"जब एक स्त्री अकेले में गीत गुनगुनाती है"
दुनिया अक्सर स्त्रियों को उनके कामों से पहचानती है। कोई उन्हें माँ कहता है, कोई बेटी, कोई बहन, कोई जीवनसंगिनी। कोई उनके कंधों पर रखी जिम्मेदारियाँ देखता है, कोई उनके चेहरे पर सजी मुस्कान। लेकिन बहुत कम लोग उस क्षण को देख पाते हैं जब एक स्त्री बिल्कुल अकेली होती है और धीमे-धीमे कोई गीत गुनगुनाने लगती है।
वह क्षण साधारण दिखाई देता है, पर वास्तव में वह उसके मन का सबसे सच्चा संवाद होता है।
कभी रसोई में काम करते हुए, कभी घर की खिड़की के पास खड़ी होकर, कभी कपड़े समेटते हुए, कभी किसी शांत दोपहर में, और कभी रात की गहरी निस्तब्धता में जब कोई उसे देख नहीं रहा होता, तब उसके होंठों पर अनायास कोई धुन उतर आती है। यह धुन केवल संगीत नहीं होती; यह उसके भीतर की अनगिनत भावनाओं का रास्ता होती है।
अक्सर लोग समझते हैं कि जो गीत गा रहा है, वह खुश होगा। लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता। कई बार गीत खुशी की नहीं, बल्कि थकान की भाषा होते हैं। कई बार वे उन शब्दों का रूप होते हैं जिन्हें वह किसी से कह नहीं पाती। कई बार वे उन आँसुओं की जगह लेते हैं जिन्हें वह दुनिया से छिपा लेती है।
एक स्त्री के जीवन में ऐसे अनेक दिन आते हैं जब वह सबके लिए मजबूत बनी रहती है। वह दूसरों की चिंताओं को सुनती है, सबकी जरूरतों का ध्यान रखती है, टूटते रिश्तों को जोड़ती है, बिखरते मनों को संभालती है। लेकिन उसके अपने मन की थकान कहाँ जाती है?
शायद वही थकान किसी दिन गीत बनकर उसके होंठों पर उतर आती है।
जब वह गुनगुनाती है, तब वह किसी मंच पर नहीं होती। उसे किसी प्रशंसा की अपेक्षा नहीं होती। वह किसी को प्रभावित करने की कोशिश नहीं कर रही होती। वह केवल अपने भीतर लौट रही होती है।
उस समय उसका मन अतीत की गलियों में भी भटक सकता है। उसे बचपन की कोई दोपहर याद आ सकती है, जब जीवन इतना जटिल नहीं था। उसे किसी पुराने मौसम की खुशबू महसूस हो सकती है। कोई अधूरा सपना, कोई बिछड़ा हुआ पल, कोई खोया हुआ विश्वास, कोई भूली हुई हँसी सब धीरे-धीरे उसकी स्मृतियों के दरवाजे पर दस्तक देने लगते हैं।
लेकिन गीत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह स्मृतियों को बोझ नहीं बनने देता।
जो बातें शब्दों में कहने पर दर्द बन जातीं, वही बातें धुन में ढलकर हल्की हो जाती हैं।
यही कारण है कि कभी-कभी गुनगुनाते-गुनगुनाते उसकी आँखें नम हो जाती हैं। वह रो नहीं रही होती, बल्कि भीतर जमा हुआ भार पिघल रहा होता है। जैसे किसी पहाड़ पर जमी बर्फ धूप पाकर धीरे-धीरे पानी बन जाए।
दुःख का सफर भी बड़ा विचित्र होता है। शुरुआत में वह मन पर पत्थर जैसा लगता है। हर बात भारी लगती है। हर जिम्मेदारी बोझ बन जाती है। लेकिन समय के साथ जब मन उस दुःख को स्वीकारना सीख लेता है, तब वही दुःख समझ में बदलने लगता है।
और शायद इसी मोड़ पर गीत जन्म लेते हैं।
गीत दुःख को मिटाते नहीं हैं, बल्कि उसे नया अर्थ दे देते हैं।
एक स्त्री जब अकेले में गुनगुनाती है, तब वह अपने घावों से लड़ नहीं रही होती; वह उन्हें सहला रही होती है। वह अपने टूटे हुए हिस्सों को जोड़ने का प्रयास कर रही होती है। वह अपने भीतर एक ऐसा स्थान बना रही होती है जहाँ शोर नहीं, केवल शांति हो।
उसके लिए वह कुछ मिनट किसी ध्यान से कम नहीं होते।
उस समय उसे दुनिया से कुछ नहीं चाहिए होता। न कोई पुरस्कार, न कोई सराहना, न कोई प्रमाण। उसे केवल अपने मन की धड़कन सुननी होती है।
धीरे-धीरे गीत आगे बढ़ता है और उसके साथ उसका मन भी।
जहाँ पहले बेचैनी थी, वहाँ थोड़ी स्थिरता आने लगती है।
जहाँ पहले शिकायतें थीं, वहाँ स्वीकार जन्म लेने लगता है।
जहाँ पहले अकेलापन था, वहाँ आत्म-संगति का सुख मिलने लगता है।
यही वह यात्रा है जो दुःख से शांति तक पहुँचाती है।
शांति का अर्थ यह नहीं कि जीवन में कोई समस्या नहीं बची। शांति का अर्थ है कि मन ने अपने भीतर एक दीपक जला लिया है। बाहर आँधियाँ चलती रहें, फिर भी वह दीपक टिमटिमाता हुआ प्रकाश देता रहता है।
और शायद यही कारण है कि कई स्त्रियाँ सबसे कठिन दिनों में भी कोई गीत गुनगुनाना नहीं छोड़तीं।
वे जानती हैं कि गीत केवल सुर नहीं हैं; वे मन की मरहम हैं।
वे जानती हैं कि दुनिया की भीड़ में खुद को खो देना आसान है, लेकिन एक छोटी-सी धुन के सहारे अपने भीतर लौट आना संभव है।
जब कोई स्त्री अकेले में गीत गुनगुनाती है, तब वह केवल संगीत नहीं रचती वह अपने भीतर एक नया संसार रचती है। एक ऐसा संसार जहाँ स्मृतियाँ हैं, संवेदनाएँ हैं, टूटन है, साहस है, आँसू हैं, मुस्कान है और अंततः एक गहरी, निर्मल शांति है।
शायद इसी कारण संसार की सबसे सुंदर ध्वनियों में से एक वह धीमी गुनगुनाहट है, जिसे कोई स्त्री तब गाती है जब वह दुनिया से नहीं, स्वयं से बात कर रही होती है।
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