पुरुष की प्रेम-यात्रा तब पूर्ण होती है, जब उसे कोई ऐसा मिल जाए जिसके सामने वह बिना किसी आवरण के स्वयं रह सके...
पुरुष भी थकता है...
हर दिन
अपनी मुस्कानों के पीछे
अनगिनत टूटनों को छिपाते-छिपाते,
वैसे ही
जैसे हिमालय
अपने भीतर की अग्नि को
बर्फ़ की चादरों में ढँककर
युगों से खड़ा है।
वह भी चाहता है—
कि एक स्त्री मिले,
जिसके सामने
उसे पर्वत होने का अभिनय न करना पड़े,
जहाँ वह
नदी की तरह बह सके,
बादल की तरह बरस सके,
और किसी बच्चे की तरह
उसकी गोद में सिर रखकर
अपनी सारी थकान उतार सके।
वह चाहता है,
कि जब वह
उसके कंधे पर अपना माथा रखे,
तो ऐसा लगे
मानो वर्षों से भटकता कोई ग्रह
आख़िर अपनी कक्षा पा गया हो,
और आकाशगंगा ने
उसे फिर से अपना लिया हो।
वह स्त्री,
उसके लिए केवल प्रेमिका नहीं,
वह तो
शिव की जटाओं में उतरती गंगा है—
जिसमें उतरकर
उसका समस्त ताप
निर्मल हो जाता है।
वह उसके सामने
अपने शब्द नहीं,
अपनी चुप्पियाँ खोलना चाहता है,
जैसे कोई संन्यासी
अपने गुरु के सामने
पहली बार
अपना अहंकार उतार देता है।
उसके सामने
उसे कोई प्रमाण नहीं देना,
कोई भूमिका नहीं निभानी,
कोई मुखौटा नहीं पहनना।
बस होना है—
वैसा ही,
जैसा वह जन्म से था।
और तब
उनका प्रेम
दो देहों का आकर्षण नहीं रहता,
वह प्रयाग का संगम बन जाता है,
जहाँ गंगा,
यमुना
और अदृश्य सरस्वती
एक-दूसरे से कुछ माँगती नहीं,
बस अपना समूचा अस्तित्व
एक-दूसरे में सौंप देती हैं।
वह चाहता है,
उसकी प्रिय
उसके भीतर के उस मरुस्थल को भी देखे,
जहाँ बरसों से
कोई वर्षा नहीं हुई,
और फिर
अपने विश्वास की पहली बूँद से
उसे हराभरा कर दे।
क्योंकि पुरुष के लिए
प्रेम का सबसे गहरा प्रणय
विजय नहीं,
समर्पण है।
वह उस स्त्री के सामने
अपने समस्त आवरण उतार देना चाहता है—
अहंकार के,
डर के,
सफलता के,
पुरुषत्व के—
वैसे ही,
जैसे पूर्णिमा की रात
समुद्र
चन्द्रमा के सामने
अपनी हर लहर
निस्संकोच अर्पित कर देता है।
और तब
उनके बीच
कोई दीवार नहीं रहती—
न शब्दों की,
न भय की,
न संकोच की।
केवल दो रूहें होती हैं,
जो एक-दूसरे में
वैसे ही उतरती हैं,
जैसे भोर की पहली किरण
कमल की बंद पंखुड़ियों में,
या जैसे
किसी भक्त के कानों में
गुरु का पावन मंत्र
धीरे-धीरे उतरकर
उसका समूचा जीवन बदल देता है।
तभी पुरुष समझता है—
प्रेम का अर्थ
किसी स्त्री को पा लेना नहीं था,
बल्कि
किसी ऐसी आत्मा तक पहुँच जाना था,
जिसके सामने
वह बिना किसी आवरण के,
बिना किसी भय के,
बिना किसी अभिनय के,
बस स्वयं हो सके।
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