Tuesday, June 2, 2026

प्रेम सिर्फ प्रार्थना

 प्रेम को सिर्फ प्रार्थना कह देना,

और वासना को केवल देह की भूख मान लेना —

शायद प्रेम की सबसे अधूरी व्याख्या है।


क्योंकि जिस प्रेम में

प्रिय को छू लेने की तड़प ही न उठे,

उसकी उंगलियों को थाम लेने की बेचैनी न हो,

उसकी गर्दन पर सिर रखकर

दुनिया भूल जाने की इच्छा न हो,

उस प्रेम में कहीं न कहीं

रूह की आग अधूरी है।


हाँ,

वासना अगर केवल उपयोग बन जाए,

तो वह प्रेम नहीं रहती,

लेकिन प्रेम अगर देह से डरने लगे,

तो वह भी पूरा प्रेम नहीं होता।


प्रेम जब सचमुच किसी से होता है,

तो आदमी उसकी आत्मा से भी प्रेम करता है

और उसकी देह से भी।

क्योंकि देह सिर्फ मांस नहीं होती,

वह उस आत्मा का दरवाज़ा होती है

जिसे हम प्रेम कहते हैं।


जिसे तुम प्रेम करते हो,

उसे चूम लेने का मन होना पाप नहीं,

उसमें खो जाने की इच्छा होना अधर्म नहीं।

बल्कि कई बार

यही इच्छा बताती है

कि तुम्हारा प्रेम सिर्फ कल्पना नहीं,

जीवित है… धड़कता हुआ।


क्योंकि प्रेम में

कोई दीवार मंज़ूर नहीं होती।

न अहंकार की,

न दूरी की,

न देह की।


प्रेम आखिर चाहता क्या है?

यही ना —

कि दो लोग इतने करीब आ जाएँ

कि एक की सांस दूसरे की धड़कन में सुनाई दे।


और सच तो यह है,

जब प्रेम बहुत गहरा होता है,

तो देह भी रूह की भाषा बोलने लगती है।

एक स्पर्श सिर्फ स्पर्श नहीं रहता,

वह आश्वासन बन जाता है।

एक आलिंगन सिर्फ बाहों का घेरा नहीं रहता,

वह दो टूटे हुए अस्तित्वों का घर बन जाता है।


जिस प्रेम में

प्रिय के लिए हवस ही न उठे,

वहाँ कहीं यह सवाल जन्म लेता है

कि क्या सचमुच तुम उसे पूरी तरह चाहते हो?

क्योंकि प्रेम अगर सम्पूर्ण है,

तो उसमें आराधना भी होगी,

और पागलपन भी।


उसकी आँखों को देखकर

मन शांत भी होगा,

और उसी क्षण

उसे अपने सीने में छिपा लेने की आग भी उठेगी।


रूह का मिलन

देह को नकार कर नहीं होता,

देह से गुजर कर होता है।


क्योंकि जब दो प्रेमी

एक-दूसरे को पूरी सच्चाई से छूते हैं,

तो वहाँ सिर्फ शरीर नहीं मिलते —

वहाँ वर्षों की तन्हाई,

डर,

अधूरेपन,

और प्रेम की भूखी आत्माएँ मिलती हैं।


और तब जो जन्म लेता है,

वह केवल वासना नहीं होती…

वह प्रेम की सबसे जीवित,

सबसे गर्म,

सबसे सच्ची प्रार्थना होती है।



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