Saturday, July 4, 2026

जहाँ से चले थे, आज भी वहीं खड़े हैं

 जहाँ से चले थे, आज भी वहीं खड़े हैं...

सारी ज़िंदगी चप्पू चलाते रहे।

किसी ने माला पहन ली,

किसी ने गेरुए वस्त्र पहन लिए,

किसी ने नया नाम रख लिया,

किसी ने सिर मुंडवा लिया,

किसी ने दाढ़ी बढ़ा ली,

किसी ने किसी संप्रदाय की सदस्यता ले ली।

सबको लगा कि यात्रा चल रही है...

लेकिन यात्रा कहाँ चल रही थी?

घर से तो निकल गए,

मंदिर से मस्जिद,

मस्जिद से गुरुद्वारा,

गुरुद्वारे से आश्रम,

आश्रम से तीर्थ तक पहुँच गए...

लेकिन एक चीज़ को साथ ले जाना नहीं भूले—

अहंकार।

और अहंकार के साथ ही ले गए यह भ्रम कि—

"मैं हिन्दू हूँ..."

"मैं मुसलमान हूँ..."

"मैं जैन हूँ..."

"मैं बौद्ध हूँ..."

"मैं ईसाई हूँ..."

"मैं इस गुरु का हूँ..."

"मैं उस संप्रदाय का हूँ..."

यही रस्सा था।

नाव किनारे से नहीं बंधी थी,

नाव इन पहचानों से बंधी थी।

और दुख की बात यह है कि

सारी ज़िंदगी चप्पू चलाते रहे,

लेकिन इस रस्से को कभी खोला ही नहीं।

एक दिन थककर नाव से उतरे...


पीछे मुड़कर देखा...

नाव तो वहीं खड़ी थी,

जहाँ से यात्रा शुरू हुई थी।

तब समझ में आया—

दूरी तय करने से यात्रा नहीं होती,

परिवर्तन से यात्रा होती है।

वर्षों की प्रार्थनाएँ,

हजारों शास्त्र,

सैकड़ों तीर्थयात्राएँ,

अनगिनत मंत्र-जाप...

सब व्यर्थ हो सकते हैं,

यदि भीतर बैठा हुआ "मैं"

वैसा का वैसा ही बचा रहे।

"सत्य किसी धर्म की संपत्ति नहीं है।"

सत्य तक वही पहुँचता है

जो अपनी पहचानें उतारने का साहस रखता है।

जिसने "मैं कौन हूँ?" पूछने का साहस किया,

वह पहुँच गया।

जो "मैं हिन्दू हूँ", "मैं मुसलमान हूँ",

"मैं जैन हूँ", "मैं बौद्ध हूँ"

इन्हीं उत्तरों में उलझा रहा,

वह किनारे पर ही खड़ा रह गया।

धर्म का अर्थ किसी झंडे के नीचे खड़ा होना नहीं है।

धर्म का अर्थ है—

अपने भीतर की नींद से जाग जाना।

आध्यात्मिकता का अर्थ किसी समूह में शामिल होना नहीं है।

आध्यात्मिकता का अर्थ है—

उस "मैं" को पहचानना

जो हर पीड़ा, हर संघर्ष और हर विभाजन की जड़ है।

याद रखो...

नाव बदलने से कुछ नहीं होगा।

गुरु बदलने से कुछ नहीं होगा।

माला बदलने से कुछ नहीं होगा।

वस्त्र बदलने से कुछ नहीं होगा।

नाम बदलने से भी कुछ नहीं होगा।

जब तक अहंकार का रस्सा नहीं खुलता,

तब तक हर यात्रा केवल भ्रम है।

और जिस दिन यह रस्सा खुल गया...

उसी दिन पहली बार

नाव सचमुच चल पड़ती है।

उसी दिन धर्म शुरू होता है।


उसी दिन खोज शुरू होती है।

उसी दिन मनुष्य पहली बार

अपने घर की ओर यात्रा करता है।"चप्पू चलाने से पहले यह देख लेना कि नाव बंधी तो नहीं है; क्योंकि बंधी हुई नाव में बिताई गई पूरी जिंदगी, यात्रा नहीं—सिर्फ़ थकान बन जाती है।"

 अगर इन यात्राओं में कोई दम होता यह यात्राओं से किसी सत्य की प्राप्ति होती तो इंसान में इतनी घृणा कितना प्यार का भाव कभी ना होता समाज में बढ़ रही गणना का एक ही मतलब है कि लोगों की यात्राएं झूठी है लोगों के धर्म झूठे हैं लोगों के गुरु झूठे हैं

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