Tuesday, June 30, 2026

बच्चों को अपनी तरह समझने की भूल मत कीजिए

 बच्चों को अपनी तरह समझने की भूल मत कीजिए


आजकल के बच्चों को बिल्कुल भी अपनी तरह समझने की भूल मत कीजिए।


क्योंकि हमारे और उनके बचपन के बीच केवल कुछ वर्षों का अंतर नहीं है, पूरी दुनिया बदल चुकी है।


आज उनके हाथ में मोबाइल है, और उस मोबाइल में पूरी दुनिया है।


उसमें ज्ञान भी है, विज्ञान भी है, कला भी है, अवसर भी हैं। लेकिन उसी के साथ अज्ञानता भी है, भ्रम भी है, दिखावा भी है और ऐसी असंख्य बातें भी हैं जिन्हें समझने की उम्र अभी उनके पास नहीं है।


वे क्या देख रहे हैं, क्या सुन रहे हैं, किससे प्रभावित हो रहे हैं, कौन-सी बात उनके मन में घर कर रही है  यह बात कई बार माता-पिता को भी नहीं पता होती।


एक शब्द, एक चित्र, एक वीडियो या एक विचार कब किसी बच्चे के भीतर जाकर बैठ जाए, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है।


आजकल अक्सर माता-पिता बच्चों के हाथ में मोबाइल या रील्स देकर अपने दूसरे कामों में व्यस्त हो जाते हैं। बाहर से सब सामान्य दिखाई देता है। बच्चा शांत बैठा है, कोई शोर नहीं कर रहा, कोई ज़िद नहीं कर रहा।


लेकिन उसी समय उसकी आँखों के सामने से न जाने कितनी दुनियाएँ गुजर रही होती हैं।


और सबसे विचित्र बात यह है कि इंटरनेट केवल वह जगह नहीं है जिसे हम देखते हैं, इंटरनेट हमें भी देखता है।


हम किस वीडियो पर रुके, किस तस्वीर को देर तक देखा, किस बात पर हँसे, किस बात पर हैरान हुए, क्या खोजा, क्या पसंद किया यह सब कहीं न कहीं दर्ज होता रहता है।


फिर धीरे-धीरे हमें वही दिखाया जाने लगता है जो हमें अच्छा लगता है।


वही विचार।


वही विषय।


वही दुनिया।


और एक समय ऐसा आता है जब मनुष्य को लगने लगता है कि पूरी दुनिया वैसी ही है जैसी उसकी स्क्रीन पर दिखाई दे रही है।


जबकि वह दुनिया नहीं देख रहा होता, बल्कि दुनिया का केवल वही हिस्सा देख रहा होता है जिसे कोई अदृश्य व्यवस्था उसके सामने बार-बार ला रही होती है।


धीरे-धीरे लाइक तालियों जैसे लगने लगते हैं।


कमेंट स्वीकृति जैसे लगने लगते हैं।


और फोन खोलते ही सबसे पहले नज़र अपने ही पोस्ट की प्रतिक्रियाओं पर जाती है।


कितने लोगों ने देखा?


कितनों ने पसंद किया?


किसने क्या कहा?


फिर अगली पोस्ट भी कहीं न कहीं उन्हीं प्रतिक्रियाओं से प्रभावित होकर बनाई जाने लगती है।


लेकिन कभी स्वयं से यह प्रश्न पूछकर देखिए—


यदि कल आपकी सोशल मीडिया आईडी बंद हो जाए तो क्या होगा?


क्या उतने ही लोग आपके साथ जुड़े रहेंगे?


क्या उतनी ही भीड़ फिर आपके आसपास दिखाई देगी?


क्या आपकी बात उतने ही लोगों तक पहुँचेगी?


शायद नहीं।


क्योंकि वास्तविक संबंध और डिजिटल भीड़, दोनों एक जैसी चीज़ें नहीं हैं।


लेकिन यह बात एक बड़ा व्यक्ति भी कई बार नहीं समझ पाता, तो फिर उस बच्चे से इसकी अपेक्षा कैसे की जा सकती है जिसकी समझ अभी विकसित हो रही है?


बच्चे का मन खेत की उस नई मिट्टी की तरह होता है जिसमें जो बीज पहले बो दिए जाते हैं, वही सबसे गहरी जड़ें बनाते हैं।


एक दृश्य मन में बस जाता है।


एक कहानी सोच बदल देती है।


एक विचार जीवन भर साथ चल सकता है।


इसीलिए दुनिया में बड़े-बड़े परिवर्तन केवल हथियारों से नहीं हुए, विचारों से भी हुए हैं।


एक दृश्य लोगों को प्रेरित कर सकता है।


एक दृश्य लोगों को भटका भी सकता है।


तो फिर उस बच्चे का क्या, जो बिना किसी मार्गदर्शन के हर दिन अनगिनत दृश्य, विचार और संदेश अपने भीतर उतार रहा है?


और यदि उसने किसी एक विषय में रुचि दिखा दी, तो इंटरनेट उसे उसी रास्ते पर और आगे ले जाता रहेगा।


वह वही देखेगा।


वही सुनेगा।


वही पढ़ेगा।


धीरे-धीरे उसके चारों ओर विचारों की एक ऐसी दीवार खड़ी हो सकती है जिसके बाहर की दुनिया उससे ओझल होने लगे।


इसीलिए बच्चों को केवल मोबाइल देकर व्यस्त कर देना समाधान नहीं है।


उन्हें जीवन से जोड़ना होगा।


उन्हें लोगों से जोड़ना होगा।


उन्हें प्रकृति से जोड़ना होगा।


उन्हें अनुभवों से जोड़ना होगा।


उनके साथ खेलिए।


शतरंज खेलिए।


गणित को खेल बनाइए।


पूछिए कि हमारे कमरे में कितनी ज्यामिति छिपी हुई है।


खिड़की, दरवाज़े, मेज़ और दीवारों में कौन-कौन से आकार दिखाई देते हैं।


रात में आसमान की ओर देखिए और चाँद, तारों और ग्रहों की बातें कीजिए।


गीतों में विज्ञान खोजिए।


कहानियों में इतिहास खोजिए।


खेलों में शिक्षा खोजिए।


क्योंकि बच्चे केवल पढ़कर नहीं सीखते, वे जीकर सीखते हैं।


मोबाइल उन्हें जानकारी दे सकता है, लेकिन अनुभव नहीं।


इंटरनेट उन्हें उत्तर दे सकता है, लेकिन जिज्ञासा नहीं।


स्क्रीन उन्हें चित्र दिखा सकती है, लेकिन जीवन का स्पर्श नहीं दे सकती।


इसलिए बच्चों के हाथ में मोबाइल होने से पहले उनके जीवन में खेल होने चाहिए, प्रश्न होने चाहिए, दोस्त होने चाहिए, किताबें होनी चाहिए, खुला आसमान होना चाहिए और परिवार के साथ बिताया गया समय होना चाहिए।


क्योंकि यदि बचपन केवल स्क्रीन पर बीत गया, तो संभव है कि बच्चे बहुत कुछ जान जाएँ, लेकिन जीवन को महसूस करना भूल जाएँ।


और जिस दिन बच्चे जीवन को महसूस करना भूल जाते हैं, उसी दिन समाज धीरे-धीरे संवेदनशील मनुष्यों की जगह केवल जानकारी से भरे लोगों को तैयार करने लगता है।


बच्चों को तकनीक से दूर मत कीजिए, लेकिन उन्हें केवल तकनीक के भरोसे भी मत छोड़ दीजिए।


क्योंकि आने वाले समय में उन्हें सबसे अधिक आवश्यकता तेज़ इंटरनेट की नहीं, बल्कि सही और गलत के बीच अंतर समझने वाली बुद्धि की होगी।


और वह बुद्धि किसी ऐप से डाउनलोड नहीं होती, वह परिवार, अनुभव, संवाद, खेल, प्रकृति और जीवन से मिलती है।


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