तुम्हारा स्पर्श
मेरे लिए कोई अधीर प्यास नहीं,
बल्कि उस दरवेश की सदियों पुरानी इबादत है
जो एक ही चौखट पर बैठा
अपने रब के कदमों की आहट सुनता रहा हो।
जब मेरी उँगलियाँ
तुम्हारी हथेलियों की पंखुड़ियों को छूती हैं,
तो भीतर कहीं
अनहद की धुन बजने लगती है,
जैसे किसी सूफ़ी ने पहली बार
अपने ही सीने में छिपा हुआ फिरदौस देख लिया हो।
तुम्हारी गर्दन के पास ठहरा हुआ मेरा मौन
वैसा ही पवित्र है
जैसे किसी फ़क़ीर को
बरसों बाद मिल जाए
उसके सवालों का आख़िरी उत्तर।
तुम्हारे कंधों पर झुकी हुई मेरी साँसें
नीलकमल की उन पंखुड़ियों जैसी हैं
जो भोर की पहली रोशनी में
धीरे-धीरे खुलती हैं,
बिना शोर,
बिना आग्रह,
सिर्फ़ प्रेम के स्पर्श से।
और फिर
हम दोनों के बीच की दूरियाँ
वैसे ही घुलने लगती हैं
जैसे सरोवर में उतरकर
चाँद अपनी ही परछाईं में विलीन हो जाए।
तुम्हारी धड़कनें
मेरी धड़कनों से यूँ लिपटती हैं
मानो दो अलग-अलग राग
एक ही अनंत सुर में बदल गए हों।
उस क्षण
न तुम देह रहती हो,
न मैं शरीर,
हम दोनों बस एक प्रार्थना बन जाते हैं,
एक ऐसी इबादत
जिसमें सूफ़ी भी खो जाए
और दरवेश भी।
मैं तुम्हारी आँखों में उतरता हूँ
और तुम मेरी रूह में,
जैसे कोई नदी
अपने स्रोत को पहचानकर
समुद्र की ओर बह निकले।
फिर धीरे-धीरे
हमारे बीच का हर भेद मिट जाता है—
नाम,
चेहरे,
दूरी,
समय।
बस एक उजाला शेष रहता है,
जिसमें तुम भी हो,
मैं भी हूँ,
और वह प्रेम भी
जो दो अस्तित्वों को
एक ही अनंत सरोवर में बदल देता है।
जहाँ न विरह है,
न प्रतीक्षा,
न कोई अधूरी तलब—
सिर्फ़ फिरदौस का वह द्वार,
जो खुलता है
जब दो आत्माएँ
एक-दूसरे में समाकर
अपने होने का अर्थ पा लेती हैं।॥
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