सुनो...!
माना कि मोहब्बत में
स्पर्श का अपना एक धर्म होता है,
और देह की अपनी एक भाषा...
मगर हर भाषा से पहले
एक ख़ामोश स्वीकृति जन्म लेती है,
जो आँखों की दहलीज़ पर बैठकर
दिल से इजाज़त माँगती है।
तुम मेरे होंठों की प्यास पढ़ने से पहले,
मेरी चुप्पियों की तह में उतरना,
क्योंकि स्त्री का मन
किसी बंद कमरे जैसा नहीं होता,
वह तो एक मंदिर है,
जहाँ प्रवेश से पहले
विश्वास की घंटी बजानी पड़ती है।
मेरे बालों में उँगलियाँ फिराने से पहले,
मेरे बिखरे दिनों को सहलाना,
मेरी हथेलियाँ थामने से पहले,
मेरे डर और मेरी थकान को थामना...
क्योंकि तन तो
एक क्षण में करीब आ सकता है,
पर मन को करीब आने में
कभी-कभी पूरी उम्र लग जाती है।
और जब मन अपनी हामी दे देता है,
तब स्पर्श सिर्फ स्पर्श नहीं रहता...
तब माथे पर रखा एक चुंबन भी
पूरे बदन में उतर जाता है,
तब उँगलियों का हल्का कंपन भी
रूह तक सुनाई देता है।
मोहब्बत की सबसे गहरी रातों में भी
मुझे तुम्हारी बाँहों से पहले
तुम्हारी समझ चाहिए,
तुम्हारी चाहत से पहले
तुम्हारा सम्मान चाहिए।
क्योंकि स्त्री के भीतर
एक नदी बहती है—
वह नदी देह से नहीं,
विश्वास से समुद्र तक पहुँचती है।
और सच तो यह है कि...
मोहब्बत में सबसे नशीला स्पर्श
होंठों का नहीं होता,
उस पल का होता है
जब मन कहता है—
"हाँ, अब तुम मेरे भीतर सुरक्षित हो..."।
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