जब जीवन हमें स्वयं से मिलवाता है
कई लोगों को यह भ्रम रहता है कि वे खुद को अच्छी तरह जानते हैं।
उन्हें अपना नाम पता होता है, पसंदीदा रंग पता होता है, कौन-सा खाना अच्छा लगता है और किन लोगों के साथ समय बिताना अच्छा लगता है, यह भी पता होता है। लेकिन फिर एक दिन कुछ ऐसा घटता है जो भीतर की सारी व्यवस्था बदल देता है। कोई रिश्ता छूट जाता है, कोई सपना टूट जाता है, कोई भरोसा बिखर जाता है या अचानक सब कुछ वैसा मिल जाता है जिसकी वर्षों से इच्छा थी—और तभी एक अजनबी चेहरा सामने आता है।
वह चेहरा किसी और का नहीं, अपना ही होता है।
अजीब बात है कि मनुष्य अपने बारे में सबसे कम तब जानता है, जब जीवन उसकी इच्छा के अनुसार चल रहा होता है। पहचान अक्सर सुविधा के दिनों में नहीं, बल्कि उन दिनों में उभरती है जब पुराने सहारे काम करना बंद कर देते हैं।
एक युवक को लगता था कि वह बहुत धैर्यवान है। यह विश्वास तब तक बना रहा जब तक उसे लगातार असफलताओं का सामना नहीं करना पड़ा। एक स्त्री को लगता था कि वह बहुत मजबूत है, लेकिन एक साधारण-सी विदाई ने उसके भीतर ऐसी खाली जगह बना दी जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की थी। एक व्यक्ति अपने आपको बेहद स्वतंत्र समझता था, फिर उसे एहसास हुआ कि उसके अधिकांश निर्णय दूसरों की स्वीकृति पाने की कोशिशों से संचालित थे।
जीवन उत्तर कम देता है, परिस्थितियाँ अधिक देता है। और परिस्थितियाँ मनुष्य से वह कहलवा देती हैं, जो वह सामान्य दिनों में स्वयं से भी छिपाकर रखता है।
यही कारण है कि कुछ घटनाएँ केवल घटनाएँ नहीं होतीं। वे दर्पण बन जाती हैं।
किसी की सफलता यह दिखा देती है कि उसके भीतर कितना अहंकार छिपा था। किसी की असफलता बता देती है कि उसके भीतर कितनी दृढ़ता बची हुई है। किसी का प्रेम यह उजागर कर देता है कि वह कितना उदार है, और किसी का बिछड़ना यह कि वह किन बातों से अब तक भागता रहा था।
हममें से अधिकांश लोग वर्षों तक एक छवि बनाकर जीते हैं। दुनिया हमें जिम्मेदार, शांत, सफल, समझदार या खुश मानती है। धीरे-धीरे हम भी उस छवि पर विश्वास करने लगते हैं। फिर जीवन किसी दिन धीरे से एक परत हटा देता है। उसके नीचे जो दिखाई देता है, वह हमेशा वैसा नहीं होता जैसा हमने सोचा था।
अपने भीतर झाँकना हमेशा सुखद अनुभव नहीं होता। कई बार यह पुराने कमरों के दरवाज़े खोलने जैसा होता है, जहाँ धूल जमी होती है और कुछ ऐसी चीज़ें पड़ी होती हैं जिन्हें हम भूल जाना चाहते थे। लेकिन इन्हीं कमरों में हमारी अधूरी कहानियाँ भी रहती हैं।
समय के साथ बहुत-से लोग समझने लगते हैं कि हर लड़ाई जीतना आवश्यक नहीं, हर व्यक्ति को समझाना आवश्यक नहीं, हर अवसर को पकड़ लेना आवश्यक नहीं। कुछ चीज़ों को जाने देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कुछ चीज़ों को बचाए रखना।
फिर एक उम्र के बाद मनुष्य को अपने बारे में बड़ी घोषणाएँ करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। वह जान जाता है कि उसके भीतर कहाँ कमजोरी है, कहाँ साहस है, कहाँ अभिमान है और कहाँ प्रेम। यह ज्ञान किताबों से नहीं मिलता; यह वर्षों की ठोकरों, प्रतीक्षाओं, विफलताओं, खुशियों और बिछड़नों से बनता है।
शायद इसी वजह से स्वयं से मुलाकात किसी एक दिन नहीं होती।
वह धीरे-धीरे घटती है।
थोड़ा किसी हार में।
थोड़ा किसी प्रेम में।
थोड़ा किसी अकेली शाम में।
और थोड़ा उन क्षणों में, जब दुनिया की सारी आवाज़ों के बीच अचानक अपनी ही आवाज़ सुनाई देने लगती है।
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