तुम्हारी समस्या तुम्हारे विचार नहीं हैं।
समस्या यह भी नहीं कि तुम्हारे पास नकारात्मक विचार हैं।
समस्या कहीं अधिक सूक्ष्म है।
तुम अपने मन के मुख्य पात्र बन चुके हो।
हर विचार तुम्हें अपने साथ कहानी में खींच लेता है।
कोई कहता है, "तुम असफल हो।"
और तुम कहानी में प्रवेश कर जाते हो।
कोई कहता है, "तुम्हें और चाहिए।"
और तुम फिर कहानी में प्रवेश कर जाते हो।
कोई कहता है, "भविष्य खतरे में है।"
और तुम फिर उसी कथा का हिस्सा बन जाते हो।
कभी गौर किया है?
तुम्हारे भीतर हर दिन सैकड़ों कहानियाँ जन्म लेती हैं, लेकिन तुमने शायद ही कभी उस जगह को देखा हो जहाँ से वे जन्म लेती हैं।
कल्पना करो कि तुम्हारा मन एक रंगमंच है।
विचार अभिनेता हैं।
भावनाएँ उनका संगीत हैं।
स्मृतियाँ मंच की सजावट हैं।
लेकिन तुम्हारी पूरी जिंदगी एक विचित्र भूल में बीत जाती है
तुम स्वयं को अभिनेता समझ लेते हो।
जबकि वास्तव में तुम दर्शक भी नहीं हो।
तुम वह स्थान हो जहाँ पूरा नाटक घट रहा है।
जिस दिन यह अंतर स्पष्ट हो जाता है, उसी दिन बहुत-सी लड़ाइयाँ समाप्त होने लगती हैं।
क्योंकि तब हर विचार आदेश नहीं रह जाता।
वह केवल एक आगंतुक बन जाता है।
आता है।
ठहरता है।
और चला जाता है।
उसके जाने के बाद भी तुम वहीं रहते हो।
अपरिवर्तित।
शांत।
उपस्थित।
No comments:
Post a Comment