40 लाख टन पदार्थ ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है। सूर्य में नाभिकीय संलयन से प्रत्येक सेकेण्ड 60 करोड़ टन हाइड्रोजन हीलियम गैस में परिवर्तित हो जाता है। यह प्रक्रिया अगले  5 अरब वर्षों तक चलती रहेगी। पृथ्वी की भांति सूर्य के भी कई स्तर होते हैं। पृथ्वी से दिखाई देने वाले भाग को सूर्यमण्डल कहते हैं। सूर्यमण्डल का ऊपरी भाग जो गुलाबी गैसों का बना है, को वर्णमण्डल कहते हैं। यह सदैव एक स्थिर गति में रहता है। अक्सर वर्णमण्डल से 100,000 मील लम्बी सौर अग्नि निकलती है। वर्णमण्डल के ऊपर एक विशाल आभामंडल होता है, इसे सिर्फ सूर्यग्रहण के समय देखा जा सकता है। इसे परिमंडल कहते हैं।

#बुध▪️

बुध सौरमंडल का सबसे छोटा ग्रह है।  यह भी एक तथ्य है कि बुध के तापमान में काफी विविधता रहती है। जहाँ इसके सूर्य प्रकाशित भाग का तापमान 450°से. होता है वहीं अंधेरे भाग का तापमान -1800°से.तक गिर जाता है। बुध, सूर्य की परिक्रमा 88 दिनों में 30 मील/सेकेंड की रफ्तार से करता है। बुध के रात व दिन काफी लम्बे होते हैं। यह अपने अक्ष पर एक परिक्रमण 59 दिनों में पूरा करता है।

#शुक्र ▪️

शुक्र के वायुमंडल के मुख्य अवयव कार्बन डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन हैं जो क्रमश: 95 एवं 2.5 प्रतिशत हैं। शुक्र के वायुमंडल का निर्माण घने बादलों से हुआ है। इन बादलों में सल्फ्यूरिक अम्ल एवँ जल के कण पाये जाते हैं। शुक्र के रात-दिन के तापमान में अंतर नहीं होता है। यह ग्रह सूर्य एवं चंद्रमा के बाद सौरमण्डल का सबसे चमकीला खगोलीय पिण्ड है।
यह 224.7 दिनों में सूर्य का एक परिक्रमण करता है। सोवियत अंतरिक्षयान 'बेनेरा 3 शुक्र की सतह पर उतरने वाला प्रथम मानव निर्मित उपग्रह बना। सन् 1989 में भेजे गए 'मैगेलान नामक अंतरिक्षयान ने शुक्र पर 1600 ज्वालामुखियों का पता लगाया और यहाँ की ऊंची पहाडिय़ों के भी चित्र लिए।

#पृथ्वी ▪️

पृथ्वी के वायुमंडल का निर्माण 79 प्रतिशत नाइट्रोजन, 21 प्रतिशत ऑक्सीजन, 1 प्रतिशत जल एवँ 0.3 प्रतिशत ऑर्गन से हुआ है। पृथ्वी, सूर्य से तीसरा ग्रह है और यह सौरमंडल का अकेला ऐसा ग्रह है, जहां जीवन की उपस्थिति है। अंतरिक्ष से देखने पर पृथ्वी नीले-सफेद रंग के गोले के रूप में दिखाई देती है। पृथ्वी की सूर्य से माध्य दूरी 9.3 करोड़ मील है। यह सूर्य की परिक्रमा 67,000 मील प्रति घण्टे की रफ्तार से करती हुई एक परिक्रमा पूरी करने में 365 दिन, 5 घण्टे, 48 मिनट और 45.51 सेकेण्ड का समय लेती है। अपनी धुरी पर एक परिक्रमण 23 घण्टे, 56 मिनट और 4.09 सेकेण्ड में पूरा करती है। पृथ्वी पूर्णतया गोलाकार नहीं है। इसका विषुवत रेखा पर व्यास 9,727 मील और ध्रुवों पर व्यास इससे कुछ कम है।
इसका अनुमानित द्रव्यमान 6.6 सेक्सटिलियन टन है एवँ औसत घनत्व 5.52 ग्राम प्रति घन सेमी. है। पृथ्वी का क्षेत्रफल 196,949,970 मील है। जिसका 3/4 भाग जल है।
हाल की खोजों में वैज्ञानिकों को ज्ञात हुआ कि पृथ्वी का क्रोड पूर्णतया गोलाकार नहीं है। पृथ्वी के क्रोड के एक्स-रे चित्रों से ज्ञात होता है कि वहाँ 6.7 मील ऊँचे पर्वत एवँ इतनी ही गहरी घाटियाँ मौजूद हैं।

#मंगल ▪️

मंगल के वायुमंडल में 95 प्रतिशत कार्बन डाईऑक्साइड, 3 प्रतिशत नाइट्रोजन, 2 प्रतिशत ऑर्गन गैस पाई जाती हैं। मिट्टी में आयरन ऑक्साइड होने की वजह से यह ग्रह लाल रंग का दिखाई देता है।मंगल का एक दिन 24 घण्टे 37 मिनट के बराबर होता है। यह पृथ्वी के एक दिन के लगभग बराबर है। किंतु इसका एक वर्ष लगभग 686 दिनों का होता है। मंगल अत्यन्त ठंडा ग्रह है जिसका औसत तापमान -90°से. से -230°से. तक होता है। मंगल का वायुमंडल अत्यन्त विरल है। मंगल पर अक्सर धूल भरी आंधियाँ चलती हैं। मंगल ग्रह का सबसे विस्मयकारी तथ्य है कि यहाँ कभी महासागर स्थित थे और यहां का  वायुमंडल काफी घना था। इस वायुमंडल की उपस्थिति का कारण ज्वालामुखियों से निकलने वाली गैसें रही होंगी। इस वायुमण्डल के कारण इसकी सतह पर जल उपस्थित रहा होगा। अंतरिक्षयान 'पाथफाइंडर द्वारा भेजे गए चित्रों से ज्ञात हुआ है कि करोड़ों वर्ष पूर्व मंगल पर जल अत्याधिक मात्रा में पाया जाता था। नासा के 'मार्स ग्लोबल सर्वेयर ने मंगल की विषुवत रेखा के निकट प्राचीन पनतापीय प्रणाली के स्पष्ट प्रमाण प्रस्तुत किए हैं।

#बृहस्पति ▪️

बृहस्पति के वायुमंडल का निर्माण 89 प्रतिशत आणविक हाइड्रोजन और 11 प्रतिशत हीलियम से हुआ है। बृहस्पति सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है। इसका द्रव्यमान सौरमंडल के अन्य सभी ग्रहों के कुल द्रव्यमान से 2.5 गुना अधिक है। इसमें 1300 पृथ्वी समा सकती हैं। यह अपनी धुरी पर एक चक्कर अत्यन्त तीव्र गति से 9 घण्टे 55 मिनट में पूरा करता है। सूर्य की परिक्रमा यह लगभग 12 वर्षों में पूरी करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह इतना विशाल ग्रह है कि तारा बन सकता था। 'वॉयजर 1 नामक अंतरिक्षयान से भेजे गए चित्रों से एक महत्वपूर्ण जानकारी यह प्राप्त हुई कि शनि की भांति बृहस्पति का भी एक छल्ला है जो उसकी सतह से 300,000 किमी. दूरी तक फैला है।  वैज्ञानिकों के अनुसार इसके उपग्रह 'यूरोपा की बर्फीली सतह के नीचे मौजूद पानी जीवन का पोषक हो सकता है।हमारे सौरमण्डल में संभवत: सबसे बड़ी संरचना बृहस्पति का चुम्बकीयमंडल है। यह अंतरिक्ष का वह क्षेत्र है, जहाँ बृहस्पति का चुम्बकीय क्षेत्र स्थित है। बृहस्पति के अभी तक खोजे गए 61 उपग्रहों में से 21 उपग्रहों की खोज 2003 में की गई। इसके चार मुख्य चंद्रमाओं- इयो, यूरोपा, गैनीमीड और कैलिस्टो की खोज गैलीलियो ने 1610 में की थी।

#शनि▪️

शनि सौरमण्डल का छठवाँ एवँ बृहस्पति के पश्चात् सबसे विशाल ग्रह है। बृहस्पति की भांति ही शनि का निर्माण हाइड्रोजन, हीलियम एवँ अन्य गैसों से हुआ है। सौरमण्डल का दूसरा सबसे विशाल ग्रह होने के बावजूद इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का 95 गुना है और घनत्व 0.70 ग्राम प्रति घन सेमी. है। शनि की उच्च चक्रण गति (प्रत्येक 10 घण्टे, 12 मिनट में एक) उसे सभी ग्रहों में सबसे ज्यादा चपटा बनाते हैं। वॉयजर 1 अंतरिक्षयान ने शनि के छल्लों की सँख्या 1,000 निर्धारित की थी। लेकिन अब इसके छल्लों की सँख्या एक लाख निर्धारित की गई है। इन छल्लों का निर्माण बर्फ के कणों से हुआ है। अभी तक शनि के 31 ज्ञात उपग्रह हैं। इसका सबसे बड़ा उपग्रह 'टाइटन है। यह सौरमण्डल का ऐसा अकेला उपग्रह है जिस पर वायुमंडल की उपस्थिति है।

#यूरेनस▪️

यूरेनस की खोज 1781 ई. में सर विलियम हर्शेल ने की थी। इसकी सूर्य से माध्य दूरी 286.9 करोड़ किमी. है। यह अपनी धुरी पर 970 पर झुका हुआ है और इसके इस अप्रत्याशित झुकाव की वजह से ध्रुवीय क्षेत्रों को एक वर्ष के दौरान अधिक सूर्य की किरणें मिलती हैं। एक यूरेनस वर्ष 84 पृथ्वी वर्षों के बराबर होता है। मीथेन की उपस्थिति की वजह से ग्रह का रंग हल्का हरा है। यह एकमात्र ऐसा ग्रह है जो एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक अपनी प्रदक्षिणा कक्षा में लगातार सूर्य के सामने रहता है।

#नेप्च्यून ▪️

नेप्च्यून, सूर्य से औसतन 2.8 अरब मील की दूरी पर स्थित है और 165 वर्षों में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है। नेप्च्यून सौरमंडल का आठवाँ ग्रह है। इसके वायुमंडल के मुख्य अवयव हाइड्रोजन और हीलियम हैं। वायुमंडल में मीथेन की उपस्थिति की वजह से इसका रंग हल्का नीला है। अभी तक नेप्च्यून के 11 ज्ञात चंद्रमा हैं। ट्राइटन इसका सबसे बड़ा उपग्रह है। ट्राइटन की विशेषता है कि यह नेप्च्यून की दिशा के विपरीत परिक्रमण करता है। 'वॉयजर 2 ने  नेप्च्यून पर कई काले धब्बे पाए थे।इसमें से सबसे बड़ा धब्बा पृथ्वी के आकार का है।

#चंद्रमा ▪️

चंद्रमा पृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है। इसका व्यास पृथ्वी के व्यास का 1/4 है। (2,160 मील या 3,476 किमी. है)। इसकी  गुरूत्वाकर्षण शक्ति पृथ्वी की गुरूत्वाकर्षण शक्ति के छठवें भाग के बराबर है। चंद्रमा द्वारा पृथ्वी का परिक्रमा पथ वृत्ताकार न होकर अंडाकार है। चंद्रमा, पृथ्वी की परिक्रमा 27.3 दिन में पूरी करता है। चंद्रमा पर वायुमंडल की उपस्थिति नहीं है, क्योंकि इसका क्षीण गुरूत्वाकर्षण बल वायुमंडल के निर्माण में असमर्थ है। जनवरी 1998 में प्रक्षेपित किए गए 'लूनर प्रॉस्पेक्टरÓ  अंतरिक्षयान द्वारा भेजे गए चित्रों से ज्ञात होता है कि चंद्रमा के ध्रुवों के विशाल गढ्ढों में लगभग 3 अरब मीट्रिक टन बर्फ दबी हुई है। यह जल संभवत: धूमकेतु के चंद्रमा की सतह पर टकराने की वजह से उत्पन्न हुआ होगा।


1. सूर्य से ग्रह की दूरी को क्या कहा जाता है?
*-- उपसौर*

2.  सूर्य के धरातल का तापमान लगभग कितना है?
*-- 6000°C*

3. मध्य रात्रि का सूर्य किस क्षेत्र में दिखाई देता है?
*-- आर्कटिक क्षेत्र में*

4. सूर्य के रासायनिक संगठन में हाइड्रोजन का % कितना है?
*-- 71%*

5. कौन-सा ग्रह सूर्य के सबसे निकट है?
*-- बुध*

6. बुध ग्रह सूर्य का एक चक्कर लगाने में कितना समय लेता है?
*-- 88 दिन*

7. सूर्य से सबसे दूर कौन-सा ग्रह है?
*-- वरुण*

8. कौन-से ग्रह जिनके उपग्रह नहीं हैं?
*-- बुध व शुक्र*

9. कौन-सा ग्रह सूर्य का चक्कर सबसे कम समय में लगाता है?
*--  बुध*

10.  किस ग्रह को पृथ्वी की बहन कहा जाता है?
*-- शुक्र*

11. किस ग्रह पर जीव रहते हैं?
*-- पृथ्वी*
12. पृथ्वी का उपग्रह कौन ह?
*-- चंद्रमा*

13. पृथ्वी अपने अक्ष पर एक चक्कर कितने दिन में लगाती है?
*-- 365 दिन 5 घंटा 48 मिनटर 46 सेकेंड*

14.  पृथ्वी को नीला ग्रह क्यो कहा जाता है?
*-- जल की उपस्थिति के कारण*

15.  किस उपग्रह को जीवाश्म ग्रह कहा जाता है?
*-- चंद्रमा को*


━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━

Monday, June 8, 2020

इंडियन सिविल सर्विस की जानकारी

इंडियन सिविल सर्विस  की जानकारी

_*🎤आखिर हम सिविल सेवक के रूप में अपना कॅरियर क्यों चुनना चाहते हैं-* क्या सिर्फ देश सेवा के लिये? वो तो अन्य रूपों में भी की जा सकती है। या फिर सिर्फ पैसों के लिये? लेकिन इससे अधिक वेतन तो अन्य नौकरियों एवं व्यवसायों में मिल सकता है। फिर ऐसी क्या वजह है कि सिविल सेवा हमें इतना आकर्षित करती है? आइये, अब हम आपको सिविल सेवा की कुछ खूबियों से अवगत कराते हैं जो इसे आकर्षण का केंद्र बनाती है

_🎤यदि हम एक सिविल सेवक बनना चाहते हैं तो स्वाभाविक है कि हम ये भी जानें कि एक सिविल सेवक बनकर हम क्या-क्या कर सकते हैं? इस परीक्षा को पास करके हम किन-किन पदों पर नियुक्त होते हैं? हमारे पास क्या अधिकार होंगे? हमें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा? इसमें हमारी भूमिका क्या और कितनी परिवर्तनशील होगी इत्यादि।_

_🎤अगर शासन व्यवस्था के स्तर पर देखें तो कार्यपालिका के महत्त्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन सिविल सेवकों के माध्यम से ही होता है। वस्तुतः औपनिवेशिक काल से ही सिविल सेवा को इस्पाती ढाँचे के रूप में देखा जाता रहा है। हालाँकि, स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग 70 साल पूरे होने को हैं, तथापि इसकी महत्ता ज्यों की त्यों बनी हुई है, लेकिन इसमें कुछ संरचनात्मक बदलाव अवश्य आए हैं।_

_🎤पहले, जहाँ यह नियंत्रक की भूमिका में थी, वहीं अब इसकी भूमिका कल्याणकारी राज्य के अभिकर्ता (Procurator) के रूप में तब्दील हो गई है, जिसके मूल में देश और व्यक्ति का विकास निहित है।_

_🎤आज सिविल सेवकों के पास कार्य करने की व्यापक शक्तियाँ हैं, जिस कारण कई बार उनकी आलोचना भी की जाती है। लेकिन, यदि इस शक्ति का सही से इस्तेमाल किया जाए तो वह देश की दशा और दिशा दोनों बदल सकता है। यही वजह है कि बड़े बदलाव या कुछ अच्छा कर गुज़रने की चाह रखने वाले युवा इस नौकरी की ओर आकर्षित होते हैं और इस बड़ी भूमिका में खुद को शामिल करने के लिये सिविल सेवा परीक्षा में सम्मिलित होते हैं।_

_🎤यह एकमात्र ऐसी परीक्षा है जिसमें सफल होने के बाद विभिन्न क्षेत्रों में प्रशासन के उच्च पदों पर आसीन होने और नीति-निर्माण में प्रभावी भूमिका निभाने का मौका मिलता है।_

_🎤इसमें  केवल आकर्षक वेतन, पद की सुरक्षा, कार्य क्षेत्र का वैविध्य और अन्य तमाम प्रकार की सुविधाएँ ही नहीं मिलती हैं बल्कि देश के प्रशासन में शीर्ष पर पहुँचने के अवसर के साथ-साथ उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा भी मिलती है।_

_🎤हमें आए दिन ऐसे आईएएस, आईपीएस अधिकारियों के बारे में पढ़ने-सुनने को मिलता है, जिन्होंने अपने ज़िले या किसी अन्य क्षेत्र में कमाल का काम किया हो। इस कमाल के पीछे उनकी व्यक्तिगत मेहनत तो होती ही है, साथ ही इसमें बड़ा योगदान इस सेवा की प्रकृति का भी है जो उन्हें ढेर सारे विकल्प और उन विकल्पों पर सफलतापूर्वक कार्य करने का अवसर प्रदान करती है।_

_🎤नीति-निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण ही सिविल सेवक नीतिगत सुधारों को मूर्त रूप प्रदान कर पाते हैं।_

_ 🎤ऐसे अनेक सिविल सेवक हैं जिनके कार्य हमारे लिये प्रेरणास्रोत के समान हैं। जैसे- एक आईएएस अधिकारी  एस.आर. शंकरण जीवनभर बंधुआ मज़दूरी के खिलाफ लड़ते रहे तथा उन्हीं के प्रयासों से “बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम,1976” जैसा कानून बना। इसी तरह बी.डी. शर्मा जैसे आईएएस अधिकारी ने पूरी संवेदनशीलता के साथ नक्सलवाद की समस्या को सुलझाने का प्रयास किया तथा आदिवासी इलाकों में सफलतापूर्वक कई गतिशील योजनाओं को संचालित कर खासे लोकप्रिय हुए। इसी तरह, अनिल बोर्डिया जैसे आईएएस अधिकारी ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण काम किया। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें इस सेवा के अंतर्गत ही अनेक महान कार्य करने के अवसर प्राप्त हुए, जिसके कारण यह सेवा अभ्यर्थियों को काफी आकर्षित करती है।_

_🎤स्थायित्व, सम्मान एवं कार्य करने की व्यापक, अनुकूल एवं मनोचित दशाओं इत्यादि का बेहतर मंच उपलब्ध कराने के कारण ये सेवाएँ अभ्यर्थियों एवं समाज के बीच सदैव प्राथमिकता एवं प्रतिष्ठा की विषयवस्तु रही हैं।_

 🎤कुल मिलाकर, सिविल सेवा में जाने के बाद हमारे पास आगे बढ़ने और देश को आगे बढ़ाने के _अनेक अवसर होते हैं। सबसे बढ़कर हम एक साथ कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, प्रबंधन जैसे_ _विभिन्न क्षेत्रों के विकास में योगदान कर सकते हैं जो किसी अन्य सार्वजनिक क्षेत्र में शायद ही सम्भव है।_
         *🧘‍♂🏇UPSC Dream🚨🚔*

Some Most Questions of Bioscience

Some Questions of Bioscience...

• मनुष्य का वैज्ञानिक नाम क्या है?- होमो सैपियंस
• मेढक का वैज्ञानिक नाम क्या है?- राना टिग्रिना
• बिल्ली का वैज्ञानिक नाम क्या है?- फेलिस डोमेस्टिका
• चूहा का वैज्ञानिक नाम क्या है?- Rattus
छिपकली का वैज्ञानिक नाम क्या है?- Lacertilia
• कुत्ता का वैज्ञानिक नाम क्या है?- कैनिस फैमिलियर्स
• गाय का वैज्ञानिक नाम क्या है?- बॉस इंडिकस
• भैँस का वैज्ञानिक नाम क्या है?- बुबालस बुबालिस
• बैल का वैज्ञानिक नाम क्या है?- बॉस प्रिमिजिनियस टारस
• बकरी का वैज्ञानिक नाम क्या है?- केप्टा हिटमस
• भेँड़ का वैज्ञानिक नाम क्या है?- ओवीज अराइज
• सुअर का वैज्ञानिक नाम क्या है?- सुसस्फ्रोका डोमेस्टिका
• शेर का वैज्ञानिक नाम क्या है?- पैँथरा लियो
• बाघ का वैज्ञानिक नाम क्या है?- पैँथरा टाइग्रिस
• चीता का वैज्ञानिक नाम क्या है?- पैँथरा पार्डुस
• भालू का वैज्ञानिक नाम क्या है?- उर्सुस मैटिटिमस कार्नीवेरा
• खरगोश का वैज्ञानिक नाम क्या है?- ऑरिक्टोलेगस कुनिकुलस
• हिरण का वैज्ञानिक नाम क्या है?- सर्वस एलाफस
• ऊँट का वैज्ञानिक नाम क्या है?- कैमेलस डोमेडेरियस
• लोमडी का वैज्ञानिक नाम क्या है?- कैनीडे
• लंगूर का वैज्ञानिक नाम क्या है?- होमिनोडिया
• बारहसिंगा का वैज्ञानिक नाम क्या है?- रुसर्वस डुवाउसेली
• मक्खी का वैज्ञानिक नाम क्या है?- मस्का डोमेस्टिका
• मोर का वैज्ञानिक नाम क्या है?- पैवो क्रिस्टेटस
• हाथी का वैज्ञानिक नाम क्या है?- एफिलास इंडिका
• डॉल्फिन का वैज्ञानिक नाम क्या है?- प्लैटिनिस्ट गैंगेटिका
• घोड़ा का वैज्ञानिक नाम क्या है?- ईक्वस कैबेलस
• गधा का वैज्ञानिक नाम क्या है?- इक्विस असिनस
• आम का वैज्ञानिक नाम क्या है?- मैग्नीफेरा इंडिका
• अंगुर का वैज्ञानिक नाम क्या है?- विटियस
• संतरा का वैज्ञानिक नाम क्या है?- साइट्रस सीनेन्सिस
• नारियल का वैज्ञानिक नाम क्या है?- कोको न्यूसीफेरा
• सेब का वैज्ञानिक नाम क्या है?- मेलस प्यूमिया/डोमेस्टिका
• अनानास का वैज्ञानिक नाम क्या है?- आननास कॉमोजस
• पपीता का वैज्ञानिक नाम क्या है?- कैरीका पपीता
• नाशपाती का वैज्ञानिक नाम क्या है?- पाइरस क्यूमिनिस
• केला का वैज्ञानिक नाम क्या है?- म्यूजा पेराडिसिएका
• लीची का वैज्ञानिक नाम क्या है?- लीची चिन्नीसिस
• इमली का वैज्ञानिक नाम क्या है?- तामार इंडस इंडिका
• खीरा का वैज्ञानिक नाम क्या है?- कुसुमिस सैटिवस
• बेर का वैज्ञानिक नाम क्या है?- ज़िज़ीफस मौरीतियाना
• चुकंदर का वैज्ञानिक नाम क्या है?- बीटा वाल्गारिस
• जामुन का वैज्ञानिक नाम क्या है?- शायजियम क्यूमिनी
• गन्ना का वैज्ञानिक नाम क्या है?- सुगरेन्स औफिसीनेरम
• मक्का का वैज्ञानिक नाम क्या है?- जिया मेज
• बाजरा का वैज्ञानिक नाम क्या है?- पेनिसिटम अमेरीकोनम
• धान का वैज्ञानिक नाम क्या है?- औरिजया सैटिवाट
• गेहूँ का वैज्ञानिक नाम क्या है?- ट्रिक्टिकम एस्टिवियम
• कपास का वैज्ञानिक नाम क्या है?- गैसीपीयम
• सरसोँ का वैज्ञानिक नाम क्या है?- ब्रेसिका कम्पेस्टरीज
• कॉफी का वैज्ञानिक नाम क्या है?- कॉफिया अरेबिका
• चाय का वैज्ञानिक नाम क्या है?- थिया साइनेनिसस
• तुलसी का वैज्ञानिक नाम क्या हैं?- ऑक्सीमेन्ट टेन्यूफ़्लोरम
• एलोविरा का वैज्ञानिक नाम क्या हैं?- एलोविरा
• अफीम का वैज्ञानिक नाम क्या है?- पपवर सोम्निफेरुम
• काजू का वैज्ञानिक नाम क्या है?- एनाकार्डियम अरोमैटिकम
• बादाम का वैज्ञानिक नाम क्या है?- प्रुनस अरमेनिका
• मुंगफली का वैज्ञानिक नाम क्या है?- एरैकिस हाइजोपिया
• लालमिर्च का वैज्ञानिक नाम क्या है?- कैप्सियम एनुअम
• कालीमिर्च का वैज्ञानिक नाम क्या है?- पाइपर नाइग्रम
• केसर का वैज्ञानिक नाम क्या है?- क्रोकस सैटिवियस
• सौफ (Fennel) का वैज्ञानिक नाम क्या है?- फ़ीनिकुलम वल्गेरे
• जीरा का वैज्ञानिक नाम क्या है?- क्यूमीनियम सिमिनियम
• हल्दी का वैज्ञानिक नाम क्या है?- कुरकुमा लोँगा
• नीबू का वैज्ञानिक नाम क्या है?- साइट्रस लिंबोन
• आंवला(gooseberry) का वैज्ञानिक नाम क्या है?- फ़िलेन्थस इम्ब्लिका
• धनिया का वैज्ञानिक नाम क्या है?- कोरियेंडम सटिवुम
• टमाटर का वैज्ञानिक नाम क्या है?- लाइकोप्रेसिकन एस्कुलेँटम
• पालक का वैज्ञानिक नाम क्या है?- स्पिनिया ओलेरसाइए
• बैगन का वैज्ञानिक नाम क्या है?- एकोनिटियम हेटरोफिलम
• फूलगोभी का वैज्ञानिक नाम क्या है?- ब्रासिका औलिरेशिया
• अदरक का वैज्ञानिक नाम क्या है?- जिँजिबर ऑफिसिनेल
• लहसून का वैज्ञानिक नाम क्या है?- एलियम सेराइवन
• गाजर का वैज्ञानिक नाम क्या है?- डाकस कैरोटा
• मूली का वैज्ञानिक नाम क्या है?- रेफेनस सैटाइविस

Sunday, June 7, 2020

Some SPECIAL आयोग & योजना

Some  SPECIAL आयोग & योजना

😎 नीति आयोग 👉1 जनवरी 2015
😎ह्रदय योजना👉 21 जनवरी 2015
😎बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओं 👉22 जनवरी 2015
😎सुकन्या समृद्धि योजना 👉22 जनवरी 2015
😎मुद्रा बैंक योजना 👉8 अप्रैल 2015
😎प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना 👉9 मई 2015
😎अटल पेंशन योजना👉 9 मई 2015
😎प्रधानमंत्री जीवन ज्योति योजना 👉9 मई 2015
😎उस्ताद योजना (USTAD) 👉14 मई 2015
😎प्रधानमंत्री आवास योजना 👉25 जून 2015
😎अमरुत योजना(AMRUT)👉 25 जून 2015
😎स्मार्ट सिटी योजना 👉25 जून 2015
😎डिजिटल इंडिया मिशन👉 1 जुलाई 2015
😎स्किल इंडिया मिशन 👉15 जुलाई 2015
😎दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना 👉25 जुलाई 2015
😎नई मंजिल 👉8 अगस्त 2015
😎सहज योजना 👉30 अगस्त 2015
😎स्वावलंबन स्वास्थ्य योजना👉 21 सितंबर 2015
😎मेक इन इंडिया👉 25 सितंबर 2015
😎इमप्रिण्ट इंडिया योजना👉 5 नवंबर 2015
😎स्वर्ण मौद्रीकरण योजना 👉5 नवंबर 2015
😎उदय योजना (UDAY) 👉5 नवंबर 2015
😎वन रैंक वन पेंशन योजना 👉7 नवंबर 2015
😎ज्ञान योजना 👉30 नवंबर 2015
😎किलकारी योजना 👉25 दिसंबर 2015
😎नगामि गंगे, अभियान का पहला चरण आरंभ 👉
5जनवरी 2016
😎स्टार्ट अप इंडिया 👉16 जनवरी 2016
😎प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना 👉18 फरवरी 2016
😎सेतु भारतम परियोजना 👉4 मार्च 2016

😎स्टैंड अप इंडिया योजना👉 5 अप्रैल 2016
😎ग्रामोदय से भारत उदय अभियान 👉14अप्रैल 2016
😎प्रधानमंत्री अज्वला योजना👉 1 मई 2016
😎प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना👉 31 मई 2016
😎राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना 👉1 जून 2016
😎नगामी गंगे कार्यक्रम 👉7 जुलाई 2016
😎गैस फॉर इंडिया 👉6 सितंबर 2016
😎उड़ान योजना 👉21 अक्टूबर 2016
😎सौर सुजला योजना 👉1 नवंबर 2016
😎प्रधानमंत्री युवा योजना 👉9 नवंबर 2016
😎भीम एप👉 30 दिसंबर 2016
😎भारतनेट परियोजना फेज - 2 👉19 जुलाई 2017
😎प्रधानमंत्री वय वंदना योजना 👉21 जुलाई 2017
😎आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना 👉21 अगस्त 2017
😎प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना- सौभाग्य 👉25 सितंबर 2017
😎साथी अभियान👉 24 अक्टूबर 2017
😎दीनदयाल स्पर्श योजना👉 3 नवंबर 2017