हर प्रतिक्रिया का कारण सामने वाला नहीं होता...
मनोविज्ञान कहता है कि मनुष्य केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया नहीं देता, वह उन घटनाओं को अपने भीतर दिए गए अर्थों पर प्रतिक्रिया देता है।
इसीलिए एक ही बात किसी को हँसा देती है, किसी को आहत कर देती है और किसी को बिल्कुल प्रभावित नहीं करती।
जब कोई व्यक्ति हर बात पर टिप्पणी करता है, हर असहमति का प्रतिवाद करता है, हर आलोचना का उत्तर देना अपना कर्तव्य समझता है, तब अक्सर वह वर्तमान से नहीं, अपने भीतर के किसी अधूरे संघर्ष से संचालित हो रहा होता है।
कई बार यह संघर्ष स्वीकृति की भूख का होता है।
उसे केवल सही होना नहीं होता, उसे यह महसूस करना होता है कि उसका अस्तित्व महत्वपूर्ण है।
कई बार यह अहंकार की रक्षा होती है।
क्योंकि यदि वह एक बार भी रुक गया, एक बार भी स्वीकार कर लिया कि शायद दूसरा व्यक्ति भी सही हो सकता है, तो उसकी बनाई हुई आत्म-छवि में दरार पड़ सकती है।
और कई बार यह उससे भी गहरा होता है।
मनोविज्ञान में इसे compulsive reaction कहा जाता है — ऐसी प्रतिक्रिया जिसे व्यक्ति स्वयं भी अनावश्यक समझता है, फिर भी रोक नहीं पाता।
वह जानता है कि यह बहस किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचेगी। वह जानता है कि यह संवाद उसके संबंधों को बेहतर नहीं बनाएगा। वह जानता है कि इससे उसकी शांति भी नष्ट होगी।
फिर भी वह प्रतिक्रिया देता है।
क्यों?
क्योंकि उस क्षण उसका उद्देश्य सत्य खोजना नहीं होता, बल्कि भीतर उठी बेचैनी से अस्थायी राहत पाना होता है।
हर उत्तर उसे कुछ क्षणों के लिए यह भ्रम देता है कि उसने स्वयं को बचा लिया है।
लेकिन बेचैनी का स्रोत बाहर नहीं था, इसलिए राहत भी टिकती नहीं।
फिर नया तर्क, नई प्रतिक्रिया, नई बहस।
और यह चक्र चलता रहता है।
विडंबना यह है कि ऐसे व्यक्ति को अक्सर लगता है कि वह दूसरों को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है, जबकि वास्तविकता में वह स्वयं अपनी ही प्रतिक्रियाओं द्वारा नियंत्रित हो रहा होता है।
आंतरिक स्वतंत्रता का पहला संकेत यह नहीं कि व्यक्ति कितना बोल सकता है।
आंतरिक स्वतंत्रता का पहला संकेत यह है कि वह कब न बोलने का चुनाव कर सकता है।
क्योंकि परिपक्वता का अर्थ हर बात का उत्तर जानना नहीं, बल्कि यह जानना है कि कौन-सी बात उत्तर के योग्य ही नहीं है।
जो व्यक्ति हर लड़ाई लड़ना चाहता है, वह अभी स्वयं से नहीं मिला है।
जो स्वयं से मिल लेता है, उसकी बहुत-सी लड़ाइयाँ बिना लड़े समाप्त हो जाती हैं।
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