स्वयं को जानने की सर्वश्रेष्ठ विधि
सच्चे गुरु बहुत ही स्पष्टता से समझाते हैं कि श्वास है तो तुम हो, जीवन है, सब कुछ है। श्वास नहीं है तो कुछ भी नहीं है। सांस केवल शरीर की क्रिया नहीं, बल्कि चेतना का द्वार है। सांस जीवन और आत्मा के बीच एक सेतु है। मन और शरीर दोनों सांस से जुड़े हैं। जब तुम क्रोधित होते हो तो सांस तेज और उखड़ी हुई हो जाती है। जब तुम शांत होते हो तो सांस धीमी और गहरी हो जाती है।
इसका अर्थ है कि मन की हर अवस्था सांस पर प्रभाव डालती है। अगर मन सांस को बदल सकता है तो सांस भी मन को बदल सकती है। सांस हमेशा वर्तमान क्षण में चलती है। मन अतीत और भविष्य में भटकता है, लेकिन सांस अभी और यहीं होती है। इसलिए जो व्यक्ति अपनी सांस के प्रति जागरूक हो जाता है, वह धीरे-धीरे मन के पार जाने लगता है। साक्षी भाव के ध्यान अभ्यास की सबसे सरल विधि है आती-जाती सांस को साक्षी भाव से देखना।
सांस को न तो बदलना, न ही रोकना, केवल साक्षी बनकर देखना। इस प्रकार के साक्षी अभ्यास से धीरे-धीरे विचार शांत होने लगते हैं, भीतर मौन उतरने लगता है और व्यक्ति श्वासों के भीतर की शक्ति यानी चेतना को अनुभव करने लगता है। सांस तुम्हारे जीवन का संगीत है। जो आती-जाती श्वास को वॉच करते हुए इसके भीतर की शक्ति को पहचान लेता है, वह स्वयं को जान लेता है और परमानंद के अनुभव से मनुष्य जीवन सफल बना लेता है।
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