कई बार इंसान को सबसे ज़्यादा चोट किसी घटना से नहीं लगती,
बल्कि उस एहसास से लगती है कि अब वह पहले जैसा नहीं रहा।
वह लोगों के बीच बैठा होता है, बातें भी करता है, मुस्कुराता भी है, लेकिन भीतर कहीं कुछ लगातार चुप रहता है।
एक ऐसी चुप्पी, जिसे वह खुद भी पूरी तरह समझ नहीं पाता।
फिर धीरे-धीरे वह अपने अंदर एक जगह बना लेता है
जहाँ वह दुनिया की नज़रों से बचकर रह सके।
यह जगह शुरू में उसे सुकून देती है।
लगता है अब कोई चोट नहीं पहुँचेगी।
अब कोई उम्मीद नहीं होगी, तो टूटना भी नहीं होगा।
लेकिन मन की बनाई हुई दीवारें हमेशा सुरक्षा नहीं देतीं, कई बार वही दीवारें कैद बन जाती हैं।
फिर इंसान बाहर की दुनिया कम और अपने भीतर के विचारों में ज़्यादा रहने लगता है।
उसे हर चीज़ महसूस तो होती है, पर वह उसे कह नहीं पाता।
क्योंकि कुछ दर्द ऐसे होते हैं जिनकी भाषा नहीं होती।
अजीब बात यह है कि मनुष्य अक्सर अपने घाव को छुपाते-छुपाते उसी घाव जैसा हो जाता है।
जिसे कभी प्रेम में चोट लगी हो, वह धीरे-धीरे भरोसे से डरने लगता है।
जिसे अपनों ने अनदेखा किया हो, वह लोगों के बीच रहकर भी अकेला महसूस करता है।
जिसने जीवन में बहुत दबाव सहा हो, उसका मन बिना कारण भी थका रहता है।
और समय के साथ इंसान अपनी असली थकान भूल जाता है।
उसे लगता है वह बस थोड़ा परेशान है, जबकि भीतर वर्षों का जमा हुआ बोझ होता है।
यही वजह है कि कई लोग बिना किसी स्पष्ट कारण के भी बेचैन रहते हैं।
रात को सब शांत होता है, लेकिन मन शांत नहीं होता।
भीतर जैसे कोई लगातार चल रहा होता है।
कुछ लोग इस बेचैनी से बचने के लिए खुद को बहुत व्यस्त कर लेते हैं।
कुछ हर समय लोगों के बीच रहना चाहते हैं।
कुछ हँसी में सब छुपा देते हैं।
और कुछ इतने शांत हो जाते हैं कि उनकी चुप्पी ही उनका परिचय बन जाती है।
लेकिन दबाया हुआ दुःख कहीं जाता नहीं।
वह मन के किसी कोने में बैठा रहता है और धीरे-धीरे इंसान की सोच, उसके स्वभाव, उसके रिश्तों सबमें उतरने लगता है।
शायद इसी कारण इंसान को सबसे कठिन काम अपने ही भीतर उतरना लगता है।
दूसरों को समझना आसान है, खुद को समझना कठिन।
क्योंकि भीतर जाते ही वे सारे हिस्से सामने आने लगते हैं जिन्हें हम वर्षों से नज़रअंदाज़ करते आए हैं।
वहाँ वह बच्चा भी होता है जो कभी खुलकर रो नहीं पाया।
वहाँ वह युवा भी होता है जिसने किसी अपने के बदल जाने के बाद खुद को बदल लिया।
वहाँ वह इंसान भी होता है जो हमेशा सबको संभालता रहा, लेकिन कभी किसी ने उससे नहीं पूछा कि वह खुद कैसा है।
Healing शायद यहीं से शुरू होती है।
जब इंसान पहली बार अपने भीतर बैठे उस थके हुए हिस्से के पास बैठता है।
उसे समझाने नहीं, बस सुनने के लिए।
क्योंकि हर दर्द तुरंत ठीक होना नहीं चाहता।
कुछ दर्द केवल यह चाहते हैं कि कोई उन्हें ईमानदारी से महसूस करे।
और सच कहें तो मनुष्य को हमेशा समाधान नहीं चाहिए होता,
कई बार उसे केवल इतना चाहिए होता है कि वह बिना डर के अपने जैसा रह सके।
जिस दिन इंसान अपने भीतर की टूटन से शर्मिंदा होना छोड़ देता है, उसी दिन उसके भीतर कुछ बदलना शुरू हो जाता है।
फिर वह हर समय मजबूत दिखने की कोशिश नहीं करता।
वह धीरे-धीरे सहज होने लगता है।
जैसे लंबे समय तक बारिश सहने के बाद मिट्टी पहली धूप में धीरे-धीरे भाप छोड़ती है…
वैसे ही मन भी एक दिन अपना बोझ छोड़ना शुरू कर देता है।
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