मासूमियत की सज़ा
मासूम हूँ बहुत
शायद ये बात वो समझ न पाया
या फिर शायद कभी उसकी
मुलाक़ात मासूम दिलों से हुई ही नहीं।
या फिर इस आधुनिकता की चकाचौंध में
स्वार्थ की मोटी परतों ने
उसकी आँखों पर पर्दा डाल दिया हो।
जिस आईने में वो खुद को देखता है
शायद उसमें सच्चाई की जगह
सिर्फ़ मतलब की धुंध भरी हो।
वो स्वार्थी है
बेपरवाह भी…
हर चीज़ को तौलता है
अपने फ़ायदे की तराज़ू में।
और शायद
शायद मेरी मासूमियत को न समझ पाने में
वो नादान भी है…
पर क्या नादानी भी कोई बहाना है?
क्या किसी की सच्चाई को न समझना
एक भूल भर होती है?
मेरी खामोशी को वो कमजोरी समझ बैठा
मेरी सादगी को बेवकूफ़ी का नाम दे बैठा।
पर मैं आज भी वही हूँ
मासूम, सच्ची, और दिल से साफ़…
शायद इस दुनिया में
ऐसे लोग अब गिने-चुने ही रह गए हैं।
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