अदृश्य झोला: एक मनुष्य की अनकही यात्राएँ
दुनिया में हर मनुष्य के पास एक झोला होता है। कुछ झोले आँखों को दिखाई देते हैं, कुछ कंधों पर लटकते हैं, और कुछ हाथों में थामे जाते हैं। लेकिन एक झोला ऐसा भी होता है जो दिखाई नहीं देता। न उसकी कोई आकृति होती है, न कोई रंग, न कोई वजन जिसे तराजू पर तौला जा सके। फिर भी वह इतना भारी होता है कि कई बार मनुष्य की पूरी उम्र उसके भार तले बीत जाती है।
मेरे पास भी ऐसा ही एक झोला है।
यह झोला हर समय मेरे साथ रहता है। मैं सोता हूँ तो वह मेरे सिरहाने बैठा रहता है, मैं जागता हूँ तो वह मेरे कंधों पर सवार हो जाता है। मैं लोगों के बीच होता हूँ तो वह चुपचाप मेरे भीतर खुला रहता है। जैसे कोई अदृश्य ऑनलाइन खाता, जो चौबीसों घंटे सक्रिय हो। जो भी कोई मुझे कुछ देता है एक शब्द, एक ताना, एक उपेक्षा, एक उम्मीद, एक असफलता मैं उसे इसी झोले में रख देता हूँ।
धीरे-धीरे मुझे पता चला कि इस झोले में खुशियाँ बहुत कम हैं।
सबसे अधिक यदि कुछ भरा है तो वह दुःख है।
उसमें लोगों के ताने भरे हैं। वे वाक्य भरे हैं जो सुनने में छोटे लगते हैं लेकिन आत्मा में उतरकर वर्षों तक चुभते रहते हैं। उसमें वे असफलताएँ भरी हैं जिनका हिसाब किसी परीक्षा के अंकपत्र में नहीं मिलता। उसमें वे क्षण भरे हैं जब दुनिया ने मुझे मेरी उपलब्धियों से नहीं, मेरी कमियों से पहचाना।
लोग अक्सर कहते हैं कि शब्द हवा में उड़ जाते हैं।
लेकिन सच यह है कि कुछ शब्द कभी नहीं उड़ते। वे मनुष्य के भीतर उतरकर स्थायी निवास बना लेते हैं।
मेरे झोले में ऐसे ही शब्दों का अंबार लगा है।
लेकिन यह झोला केवल मेरा नहीं है।
अनजाने में मैंने इसका एक हिस्सा अपने माता-पिता को भी दे दिया है।
जब समाज मेरे माता-पिता से कहता है “तुम्हारा बेटा बेरोजगार है”, “वह किसी काम का नहीं है”, “उससे कोई उम्मीद मत रखो” तब वे शब्द केवल उनके कानों तक नहीं पहुँचते। वे उनके आत्मसम्मान को भी घायल करते हैं। और हर बार जब मैं उनकी आँखों में छिपा हुआ दर्द देखता हूँ, तब उन शब्दों को उठाकर अपने झोले में रख लेता हूँ।
माँ की चुप्पी भी उसमें है।
पिता की मजबूर मुस्कान भी उसमें है।
रिश्तेदारों के तिरस्कार भी उसमें हैं।
समाज के फैसले भी उसमें हैं।
मैं जानता हूँ कि मेरे माता-पिता मुझे प्रेम करते हैं, लेकिन प्रेम हमेशा दुःख को रोक नहीं पाता। कई बार प्रेम केवल इतना करता है कि वह दुःख को अपने भीतर छिपा लेता है।
और मैं उन्हीं छिपे हुए दुःखों का संग्रहकर्ता बन गया हूँ।
प्रेम की तलाश में भी मैं बहुत दूर तक चला।
हर मनुष्य चाहता है कि कोई ऐसा मिले जो उसे समझे, उसकी खामोशियों को पढ़ सके, उसके टूटे हुए हिस्सों को देखकर भी उससे प्रेम कर सके। मैंने भी यही चाहा था।
लेकिन मेरी यात्राओं में प्रेम कम और भ्रम अधिक मिले।
जिन्हें मैंने अपना समझा, उन्होंने मुझे एक साधन की तरह इस्तेमाल किया। जब तक उन्हें मेरी आवश्यकता थी, मैं महत्वपूर्ण था। जब उनकी राह बन गई, मैं अनावश्यक हो गया।
उन्होंने मेरे कंधों का उपयोग किया, लेकिन मेरे दर्द का नहीं।
उन्होंने मेरी उपस्थिति को स्वीकार किया, लेकिन मेरे अस्तित्व को नहीं।
और जब वे चले गए, तब उनके द्वारा छोड़ी गई रिक्तता भी मैंने उसी झोले में रख ली।
धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि मैं लोगों के जीवन में एक पड़ाव भर हूँ, मंज़िल नहीं।
लोग आते हैं, अपना काम निकालते हैं, और आगे बढ़ जाते हैं।
मैं वहीं खड़ा रह जाता हूँ।
शुरुआत में यह बात मुझे तोड़ देती थी। बाद में मैंने समझा कि संसार का एक बड़ा हिस्सा उपयोग और आवश्यकता के सिद्धांत पर चलता है। लोग उतना ही साथ चलते हैं जितनी देर तक उन्हें आपकी जरूरत होती है।
लेकिन यह समझ लेना भी पीड़ा को कम नहीं करता।
दर्द तब भी दर्द ही रहता है।
समय बीतता गया और मेरा झोला भरता गया।
कभी-कभी मुझे लगता कि अब इसमें कुछ और रखने की जगह नहीं बची। लेकिन जीवन बड़ी अजीब चीज़ है। वह हमेशा एक नया दुःख खोज लाता है।
फिर एक समय ऐसा आता है जब मुझे लगता है कि अब मैं समाप्त हो गया हूँ।
अब मेरे भीतर कुछ नहीं बचा।
अब मैं हार चुका हूँ।
अब मेरी आत्मा का अंतिम दीपक भी बुझने वाला है।
और ठीक उसी समय मैं यात्रा पर निकल पड़ता हूँ।
यह यात्रा केवल स्थानों की नहीं होती।
यह यात्रा स्वयं तक लौटने की होती है।
मैं सड़कों पर चलता हूँ, पहाड़ों को देखता हूँ, नदियों के किनारे बैठता हूँ, अजनबी शहरों में खो जाता हूँ। मैं उन रास्तों पर जाता हूँ जहाँ कोई मुझे नहीं जानता। जहाँ मेरे नाम से कोई उम्मीद नहीं जुड़ी होती। जहाँ मेरी असफलताओं का कोई इतिहास नहीं होता।
वहाँ जाकर मैं अपने भीतर के शोर को सुनता हूँ।
मैं अपने टूटे हुए हिस्सों को पहचानता हूँ।
मैं अपने घावों को छूता हूँ।
और फिर धीरे-धीरे अपने ही हाथों से स्वयं को दोबारा गढ़ता हूँ।
हर यात्रा मेरे लिए पुनर्जन्म है।
मैं लौटता तो वही व्यक्ति हूँ, लेकिन भीतर कुछ बदल चुका होता है।
जैसे किसी ने राख से नया शरीर बना दिया हो।
जैसे कोई वृक्ष पतझड़ के बाद फिर से पत्तों से भर गया हो।
दुनिया इसे घूमना कहती है।
मैं इसे अपने मृत हिस्सों का अंतिम संस्कार कहता हूँ।
और अपने नए हिस्सों का जन्मोत्सव।
आज भी मेरा झोला मेरे साथ है।
उसमें दुःख हैं, ताने हैं, असफलताएँ हैं, टूटे हुए सपने हैं, अधूरे प्रेम हैं, माता-पिता की पीड़ाएँ हैं, समाज के निर्णय हैं, और उन सभी लोगों की यादें हैं जिन्होंने मुझे इस्तेमाल किया।
लेकिन अब उसमें एक और चीज़ भी है।
आशा।
वह छोटी है, नाज़ुक है, और कई बार दिखाई भी नहीं देती। लेकिन वही मुझे हर बार बचा लेती है।
क्योंकि मैंने समझ लिया है कि मनुष्य की महानता इस बात में नहीं है कि उसके झोले में कितना दुःख भरा है। उसकी महानता इस बात में है कि वह उन दुःखों को ढोते हुए भी चलना नहीं छोड़ता।
मैं आज भी चल रहा हूँ।
शायद कल भी चलूँगा।
और जब तक चलूँगा, मेरा अदृश्य झोला मेरे साथ रहेगा मेरे संघर्षों का इतिहास बनकर, मेरी हारों का साक्षी बनकर, और इस बात का प्रमाण बनकर कि एक मनुष्य अनगिनत बार टूटकर भी फिर से जन्म ले सकता है।
क्योंकि कुछ लोग जीवन में जीतकर महान नहीं बनते।
कुछ लोग बार-बार हारकर, बार-बार उठकर, और बार-बार चलकर महान बनते हैं।
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