Friday, June 26, 2026

माँ की ममता

 माँ को लेकर सबसे अजीब बात यह है कि हम उसे “मान लेते” हैं। जैसे वह कोई चीज़ नहीं, एक स्थायी स्थिति हो घर का तापमान, सुबह की रोशनी, या पानी का होना।


वह होती है तो ध्यान नहीं जाता। और जब थोड़ा भी कम होती है, तो अचानक घर का पूरा संतुलन समझ आने लगता है लेकिन तब तक हम उसे समझने की आदत खो चुके होते हैं।


उसकी दिनचर्या में कोई नाटकीयता नहीं होती। बस लगातार चलती हुई छोटी-छोटी चीज़ें चाय, खाना, पूछना, याद रखना, इंतज़ार करना। ये सब इतना सामान्य लगता है कि हम इनके पीछे की मेहनत देखना बंद कर देते हैं।


कभी वह कुछ दोहराकर पूछ लेती है, कभी कोई बात देर से समझती है। हम मुस्कुरा देते हैं या अधीर हो जाते हैं। हमें नहीं दिखता कि समय उसके भीतर भी चल रहा है बस उसकी रफ्तार बदल गई है।


और हम… हम जल्दी में हैं। हमेशा।


उसकी आवाज़ कई बार घर के कोनों में रह जाती है। वह बोलती है, लेकिन जवाबों की जगह अक्सर सिर्फ “हाँ-हाँ” या “बाद में” मिलते हैं। वह फिर भी बोलना नहीं छोड़ती। शायद इसलिए कि बोलते रहना ही उसका जुड़ाव है।


उसके पास बैठने का मतलब सिर्फ बैठना नहीं होता वह तुम्हें देखती है, बिना ज्यादा पूछे समझने की कोशिश करती है, और फिर खुद को पीछे कर लेती है ताकि तुम्हारी जगह बनी रहे।


उसने अपने जीवन को बहुत छोटे-छोटे हिस्सों में बाँट दिया है इतने छोटे कि हम उन्हें अलग से देख ही नहीं पाते। पूरा जोड़ो तो पता चलता है कि बहुत कुछ था जो उसने अपने लिए कभी रखा ही नहीं।


और दिलचस्प यह है कि वह इसे त्याग कहकर नहीं जीती। उसके लिए यह “सामान्य” है। यही बात इसे और भारी बना देती है क्योंकि जो चीज़ किसी के लिए सामान्य हो, वह दुनिया की नजर में अक्सर अदृश्य हो जाती है।


कभी-कभी तुम उससे तेज़ बोल देते हो, या बिना देखे जवाब दे देते हो। वह उसी पल में कुछ नहीं कहती। वह रुकती है, फिर आगे बढ़ जाती है जैसे उसने अपने भीतर एक छोटी-सी जगह बनाना सीख लिया हो जहाँ ऐसी बातें गिरकर खो जाएँ।


उसकी याददाश्त अब पहले जैसी नहीं रहती, पर उसकी चिंता पहले जैसी ही रहती है। फर्क बस इतना है कि अब वह उसे शब्दों में नहीं, अपनी चुप्पी में रखती है।


घर के किसी कोने में जब वह अकेली होती है, तो वह शायद बहुत कुछ नहीं सोचती बस दिन के कामों को दोहराती है, और बीच-बीच में तुम्हें याद कर लेती है। यह याद करना उसके लिए कोई भावुक क्षण नहीं, एक आदत है।


और यही सब धीरे-धीरे एक दिन समझ में आता है कि माँ कोई बड़ी घटना नहीं थी, वह लगातार चलती हुई एक उपस्थिति थी, जिसे हमने “हमेशा रहेगा” समझकर देखा ही नहीं।

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