जिसे खोज रहे हो, वह तुम स्वयं हो
मनुष्य का जीवन एक अनवरत खोज है। कोई सुख खोज रहा है, कोई शान्ति, कोई प्रेम, कोई सफलता और कोई परमात्मा। आश्चर्य की बात यह है कि जिस वस्तु की खोज में मनुष्य जीवन भर भटकता है, वह उसके अपने ही भीतर विद्यमान होती है। उपनिषदों का समस्त संदेश इसी एक सत्य में समाहित है— "तत्त्वमसि" (वह तुम ही हो)।
इस सत्य को समझाने के लिए वेदान्त में दो अत्यन्त सुंदर दृष्टान्त मिलते हैं।
दशवाँ तुम ही हो
दस व्यक्ति एक नदी पार कर रहे थे। नदी पार करने के बाद उन्हें चिंता हुई कि कहीं कोई साथी नदी में बह तो नहीं गया। एक व्यक्ति ने सबको गिनना शुरू किया। उसने सामने खड़े नौ लोगों को तो गिन लिया, पर स्वयं को गिनना भूल गया। संख्या नौ निकली।
वह घबराकर रोने लगा— "हमारा एक साथी डूब गया।"
दूसरे ने गिना, तीसरे ने गिना, चौथे ने गिना। सभी को केवल नौ ही दिखाई दिए। क्योंकि हर कोई स्वयं को गिनना भूल रहा था। अब सब विलाप करने लगे।
उसी समय एक बुद्धिमान यात्री वहाँ से गुजरा। उसने कारण पूछा। सारी बात सुनकर उसने सभी को पुनः गिना और जो गिन रहा था, उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा—
"दशमोऽसि — दसवाँ तुम ही हो।"
इतना सुनते ही उसका शोक समाप्त हो गया। न कोई नया व्यक्ति आया, न कोई नदी से बाहर निकला, न कोई संख्या बढ़ी। केवल अज्ञान दूर हुआ।
जिसे वे खोया हुआ समझ रहे थे, वह कभी खोया ही नहीं था।
भूला हुआ राजकुमार
दूसरा दृष्टान्त भी उतना ही मार्मिक है।
एक राजा का पुत्र बचपन में बिछड़ गया। वह जंगल में भीलों के बीच पलने लगा। समय बीतता गया और उसने स्वयं को भील ही मान लिया। उसे अपनी वास्तविक पहचान का कोई ज्ञान नहीं था।
वर्षों बाद राजा के एक मंत्री ने उसे खोज निकाला। मंत्री ने उससे कहा—
"तुम भील नहीं हो, राजा के पुत्र हो।"
युवक ने विश्वास नहीं किया। उसने कहा—
"मैं तो बचपन से यही जीवन जी रहा हूँ। मैं राजकुमार कैसे हो सकता हूँ?"
मंत्री ने उसे प्रमाण दिए, उसका इतिहास बताया, उसकी पहचान स्पष्ट की। धीरे-धीरे उसका भ्रम मिटा और उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हो गया।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि मंत्री ने उसे राजकुमार नहीं बनाया। वह पहले से ही राजकुमार था। केवल उसका अज्ञान समाप्त हुआ।
यही जीव और ब्रह्म की कथा है
वेदान्त कहता है कि हमारी स्थिति भी इन दोनों कथाओं के पात्रों जैसी है।
दसवें व्यक्ति की तरह हम स्वयं को भूल गए हैं।
राजकुमार की तरह हमने अपनी वास्तविक पहचान खो दी है।
हम शरीर को "मैं" मान बैठे हैं।
हम मन को "मैं" मान बैठे हैं।
हम नाम, जाति, पद, धन और संबंधों को "मैं" मान बैठे हैं।
जबकि उपनिषद कहते हैं—
तुम शरीर नहीं हो।
तुम मन नहीं हो।
तुम सीमित जीव नहीं हो।
तुम वही चैतन्य हो जिससे सम्पूर्ण जगत प्रकाशित है।
इसीलिए गुरु कहता है—
"तत्त्वमसि" — वह ब्रह्म तुम ही हो।
फिर साक्षात्कार तुरंत क्यों नहीं होता?
यह प्रश्न स्वाभाविक है।
दशमोऽसि सुनते ही व्यक्ति को दसवें का ज्ञान हो गया। फिर तत्त्वमसि सुनते ही ब्रह्मज्ञान क्यों नहीं हो जाता?
कारण यह है कि दशवें व्यक्ति के सामने केवल एक साधारण भूल थी, जबकि जीव के सामने जन्म-जन्मान्तरों का अज्ञान, देहाभिमान, राग-द्वेष और वासनाओं का घना आवरण है।
इसलिए वेदान्त श्रवण, मनन और निदिध्यासन की बात करता है।
बार-बार सुनना, उस पर विचार करना और उसे अपने अनुभव में उतारना आवश्यक होता है।
जब मन पूर्ण रूप से निर्मल हो जाता है, तब गुरु का एक वाक्य ही पर्याप्त हो जाता है।
परमात्मा की खोज या स्वयं की खोज?
अधिकांश लोग परमात्मा को कहीं दूर खोजते हैं।
कोई तीर्थों में खोजता है।
कोई पर्वतों में खोजता है।
कोई आकाश में खोजता है।
कोई भविष्य में खोजता है।
परन्तु उपनिषद कहते हैं कि जिस परमात्मा को तुम बाहर खोज रहे हो, वह तुम्हारे अपने अस्तित्व का आधार है।
जिस प्रकार दसवाँ व्यक्ति स्वयं ही था, जिस प्रकार राजकुमार स्वयं ही राजकुमार था, उसी प्रकार जीव स्वयं ही ब्रह्मस्वरूप है।
आवश्यकता किसी नई वस्तु को प्राप्त करने की नहीं है।
आवश्यकता केवल अज्ञान हटाने की है।
ज्ञान कोई उपलब्धि नहीं, अपितु पहचान है।
ब्रह्मसाक्षात्कार कोई बनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेने का नाम है।
और जिस दिन यह पहचान हो जाती है, उसी दिन साधक के जीवन में उपनिषद का यह महावाक्य सजीव हो उठता है
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