Friday, June 26, 2026

ध्यान का अर्थ परमात्मा को खोजना

"कैसे पहचानें कि भीतर बोल रहा है अहंकार या परमात्मा?"

साधक पूछते हैं, "जब भीतर कोई आवाज़ उठती है, कोई इच्छा उठती है, तो कैसे जानें कि यह अहंकार की है या परमात्मा की?"

यह पहचान ही साधना का सार है।

अहंकार और परमात्मा दोनों भीतर से ही बोलते प्रतीत होते हैं, इसलिए भ्रम पैदा होता है।

लेकिन दोनों की भाषा अलग है।

अहंकार हमेशा जल्दबाज़ी में होता है।

वह कहता है — "अभी करो, तुरंत करो, नहीं तो अवसर निकल जाएगा।"

परमात्मा कभी जल्दी नहीं करता।

उसकी आवाज़ शांत होती है, धैर्यपूर्ण होती है।

अहंकार भय पैदा करता है।

परमात्मा भरोसा पैदा करता है।

अहंकार अशांति देता है।

परमात्मा शांति देता है।

एक उदाहरण

एक व्यक्ति ने नई कार खरीदी।

उसके पड़ोसी ने उससे बड़ी और महँगी कार खरीद ली।

तुरंत उसके भीतर आवाज़ उठी —

"मुझे भी इससे बड़ी कार लेनी चाहिए, नहीं तो लोग क्या कहेंगे?"

अब जरा देखो।

यह आवाज़ कहाँ से आ रही है?

क्या यह परमात्मा की आवाज़ है?

नहीं।

यह अहंकार बोल रहा है।

क्योंकि इसमें तुलना है, प्रतियोगिता है, बेचैनी है।

परमात्मा कभी तुलना नहीं करता।

परमात्मा कहता है —

"जो मिला है, उसे प्रेम से स्वीकार करो।"

"तुम जैसे हो, वैसे ही पूर्ण हो।"

यदि उस व्यक्ति ने ध्यान किया होता तो वह तुरंत पहचान लेता कि यह आवाज़ अहंकार की है।

और यदि वह शांत बैठकर भीतर सुनता, तो एक दूसरी आवाज़ उठती —

"क्या सचमुच नई कार की आवश्यकता है, या केवल दिखावे की इच्छा है?"

यह दूसरी आवाज़ अस्तित्व की है।

वह तुम्हें शांत करती है।

वह तुम्हें वर्तमान में ले आती है।

याद रखना,

अहंकार हमेशा कुछ बनने की दौड़ में है।

परमात्मा तुम्हें याद दिलाता है कि तुम पहले से ही वही हो जिसकी खोज कर रहे हो।

जब भी कोई निर्णय लेना हो, पहले अपने भीतर देखो।

यदि निर्णय के साथ तनाव, भय, लालच और बेचैनी जुड़ी है, तो समझ लेना अहंकार बोल रहा है।

यदि निर्णय के साथ शांति, सहजता और मौन जुड़ा है, तो समझ लेना अस्तित्व मार्ग दिखा रहा है।

ध्यान का अर्थ परमात्मा को खोजना नहीं है।

ध्यान का अर्थ है — अहंकार के शोर को इतना शांत कर देना कि परमात्मा की फुसफुसाहट सुनाई देने लगे।

जिस दिन तुमने दोनों आवाज़ों में अंतर पहचान लिया, उसी दिन जीवन में पहली बार सही यात्रा शुरू हो जाती है। 


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