देह को चाहना और व्यक्ति को चाहना...
किसी की देह को देखकर आकर्षित होना बहुत स्वाभाविक है। इसमें शर्म जैसी कोई बात नहीं। आँखें पहले देह को देखती हैं, मन बाद में उसके भीतर उतरता है। जैसे किसी नदी को पहली बार देखकर हम उसकी सतह पर चमकती धूप देखते हैं; उसकी गहराई का पता बाद में चलता है।
समस्या आकर्षण में नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है जब तुम्हारी दृष्टि देह पर जाकर रुक जाती है।
तुम्हें उसका चेहरा सुंदर लगता है, उसकी गर्दन की वक्रता, बालों का गिरना, चलते समय शरीर की लय—और अचानक तुम्हारे भीतर इच्छा उठती है। तुम उसे अपने करीब महसूस करना चाहते हो। उसकी हथेली पकड़ने की कल्पना करते हो। उसके पास बैठने भर से भीतर कोई पुरानी प्यास जाग जाती है।
यह कामना है।
लेकिन अभी प्रेम नहीं भी हो सकता।
प्रेम वहाँ से शुरू होता है जहाँ तुम उसकी देह से आगे देखने लगते हो।
तुम्हें पता चलता है कि जिस चेहरे को देखकर तुम ठहर गए थे, उसके पीछे एक ऐसा मन है जो कभी-कभी बहुत मजबूत दिखाई देता है और भीतर से बहुत अकेला है। वह हँसती है, लेकिन उसकी हँसी के पीछे कुछ ऐसी स्मृतियाँ हैं जिनके बारे में उसने शायद किसी को नहीं बताया। उसे छुए जाने की इच्छा हो सकती है, लेकिन उससे पहले उसे समझे जाने की भी आवश्यकता है।
अब तुम्हारी दृष्टि बदलती है।
तुम उसकी देह को कम नहीं देखते; तुम उसे केवल देह की तरह देखना बंद कर देते हो।
यही अंतर है देह को चाहने और व्यक्ति को चाहने में।
देह को चाहने वाला अक्सर पूछता है—“मैं इसे कितना पा सकता हूँ?”
व्यक्ति को चाहने वाला पूछता है—“मैं इसे कितना समझ सकता हूँ?”
पहली दृष्टि में भूख है।
दूसरी में जिज्ञासा।
और प्रेम की असली शुरुआत शायद जिज्ञासा से होती है।
क्योंकि मनुष्य कोई सुंदर शरीर नहीं है जिसे देखकर कहानी समाप्त हो जाए। वह एक पूरा ब्रह्मांड है। उसकी देह उसका सबसे दिखाई देने वाला हिस्सा है; उसके भीतर बहुत कुछ ऐसा है जो आँखों से दिखाई ही नहीं देता।
कभी तुम किसी स्त्री के बहुत पास बैठे हो और तुम्हारे भीतर उसे छू लेने की तीव्र इच्छा उठती है। तुम उसकी ओर देखते हो। वह भी तुम्हारी ओर देखती है। कमरे में एक क्षण के लिए बातचीत रुक जाती है।
उस क्षण में देह मौजूद है।
कामना भी।
लेकिन यदि तुम सचमुच उससे प्रेम करते हो, तो तुम्हारी इच्छा केवल उसे छू लेने की नहीं होगी। तुम यह भी जानना चाहोगे कि वह तुम्हारे स्पर्श में कैसा महसूस करेगी।
यहीं कामना में प्रेम प्रवेश करता है।
तुम्हारी उँगलियाँ आगे बढ़ने से पहले उसकी आँखों को पढ़ती हैं। तुम्हें उसकी इच्छा उतनी ही महत्वपूर्ण लगती है जितनी अपनी। और अगर वह पीछे हटती है, तो तुम्हारा प्रेम उस दूरी को भी उतनी ही सहजता से स्वीकार करता है जितनी सहजता से उसकी निकटता को।
क्योंकि तुम उसकी देह नहीं चाहते।
तुम उस व्यक्ति को चाहते हो जिसके पास अपनी देह पर स्वयं का अधिकार है।
यही बात इच्छा को सुंदर बनाती है।
किसी की देह को चाहना आसान है।
किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता समेत उसे चाहना कठिन है।
तुम उसके शरीर के पास जा सकते हो, लेकिन उसके भीतर तभी जा सकते हो जब वह स्वयं तुम्हारे लिए कोई दरवाज़ा खोले। और वह दरवाज़ा केवल स्पर्श से नहीं खुलता। विश्वास से खुलता है।
विश्वास बहुत धीमी चीज़ है।
वह बारिश की तरह आता है। पहले मिट्टी की गंध बदलती है, फिर धरती नरम होती है, और बहुत बाद में बीज फूटता है।
इसी तरह अंतरंगता भी अचानक पैदा नहीं होती।
वह छोटी-छोटी चीज़ों से बनती है—तुम्हारा उसकी बात सचमुच सुनना, उसके “नहीं” को सहजता से स्वीकार करना, उसकी असुरक्षाओं को उसके विरुद्ध इस्तेमाल न करना, उसकी चुप्पी को अपनी सुविधा के अर्थ में न बदलना।
और एक दिन वही व्यक्ति तुम्हारे सामने अपनी देह को लेकर उतना सजग नहीं रहता।
क्योंकि उसे पता है कि तुम्हारी आँखों में केवल उसका शरीर नहीं है।
तुम उसे देख रहे हो।
पूरी तरह।
उसकी सुंदरता सहित उसकी थकान।
उसकी इच्छा सहित उसकी झिझक।
उसकी त्वचा सहित उसकी कहानी।
उसकी देह सहित उसका अकेलापन।
तब कामना का अर्थ बदल जाता है।
अब तुम उसे केवल अपने पास खींचना नहीं चाहते। तुम उसके पास होना चाहते हो।
उसकी हथेली तुम्हारी हथेली में आए तो तुम्हें केवल त्वचा की गर्मी महसूस नहीं होती; तुम्हें यह भी महसूस होता है कि उसने अपनी एक छोटी-सी असुरक्षा तुम्हारे भरोसे रख दी है।
यही वह क्षण है जहाँ इरोटिक अपनी सबसे गहरी भूमि में उतरता है।
क्योंकि वास्तविक अंतरंगता नग्नता से बहुत आगे की चीज़ है।
नग्न शरीर को देख लेना सरल है।
किसी मनुष्य को उसकी पूरी नग्न सच्चाई में देखना कठिन है।
जब वह अपने डर नहीं छिपाता।
जब वह सुंदर दिखने की कोशिश छोड़ देता है।
जब वह कह सकता है—“आज मैं ठीक नहीं हूँ।”
और फिर भी तुम्हारे पास बैठ सकता है।
वहाँ कोई देह की उत्तेजना से बड़ी चीज़ घट रही होती है।
वहाँ दो मनुष्य एक-दूसरे के सामने बिना कवच के खड़े होते हैं।
शायद इसलिए प्रेम में सबसे सुंदर स्पर्श वह नहीं होता जो सबसे अधिक शरीर को छुए।
सबसे सुंदर वह होता है जिसके बाद सामने वाला अपने भीतर थोड़ा और सुरक्षित महसूस करे।
तुम उसकी देह चाहते हो—यह स्वाभाविक है।
लेकिन अगर तुम उसके भीतर के व्यक्ति को भी चाहते हो, तो तुम्हारी इच्छा का स्वर बदल जाता है।
अब तुम केवल उसके होंठों की सुंदरता नहीं देखते; तुम यह भी जानना चाहते हो कि वह किन शब्दों को बोलते हुए चुप हो जाती है।
तुम केवल उसकी आँखों को नहीं देखते; तुम यह भी जानना चाहते हो कि उनमें किस बात से रोशनी आती है और किस बात से अँधेरा।
तुम केवल उसके शरीर के पास नहीं जाना चाहते; तुम उसके जीवन के उन कमरों तक पहुँचना चाहते हो जहाँ वह हर किसी को प्रवेश नहीं देती।
यहीं देह से आगे का रास्ता शुरू होता है।
और शायद प्रेम का सबसे गहरा रहस्य भी यही है—
किसी की देह तुम्हें आकर्षित करे, लेकिन उसका पूरा अस्तित्व तुम्हें रोक ले।
तुम उसके शरीर को देखकर उसके करीब जाना चाहो, फिर उसकी आँखों में देखकर ठहर जाओ।
क्योंकि अचानक तुम्हें याद आता है—
तुम्हारे सामने केवल एक सुंदर देह नहीं है।
एक पूरा मनुष्य है।
एक ऐसी दुनिया, जिसे छूने के लिए हाथों से अधिक कुछ चाहिए।
समझ।
और शायद प्रेम वही है—
जब तुम्हें किसी की देह पाने की इच्छा हो, लेकिन उससे भी गहरी इच्छा यह हो कि वह तुम्हारे पास रहते हुए स्वयं को कभी खोए नहीं।
No comments:
Post a Comment