शरीर और मन गहरे रूप से जुड़े हुए हैं। जब शरीर अस्वस्थ होता है, थका हुआ होता है या पीड़ा में होता है, तब मन पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। ऐसी अवस्था में नकारात्मक विचार, निराशा, चिंता और उदासी का उठना स्वाभाविक है। इसलिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि हर नकारात्मक विचार आपका सत्य नहीं है; वह कभी-कभी शरीर की अस्वस्थता की प्रतिक्रिया भी हो सकता है।
ओशो कहते हैं कि बीमारी के समय मन से लड़ना नहीं चाहिए। यदि शरीर कमजोर है और मन में नकारात्मक विचार आ रहे हैं, तो उनके विरुद्ध युद्ध मत छेड़ो। केवल उन्हें देखो। साक्षी बनो। विचार आते हैं, जाते हैं; तुम विचार नहीं हो। जो उन्हें देख रहा है, वही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है।
बीमारी में अक्सर व्यक्ति भविष्य की चिंता करने लगता है—“मैं ठीक हो पाऊँगा या नहीं?”, “मेरा क्या होगा?”। ओशो कहते हैं कि भविष्य की कल्पनाएँ दुख को बढ़ाती हैं। वर्तमान क्षण में लौट आओ। इस क्षण जो है, उसे स्वीकार करो। शरीर बीमार हो सकता है, लेकिन भीतर की चेतना बीमार नहीं होती।
वे यह भी कहते हैं कि शरीर को प्रेम दो, क्योंकि शरीर तुम्हारा मंदिर है। पर्याप्त विश्राम करो, संतुलित भोजन लो, चिकित्सकीय सलाह का पालन करो और अपने शरीर से संघर्ष मत करो। बीमारी को शत्रु मत मानो; कभी-कभी वह शरीर का संकेत होती है कि जीवन की गति, आदतों या दृष्टिकोण में परिवर्तन की आवश्यकता है।
ध्यान बीमारी के समय बहुत सहायक हो सकता है। यदि लंबा ध्यान संभव न हो, तो केवल शांत बैठकर अपनी श्वास को देखो। श्वास भीतर जाती है, बाहर आती है—बस उसका साक्षी बने रहो। धीरे-धीरे मन का बोझ हल्का होने लगेगा। नकारात्मक विचारों की शक्ति कम हो जाएगी, क्योंकि उन्हें ऊर्जा तुम्हारे विरोध या पहचान से मिलती है।
ओशो कहते हैं कि अंधकार से लड़ने की आवश्यकता नहीं होती; केवल एक दीपक जलाना होता है। उसी प्रकार नकारात्मक विचारों से लड़ो मत। जागरूकता का दीपक जलाओ। जितनी अधिक जागरूकता होगी, उतनी ही कम नकारात्मकता रह जाएगी।
ओशो का संदेश है:
"शरीर की बीमारी को स्वीकार करो, मन के विचारों को देखो, और चेतना में विश्राम करो। बीमारी अस्थायी है, साक्षी शाश्वत है। जब तुम देखने वाले बन जाते हो, तब दुख का रूपांतरण होने लगता है।"
"बीमारी में भी शांत रहो। शरीर बदलता है, मन बदलता है, लेकिन तुम्हारे भीतर जो साक्षी है, वह कभी बीमार नहीं होता। उसी में विश्राम करो।"
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