मैंने बहुत दरवाज़े खटखटाए थे—
मंदिर, मस्जिद,
ख़ानकाहें, दरगाहें,
सूफ़ियों की महफ़िलें,
दरवेशों के चक्कर,
फ़क़ीरों की दुआएँ...
हर जगह
ईश्वर का पता मिला,
पर उसका घर नहीं।
फिर एक दिन
तुमने बिना कुछ कहे
अपनी बाँहें खोल दीं।
और मैं—
सदियों से भटका हुआ मुसाफ़िर—
पहली बार
किसी मंज़िल की ख़ामोशी में
ठहर गया।
तुम्हारी बाँहें
कोई साधारण आलिंगन नहीं थीं,
वे तो
फ़िरदौस का वह दरवाज़ा थीं
जिसे खोलने के लिए
न कोई आयत पढ़नी पड़ती है,
न कोई मंत्र।
बस प्रेम करना पड़ता है।
मैंने जब
अपना माथा
तुम्हारे कंधे पर रखा,
लगा—
जैसे कोई दरवेश
बरसों की भटकन के बाद
अपनी ख़ानकाह लौट आया हो।
तुम्हारी साँसों की गर्माहट
लोबान की उस महक जैसी थी
जो इबादत से पहले
पूरे आँगन को
रूह की ख़ुशबू से भर देती है।
तुम्हारे निकट
समय तस्बीह के दानों-सा
धीरे-धीरे
मेरी उँगलियों से फिसलता रहा,
और मैं
हर धड़कन पर
तुम्हारा नाम पढ़ता गया।
तुम्हारी बाँहों का घेरा
काबा की परिक्रमा नहीं था,
वह तो
उस प्रेम का चक्कर था
जहाँ लौटकर
मनुष्य
अपने ही भीतर
ईश्वर को पा लेता है।
मैंने देखा—
तुम्हारी आँखें बंद थीं,
मानो कोई सूफ़ी
समा में डूबकर
अपने रब का दीदार कर रहा हो।
उस क्षण
न देह का भार था,
न संसार की थकान।
केवल इतना था—
कि दो रूहें
एक-दूसरे के मौन में
ज़िक्र बन चुकी थीं।
तुम्हारे आलिंगन में
मुझे लगा,
जैसे रेगिस्तान का कोई फ़क़ीर
अचानक
फ़िरदौस की नदी तक पहुँच गया हो;
जैसे सदियों से प्यासी रेत पर
पहली रहमत बरसी हो;
जैसे बाँसुरी ने
आख़िरकार
अपने भीतर की साँस को
पहचान लिया हो।
प्रेम का चरम
शायद पाना नहीं होता,
बल्कि यह जान लेना होता है
कि अब कहीं और जाने की
ज़रूरत नहीं रही।
तुम्हारी बाँहों में
मुझे कोई कैद नहीं मिली,
एक अजीब-सी आज़ादी मिली—
वैसी,
जैसी परवाने को
शमा में जलकर मिलती है,
या नदी को
समुद्र में अपना नाम खोकर।
यदि कभी
ईश्वर मुझसे पूछे—
"मोक्ष कहाँ मिला?"
तो मैं
स्वर्ग का रास्ता नहीं बताऊँगा।
मैं मुस्कराकर कहूँगा—
एक स्त्री थी,
जिसकी बाँहों में
मैंने अपने समूचे अहंकार को उतार दिया।
उसने मुझे बाँधा नहीं,
मुक्त कर दिया।
और उसी दिन
समझ आया—
मोक्ष मृत्यु के बाद नहीं मिलता,
कभी-कभी
वह प्रेमिका की बाँहों में भी मिल जाता है,
जहाँ इश्क़
इबादत बन जाता है,
प्रेमी
दरवेश,
प्रेमिका
ख़ानकाह,
और दो धड़कनों के बीच
खुल जाता है—
फ़िरदौस का सबसे गुप्त दरवाज़ा।
No comments:
Post a Comment