जो दिखाई नहीं देता, वही जीवन को थामे रहता है
दुनिया में सबसे बड़ी गलतफ़हमी यह है कि लोग समझते हैं कि जीवन बड़ी चीज़ों से चलता है।
कोई सोचता है कि धन से चलता है।
कोई सोचता है कि प्रसिद्धि से चलता है।
कोई सोचता है कि सफलता से चलता है।
लेकिन यदि ध्यान से देखा जाए, तो जीवन उन चीज़ों से चलता है जिनका कहीं कोई हिसाब नहीं रखा जाता।
सुबह किसी का यह पूछ लेना कि रात ठीक से बीती या नहीं।
थककर लौटने पर किसी का बिना कहे पानी रख देना।
भीड़ में किसी का यह देख लेना कि आज चेहरा सामान्य नहीं है।
और कई बार तो केवल इतना कि कोई व्यक्ति हमारे होने को गंभीरता से लेता है।
मनुष्य को रोटी जितनी भूख होती है, उतनी ही भूख देखे जाने की भी होती है।
हर व्यक्ति अपने भीतर एक अनकहा संसार लेकर चलता है।
बाहर से वह सामान्य दिखाई देता है, पर भीतर कहीं न कहीं वह चाहता है कि कोई उसके शब्द नहीं, उसकी खामोशी भी समझे।
यही वह जगह है जहाँ दो लोगों का संबंध जन्म लेता है।
संबंध साथ रहने से नहीं बनता।
संबंध समझे जाने से बनता है।
एक ही छत के नीचे वर्षों रह लेने वाले लोग भी कभी-कभी एक-दूसरे से दूर रह जाते हैं।
और कभी कोई ऐसा मिल जाता है जिसके साथ कुछ क्षण की बातचीत वर्षों की निकटता जैसी लगती है।
क्यों?
क्योंकि मनुष्य को शब्दों से अधिक स्वीकृति की आवश्यकता होती है।
वह चाहता है कि कोई उसके अधूरेपन को देखकर भी उसके पास बैठा रहे।
कोई उसकी कमज़ोरियों का हिसाब न बनाए।
कोई उसकी असफलताओं को उसके व्यक्तित्व का अंतिम सत्य न मान ले।
कोई यह न कहे कि पहले बदलो, फिर प्रेम मिलेगा।
बल्कि कोई ऐसा हो जो कहे...
"तुम जैसे हो, पहले वैसे ही बैठो, बाकी बातें बाद में देखी जाएँगी।"
जीवन की सबसे सुंदर बात यह नहीं कि कोई हमारे लिए बहुत कुछ कर दे।
सबसे सुंदर बात यह है कि कोई हमारे साथ बना रहे।
जब हम अच्छे हों तब भी।
जब हम बुरे दिनों से गुजर रहे हों तब भी।
जब हमारे पास देने के लिए कुछ न हो तब भी।
समय के साथ चेहरों की चमक बदल जाती है।
आवाज़ों का उत्साह बदल जाता है।
आदतें बदल जाती हैं।
पर जो लोग एक-दूसरे के भीतर का मौसम पहचान लेते हैं, वे आसानी से नहीं बदलते।
वे जानते हैं कि सामने वाला कब मुस्कुरा रहा है और कब मुस्कुराने का अभिनय कर रहा है।
वे जानते हैं कि कब सलाह देनी है और कब केवल चुप बैठना है।
वे जानते हैं कि हर समस्या का समाधान शब्द नहीं होते।
कभी-कभी किसी के पास होना ही समाधान होता है।
दुनिया तेज़ हो गई है।
हर कोई कहीं पहुँचने की जल्दी में है।
लेकिन इस भागती हुई दुनिया में सबसे दुर्लभ व्यक्ति वह है जो आपके साथ कुछ देर बिना किसी उद्देश्य के बैठ सके।
जिसे आपकी उपयोगिता से नहीं, आपकी उपस्थिति से लगाव हो।
जो यह न पूछे कि आप क्या बनेंगे।
जो यह पूछे कि आप कैसे हैं।
क्योंकि अंत में जीवन उपलब्धियों की सूची नहीं बनता।
जीवन स्मृतियों का घर बनता है।
और स्मृतियों में बड़े आयोजन नहीं टिकते।
टिकती हैं छोटी-छोटी बातें।
किसी बरसाती दिन की साझा चाय।
किसी कठिन समय में मिला एक संदेश।
किसी लंबी चुप्पी के बाद सुना गया एक परिचित स्वर।
किसी का यह कहना कि..
"तुम्हें सबके सामने मज़बूत होने की ज़रूरत नहीं है।"
शायद यही कारण है कि मनुष्य पूरी दुनिया जीत लेने के बाद भी अकेला हो सकता है।
और कोई साधारण जीवन जीते हुए भी भीतर से समृद्ध हो सकता है।
क्योंकि सुख वस्तुओं से कम और संबंधों से अधिक पैदा होता है।
हम सब अपने जीवन में किसी न किसी ऐसे व्यक्ति की प्रतीक्षा करते हैं जो हमें बदलने नहीं, समझने आए।
जो हमारी कहानी को सुधारने नहीं, सुनने आए।
जो हमारी कमियों का निर्णय न करे, बल्कि हमारे संघर्षों का सम्मान करे।
और यदि ऐसा कोई व्यक्ति मिल जाए, तो उसे किसी विशेष नाम की आवश्यकता नहीं होती।
वह जीवन का वह हिस्सा बन जाता है जिसके कारण कठिन दिन भी पार हो जाते हैं।
शायद इसी को अपनापन कहते हैं।
और शायद यही वह चीज़ है जिसकी तलाश में पूरी दुनिया इतनी दूर-दूर तक भटकती रहती है, जबकि उसका घर हमेशा किसी सच्चे हृदय के पास ही होता है।
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