Carrer को ठेस पंहुचाओ...कोई बात नहीं मेरे दोस्त परंतु ध्यान रहे character पे आंच की लूह तक भी नहीं आनी चाहिए...क्यूंकि mountain everest से गिरा हुआ मनुष्य उठ कर चल सकता है...लेकिन नजरो से गिरा हुआ इंसान कभी चलने योग भी नहीं रहता...जो लोग आपसे नजरें नहीं मिलाते है उनसे आप अपनी नजरिया को मत छुपाइये...क्योंकि दोस्त ये वही लोग है जो एक दिन आप को देखना पसन्द नहीं करते थे...दोस्त जोस,जज्बा, जाहिर कर... अपनी अंदर की जमीर और जिगर को जागृत कर के ही हम अपनी जिज्ञासा को जगाने में जिमीदार जरिया बन सकतेआप ये जान कर हैरान रह जायँगे...बहुत सूंदर,अति सूंदर और अति उत्तम में जमी आसमा का फर्क है...दोस्त इन जैसे शब्दों को समझने के लीये हर एक इंसान को हर एक वय्क्ति के प्रति अच्छी feelings & imagination रखनी पड़ती है...तब कही जाकर इन सब वस्तुओ का आनंद लेने में हम सफल होते है...दोस्त now & always remember it Best efforts Better thinking.... है...मैं ज्यदातर उन्ही सोंचो को सोंचने की प्रयास और प्रयत्न करता हूँ जिसे लोग कहते है नहीं हो सकता है...दोस्त सफलता और काबिलयत किसी दर्जी के हाथ से बनाया या बूना हुआ कपडा नहीं है जो किसी शो रूम या शॉपिंग मॉल खरीद पहन लिया जाय...इसे आपने क्षमता और मेहनत के हुनर से सींचना पड़ता है...जब हम किसी गलत काम को करने के लिए इच्छुक होते है तब हमारे अंदर एक हल्की सी हिचक होती है...इच्छुक हमरा मन जबकि हलकी सी हिचक होता है आत्मा मेरे दोस्त...समझदार के लिए सुचना ही sufficient है...जो लोग जातीयता की बातो में forward or backward जैसी शब्दों की प्रयोग करते है...वो शायद ये नहीं जानते की जातीयता के प्रति इन शब्दों का उच्चारण करना ही पाप है...इसके प्रति सनेह और समांनजनक जैसी शब्दों को जुबान पे लाना चाहिए...क्यूंकि मेरे दोस्त forward or backward शब्द शिक्षा के सही और गलत उदेश्य को दरसाने के लिए किया जाता है न की किसी धर्म को...अधर्म और धर्म बताने के उदेश्य से...उठो जागो और तब तक नहीं रुको जबतक आप अपनी लक्ष्य की प्राप्ति न कर ले...हम वो है जो हमारे सोंच ने बनया जैसा सोंचोगे वैसा होंगे...सबसे बड़ा धर्म अपने आप के प्रति संचा होना और अपने आप के ऊपर विस्वास रखना...अगर समस्याये न आये तो ये तय है की आप अभी भी गलत रास्ते पे है...खुद पे यकीन नहीं तो खुदा पे भी विस्वास मत करना...इन शब्दों को आम तौर से मत लेना क्यूंकि मेरे दोस्त ये वो शब्द है जो हमारे देश को इस नाम के काबिल बनाया...साइना और सानिया, कल्पना और रानी, प्रतिभा और इंद्रा...आप भी बन सकते हो क्यूंकि मेरे दोस्त ये लोग कोई पार्सल नहीं थे...किसी कंपनी की...जो इनको पैक कर और तैयार कर के किसी वय्क्ति के द्वारा किसी इंसान को भेट में मिले थे बल्कि इन्होंने अपने क्षमता और रूचि के आधार पर अपने आप को इस दुनीया के मंच पे रखा था/रखे है...हांथो के लकीरो को तकदीर समझने वाले शायद ये बात भूल जाते है मेरे दोस्त की तकदीरें उनकी भी खुदा बनता है जिनके हाथ नहीं होते...कर्म ही पूजा है यारो... बाकि सब कहने के लिए पूजनीय है...छोटी 2 बाते ही गंभीर समस्याओ को जन्म देती है...फर्क बस ये होता है हम किस तरीके से लेते है...
अभिमानी थे भीष्मपितामा और अहंकारी थे गुरु द्रोणाचार्य...कैसे...आइए आज मैं बताता हूँ...जब गुरु द्रोणा जी ने एकलबेए से अपनी नाम की उपाधि के वास्ते उसका अंगूठा मागे थे ये उनका अहंकार था जिसके वजह से... जिसको उन्हों ने वेद और शात्र का ज्ञान दिया या बहुत मानते थे...दोस्त वही शिष्य उनके जीवन का अंत किया...ये है अहंकार का अंजाम...अब चलिये भीष्मपितामा के पास...इन्होंने अपने पिता मोह के पक्ष में एक ऐसा सपत ले लिया जो उनको नहीं लेना चाहिये था...हस्तिनापुर के साम्राज्य और जायजाद का विभाजन न करने की सोंच...जिसके वजह से जो पोता उनका सबसे अजीज हुआ करता था...उसने ही उनको अपनी बाण से मुरक्षित किया था...ये है अभिमान का दृस्य...ईमानदारी से बेहतर कोई और दूसरी निति नहीं होती मेरे दोस्त...आप ये जान कर हैरान रह जायँगे...बहुत सूंदर,अति सूंदर और अति उत्तम में जमी आसमा का फर्क है...दोस्त इन जैसे शब्दों को समझने के लीये हर एक इंसान को हर एक वय्क्ति के प्रति अच्छी feelings & imagination रखनी पड़ती है...तब कही जाकर इन सब वस्तुओ का आनंद लेने में हम सफल होते है...दोस्त now & always remember it Best efforts Better thinking....
Have a great day...Friends

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