तनाव: वह मेहमान जो बिना बुलाए आता है
हम सबके जीवन में एक ऐसा मेहमान है जो कभी निमंत्रण का इंतज़ार नहीं करता। वह दरवाज़ा खटखटाता भी नहीं। बस चुपचाप आकर हमारे भीतर कहीं बैठ जाता है। उसका नाम है तनाव।
कभी वह स्कूल की परीक्षा के रूप में आता है, कभी नौकरी की चिंता बनकर, कभी घर की जिम्मेदारियों का बोझ लेकर और कभी किसी अपने को खो देने के दुख में बदलकर। अजीब बात यह है कि हम उसे पहचानते भी हैं और नहीं भी।
कई बार हम कहते हैं, "आज बहुत थक गया हूँ।" लेकिन सच में शरीर नहीं, मन थका होता है।
मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी कल्पना है। वही कल्पना उसे भविष्य बनाने की शक्ति देती है। लेकिन यही कल्पना कभी-कभी उसे ऐसे दुखों में भी धकेल देती है जो अभी हुए ही नहीं हैं। हम आने वाले कल की चिंता में आज की शांति खो देते हैं।
एक किसान को देखिए। वह बीज बोता है और फिर मौसम का इंतज़ार करता है। उसे पता है कि हर चीज़ उसके नियंत्रण में नहीं है। लेकिन शहरों में रहने वाला आधुनिक इंसान हर चीज़ को नियंत्रित करना चाहता है समय, परिणाम, लोग, परिस्थितियाँ, यहाँ तक कि भविष्य भी। शायद यहीं से तनाव जन्म लेता है।
तनाव हमेशा बुरा नहीं होता। अगर बिल्कुल तनाव न हो, तो शायद कोई छात्र पढ़ाई न करे, कोई खिलाड़ी मैदान में मेहनत न करे और कोई कलाकार अपनी कला को निखारने की कोशिश न करे। थोड़ा-सा तनाव हमें जगाए रखता है। समस्या तब शुरू होती है जब यह थोड़ा-सा तनाव हमारे जीवन का स्थायी निवासी बन जाता है।
फिर रातें लंबी होने लगती हैं।
नींद बिस्तर पर होती है, लेकिन मन कहीं और भटक रहा होता है।
चेहरे पर मुस्कान होती है, लेकिन भीतर बेचैनी चल रही होती है।
लोग पूछते हैं, "सब ठीक है न?" और हम आदतन जवाब दे देते हैं, "हाँ, सब ठीक है।"
जबकि सच यह होता है कि बहुत कुछ ठीक नहीं होता।
जीवन ने मुझे एक बात सिखाई है तनाव से लड़कर कोई नहीं जीतता। जितना हम उससे भागते हैं, वह उतना ही हमारा पीछा करता है। लेकिन जब हम रुककर उसकी वजह को समझने लगते हैं, तो उसका आकार छोटा होने लगता है।
कभी-कभी समाधान किसी बड़ी किताब में नहीं मिलता।
कभी वह शाम की एक सैर में मिल जाता है।
कभी माँ के साथ दस मिनट की बातचीत में।
कभी किसी पुराने दोस्त की हँसी में।
कभी किसी पेड़ के नीचे बैठकर चुप रहने में।
और कभी यह स्वीकार कर लेने में कि हम हर चीज़ को नियंत्रित नहीं कर सकते।
जीवन नदी की तरह है। उसमें बहाव भी होगा, पत्थर भी होंगे और भँवर भी। जो हर लहर से लड़ने की कोशिश करेगा, वह जल्दी थक जाएगा। जो तैरना सीख लेगा, वही आगे बढ़ पाएगा।
तनाव को जीवन से निकालना शायद संभव नहीं है। लेकिन उसके साथ जीना सीखा जा सकता है।
और शायद परिपक्वता का अर्थ भी यही है हर समस्या को खत्म कर देना नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में अपने भीतर की शांति को बचाए रखना।
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