साक्षी है ध्यान की आत्मा
"ध्यान का सार साक्षीभाव है।"
ओशो कहते हैं कि मनुष्य का सारा दुःख इस कारण है कि वह अपने विचारों, भावनाओं और इच्छाओं के साथ स्वयं को जोड़ लेता है। जब क्रोध आता है, वह कहता है "मैं क्रोधित हूँ"; जब दुःख आता है, वह कहता है "मैं दुःखी हूँ।" लेकिन ध्यान की दृष्टि से यह भ्रम है।
तुम न विचार हो, न भावनाएँ, न शरीर। तुम तो केवल उनके देखने वाले हो। यही देखने वाला साक्षी है, और यही ध्यान की आत्मा है।
शांत बैठो और अपने भीतर जो कुछ भी घट रहा है उसे बिना किसी निर्णय, बिना किसी विरोध और बिना किसी पक्षपात के देखते रहो। विचार आएँ तो आने दो, जाएँ तो जाने दो। उनसे लड़ो मत। केवल जागरूक रहो।
धीरे-धीरे तुम्हें अनुभव होगा कि विचार अलग हैं और तुम अलग हो। विचार बादलों की तरह आते-जाते रहते हैं, लेकिन तुम्हारी चेतना आकाश की तरह सदा शांत और स्थिर रहती है।
ओशो कहते हैं कि जिस दिन साक्षीभाव पूर्ण हो जाता है, उसी दिन ध्यान घटित होता है। तब भीतर मौन का जन्म होता है, आनंद स्वतः प्रकट होता है और जीवन एक उत्सव बन जाता है
"साक्षी ही ध्यान की आत्मा है। जो साक्षी बन गया, वह मुक्त हो गया।"
अपने विचारों को बदलने की कोशिश मत करो, केवल उन्हें देखो। देखने की यही कला ध्यान है।
अगर ये बात समझ गए, तो किसी से नाराज़ नहीं रहोगे।
जीवन में हर व्यक्ति अपने अनुभवों, परिस्थितियों और समझ के अनुसार व्यवहार करता है। जब हम लोगों को उनकी कमियों सहित स्वीकार करना सीख जाते हैं, तो मन में शिकायत कम और सहानुभूति अधिक पैदा होती है। क्षमा और समझदारी मन को हल्का करती है, रिश्तों को मजबूत बनाती है और जीवन में शांति लाती है।
Smart thinking is not only about having ideas — it’s about knowing how to use the right type of thinking at the right time. Analyze, reflect, create, question, plan, and choose better. A sharper mind creates better decisions in work and life...
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