"स्त्री का अपना निर्णय: बदलते समय की सबसे बड़ी आहट"
समाज में होने वाले बड़े बदलाव हमेशा शोर मचाकर नहीं आते। कई बार वे चुपचाप लोगों की सोच में जन्म लेते हैं और धीरे-धीरे पूरे समाज का चेहरा बदल देते हैं। आज का समय भी ऐसे ही एक बदलाव का साक्षी है। यह बदलाव है स्त्री के अपने निर्णय स्वयं लेने का।
लंबे समय तक स्त्री के जीवन से जुड़े अधिकांश निर्णय दूसरे लोग करते रहे। उसे क्या पढ़ना है, कहाँ जाना है, किससे मिलना है, क्या पहनना है, किस काम को चुनना है और जीवन के बड़े फैसले कैसे लेने हैं इन सब पर अक्सर किसी और का अधिकार माना जाता था। स्त्री से अपेक्षा की जाती थी कि वह केवल निर्देशों का पालन करे। उसकी राय सुनी भी जाती थी तो अंतिम निर्णय उसका नहीं होता था।
लेकिन समय के साथ परिस्थितियाँ बदली हैं। शिक्षा का विस्तार हुआ, संचार के साधन बढ़े, दुनिया छोटी हुई और जानकारी हर व्यक्ति की पहुँच में आ गई। स्त्री ने अपने चारों ओर की दुनिया को स्वयं समझना शुरू किया। उसने देखा कि उसके जीवन के सुख-दुख, संघर्ष और उपलब्धियाँ सबसे अधिक उसी को प्रभावित करती हैं। तब उसके भीतर यह प्रश्न उठा कि जब परिणाम उसे भुगतने हैं तो निर्णय का अधिकार भी उसका क्यों न हो।
आज की स्त्री केवल सुनती नहीं, सोचती भी है। वह केवल मानती नहीं, सवाल भी करती है। वह किसी विचार को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करती क्योंकि उसे बार-बार दोहराया गया है। वह उसके पीछे के तर्क को समझना चाहती है। यही कारण है कि वह अपने जीवन के विषय में स्वतंत्र निर्णय लेने लगी है।
इस बदलाव का एक महत्वपूर्ण कारण आत्मसम्मान भी है। हर मनुष्य चाहता है कि उसकी बुद्धि, अनुभव और समझ का सम्मान हो। स्त्री भी इससे अलग नहीं है। जब वह शिक्षा, रोजगार, कला, विज्ञान, व्यापार और समाज के हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर रही है, तब वह अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार भी स्वाभाविक रूप से चाहती है।
नई पीढ़ी की स्त्रियाँ यह समझ चुकी हैं कि किसी भी व्यक्ति का विकास तभी संभव है जब उसे अपनी सोच के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले। वे यह भी जानती हैं कि गलती करने का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना सही निर्णय लेने का। क्योंकि अनुभव से ही समझ विकसित होती है।
एक और बड़ा परिवर्तन यह आया है कि अब स्त्री अपने जीवन को केवल दूसरों की अपेक्षाओं के आधार पर नहीं देखती। वह अपनी इच्छाओं, सपनों और आवश्यकताओं को भी महत्व देती है। वह जानती है कि त्याग और समर्पण महत्वपूर्ण गुण हैं, लेकिन आत्मसम्मान और आत्मनिर्णय भी उतने ही आवश्यक हैं।
आज जब कोई स्त्री किसी विचार, व्यक्ति, व्यवस्था या परंपरा से असहमति जताती है, तो वह केवल विरोध नहीं कर रही होती। वह यह बता रही होती है कि उसके पास अपनी समझ है, अपना विवेक है और अपने निर्णय लेने की क्षमता है। यही लोकतांत्रिक और जागरूक समाज की पहचान भी है।
स्त्री का निर्णयकर्ता बनना किसी के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है। यह उसके स्वयं के पक्ष में खड़ा होना है। यह अधिकार, सम्मान और आत्मविश्वास की यात्रा है। यह उस लंबे सफर का परिणाम है जिसमें उसने चुप रहने के बजाय बोलना सीखा, अनुसरण करने के बजाय विचार करना सीखा और दूसरों के निर्णय स्वीकार करने के बजाय अपने निर्णय स्वयं लेना सीखा।
समय बदल रहा है। इस बदलाव की सबसे स्पष्ट पहचान यही है कि स्त्री अब किसी की परछाईं बनकर नहीं जीना चाहती। वह अपने जीवन की सहभागी ही नहीं, उसकी निर्णयकर्ता भी बनना चाहती है। यही बदलते समाज की सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी आहट है।
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