Saturday, July 11, 2026

दो दिल मिल रहे हैं, मगर चुपके-चुपके...

 दो दिल मिल रहे हैं, मगर चुपके-चुपके...


दो दिल मिल रहे हैं, मगर चुपके-चुपके,

जैसे रात मिलती हो चाँद से धीरे-धीरे,

जैसे कोई दुआ उतरती हो रूह में

बिना कोई शोर किए, बिना कुछ कहे।


न कोई वादा हुआ, न कोई इज़हार,

फिर भी हर धड़कन में उसका ही अधिकार,

नज़रें मिलीं तो जैसे मौसम बदल गए,

सूखे हुए एहसास भी फिर से मचल गए।


वो जब भी सामने आता है,

वक़्त कुछ पल ठहर जाता है,

और दिल अपनी सारी दुनियादारी भूलकर

बस उसके चेहरे पर सिमट जाता है।


दोनों खामोश हैं, मगर बातें बहुत हैं,

लब बंद हैं, मगर मुलाक़ातें बहुत हैं,

जो कहा नहीं गया, वही सबसे ज़्यादा है,

जो सुना नहीं गया, वही इश्क़ का वादा है।


कभी हवा उसके होने की खबर लाती है,

कभी तन्हाई उसका नाम गुनगुनाती है,

और दिल की वीरान गलियों में

उसकी याद चुपचाप दीप जलाती है।


ये मोहब्बत भी कितनी अजीब होती है,

न मिलने पर भी बहुत करीब होती है,

एक चेहरा आँखों में बस जाता है,

और पूरी दुनिया उससे छोटी लगने लगती है।


न कोई मंज़िल तय है, न कोई रास्ता,

फिर भी साथ चल रहा है एक खूबसूरत वास्ता,

जैसे दो नदियाँ दूर-दूर बहते हुए भी

एक ही समंदर का सपना देखती हों।


दो दिल मिल रहे हैं, मगर चुपके-चुपके,

जैसे फूल महकते हैं चुपके-चुपके,

जैसे बारिश की पहली बूंद

सूखी मिट्टी को छूती है चुपके-चुपके।


और शायद सच्चा प्रेम ऐसा ही होता है,

जिसमें शोर नहीं, सुकून होता है,

जिसमें दुनिया को बताने की जल्दी नहीं होती,

बस एक-दूसरे को महसूस करने की आरज़ू होती है।


दो दिल मिल रहे हैं, मगर चुपके-चुपके,

और इस ख़ामोशी में

एक पूरी मोहब्बत जन्म ले रही है...

चुपके-चुपके। 


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