चाँदनी का संसर्ग
तुम्हें छूना,
मेरे लिए कभी किसी अधूरी भूख का किस्सा नहीं था,
तुम्हें छूना तो वैसा था जैसे सदियों से बंद पड़ा कोई मंदिर अचानक फिर से दीपों से भर जाए।
मैं तुम्हारे सामने था,
पर तुम्हें पाने की उतनी इच्छा नहीं थी जितनी तुम्हारे भीतर उतर जाने की।
और तुम—
तुम भी कोई संकोची नदी नहीं थीं,
तुम तो वह समुद्र थीं जिसने अपनी समूची गहराई एक ही चंद्रमा के नाम कर दी थी।
उस रात
हम दोनों के बीच सिर्फ़ निकटता नहीं थी,
एक अजीब-सी समाधि थी।
तुम्हारी साँसें मेरे सीने पर सिर रखकर वैसे बह रही थीं
जैसे किसी पीपल के नीचे बैठा दरवेश धीरे-धीरे अपना कलाम पढ़ रहा हो।
मैंने तुम्हारी आँखों में झाँका,
और वहाँ मुझे अपना ही प्रतिबिंब नहीं,
अपना घर दिखाई दिया।
तुमने मेरी धड़कनों को सुना,
और उनमें तुम्हें अपना नाम सुनाई दिया।
फिर हम दोनों धीरे-धीरे अपनी सीमाएँ भूलने लगे।
तुम्हारे भीतर का आकाश मेरे भीतर के चाँद से भरने लगा,
और मेरे भीतर की रात तुम्हारी चाँदनी से उजली होने लगी।
वह मिलन वैसा था
जैसे गंगा पहली बार शिव की जटाओं में उतरते समय अपने समूचे वेग को समर्पित कर दे,
और शिव अपने समूचे विस्तार से उसे थाम लें।
तुम मेरे कंधे पर सिर रखे हुए थीं,
और मुझे लगा मानो समूची सृष्टि का भार फूल की पंखुड़ी जितना हल्का हो गया है।
तुम्हारी पलकों पर नींद नहीं थी,
एक ऐसी तृप्ति थी जो शब्दों में नहीं उतरती।
और मेरे भीतर
एक ऐसा मौन था जिसमें हजारों कविताएँ जन्म ले रही थीं।
फिर बहुत देर बाद,
जब रात थकने लगी,
हम अलग नहीं हुए—
बस एक-दूसरे में कुछ और गहरे उतर गए।
जैसे चाँद समुद्र को छोड़कर भी उसकी लहरों में बना रहता है,
जैसे वर्षा बीत जाने के बाद भी मिट्टी अपनी देह में बादलों की स्मृति सँजोए रखती है।
तब समझ आया—
प्रेम का सबसे सुंदर रूप पाना नहीं होता,
बल्कि उस बिंदु तक पहुँच जाना होता है
जहाँ दो रूहें एक-दूसरे को इस तरह स्वीकार कर लें
कि फिर उनके बीच स्पर्श भी प्रार्थना बन जाए,
और निकटता भी इबादत।॥
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