Sunday, June 14, 2026

प्रेम का स्पर्श

 प्रेम का स्पर्श


प्रेम के सबसे सुंदर क्षणों में,

जब स्त्री अपनी सारी सतर्कताएँ उतारकर

केवल एक धड़कता हुआ हृदय रह जाती है,


जब वह अपनी पलकों पर भरोसा रखकर

किसी की उँगलियों में अपना संसार रख देती है,


तब उसे देह नहीं,

देह के पार की यात्रा चाहिए होती है।


उसे चाहिए होता है

कि कोई उसके माथे को ऐसे छुए

जैसे कोई मंदिर की पहली सीढ़ी पर

नंगे पाँव उतरता है।


उसे चाहिए होता है

कि कोई उसकी हथेलियों को ऐसे थामे

जैसे वर्षों से बिछड़ा कोई मौसम

अपने घर लौट आया हो।


लेकिन...


यदि उसी क्षण

उस स्पर्श में प्रेम की धीमी नदी के बजाय

कामना का उतावला शोर सुनाई दे जाए,


यदि बाँहों का घेरा

आश्रय से अधिक अधिकार लगने लगे,


यदि आँखों की गहराई में

आत्मा के बजाय केवल शरीर की भूख दिखाई दे,


तो स्त्री कुछ नहीं कहती...


वह मुस्कुरा भी सकती है,

पास भी रह सकती है,


मगर उसके समर्पण का जो सर्वोच्च शिखर था,

वह एक इंच खिसक जाता है।


बस एक इंच...


इतना कम कि दुनिया देख न सके,

इतना अधिक कि प्रेम पहचान ले।


क्योंकि स्त्री को पुरुष का स्पर्श

उसकी त्वचा पर नहीं याद रहता,


उसे याद रहता है

कि उस स्पर्श में उसकी रूह को कितनी जगह मिली थी।


वह चाहती है कि

जब उसके बालों में उँगलियाँ उलझें,


तो उनमें अधीरता नहीं,

एक मधुर ठहराव हो।


जब उसकी कमर पर हाथ ठहरे,


तो उसमें पाने की जल्दी नहीं,

खो जाने की इच्छा हो।


जब होंठ उसके माथे को चूमें,


तो उस चुंबन में यह एहसास हो

कि वह किसी देह को नहीं,

एक पूरी दुनिया को प्रेम कर रहा है।


प्रेम में स्त्री देह का विरोध नहीं करती,


वह तो स्वयं प्रेम के सबसे सुंदर मौसम में

अपनी सारी दूरियाँ भूल जाती है।


पर वह चाहती है कि

उसकी देह तक पहुँचने से पहले

कोई उसकी आत्मा तक पहुँचे।


क्योंकि स्त्री के लिए

सबसे गहरा आलिंगन वह नहीं

जो बाँहों से दिया जाए,


बल्कि वह है

जहाँ उसे महसूस हो कि


"यह पुरुष मुझे छू नहीं रहा,

मुझे पढ़ रहा है..."


और तब,


उसका समर्पण नदी नहीं रहता,

समुद्र बन जाता है।


वह स्वयं प्रेम बन जाती है,


और उसके बाद

पुरुष का एक साधारण-सा स्पर्श भी


उसके पूरे अस्तित्व में

हजारों फूलों की तरह खिल उठता है। 

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