ये दुनिया सच में बड़ी मादर*** है ! और गांव के लोग जिन्हें सब बड़े भोले भाले समझते हैं वहां तो कुछ और भी बड़े वाले होते हैं।
सच कहें तो अभी तक गांव और वहां की मिट्टी को लेकर जो एक भोलेपन का रूमानी नैरेटिव गढ़ा गया है, उस पर से परदा हटना बहुत ज़रूरी है। दुनिया कितनी अजीब है, इसकी एक ताज़ा बानगी कल अपने ही गांव में देखने को मिल गई।
वैसे तो गांव छोड़े 17 साल हो चुके हैं। घर-जमीन-जायदाद सब आज भी वहीं है, लेकिन हमारा आना-जाना कभी-कभार ही हो पाता है। इस बार भी पुराने घर में मरम्मत का काम चल रहा था, उसी सिलसिले में जाना हुआ। दोपहर की चिलचिलाती धूप थी। काम देखते-देखते प्यास लगी और साथ में पानी की बोतल भी नहीं थी। सोचा, अपने ही लोग हैं, एक गिलास पानी मांगना कौन सा बड़ा अपराध है?
लेकिन शायद इसी भ्रम का टूटना बाकी था।
बगल के रास्ते पर तीन लोग खड़े थे, जिनकी वहीं घर-दुकान है। पहले महाशय हमारे पंडित जी थे—मतलब शास्त्रों वाले नहीं, जाति वाले। वही पंडित जी जिनका परिवार वर्षों तक हमारे घर के हर तीज-त्योहार, श्राद्ध और भोज का हिस्सा रहा। सालों तक हमारे घर से उनके यहां थाली पहुंचती रही और विशेष अवसरों पर उन्हें आदर से बुलाकर खिलाया जाता रहा।
दूसरे सज्जन भी पुराने परिचित थे और तीसरे वो नौजवान, जो कुछ दिन पहले तक नौकरी के लिए मिन्नतें कर रहे थे, जिनके लिए फोन घुमाकर बात तक कराई गई थी।
मैंने पानी के लिए पूछा।
जवाब मिला—"हम तो खुद नलके पर जाकर पी लेते हैं।"
मैंने कहा, "कोई जग, गिलास या बोतल ही दे दो। सरकारी नलके का पाइप इतना नीचे है कि वहां मुँह लगाकर पानी पीना भी मुश्किल है।"
तीनों ने एक साथ गर्दन ऐसे हिला दी जैसे घर में गिलास रखना कोई दंडनीय अपराध हो।
आखिरकार अपने ही गांव में, अपनी ही जमीन पर, घुटनों के बल बैठकर सरकारी नल से मुँह लगाकर पानी पीना पड़ा।
हालांकि यह इंसान उम्र में काफी बड़ा है और इसके हमउम्र और साथ रहने वाले लोगों को इसके बारे में नकारात्मक बातें (इसका जिक्र होते ही हराम** शब्द का उच्चारण) करने के बावजूद भी भरपूर सम्मान देते आया हूँ ।
अब सवाल यह है कि मामला क्या था?
छुआछूत? बिल्कुल नहीं।
साला जिन लोगों ने दशकों तक हमारे घर का अन्न खाया हो, उनके बारे में ऐसा सोचना भी मुश्किल है। पानी की कमी भी नहीं थी। असली बीमारी शायद कुछ और है।
मुझे लगता है कि यह वही पुरानी इंसानी कुंठा है, जो अक्सर छोटे समाजों में चुपचाप पलती रहती है। जब कोई व्यक्ति गांव से निकलकर अपनी दुनिया बना लेता है और फिर कभी-कभार लौटता है, तो कुछ लोगों के भीतर अजीब सा अहंकार जाग उठता है। उन्हें लगता है कि चलो, आज इसे एहसास करा दें कि चाहे बाहर कितना भी बड़ा आदमी बन गया हो, यहां तो पानी भी हमारी मर्जी से मिलेगा।
शायद यह किसी को परेशान देखकर मिलने वाला वह छोटा-सा मानसिक सुख है, जिसे शब्दों में समझाना मुश्किल है।
सबसे ज्यादा हैरानी इस बात की हुई कि जो लोग आते-जाते सलाम ठोकते थे, वही एक गिलास पानी तक देने को तैयार नहीं हुए।
लोग गांव की सादगी, अपनापन और संस्कारों पर बड़े-बड़े भाषण देते हैं। लेकिन सच यह है कि किसी समाज की असली परीक्षा बड़े आयोजनों में नहीं, ऐसे छोटे मौकों पर होती है। जहां एक प्यासे आदमी को पानी देने में भी मन छोटा पड़ जाए, वहां विकास की बातें किताबी लगती हैं।
खैर, इस घटना ने इतना जरूर सिखा दिया कि इंसान को जगहों से व लोगों से उम्मीद नहीं बांधनी चाहिए—और उम्मीद जितनी कम हो, निराशा भी उतनी कम होती है।
बाकी, रामजी सबका भला करें...
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