Friday, June 26, 2026

प्रवृत्ति और निवृत्ति

 हम अक्सर प्रेम को एक ही रंग में देखते हैं। मान लेते हैं कि जो स्त्री प्रेम करती है, वही प्रेम पुरुष भी करता होगा। जो दर्द एक महसूस करता है, वही दूसरा भी महसूस करता होगा। लेकिन जीवन को थोड़ा ध्यान से देखें तो पता चलता है कि प्रेम की भाषा एक हो सकती है, उसका अनुभव नहीं।


यहीं से प्रवृत्ति और निवृत्ति की बात शुरू होती है।


प्रवृत्ति का अर्थ है किसी चीज़ की ओर बढ़ना, उसमें स्वयं को लगाना, उसके साथ अपना जीवन जोड़ देना।


निवृत्ति का अर्थ है किसी चीज़ से हट जाना, उससे ऊपर उठ जाना, या उससे दूरी बना लेना।


दिलचस्प बात यह है कि प्रेम में स्त्री और पुरुष अक्सर इन दोनों दिशाओं में चलते दिखाई देते हैं।


स्त्री प्रेम में पड़ती है तो उसका स्वभाव प्रवृत्ति की ओर बढ़ता है। वह प्रेम को अपने जीवन में शामिल नहीं करती, बल्कि धीरे-धीरे अपने जीवन को प्रेम में शामिल कर देती है।


पुरुष प्रेम में पड़ता है तो वह भी समर्पित होता है, लेकिन उसके भीतर एक दूसरी शक्ति भी काम करती रहती है। वह प्रेम के साथ-साथ किसी लक्ष्य, किसी महत्वाकांक्षा, किसी उपलब्धि की ओर भी बढ़ता रहता है। उसके भीतर निवृत्ति की क्षमता अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है।


इसीलिए प्रेम के टूटने की कहानियों में अक्सर स्त्री स्मृति बनकर रह जाती है और पुरुष यात्रा बनकर आगे निकल जाता है।


यह कोई नैतिक निर्णय नहीं है। यह किसी को अच्छा या बुरा ठहराने की कोशिश भी नहीं है। यह केवल एक मानवीय प्रवृत्ति का अवलोकन है।


एक लड़की जब प्रेम करती है तो वह केवल व्यक्ति से प्रेम नहीं करती। वह उससे जुड़ी हुई जगहों से प्रेम करती है। उसकी आवाज़ से, उसके आने-जाने के समय से, उसकी आदतों से, उसके परिवार से, उसके सपनों से भी।


प्रेम उसके लिए एक सम्पूर्ण संसार बन जाता है।


इसीलिए जब प्रेम समाप्त होता है तो केवल एक व्यक्ति नहीं जाता, उसके साथ पूरा संसार चला जाता है।


पुरुष के साथ भी दर्द होता है, लेकिन उसका दर्द अक्सर दिशा बदल लेता है।


वह अपने दुःख को काम में लगा देता है।


व्यापार में।


राजनीति में।


सफलता में।


यात्राओं में।


नई महत्वाकांक्षाओं में।


वह टूटता भी है तो दुनिया उसे आगे बढ़ते हुए देखती है।


स्त्री टूटती है तो अक्सर वह भीतर बैठकर अपने बिखरे हुए संसार के टुकड़े समेटती रहती है।


यही कारण है कि प्रेम में प्रतीक्षा की सबसे बड़ी कहानियाँ स्त्रियों के हिस्से में आई हैं।


प्रतीक्षा केवल किसी व्यक्ति की नहीं होती।


प्रतीक्षा उस जीवन की होती है जो कभी संभव था।


प्रतीक्षा उन बातों की होती है जो कही नहीं गईं।


प्रतीक्षा उस विदाई की होती है जो ठीक से हुई नहीं।


मनुष्य के जीवन में सबसे गहरे घाव अक्सर अधूरी विदाइयाँ छोड़ती हैं।


मृत्यु उतना नहीं दुखाती जितना अचानक गायब हो जाना दुखाता है।


जब कोई व्यक्ति हमेशा के लिए चला जाता है तो धीरे-धीरे मन उसे स्वीकार कर लेता है।


लेकिन जब कोई व्यक्ति कहीं मौजूद हो, जीवित हो, दुनिया में सफल हो, खुश हो, और फिर भी आपकी ओर मुड़कर न देखे, तब पीड़ा की प्रकृति बदल जाती है।


वह विरह बन जाती है।


और विरह केवल अनुपस्थिति का दुःख नहीं है।


विरह उस प्रश्न का दुःख है जिसका उत्तर कभी नहीं मिला।


क्यों?


बस यही एक शब्द।


क्यों?


यही कारण है कि प्रेम में स्त्रियाँ अक्सर स्मृति की संरक्षक बन जाती हैं।


उन्हें तारीखें याद रहती हैं।


उन्हें संवाद याद रहते हैं।


उन्हें वह कपड़ा याद रहता है जो किसी दिन पहना गया था।


उन्हें वह बारिश याद रहती है जिसमें कोई साथ चला था।


पुरुषों को भी बहुत कुछ याद रहता है, लेकिन वे स्मृतियों को जीवन का केंद्र नहीं बनने देते।


स्त्रियाँ अक्सर स्मृतियों के साथ रहती हैं।


पुरुष अक्सर स्मृतियों के साथ आगे बढ़ जाते हैं।


यहीं प्रवृत्ति और निवृत्ति का सबसे मानवीय अंतर दिखाई देता है।


शायद इसी कारण विवाह केवल सामाजिक संस्था नहीं है।


विवाह एक स्त्री का सबसे बड़ा भावनात्मक निवेश भी होता है।


वह केवल घर नहीं बदलती।


वह अपनी भाषा बदलती है।


अपनी दिनचर्या बदलती है।


अपने लोगों से दूरी बनाती है।


अपनी पहचान के कुछ हिस्सों को पीछे छोड़ती है।


और धीरे-धीरे किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन को अपना जीवन बना लेती है।


इसलिए जब कोई पत्नी अपने पति की छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखती है तो वह केवल कर्तव्य नहीं निभा रही होती।


वह प्रेम की अपनी भाषा बोल रही होती है।


वह कह रही होती है "तुम मेरे संसार का हिस्सा नहीं, मेरा संसार हो।"


समस्या यह है कि पुरुष अक्सर प्रेम को उपलब्ध मान लेते हैं।


जो हर दिन मिलता है, उसकी कीमत कम दिखाई देने लगती है।


जो बिना माँगे मिलता है, वह साधारण लगने लगता है।


लेकिन सच यह है कि संसार में सबसे दुर्लभ चीज़ प्रेम नहीं है।


सबसे दुर्लभ चीज़ है लंबे समय तक बना रहने वाला प्रेम।


वह प्रेम जो शिकायतों के बावजूद बना रहे।


वह प्रेम जो झगड़ों के बावजूद बना रहे।


वह प्रेम जो उम्र के साथ भी बना रहे।


ऐसा प्रेम किसी चमत्कार से कम नहीं।


इसलिए जीवन के किसी भी पड़ाव पर एक पुरुष को अपनी पत्नी, प्रेमिका, माँ या किसी भी प्रेम करने वाली स्त्री को केवल रिश्ते के रूप में नहीं देखना चाहिए।


उसे यह भी देखना चाहिए कि उस व्यक्ति ने उसके जीवन में कितनी भावनात्मक ऊर्जा निवेश की है।


क्योंकि प्रेम का सबसे बड़ा दुख यह नहीं कि प्रेम समाप्त हो जाए।


प्रेम का सबसे बड़ा दुख यह है कि किसी का समर्पण सामान्य समझ लिया जाए।


और प्रेम का सबसे बड़ा सम्मान यह नहीं कि किसी को बड़े-बड़े उपहार दिए जाएँ।


प्रेम का सबसे बड़ा सम्मान है किसी के समर्पण को देख लेना।


देख लिया जाना ही प्रेम का सबसे बड़ा पुरस्कार है।


शायद इसी कारण दुनिया में करोड़ों लोग प्रेम से अधिक समझे जाने की इच्छा रखते हैं।


क्योंकि जिसे समझ लिया गया, वह अपने आप प्रेम भी पा लेता है।

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