इच्छा (Desire) दुःख का कारण है या सफलता का? यह प्रश्न हजारों वर्षों से मनुष्य के सामने खड़ा है। एक ओर ऋषि-मुनि कहते हैं कि इच्छा ही बंधन और दुःख का कारण है, दूसरी ओर पूरी दुनिया सफलता, प्रगति और उपलब्धियों की नींव इच्छा को मानती है। पहली नज़र में ये दोनों बातें विरोधाभासी लगती हैं, लेकिन जब हम गहराई से देखते हैं तो समझ में आता है कि समस्या इच्छा नहीं है, बल्कि इच्छा के साथ हमारा संबंध है। यदि मनुष्य के भीतर कोई इच्छा ही न हो, तो वह भोजन भी न खोजे, ज्ञान भी न सीखे, परिवार भी न बनाए, समाज भी न विकसित करे। हर आविष्कार, हर कला, हर खोज और हर उपलब्धि के पीछे किसी न किसी रूप में इच्छा ही रही है। इसलिए इच्छा जीवन की एक स्वाभाविक शक्ति है। ब्रह्मर्षियों का दृष्टिकोण यह नहीं था कि हर इच्छा का त्याग कर दो, बल्कि उनका कहना था कि जब इच्छा आसक्ति में बदल जाती है, तब दुःख जन्म लेता है। जब मन किसी वस्तु, व्यक्ति, पद, धन या परिणाम से इतना चिपक जाता है कि उसके बिना स्वयं को अधूरा महसूस करने लगता है, तब व्यक्ति का संतुलन टूटने लगता है। फिर उसकी खुशी वर्तमान में नहीं रहती, बल्कि भविष्य के किसी परिणाम पर टिकी रहती है। परिणाम मिला तो कुछ समय के लिए प्रसन्नता, नहीं मिला तो निराशा, चिंता और पीड़ा। इसी को उन्होंने बंधन कहा। गीता भी यही बात कहती है कि कर्म करो, लक्ष्य रखो, लेकिन फल में इस तरह मत उलझो कि तुम्हारी शांति उसी पर निर्भर हो जाए। आधुनिक मनोविज्ञान भी लगभग इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है। मनोविज्ञान बताता है कि लक्ष्य और आकांक्षाएँ मनुष्य को ऊर्जा देती हैं, उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं, लेकिन जब व्यक्ति अपनी पूरी पहचान किसी उपलब्धि से जोड़ लेता है, तब तनाव बढ़ने लगता है। यदि कोई व्यक्ति सोचता है कि सफलता मिली तो मैं योग्य हूँ और असफल हुआ तो मैं बेकार हूँ, तो उसका मन लगातार दबाव में रहेगा। यही कारण है कि कई बार बहुत सफल लोग भी भीतर से संतुष्ट नहीं होते, क्योंकि उन्होंने अपनी आंतरिक शांति को परिणामों के हवाले कर दिया होता है। आकर्षण के सिद्धांत में भी एक महत्वपूर्ण अंतर बताया जाता है। इच्छा रखना और किसी चीज़ की कमी में जीना अलग-अलग बातें हैं। जब व्यक्ति बार-बार किसी चीज़ को पाने की बेचैनी में रहता है, तब उसका ध्यान उस वस्तु पर नहीं बल्कि उसकी अनुपस्थिति पर टिका रहता है। भीतर लगातार यह संदेश जाता है कि "मेरे पास अभी यह नहीं है।" इससे कमी की भावना मजबूत होती है। इसके विपरीत जब व्यक्ति किसी लक्ष्य को स्पष्ट रूप से देखता है, उसकी दिशा में कार्य करता है और साथ ही भीतर विश्वास बनाए रखता है, तब उसकी मानसिक अवस्था अधिक संतुलित रहती है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए इच्छा आवश्यक है, लेकिन उस इच्छा से अपनी पहचान जोड़ लेना समस्या की शुरुआत है। इच्छा कहती है, "मैं इसे प्राप्त करना चाहता हूँ।" आसक्ति कहती है, "यदि यह नहीं मिला तो मैं अधूरा हूँ।" इच्छा प्रेरणा देती है, आसक्ति दबाव पैदा करती है। इच्छा व्यक्ति को सक्रिय बनाती है, आसक्ति उसे बेचैन बनाती है। इच्छा विकास की ओर ले जाती है, आसक्ति भय की ओर। यदि कोई व्यक्ति धन कमाना चाहता है, अपने परिवार को बेहतर जीवन देना चाहता है, कुछ नया सीखना चाहता है या अपने जीवन को ऊँचे स्तर पर ले जाना चाहता है, तो यह स्वाभाविक और स्वस्थ इच्छा है। लेकिन यदि वही व्यक्ति हर समय परिणाम को लेकर घबराया हुआ है, दूसरों से तुलना कर रहा है, स्वयं को कमतर समझ रहा है और अपनी खुशी को केवल उपलब्धियों पर आधारित कर रहा है, तो वह इच्छा धीरे-धीरे दुःख का कारण बन जाएगी। इसलिए वास्तविक संतुलन यह नहीं कि इच्छा को खत्म कर दिया जाए, बल्कि यह है कि इच्छा को दिशा दी जाए और आसक्ति को कम किया जाए। लक्ष्य रखें, पूरी मेहनत करें, अपने सपनों के लिए समर्पित रहें, लेकिन अपनी आंतरिक शांति को किसी परिणाम का बंधक न बनाएं। क्योंकि जीवन का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि जिन लोगों ने सबसे महान कार्य किए, वे लक्ष्य के प्रति समर्पित थे लेकिन परिणाम के भय से संचालित नहीं थे। वे कर्म पर केंद्रित थे, चिंता पर नहीं। अंततः इच्छा एक शक्ति है। वही शक्ति किसी को सृजनकर्ता, खोजकर्ता, कलाकार, वैज्ञानिक या साधक बना सकती है, और वही शक्ति किसी को बेचैनी, लालच और निरंतर असंतोष में भी धकेल सकती है। अंतर इच्छा में नहीं, बल्कि उस चेतना में है जिससे इच्छा को जिया जा रहा है। जब इच्छा आपके हाथ में होती है, तो वह सफलता का साधन बनती है। जब आप इच्छा के हाथ में होते हैं, तो वही दुःख का कारण बन जाती है।
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