हम अक्सर सोचते हैं कि सुख और दुःख दुनिया हमें देती है। लेकिन सच यह है कि दुनिया केवल घटनाएँ देती है, सुख और दुःख हम स्वयं बनाते हैं।
एक ही बारिश किसी किसान के लिए खुशी है और किसी मजदूर के लिए परेशानी। बारिश वही है, लेकिन अनुभव अलग है। इससे समझ आता है कि अनुभव बाहर नहीं, भीतर जन्म लेता है।
अनुभव वह है जब कोई घटना हमारी चेतना को छूती है। केवल देखना अनुभव नहीं है। हजारों लोग रोज़ सूरज उगते देखते हैं, पर कुछ ही लोग उसकी सुंदरता को महसूस कर पाते हैं। जहाँ महसूस करना शुरू होता है, वहीं अनुभव जन्म लेता है।
दिलचस्प बात यह है कि अनुभव खुद बंधन भी बन सकता है। एक सुखद क्षण मिला तो मन उसे दोबारा चाहता है। एक दुखद घटना हुई तो मन उसे बार-बार याद करता है। घटना चली जाती है, लेकिन अनुभव की पकड़ बनी रहती है। यही बंधन है।
चेतना और अनुभव का संबंध नदी और किनारे जैसा है। अनुभव बहते रहते हैं कभी सुख, कभी दुःख, कभी प्रेम, कभी क्रोध। लेकिन भीतर कुछ ऐसा भी है जो इन सबको आते-जाते देख रहा है। वही चेतना है।
जब हम कहते हैं "मैं दुखी हूँ", तब हम अनुभव में खोए हुए होते हैं। लेकिन जब हम देखते हैं कि "दुःख हो रहा है", तब देखने वाला प्रकट होने लगता है। यहीं से चेतना की झलक मिलती है।
कई लोग पूछते हैं कि क्या कुछ न करने से भी अनुभव हो सकता है?
हाँ।
जब मन लगातार भागना बंद करता है, तब पहली बार वह उन चीज़ों को महसूस करता है जो हमेशा से मौजूद थीं। जैसे शांत झील में तल दिखाई देने लगता है, वैसे ही शांत मन में जीवन दिखाई देने लगता है।
हम जीवन भर अनुभवों को पकड़ने में लगे रहते हैं, जबकि अनुभव आते-जाते रहते हैं। जो कभी नहीं जाता, जो हर अनुभव का साक्षी है, उसे बहुत कम लोग देखते हैं।
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