खाली कुर्सी
घर के कोने में रखी एक कुर्सी थी,
लकड़ी की नहीं, अभिमान की थी।
उस पर बैठने वाला हर शख़्स
धीरे-धीरे ऊँचा होने लगता था,
इतना ऊँचा कि उसे
दूसरों की आँखों में उतरती उदासी दिखाई नहीं देती थी।
उसे लगता था
घर उसकी वजह से साँस लेता है,
दीवारें उसी के नाम पर खड़ी हैं,
और लोग उसके इर्द-गिर्द
ग्रहों की तरह चक्कर काटते हैं।
वह बोलता था,
बाकी सुनते थे।
वह तय करता था,
बाकी मानते थे।
उसे लगता था यह सम्मान है।
उसे कौन बताता
कि कई बार चुप्पी, सम्मान नहीं,
थकान होती है।
धीरे-धीरे
लोग बहस करना छोड़ गए।
फिर समझाना छोड़ गए।
फिर बताना छोड़ गए।
और एक दिन
मन ही मन उससे मिलना भी छोड़ गए।
मगर कुर्सी पर बैठा आदमी
अब भी खुद को विजेता समझता रहा।
उसे लगता रहा
कि उसने सबको झुका दिया है।
उसे कहाँ पता था
कि झुके हुए लोग अक्सर
दिल से दूर जा चुके होते हैं।
समय गुज़रा।
बाल सफ़ेद हुए।
आवाज़ में पहले जैसी कड़ाई नहीं रही।
एक दिन उसने मुड़कर देखा
घर तो था,
लोग भी थे,
लेकिन उसके लिए किसी के पास
पहले जैसी जगह नहीं थी।
तब पहली बार
उसने अपनी कुर्सी को देखा।
वह उतनी बड़ी नहीं थी
जितनी उसे दिखाई देती थी।
वह तो बस एक साधारण-सी जगह थी,
जिस पर बैठकर उसने
खुद को बहुत बड़ा समझ लिया था।
ज़िंदगी ने तब उसके कान में
धीरे से कहा
"तुम ज़रूरी थे,
लेकिन अकेले नहीं।
तुम प्रिय हो सकते थे,
यदि पूजे जाने की ज़िद न करते।
तुम्हें सुना जा सकता था,
यदि तुमने दूसरों को भी सुना होता।"
उस दिन उसे समझ आया
दुनिया में सबसे भारी चीज़
पत्थर नहीं होती,
अहंकार होता है।
और सबसे खाली जगह
रेगिस्तान नहीं होता,
वह दिल होता है
जहाँ सिर्फ़ "मैं" बच जाता है।
बाकी सब चले जाते हैं।
फिर कुर्सियाँ रह जाती हैं...
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