"सुनने की वो चुप्पी जो दिल के ज़ख़्म भर देती है"
दोस्तों, कभी-कभी लगता है कि इंसान का सबसे बड़ा दर्द अकेलापन भी नहीं होता। सबसे बड़ा दर्द ये होता है कि कोई उसे सच में समझ ही नहीं रहा। हम सब देखते हैं चेहरा, सुनते हैं बातें, लेकिन उसकी आँखों के पीछे छिपी चीख़ को अनसुना कर देते हैं। फिर जल्दी-जल्दी में फैसला सुना देते हैं “ये तो बदल गया है”, “अब घमंडी हो गया है”, “नकारात्मक सोच रहा है”।
मगर असल ज़िंदगी इतनी सीधी नहीं होती।
मेरे कस्बे में रीना दी रहती थीं। स्कूल में विज्ञान पढ़ाती थीं। पहले उनका चेहरा हमेशा खिलता रहता। बच्चों को गले लगातीं, पड़ोस में किसी की मदद हो तो सबसे पहले वो पहुँच जातीं। सब उन्हें “रीना दी” कहकर बुलाते थे। उनकी हँसी सुनकर घर का माहौल बदल जाता था।
फिर एक दिन सब कुछ बदल गया।
धीरे-धीरे वो क्लास के बाद चुपचाप घर चली जातीं। फोन की घंटी बजती तो उठाती नहीं। मुस्कान गायब हो गई। पड़ोस की आंटियाँ फुसफुसाने लगीं “अब तो नाक ऊँची हो गई है।” स्कूल की सहेलियाँ भी दूर होने लगीं। कोई कहता, “शादी के बाद ससुराल वालों की बात मानने लगी है।” कोई कहता, “स्वभाव खराब हो गया है।”
किसी को नहीं पता था कि रीना दी के अंदर क्या तूफान चल रहा था।
पिछले डेढ़ साल में उन्होंने अपनी छोटी बहन को कैंसर में खो दिया था। वो बहन उनकी सबसे अच्छी दोस्त थी। रात-रात भर अस्पताल की बेंच पर बैठना, दवाइयों के बिल, और फिर अचानक घर में फैला वो सन्नाटा… सब कुछ अंदर से तोड़ गया था। वो रोना चाहती थीं, लेकिन डरती थीं कि लोग या तो “सहानुभूति” दिखाएँगे या “सकारात्मक सोचो” वाली सलाह देने लगेंगे। उन्हें न सहानुभूति चाहिए थी, न सलाह। बस एक कंधा चाहिए था — बिना कुछ कहे, बस साथ बैठने वाला।
फिर एक शाम उनकी कॉलेज की पुरानी सहेली प्रिया बिना बताए आ पहुँची।
प्रिया ने कुछ नहीं पूछा। न “क्या हुआ?”, न “तुम ठीक तो हो?”। बस चुपचाप चाय बनाई, रीना दी के बगल में बैठ गई और उनका हाथ थाम लिया।
काफी देर तक खामोशी रही।
फिर रीना दी का बाँध टूट गया। पहले आँसू आए, फिर शब्द। कभी गुस्से में, कभी फफक-फफक कर। उन्होंने सब कुछ कह दिया बहन के आखिरी दिन, अपनी नाकामी, उस खालीपन का दर्द जो हर साँस के साथ चुभता था।
प्रिया ने बीच में एक शब्द भी नहीं बोला। सिर्फ सुनती रही। उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन उन्होंने रोका नहीं। बस साथ बैठी रहीं।
उस रात रीना दी ने कई सालों बाद पहली बार महसूस किया कि कोई उन्हें “ठीक” करने नहीं आया था। कोई उन्हें बदलने नहीं आया था। कोई बस उनके साथ था।
उसके बाद जादू नहीं हुआ। दर्द एकदम से नहीं गया। लेकिन उस भारी अकेलेपन में एक हल्की सी साँस ज़रूर आई। धीरे-धीरे वो फिर बच्चों के साथ हँसने लगीं। पड़ोस में चाय पीने लगीं। ज़िंदगी फिर से थोड़ी नरम होने लगी।
क्योंकि जब कोई हमें बिना जजमेंट के सुन लेता है, तो दिल खुद-ब-खुद कुछ टूटे हुए टुकड़े जोड़ने लगता है।
दोस्तों, आजकल हम सब थोड़े-बहुत रीना दी बन गए हैं। और हम सब प्रिया भी बन सकते हैं।
किसी का चुप रहना हमेशा घमंड नहीं होता। कभी-कभी वो चुप्पी बहुत बड़ी लड़ाई लड़ रही होती है।
किसी का गुस्सा अक्सर थकान का चेहरा होता है।
किसी की दूरी शायद डर का नाम होती है डर कि कहीं फिर से ठुकरा न दिया जाए।
हम सलाह देने में इतने माहिर हो गए हैं कि भूल गए हैं कई बार इंसान को जवाब नहीं, सिर्फ एक गवाह चाहिए होता है। कोई जो कह सके, “हाँ यार, मैं देख रहा हूँ तुम कितना सह रहे हो।”
"सुनना" ये छोटा सा काम, लेकिन इसमें इंसानियत की सारी ताकत छिपी है।
सलाह देने वाले बहुत मिल जाते हैं।
“तुम्हें ऐसा करना चाहिए” कहने वाले तो और भी।
लेकिन जो बिना कुछ बोले, सिर्फ अपनी मौजूदगी से कह दे “तुम अकेले नहीं हो”, वही असली इंसान होते हैं।
क्योंकि रिश्तों की सबसे प्यारी कला किसी को अपने हिसाब से ढालने की नहीं, बल्कि उसे वैसा ही गले लगाने की है.... जैसे वो इस वक्त है।
जब किसी को ये एहसास हो जाता है कि उसे स्वीकार किया जा रहा है, तभी उसके अंदर वो हिम्मत जागती है जो कोई उपदेश नहीं जगा सकता।
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