बल्ब तो है, लेकिन प्रकाश नहीं...
बहुत बार ऐसा होता है कि बल्ब अपनी जगह पर लगा रहता है, उसके सभी हिस्से सही-सलामत होते हैं, लेकिन उसमें प्रकाश नहीं होता। कारण केवल इतना होता है कि उसमें बहने वाली बिजली समाप्त हो चुकी होती है।
मनुष्य के शरीर की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है।
जब कोई व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होता है, तब उसका शरीर वहीं रहता है। आंखें भी होती हैं, कान भी होते हैं, नाक भी होती है, हृदय भी होता है। शरीर का कोई अंग अचानक गायब नहीं हो जाता। फिर ऐसा क्या होता है कि जो व्यक्ति कुछ क्षण पहले बोल रहा था, चल रहा था, हंस रहा था, वह अब बिल्कुल शांत हो जाता है?
कारण यह है कि शरीर को चलाने वाली वह सूक्ष्म ऊर्जा, वह चेतना, वह प्राणशक्ति अब वहां नहीं है।
हम जीवन भर शरीर को ही अपना वास्तविक स्वरूप मानते रहते हैं, जबकि शरीर तो केवल एक साधन है। वास्तविक सत्ता वह चेतना है जो इस शरीर को जीवंत बनाती है। जिस दिन यह चेतना शरीर से अलग हो जाती है, उसी दिन स्पष्ट हो जाता है कि शरीर स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता।
इस सत्य को समझना आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत है। जब हम यह जान लेते हैं कि हम केवल शरीर नहीं हैं, बल्कि उसके भीतर विद्यमान चेतना हैं, तब जीवन को देखने का हमारा दृष्टिकोण बदलने लगता है।
मृत्यु हमें यह याद दिलाने आती है कि जो दिखाई देता है वह सब कुछ नहीं है। जीवन का वास्तविक रहस्य उस अदृश्य ऊर्जा में छिपा है, जो शरीर को जीवंत बनाती है।
स्वयं को शरीर नहीं, चेतना के रूप में जानना ही आत्मज्ञान की दिशा में पहला कदम है।
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