मेरे पास तुम्हारे लिए कोई बड़ा उपहार नहीं है, न कोई चमकता हुआ वादा, न ही ऐसे शब्द जो तुम्हारी सारी थकान को एक पल में मिटा दें। मेरे पास तो बस कुछ चंद शब्द हैं, कुछ अनकहे भाव हैं, और एक लंबा सूनापन है, जिसे मैं बरसों से अपने भीतर लिए घूम रहा हूँ और सच कहूँ तो डरता हूँ कि कहीं ये सब तुम्हें और अधिक उदास न कर दे।
क्योंकि जो लोग बहुत गहराई से प्रेम करते हैं, उनके पास देने के लिए अक्सर खुशियों से अधिक स्मृतियाँ होती हैं।
मेरे पास तुम्हारे लिए वे शामें हैं जो तुम्हारे नाम के बिना अधूरी लगती हैं। वे रातें हैं जिनमें नींद तो आती है, मगर सपने तुम्हारे दरवाज़े पर जाकर बैठ जाते हैं। मेरे पास वे तमाम अधूरे वाक्य हैं जिन्हें मैं हर दिन लिखता हूँ और फिर मिटा देता हूँ, क्योंकि उन्हें पढ़ने वाली आँखें मुझसे बहुत दूर हैं।
मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ खामोशियाँ हैं, जिन्हें मैंने शब्दों से कहीं अधिक सँभालकर रखा है। वे खामोशियाँ जो तुम्हारे जाने के बाद मेरे कमरे की दीवारों में बस गईं, जो मेरी किताबों के पन्नों में छिप गईं, जो मेरी चाय की हर प्याली के साथ धीरे-धीरे घुलती रहीं।
तुम्हें क्या दूँ....?
वो प्रतीक्षा दूँ जो हर सुबह तुम्हारे संदेश की आहट सुनती है....? या वो बेचैनी दूँ जो हर रात तुम्हारा नाम लेकर खुद को समझाती है कि कुछ प्रेमों का मुकद्दर मिलन नहीं, स्मरण होता है।
मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ भी ऐसा नहीं है जो दुनिया की नज़रों में कीमती हो। लेकिन मेरे पास तुम्हारे लिए वो सब है जिसे मैंने अपनी आत्मा के सबसे सुरक्षित कोने में रखा है।
एक कोना है जहाँ आज भी तुम्हारी हँसी रखी है।
एक कोना है जहाँ तुम्हारी आवाज़ अब भी किसी पुराने गीत की तरह गूँजती है।
एक कोना है जहाँ तुम्हारे होने का एहसास अब भी वैसे ही ताज़ा है जैसे पहली बारिश के बाद मिट्टी की ख़ुशबू।
एक कोना है जहां आज भी तुम्हारी अनगिनत अदाएं श्रिंगार करती है और
एक कोना ऐसा भी है जहाँ सिर्फ़ सूनापन रहता है।
वही सूनापन जो तुम्हारे जाने के बाद आया था और फिर कभी गया नहीं।
कभी-कभी लगता है कि ये सूनापन भी तुम्हारी ही तरह मेरा अपना हो गया है। ये मेरे साथ चलता है, मेरे साथ बैठता है, मेरी डायरी के पन्नों पर उतरता है और फिर तुम्हारा नाम लिखकर चुप हो जाता है।
मैं तुम्हें प्रेम का दावा नहीं देना चाहता, मैं तुम्हें अधिकार का बंधन नहीं देना चाहता, मैं तुम्हें सिर्फ़ अपना सच देना चाहता हूँ और मेरा सच यही है कि दुनिया में तुम्हारे लिए लाखों कहानीयां, शायरीयां, गज़लें लिखने के बाद भी मेरी आँखें जब थक जाती हैं तो उन्हें सुकून तुम्हारी स्मृति में ही मिलता है। मेरा सच ये है कि मैंने तुम्हें पाने से अधिक तुम्हें महसूस किया है। मेरा सच ये है कि तुम्हारी अनुपस्थिति भी मेरे जीवन में उतनी ही मौजूद है जितनी कभी तुम्हारी उपस्थिति थी।
इसलिए आज ये पत्र लिखते हुए मेरे हाथों में कोई गुलाब नहीं है, कोई चमकती हुई कविता नहीं है, कोई बनावटी खूबसूरती नहीं है। बस कुछ चंद शब्द हैं, कुछ अनकहे भाव हैं, कुछ अधूरी इच्छाएँ हैं, कुछ भींगी हुई यादें हैं और एक अथाह सूनापन है।
शायद ये सब तुम्हें और दर्द दें, शायद तुम्हारी आँखें भींग जाएँ, शायद तुम मुस्कुरा कर कहो कि मैं आज भी वैसा ही हूँ, लेकिन फिर भी ये सब तुम्हारा है। क्योंकि प्रेम जब अपनी सबसे निर्मल अवस्था में पहुँचता है, तब वो खुशियाँ नहीं बाँटता, वो अपना समूचा अस्तित्व सौंप देता है।
और मेरा अस्तित्व...उसमें जितनी रौशनी है, जितनी तन्हाई है, जितनी प्रार्थनाएँ हैं, जितनी अधूरी कहानियाँ हैं, जितनी धड़कनें हैं, जितनी प्रतीक्षाएँ हैं, सब तुम्हारे नाम लिखी जा चुकी हैं।
अब मेरे पास बचा ही क्या है?
बस कुछ चंद शब्द, कुछ अनकहे भाव और एक ऐसा सूनापन है, जो हर दिन तुम्हें अपने समक्ष बैठा मेहसूस करके दिल पर जमा सुनेपन का अंधेरा थोड़ा कम हो जाता है।
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