पुरुष और स्त्री की कामवासना में अंतर...
"पुरुष की कामवासना शरीर से शुरू होती है, स्त्री की कामवासना हृदय से।" — ओशो
ओशो कहते हैं कि पुरुष और स्त्री की काम-ऊर्जा की प्रकृति अलग-अलग होती है। पुरुष सामान्यतः शीघ्र उत्तेजित हो जाता है क्योंकि उसकी यौन ऊर्जा अधिक केंद्रित और प्रत्यक्ष होती है। वह पहले शरीर के माध्यम से जुड़ता है और फिर प्रेम की संभावना पैदा हो सकती है।
स्त्री का स्वभाव भिन्न है। उसके लिए प्रेम, विश्वास, सुरक्षा और भावनात्मक निकटता अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जब उसका हृदय खुलता है, तभी उसकी काम-ऊर्जा पूर्ण रूप से खिलती है। इसलिए स्त्री के लिए प्रेम और कामवासना अक्सर एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
ओशो कहते हैं कि पुरुष की ऊर्जा आक्रामक और सक्रिय है, जबकि स्त्री की ऊर्जा ग्रहणशील और समर्पणपूर्ण है। इसी कारण दोनों के अनुभव, अपेक्षाएँ और अभिव्यक्तियाँ अलग दिखाई देती हैं। जब पुरुष स्त्री की भावनात्मक गहराई को समझता है और स्त्री पुरुष की जैविक प्रकृति को समझती है, तब संबंध में सामंजस्य पैदा होता है।
ओशो के अनुसार कामवासना कोई पाप नहीं है। यह जीवन की मूल ऊर्जा है। यदि इसे जागरूकता, प्रेम और समझ के साथ जिया जाए, तो यही ऊर्जा धीरे-धीरे प्रेम, करुणा और ध्यान में रूपांतरित हो सकती है।
"सेक्स ऊर्जा का बीज है, प्रेम उसका फूल है और ध्यान उसकी सुगंध।" — ओशो
जब बूंद खुद को समुन्दर में खो देती है
"जब बूंद खुद को समुन्दर में खो देती है, तभी उसे पहली बार पता चलता है कि वह स्वयं समुन्दर ही थी।"
ओशो कहते हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम उसका अलग होना है। हम अपने को एक छोटी-सी बूंद समझते हैं—सीमित, अकेले और असुरक्षित। इसी भ्रम से भय, दुःख और संघर्ष पैदा होते हैं। लेकिन अस्तित्व की सच्चाई यह है कि हम कभी भी समुन्दर से अलग नहीं हुए हैं।
ध्यान का अर्थ है इस झूठे अलगाव को पहचानना। जब अहंकार शांत होता है, जब "मैं" का शोर मिटता है, तब व्यक्ति अनुभव करता है कि उसकी चेतना उसी विराट चेतना का हिस्सा नहीं, बल्कि वही चेतना है। जैसे बूंद समुन्दर में गिरकर नष्ट नहीं होती, बल्कि असीम हो जाती है, वैसे ही साधक अहंकार को छोड़कर अपने वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करता है।
अहंकार कहता है, "अपने को बचाओ।"
प्रेम और ध्यान कहते हैं, "अपने को मिटाओ।"
और यही जीवन का महान रहस्य है—जो स्वयं को बचाने में लगा रहता है, वह छोटा बना रहता है; जो स्वयं को अस्तित्व के हाथों समर्पित कर देता है, वह विराट हो जाता है।
जब बूंद समुन्दर में गिरती है, तब कोई हानि नहीं होती; बल्कि उसकी सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं। उसी क्षण वह अनंत, असीम और शाश्वत बन जाती है।
ध्यान का मार्ग बूंद से समुन्दर बनने की यात्रा है।
समर्पण का अर्थ हारना नहीं, बल्कि अनंत को पा लेना है।
— ओशो
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