“बीज और मनुष्य”
धरती की हथेली पर
एक बीज पड़ा था,
और दुनिया की भीड़ में
एक मनुष्य।
दोनों छोटे थे,
दोनों को कोई नहीं जानता था,
दोनों के भीतर
एक अनदेखा भविष्य धड़क रहा था।
बीज को मिट्टी मिली,
मनुष्य को संसार।
दोनों ही जगहें सरल नहीं थीं।
मिट्टी ने बीज को दबाया,
संसार ने मनुष्य को।
बीज के ऊपर
मिट्टी की परतें चढ़ती गईं,
मनुष्य के ऊपर
उम्मीदों, असफलताओं,
भयों और जिम्मेदारियों की।
दोनों अंधेरे में थे।
फिर एक दिन
बीज के पास पानी पहुँचा,
और मनुष्य के पास
एक सपना।
दोनों के भीतर
कुछ हलचल हुई।
बीज की कठोर देह में
पहली दरार पड़ी,
मनुष्य के अहंकार में
पहली चोट।
किसी ने नहीं देखा
कि जन्म हमेशा टूटने से शुरू होता है।
बीज टूटा
तभी अंकुर निकला।
मनुष्य टूटा
तभी समझ निकली।
बीज ने सबसे पहले
ऊपर नहीं देखा।
उसने जड़ भेजी।
क्योंकि ऊँचा उठने से पहले
गहरा उतरना पड़ता है।
मनुष्य ने भी जब जीवन सीखा
तो पाया
सफलता की ऊँचाई से पहले
चरित्र की गहराई चाहिए।
जड़ें धरती में उतरती रहीं।
मनुष्य का धैर्य
अपने भीतर।
जितनी जड़ गहरी हुई,
उतना वृक्ष सुरक्षित हुआ।
जितना मनुष्य भीतर उतरा,
उतना व्यक्तित्व मजबूत हुआ।
फिर अंकुर मिट्टी फोड़कर निकला।
वह क्षण छोटा था,
पर वही उसका पहला विद्रोह था।
धरती कह रही थी
“यहीं रहो।”
अंकुर कह रहा था
“मुझे आकाश देखना है।”
दुनिया मनुष्य से कहती रही
“जितना है, उतना काफी है।”
पर उसके भीतर की आवाज़ कहती रही
“मुझे अपनी सीमा से आगे जाना है।”
अंकुर बढ़ता गया।
हर दिन थोड़ा-सा।
इतना थोड़ा
कि किसी को अंतर दिखाई नहीं देता था।
यही वृद्धि का नियम है।
पेड़ कभी एक रात में नहीं बनता।
मनुष्य भी नहीं।
वर्षों तक
जड़ें बढ़ती हैं,
शाखाएँ बढ़ती हैं,
और लोग कहते हैं
“कुछ विशेष नहीं हुआ।”
फिर एक दिन
वही अंकुर वृक्ष कहलाता है।
और वही संघर्षरत व्यक्ति
सफल मनुष्य।
लोग परिणाम देखते हैं,
प्रक्रिया नहीं।
किसी को दिखाई नहीं देतीं
वो रातें
जब तूफान ने पेड़ को झुकाया था,
और वो दिन
जब जीवन ने मनुष्य को रुलाया था।
किसी को नहीं दिखतीं
टूटी टहनियाँ,
जैसे किसी को नहीं दिखते
टूटे हुए सपने।
पर पेड़ रुकता नहीं।
मनुष्य भी नहीं।
वह फिर पत्ते उगाता है।
वह फिर उम्मीद उगाता है।
समय बीतता है।
पेड़ अब विशाल है।
उसकी छाया में
थके हुए लोग बैठते हैं।
उसके फल
भूखों का पेट भरते हैं।
उसकी शाखाओं पर
पक्षी घर बनाते हैं।
और मनुष्य
जब सचमुच बड़ा होता है,
तो अपने लिए नहीं जीता।
वह भी छाया बनता है,
सहारा बनता है,
आश्रय बनता है।
तभी समझ आता है
पेड़ का महान होना
उसकी ऊँचाई में नहीं,
उसकी उपयोगिता में है।
और मनुष्य का महान होना
उसकी संपत्ति में नहीं,
उसकी करुणा में है।
अंत में,
एक दिन पेड़ बूढ़ा होता है।
मनुष्य भी।
पत्ते झड़ते हैं,
बाल सफेद होते हैं।
शाखाएँ थकती हैं,
कंधे झुकते हैं।
पर दोनों के भीतर
एक मुस्कान रहती है।
क्योंकि वे जानते हैं
उन्होंने अपना जीवन
सिर्फ जिया नहीं,
उगाया है।
और तब,
जब अंतिम पत्ता गिरता है,
जब अंतिम साँस निकलती है,
कहानी समाप्त नहीं होती।
पेड़ फिर बीज छोड़ जाता है।
मनुष्य फिर विचार।
बीज से नया वृक्ष जन्म लेता है।
विचार से नया मनुष्य।
और इस तरह
धरती पर पेड़ उगते रहते हैं,
और समय में मनुष्य।
ऊँचा वही उठता है,
जो पहले गहरा उतरने का साहस रखता है।
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