रामलाल की उम्र लगभग सत्तर वर्ष थी। सर्दियों की एक दोपहर वह अपने पुराने घर के बरामदे में बैठा धूप सेंक रहा था। सामने अमरूद का पेड़ था, जिसे उसने चालीस साल पहले लगाया था। उसकी पत्नी रसोई में थी, बच्चे अपने-अपने शहरों में बस चुके थे। घर में कोई कमी नहीं थी।
फिर भी उस दिन न जाने क्यों उसे एक लड़की याद आई।
लड़की का चेहरा अब धुंधला पड़ चुका था। नाम भी मुश्किल से याद था। लेकिन उसे इतना याद था कि कॉलेज के दिनों में वह रोज़ पुस्तकालय की सीढ़ियों पर बैठकर उसका इंतज़ार किया करता था। दोनों ने कभी प्रेम का इज़हार नहीं किया। कभी हाथ तक नहीं पकड़ा। बस कुछ मुस्कुराहटें थीं, कुछ नज़रें थीं, और बहुत-सी अनकही बातें।
एक दिन वह लड़की कॉलेज छोड़कर चली गई। फिर कभी नहीं मिली।
सत्तर साल की उम्र में, अपने भरे-पूरे परिवार के बीच बैठा रामलाल उस लड़की को नहीं याद कर रहा था। वह उस जीवन को याद कर रहा था जो उसके साथ हो सकता था।
यहीं मनुष्य का मन सबसे रहस्यमय हो जाता है।
हम केवल उन लोगों को याद नहीं रखते जो हमारे जीवन का हिस्सा बने। कई बार हम उन लोगों को भी अपने भीतर जगह दिए रहते हैं जो कभी हमारे जीवन में आए ही नहीं।
एक महिला अपने पति के साथ पैंतालीस साल बिता सकती है, फिर भी किसी बरसाती शाम उसे वह अधूरा सपना याद आ सकता है जिसमें वह चित्रकार बनना चाहती थी।
एक पुरुष सफल व्यापारी बन सकता है, लेकिन किसी रेलवे स्टेशन पर खड़े होकर उसे अचानक वह नौकरी याद आ सकती है जिसे उसने परिवार की जिम्मेदारियों के कारण ठुकरा दिया था।
बाहर से देखने पर ये छोटी बातें लगती हैं। लेकिन मनुष्य का हृदय घटनाओं से कम और संभावनाओं से अधिक बना होता है।
इसीलिए कुछ लोग हमारे जीवन से चले जाते हैं, फिर भी समाप्त नहीं होते।
वे किसी तस्वीर की तरह नहीं रहते। वे एक प्रश्न की तरह रहते हैं।
"अगर ऐसा हुआ होता तो?"
यह प्रश्न उम्र के साथ बूढ़ा नहीं होता। कभी-कभी यह हमारे साथ आख़िरी साँस तक चलता है।
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