Friday, June 26, 2026

आंदोलन

 कुछ लक्ष्य ऐसे होते हैं जो केवल हमारे विचारों में नहीं रहते, वे हमारे अवचेतन मन में उतर जाते हैं। फिर वे लक्ष्य नहीं रहते, वे हमारी पहचान बन जाते हैं। उन्हें भूलना असंभव-सा लगता है। हाँ, मनुष्य चाहे तो स्वयं को बदल सकता है, दिशा बदल सकता है, लेकिन जो एक बार आत्मा में बस गया हो, उसकी छाप जीवन भर रहती है।


मैं भी कभी एक आंदोलन में जीने लगा था।


यह कोई साधारण आंदोलन नहीं था। यह पश्चिम बंगाल के तराई, डुआर्स और पहाड़ के लाखों चाय मजदूरों के जमीन के अधिकार और न्यूनतम मजदूरी की लड़ाई थी। धीरे-धीरे यह संघर्ष मेरे लिए एक सामाजिक विषय नहीं रहा; यह मेरे जीवन का केंद्र बन गया।


मैं महीनों घर से बाहर रहता। चाय बागानों में जाता, लोगों से मिलता, साथियों के साथ गाँव-गाँव घूमता, मजदूरों को जोड़ता, उनकी कहानियाँ सुनता, उनकी पीड़ा को समझता। दिन-रात एक ही विचार मन में चलता—कैसे लाखों लोगों को एक साथ लाया जाए? कैसे उनकी आवाज़ को इतना मजबूत बनाया जाए कि सत्ता उसे अनसुना न कर सके?


माँ-पिता चाहते थे कि मैं कोई नौकरी करूँ, अपना जीवन स्थिर बनाऊँ। उनकी चिंता भी उचित थी। मैं उनका इकलौता बेटा हूँ। लेकिन उस समय मेरा मन पूरी तरह आंदोलन में था। मैं रणनीतियाँ बनाता, नेताओं से सवाल पूछता, मंचों पर खुलकर बोलता। हम कुछ लोगों ने मिलकर एक संगठन बनाया, और देखते ही देखते वह पढ़े-लिखे युवाओं का एक चेतना समूह बन गया।


फिर परिस्थितियाँ बदलीं।


माँ-पिता को समझते हुए मुझे काम के लिए राजस्थान जाना पड़ा। लेकिन आंदोलन मेरे भीतर से नहीं निकला। वहाँ भी जमीन और अधिकारों से जुड़ा संघर्ष चल रहा था। उदयपुर के कोटड़ा ब्लॉक के कुकावास और विकरणी जैसे क्षेत्रों में लोगों से मिला। पंचायत प्रतिनिधियों से बातचीत की। अलग-अलग संघर्षों को जोड़ने और विधानसभा घेराव जैसी रणनीतियों पर विचार करने लगा।


लेकिन इसी दौरान एक गहरी बात समझ में आई।


मैं जिन लोगों के बीच काम कर रहा था, उनके संघर्ष केवल आर्थिक नहीं थे। उनके भीतर टूटन थी, निराशा थी, असहायता थी। मैंने महसूस किया कि सबसे बड़ी लड़ाई कई बार जमीन या मजदूरी की नहीं होती, बल्कि मन की होती है। करुणा की बातें बहुत लोग करते हैं, लेकिन वास्तविक करुणा किसी के भीतर की पीड़ा को समझने में है।


फिर जीवन मुझे उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ले गया।


वहाँ मैंने बच्चों को निशुल्क शिक्षा देना शुरू किया।


धीरे-धीरे एक सत्य मेरे सामने स्पष्ट हुआ। चाय बागानों के आंदोलन में मेरी भूमिका का सबसे सुंदर समय बीत चुका था। उस बीते हुए समय को पकड़कर रखने का कोई अर्थ नहीं था। स्मृतियाँ सम्मान की पात्र हो सकती हैं, लेकिन वे भविष्य नहीं बन सकतीं।


तब मैंने अपने भीतर बसे आंदोलन को समाप्त नहीं किया; मैंने उसकी दिशा बदल दी।


जिस ऊर्जा से कभी मैं मजदूरों को संगठित करता था, उसी ऊर्जा को मैंने ध्यान और चेतना की ओर मोड़ दिया।


लोग अक्सर पूछते हैं कि मैं स्त्री-पुरुष संबंधों, ध्यान, प्रेम, सम्भोग, चेतना और जीवन के इतने गंभीर विषयों पर कैसे लिख पाता हूँ।


उसका उत्तर सरल है।


मैं ध्यान देता हूँ।


मैं ध्यान के माध्यम से सृजन करने का प्रयास करता हूँ। जो कुछ भी जन्म लेता है, वह मेरे सामने उपस्थित हो जाता है। मैं उसे देख सकता हूँ, महसूस कर सकता हूँ, उसके साथ चल सकता हूँ। लेकिन मैं वहाँ रुकता नहीं। क्योंकि मुझे पता है कि जहाँ सृजनकर्ता अपने ही सृजन में फँस जाता है, वहीं उसकी यात्रा रुक जाती है। मैं केवल उसे शब्दों में उतारने का प्रयास करता हूँ।


आज मैं एक छोटी-सी दुकान पर बैठता हूँ। ग्राहक आते हैं, जाते हैं। ध्यान बार-बार बंटता है। लिखने में बाधाएँ आती हैं। लेकिन अब मैंने बाधाओं से लड़ना छोड़ दिया है। मैंने उन्हें जीवन का हिस्सा मान लिया है।


इसी बीच "इवनिंग पाठशाला ट्रस्ट" की शुरुआत हुई।


गाँव के बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का एक छोटा-सा प्रयास।


लेकिन यह शिक्षा केवल किताबों की शिक्षा नहीं है।


छह महीने लगे, लेकिन आज बच्चे दो घंटे तक गहरे ध्यान में बैठ सकते हैं। वे चेतन और अवचेतन मन के बारे में सीखते हैं। समझते हैं कि आदतें कैसे बनती हैं, व्यवहार कैसे बदलता है, हमारी सीमाएँ क्या हैं, चेतन मन क्या कर सकता है और अवचेतन मन में क्या घटता है।


वे सीखते हैं कि पहले संवेदना आती है या भावना।


वे शब्द बनाना सीखते हैं।


जो बच्चे पहले एक अक्षर तक नहीं लिख पाते थे, आज वे अपने विचारों को वाक्यों में व्यक्त कर रहे हैं। जो बोलने से डरते थे, वे अब चर्चा में भाग लेते हैं। जिनके पास शब्द नहीं थे, उनके पास अब अपनी आवाज़ है।


हम गणित सीखते हैं।


घर की साधारण वस्तुओं से विज्ञान के प्रयोग करते हैं।


पुराने शादी के कार्ड मोटे कागज बन जाते हैं। पानी से भरे गिलास प्रयोगशाला बन जाते हैं। बच्चे स्वयं खोजते हैं, स्वयं प्रश्न पूछते हैं, स्वयं उत्तर ढूँढ़ते हैं।


वे ध्यान करते हैं।


भारत के इतिहास को समझते हैं।


अपने अनुभव साझा करते हैं।


जो चर्चा होती है, उसे लिखते हैं।


दिन के अंत में बैठकर विचार करते हैं कि आज क्या सीखा।


वे एक-दूसरे की सहायता करते हैं।


वे नवाचार करते हैं।


और सबसे महत्वपूर्ण बात वे स्वयं को समझना सीख रहे हैं।


कई बार मुझे लगता है कि यह काम केवल बच्चों के लिए नहीं है।


यह तो हर मनुष्य के लिए है।


यदि कुछ बच्चे अपनी चेतना को समझकर इतना बदल सकते हैं, तो समाज भी बदल सकता है। लोग भी बदल सकते हैं। संबंध भी बदल सकते हैं। जीवन भी बदल सकता है।


लेकिन हर विचार का अपना समय होता है।


आज मेरे पास इतनी व्यवस्था नहीं है कि मैं लाखों लोगों तक पहुँच सकूँ।


इसलिए जहाँ हूँ, वहीं काम कर रहा हूँ।


जितना कर सकता हूँ, उतना कर रहा हूँ।


क्योंकि अब मैं समझ चुका हूँ कि परिवर्तन हमेशा विशाल मंचों से शुरू नहीं होता। कई बार वह एक छोटे कमरे से शुरू होता है, जहाँ कुछ बच्चे बैठकर पहली बार अपने मन को देखना सीख रहे होते हैं।


शायद यही मेरा नया आंदोलन है।


पहले मैं लोगों को उनके अधिकारों के लिए जगाना चाहता था।


आज मैं उन्हें स्वयं के प्रति जागृत होते देखना चाहता हूँ।


संघर्ष बदल गया है, लेकिन उद्देश्य नहीं।


पहले आंदोलन बाहर था।


अब आंदोलन भीतर है।


और शायद दुनिया के हर बड़े परिवर्तन की शुरुआत यहीं से होती है।

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